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Lucknow: अयोध्या तो बस झांकी है, काशी-मथुरा बाकी है, भाजपा चल पड़ी है इसी राह!

Lucknow: अयोध्या तो बस झांकी है, काशी-मथुरा बाकी है। यह नारा काफी दिनों भाजपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों की जुबान पर चढ़ा रहा। अब इस नारे को अमली जामा पहनाने की कोशिशों के तेज होने के बाद तनातनी एक बार फिर बढ़ती दिख रही है।

Anshuman Tiwari
Published on 12 May 2022 10:47 AM GMT
Lucknow News In Hindi
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Lucknow: अयोध्या तो बस झांकी है, काशी-मथुरा बाकी है, भाजपा चल पड़ी है अपने अजेंडे पर! (Social Media)

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Lucknow: अयोध्या तो बस झांकी है, काशी-मथुरा बाकी है। यह नारा काफी दिनों भाजपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों की जुबान पर चढ़ा रहा। अब इस नारे को अमली जामा पहनाने की कोशिशों के तेज होने के बाद तनातनी एक बार फिर बढ़ती दिख रही है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद अयोध्या का विवाद सुलझ चुका है और वहां भव्य राम मंदिर का निर्माण जोरों पर चल रहा है। अयोध्या का विवाद सुलझने के बाद अब सियासी और धार्मिक नजरिए से काफी अहम काशी और मथुरा के मुद्दे की गूंज शिद्दत से महसूस की जा रही है।

हालांकि काशी और मथुरा का मुद्दा भी नया नहीं है मगर इन दोनों ही मामलों में अदालती कार्यवाही तेज होने के बाद माहौल गरमाने लगा है। हिंदू पक्षकारों के सक्रिय होने के बाद मुस्लिम पैरोकार भी जवाबी कार्रवाई में जुट गए हैं। मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ की दूसरी पारी शुरू होने के बाद इस मामले में ज्यादा सक्रियता दिख रही है और इसी कारण विपक्षी खेमे में बेचैनी बढ़ती जा रही है।

काशी और मथुरा का मामला गरमाया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी PM Narendra Modi) के हाथों पिछले वर्ष 13 दिसंबर को काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के लोकार्पण के बाद विश्वनाथ मंदिर से सटी ज्ञानवापी मस्जिद एक बार फिर चर्चाओं में है। मस्जिद परिसर के अंदर मौजूद श्रृंगार गौरी की रोज पूजा-अर्चना की मांग को लेकर दायर याचिका के बाद एक बार फिर विवाद पैदा हो गया है। कोर्ट के आदेश के बाद मस्जिद में आर्कियोलॉजिकल सर्वे का काम शुरू हो गया है। सर्वे का काम शुरू होने के बाद दोनों पक्षों के बीच एक बार फिर तनातनी की स्थिति दिख रही है।

उधर, मथुरा में श्रीकृष्ण मंदिर से सटी शाही मस्जिद ईदगाह को हटाने की मांग को लेकर दायर वाद में भी गतिविधियां तेज हो गई हैं। इस मामले में पांच आवेदनकर्ताओं ने ठाकुर केशव देव जी महाराज के मंदिर की 13.37 एकड़ भूमि पर बनी मस्जिद को हटाने का अनुरोध किया है। वाराणसी की तर्ज पर यहां भी अधिवक्ता कमीशन का गठन करके सर्वे कराने की मांग की गई है।

ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर ताजा विवाद

काशी विश्वनाथ मंदिर (Kashi Vishwanath Temple) से सटी ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर ताजा विवाद परिसर में श्रृंगार गौरी और अन्य देवी-देवताओं की पूजा अर्चना की मांग को लेकर शुरू हुआ है। इस मांग को लेकर पांच महिलाओं की ओर से पिछले साल 18 अगस्त को अदालत में याचिका दायर की गई थी। दिल्ली की राखी सिंह के साथ बनारस की चार अन्य महिलाओं सीता साहू, मंजू व्यास, लक्ष्मी देवी और रेखा पाठक की ओर से यह याचिका दायर की गई है। इस याचिका पर सुनवाई के बाद वाराणसी सिविल कोर्ट की ओर से गत 26 अप्रैल को मस्जिद परिसर में श्रृंगार गौरी और अन्य सभी देव विग्रहों के सत्यापन के लिए वीडियोग्राफी और सर्वे कराने का आदेश जारी किया गया था। अदालत के इस आदेश के बाद ही माहौल गरमा गया क्योंकि मुस्लिम पक्ष वीडियोग्राफी और सर्वे के पूरी तरह खिलाफ रहा है।

मुस्लिम पक्ष सर्वे के खिलाफ

सर्वे की कार्रवाई शुरू होने के साथ ही मुस्लिम पक्ष ने खुलकर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। अदालती आदेश पर 6 मई को सर्वे का काम शुरू होने के बाद दूसरे दिन मुस्लिम पक्ष के अड़ जाने के कारण सर्वे का काम नहीं हो सका। हिंदू पक्ष के वकील सर्वे के लिए मौके पर पहुंचे थे मगर उन्हें भीतर दाखिल होने से रोक दिया गया। हिंदू पक्ष के वकीलों के मुताबिक जब वे सर्वे करने के लिए ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में पहुंचे तो उससे पहले ही मौके पर काफी संख्या में मुस्लिम पक्ष के लोग जुट गए थे और उन्होंने सर्वे के काम में अड़ंगा डालते हुए टीम को भीतर जाने से रोक दिया। दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष की ओर से कोर्ट कमिश्नर पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए उन्हें हटाने की मांग की गई है। प्रतिवादी अंजुमन इंतजामिया मस्जिद कमेटी की ओर से कोर्ट कमिश्नर को हटाने की मांग को लेकर सिविल जज सीनियर डिविजन की कोर्ट में अर्जी दाखिल की गई है। अब इस मामले में अदालती फैसले का इंतजार किया जा रहा है।

इस मामले में वादी पक्ष की ओर से अधिवक्ता आयुक्त पर लगे आरोपों को झूठा व निराधार बताया गया है। वादी पक्ष का कहना है कि सर्वे की कार्यवाही को बाधित करने के मकसद से अंजुमन इंतजामिया मस्जिद कमेटी की ओर से आपत्ति दाखिल की गई है। वादी पक्ष ने कोर्ट को जानकारी दी है कि अधिवक्ता आयुक्त को बैरिकेडिंग के अंदर नहीं जाने दिया गया जिससे कमीशन की कार्यवाही बाधित हुई। वादियों ने ज्ञानवापी मस्जिद समेत बैरिकेडिंग के अंदर तहखाने का ताला तोड़कर वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी कराने की भी मांग की है।

सर्वे के आदेश पर गरमाई सियासत

ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में सर्वे का काम शुरू होने के साथ ही सियासी माहौल भी गरमा गया है। वाराणसी के दौरे पर पहुंचे सपा के मुखिया और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने ज्ञानवापी के मुद्दे को पूरी तरह भाजपा प्रायोजित बताया। उन्होंने कहा कि ज्ञानवापी मस्जिद और ताजमहल जैसे मुद्दे उठाकर भाजपा उसका सियासी फायदा उठाना चाहती है। उन्होंने कहा कि आम लोगों के जीवन से जुड़े मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए ही भाजपा ऐसा माहौल पैदा करती है।

एआईएमआईएम के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी (AIMIM chief Asaduddin Owaisi) भी इस विवाद में कूद पड़े हैं और उन्होंने सर्वे को पूरी तरह कानून का उल्लंघन बताया है। उन्होंने कहा कि ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के सर्वेक्षण का आदेश 1991 के पूजा स्थल अधिनियम का खुला उल्लंघन है। उन्होंने आरोप लगाया कि इसके जरिए मुस्लिम विरोधी हिंसा का रास्ता खोलने की साजिश की जा रही है। ओवैसी का कहना है कि 1990 के दशक में रथयात्रा के बाद हुए खूनखराबे और हिंसा का माहौल एक बार फिर बनाने का षड्यंत्र रचा जा रहा है।

मथुरा विवाद में हिंदू पक्ष की दलील

ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के साथ मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि परिसर को लेकर भी माहौल गरमा गया है। इस मामले को लेकर अदालत में दलील दी गई है कि जिस स्थान पर शाही ईदगाह मस्जिद बनाई गई है, उसी स्थान पर कंस का कारागार था जहां पर भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। मुगल सम्राट औरंगजेब ने 1669-70 के दौरान श्री कृष्ण जन्मभूमि स्थल पर बने मंदिर को तोड़ दिया और वहां पर शाही ईदगाह मस्जिद का निर्माण करवा दिया।

हिंदू पक्षकारों की ओर से मस्जिद परिसर का सर्वे कराने के लिए टीम का गठन करने की मांग की गई है। कोर्ट से अपील की गई है कि इस बाबत आदेश जारी किया जाना चाहिए ताकि सच्चाई उजागर हो सके। इस सर्वे से इस बात की तस्दीक भी हो सकती है कि मस्जिद परिसर में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां और प्रतीक चिह्न मौजूद हैं। इस सर्वे से इस बात की पुष्टि हो सकती है कि यहां पर पहले हिंदुओं का मंदिर था जिसे तोड़कर मस्जिद बनाई गई।

1968 के समझौते पर सवाल

याचिकाकर्ता महेंद्र प्रताप सिंह का कहना है कि बनारस की तर्ज पर यहां भी अधिवक्ता कमीशन का गठन किया जाना चाहिए ताकि वह ईदगाह का निरीक्षण करे। उनका आरोप है कि विपक्षियों की ओर से ईदगाह के प्रांगण में तथ्यों से छेड़छाड़ की जा रही है। याचिका में यह सवाल भी उठाया गया है कि जब पूरी जमीन श्री कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की थी तो श्री कृष्ण जन्मभूमि सेवा संघ नामक संस्था की ओर से ईदगाह कमेटी के साथ मस्जिद को न हटाने का फैसला किस आधार पर ले लिया गया।

दरअसल श्री कृष्ण जन्मभूमि सेवा संघ और शाही ईदगाह मस्जिद के प्रतिनिधियों के बीच 12 अक्टूबर 1968 को एक समझौता हुआ था जिसके मुताबिक 13.37 एकड़ जमीन पर श्री कृष्ण जन्मभूमि मंदिर और शाही ईदगाह मस्जिद दोनों का अस्तित्व बना रहेगा। मथुरा के सब रजिस्ट्रार के यहां 17 अक्टूबर 1968 को यह समझौता पेश किया गया था और 22 नवंबर 1968 को इसे रजिस्टर किया गया था। मौजूदा समय में 10.9 एकड़ जमीन श्री कृष्ण जन्मभूमि के पास है जबकि बाकी 2.5 एकड़ जमीन शाही ईदगाह मस्जिद के पास है।

मुस्लिम पक्ष ने दावे को गलत बताया

दूसरी ओर ईदगाह मस्जिद की ओर से हिंदू पक्ष के दावे को पूरी तरह गलत और आधारहीन बताया जा रहा है। ईदगाह मस्जिद के सचिव तनवीर अहमद का कहना है कि तथ्यों को तोड़-मरोड़कर मस्जिद को मंदिर का हिस्सा बताने की कोशिश की जा रही है। उनका कहना है कि इतिहास में कोई ऐसा तथ्य नहीं मिलता जिससे इस बात की पुष्टि हो सके तो मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण किया गया। इस बात का भी कोई तथ्य नहीं मिलता है कि श्री कृष्ण का जन्म उसी स्थान पर हुआ था, जहां पर शाही ईदगाह मस्जिद बनी हुई है।

मुस्लिम पक्ष की ओर से 1991 के पूजा अधिनियम की दलील भी दी जा रही है। मुस्लिम पक्ष का कहना है कि इस एक्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि 1947 से पहले धार्मिक स्थलों को लेकर जो स्थिति थी, उसे उसी रूप में बरकरार रखा जाएगा और किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं की जाएगी। दूसरी ओर हिंदू पक्षकार इस दलील को पूरी तरह बेदम बता रहे हैं। उनका कहना है कि इस एक्ट में साफ तौर पर इस बात का जिक्र किया गया है कि यदि किसी मामले को लेकर अदालतों में लगातार याचिकाएं दाखिल होती रहीं तो वह मामला पूजा अधिनियम के अंतर्गत नहीं आएगा। मामले में अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रखा है और अब अदालत 19 मई को अपना फैसला सुनाएगी।

सुप्रीम कोर्ट में भी समझौते को चुनौती

इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी एक याचिका दाखिल की गई है। इस याचिका में समझौते के तहत श्री कृष्ण जन्मभूमि से जुड़ी जमीन को मस्जिद को सौंपने के संबंध में किए गए समझौते को चुनौती दी गई है। याचिका में समझौते को हिंदुओं के साथ धोखा बताया गया है और कहा गया है कि श्री कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की संपत्ति अनधिकृत रूप से समझौता करके शाही ईदगाह मस्जिद को सौंप दी गई। यह समझौता 1968 में किया गया था और याचिका में इसी समझौते को चुनौती दी गई है।

भाजपा भी मामला गरमाने में जुटी

अयोध्या विवाद (Ayodhya dispute) के समय से ही भाजपा नेताओं की ओर से काशी और मथुरा की चर्चा समय-समय पर की जाती रही है। अयोध्या का मुद्दा सुलझने के बाद अब काशी और मथुरा की चर्चाओं ने तेजी पकड़ ली है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण का जिक्र करने के साथ ही काशी विश्वनाथ की भव्यता की चर्चा करना नहीं भूलते। उनका कहना है कि जब इन दोनों स्थानों का कायाकल्प हो रहा है तो मथुरा-वृंदावन कैसे छूट जाएगा। मुख्यमंत्री ने विधानसभा चुनाव के दौरान अपनी चुनावी सभाओं में भी अयोध्या, मथुरा और काशी का जिक्र जोरशोर से किया था।

डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य (Deputy CM Keshav Prasad Maurya) भी अयोध्या-काशी के बाद मथुरा की बारी का जिक्र खुलकर कर चुके हैं। चुनाव से पहले उनकी ओर से इस बाबत किए गए ट्वीट पर खासी प्रतिक्रिया हुई थी। भाजपा के पूर्व विधायक और फायरब्रांड नेता संगीत सोम ने ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर विवादित बयान देखकर माहौल को और गरमा दिया है। उन्होंने कहा कि 92 में बाबरी और 22 में ज्ञानवापी की बारी है। मुस्लिम आक्राताओं ने मंदिर तोड़कर जो मस्जिद खड़ी की थी, उसे वापस लाने का वक्त आ चुका है। उन्होंने यह दावा भी किया कि राम जन्मभूमि की तरह यहां पर भी मस्जिद की हकीकत छुपाई गई है।

संत समिति के महामंत्री ने जताई नाराजगी

इस बीच अखिल भारतीय संत समिति के महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने श्रृंगार गौरी और ज्ञानवापी मस्जिद के सर्वे के काम में प्रतिवादी पक्ष की ओर से रुकावट पैदा किए जाने पर गहरी नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा कि इन लोगों को देश के कानून और संविधान पर कोई विश्वास नहीं है। सिर्फ अराजकता फैलाने के मकसद से सर्वे के काम में रुकावट पैदा की जा रही है मगर प्रतिवादी पक्ष को यह बात समझ लेनी चाहिए कि सर्वे होकर रहेगा।

कोर्ट के आदेश पर ही सर्वे का काम किया जा रहा है और सर्वे को रोककर कोर्ट की अवमानना करने की कोशिश की गई है। उन्होंने कहा कि अंजुमन इंतजामिया मस्जिद कमेटी को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उसने अदालत के आदेश के खिलाफ जाकर यह कदम क्यों उठाया।

भाजपा चली मथुरा-काशी की ओर

  • 2014 में भाजपा के घोषणा पत्र में सिर्फ राम मंदिर था। जिसमें कहा गया था कि भाजपा राम मंदिर पर अपना रुख दोहराती है। संविधान के दायरे में अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए सभी संभावनाओं को तलाशा जाए।
  • 2017 में पार्टी ने कहा- मथुरा, वृंदावन, अयोध्या, प्रयाग, विंध्याचल, नैमिषारण्य, चित्रकूट, कुशीनगर और वाराणसी आदि में सांस्कृतिक पर्यटन सुविधाओं का विकास कर प्रदेश में सांस्कृतिक पर्यटन सर्किट बनाए जाएंगे। जैसे राम सर्किट, कृष्ण सर्किट, बुद्ध सर्किट आदि हैं। यहां उसका सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की दिशा में एक कदम आगे बढ़ा था।
  • 2019 के लोकसभा चुनाव में कहा- संविधान के दायरे में अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए सभी संभावनाओं को तलाशने की बात की गई और अंततः राममंदिर का निर्माण शुरू हुआ।

अगर गौर करें तो 29 दिसंबर 2021 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा, 'हमने कहा था अयोध्या में प्रभु राम का भव्य मंदिर निर्माण का कार्य प्रारंभ कराएंगे। मोदीजी ने कार्य प्रारंभ करा दिया है। अयोध्या में राम मंदिर बनने से खुश हैं और अभी काशी में भगवान विश्वनाथ का धाम का भी भव्य रूप से बन रहा है। आपने देख लिया है और फिर मथुरा वृंदावन कैसे छूट जाएगा। वहां पर भी काम भव्यता के साथ आगे बढ़ चुका है।

इसके बाद 2 फरवरी को सीएम योगी ने एक ट्वीट किया, जिसमें फिर से मथुरा का जिक्र करते हुए उन्होंने लिखा, 'भारत की अस्मिता और सनातन आस्था के मानबिन्दुओं के सम्मान व अपने अतीत की गौरवशाली परम्परा की पुनर्स्थापना भाजपा का ध्येय है। अयोध्या में प्रभु श्री राम का मंदिर और काशी में भगवान विश्वनाथ का भव्य धाम बन रहा है. फिर मथुरा-वृन्दावन कैसे छूट जाएगा।'

इससे पहले 1 दिसंबर को डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने ट्वीट कर मथुरा को लेकर नया नारा दिया। मौर्य ने लिखा, 'अयोध्या काशी में भव्य मंदिर निर्माण जारी है. मथुरा की तैयारी है। हालांकि 2022 के भाजपा के घोषणा पत्र में काशी और मथुरा पर प्रत्यक्ष रूप से कुछ भी कहने से बचा गया लेकिन परोक्ष रूप से विकास के जरिये राम मंदिर के लिए कर के दिखाया है के जरिये ये संदेश देने की कोशिश जरूर की गई। आगे भी करके दिखाएंगे।

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Deepak Kumar

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