कर पाओगे कोई! बिना आंखों के सैकड़ों बच्चों के जीवन में लाया उजाला      

आंखों से दिव्यांगता के बाद भी कुशल शिक्षण कार्य के लिए शैलेन्द्र सिंह को आज पूरे जनपद में जाना जा रहा है। आज पूरे देश में शिक्षक दिवस मनाया जा रहा है लेकिन शिक्षक शैलेन्द्र सिंह आज सभी शिक्षकों के लिए बड़ी मिसाल बने हुए है। समाज मे ऐसे जज्बा और  जुनून वाले शिक्षक बहुत कम देखने को मिलते है।

कानपुर: इंसान अगर चाह ले तो पत्थर को भी पिघलाकर मोम बना सकता है। जिंदगी में असंभव नाम की कोई चीज नही होती है यह साकार कर दिखाया कपराहट कहिंजरी के दिव्यांग शिक्षक शैलेन्द्र सिंह ने। बतौर शैलेन्द्र सिंह की आंखों में रोशनी नही है लेकिन फिर भी वे अपनी शिक्षा से  सैकड़ों बच्चों की जिंदगी को रोशन कर रहे है।

शैलेन्द्र सिंह आज सभी शिक्षकों के लिए बड़ी मिसाल

आंखों से दिव्यांगता के बाद भी कुशल शिक्षण कार्य के लिए शैलेन्द्र सिंह को आज पूरे जनपद में जाना जा रहा है। आज पूरे देश में शिक्षक दिवस मनाया जा रहा है लेकिन शिक्षक शैलेन्द्र सिंह आज सभी शिक्षकों के लिए बड़ी मिसाल बने हुए है। समाज मे ऐसे जज्बा और  जुनून वाले शिक्षक बहुत कम देखने को मिलते है।

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इंसान के अंदर अगर जज्बा है तो वह हर मुश्किल को आसान कर सकता है। रसूलाबाद क्षेत्र के कपराहट के जिले में स्थित प्राथमिक विद्यालय के शैलेंद्र सिंह भदौरिया ने ऐसा ही कर दिखाया नेत्रों से दिव्यांग शैलेंद्र सिंह कपराहट गांव के ही रहने वाले हैं विशिष्ट बीटीसी करने के बाद उन्होंने प्राथमिक विद्यालय कपराहट  में ही प्रशिक्षण किया।

सहायक अध्यापक के पद पर कर चुके हैं काम

उन्होंने चित्रकूट में भी शिक्षा पाई। 2009 में उन्होंने शिक्षक की नौकरी पाई। सहायक अध्यापक पर कई वर्षों तक तैनात रहे और  अब प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापक  और जज्बे ने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया। उन्होंने यह साबित कर दिया कि इंसान के अंदर जज्बा और जुनून हो तो उसके लिए दिव्यांग का और विकलांगता कोई मायने नहीं रखती।

उन्होंने कहा कि जितना अच्छा और बेहतर तरीके से कोई कार्य विकलांग और दिव्यांग कर सकता है वह कार्य एक सही सलामत व्यक्ति तक नहीं कर सकता। आलम यह है कि शैलेंद्र सिंह शिक्षकों के लिए एक प्रेरणा बने हैं। इस बात को इस विद्यालय के शिक्षकों ने स्वयं स्वीकार किया।

शैलेंद्र सिंह जन्म से ही आंखों से दिव्यांग। उन्हें आंखों से कुछ नहीं दिखाई देता। उनके पढ़ाये बच्चे शिक्षा में अग्रणी है। इसकी बानगी हमें तब देखने को मिली जब शैलेन्द्र सिंह बच्चों को पढ़ा रहे थे। बच्चे बोर्ड पर लिखते थे तो शैलेन्द्र सिंह इशारों में और उंगली से जोड़कर अच्छे से सिखा देते थे। बच्चा-बच्चा एक सुर में गणित के सवाल लगाकर उन्हें बता देता।

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बच्चे शैलेन्द्र सिंह से ही ज्यादा पढ़ने की इच्छा रखते हैं

वहीं स्कूल के बच्चे शैलेन्द्र सिंह से ही ज्यादा पढ़ने की इच्छा रखते हैं। जब बच्चों से बात की तो उन्होंने भी बताया कि शैलेन्द्र सिंह सबसे अच्छे अध्यापक हैं। शैलेन्द्र सिंह आज समाज में उन लोगों के लिए प्रेरणा बने हैं जो विकलांगता को अभिशाप मानते हैं   जबकि विकलांग होना कोई अभिशाप नहीं है। विकलांग व्यक्ति कभी भी बुद्धि और मन से विकलांग नहीं हो सकता। शैलेंद्र सिंह के हौसलों से विकलांग लोगों में भी प्रेरणा है। शैलेन्द्र सिंह कपराहट गांव के ही निवासी है। उन्होंने कहा कि मैं और बेहतर शिक्षण कार्य करने की कोशिश करूंगा।

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गौरतलब हो कि गत 10 वर्षों से विद्यालय में शिक्षण कार्य दे रहे हैं। विकलांग होने के बावजूद बेहतर शिक्षण कार्य दे रहे हैं।  लेकिन आज तक जिले के अधिकारियों की इस ओर नजर नहीं गई। क्या शैलेन्द्र सिंह जिले के किसी सम्मान के हकदार नहीं है। लेकिन जिले के आला अधिकारियों की नजर नहीं जाती। जिले के अधिकारियों को ऐसी प्रतिभाओं का सम्मान करना चाहिए ताकि कोई व्यक्ति यह सोचकर जीवन न जिये कि वह विकलांग है और वह कुछ नहीं कर सकता। शैलेन्द्र सिंह के कारण कई लोगों को प्रेरणा मिली।