लोकसभा चुनाव : भारी पड़ा भाजपा का हार्ड हिन्दुत्व

लोकसभा चुनाव : भारी पड़ा भाजपा का हार्ड हिन्दुत्व

श्रीधर अग्निहोत्री
लोकसभा चुनाव परिणाम आने के बाद यह बात पूरी तरह से साफ हो गयी कि दूसरे दलों के ‘साफ्ट हिन्दुत्व ‘ के मुकाबले भाजपा का ‘हार्ड हिन्दुत्व’ भारी पड़ा जिसके कारण उसे इतनी बड़ी सफलता मिली। पूरा चुनाव हिन्दुत्व पर आधारित रहा जिसे ‘राष्ट्रवाद’ की प्रतिछाया से नवाजा गया। लोकसभा चुनाव के पहले अन्य दलों के मुकाबले भाजपा हिन्दुत्व को लेकर अपनी जोरदार तैयारियां कर चुकी थी। चुनाव से कुछ समय पहले कांग्रेस ने अपनी रणनीति में बदलाव भी किया मगर आखिरकार वह भाजपा के सामने चित हो गई।
पिछला साल राजनीतिक नजरिए से बेहद महत्वपूर्ण रहा। लोकसभा चुनाव के पहले भाजपा यह माहौल बनाने में कामयाब रही कि राममंदिर मुद्दे का हल निकालने का प्रयास हो रहा है। इसीलिए योगी सरकार के संरक्षण में अयोध्या में धर्मसंसद का आयोजन किया गया। इसके बाद भाजपा अपने विकास कार्य की उपलब्धियों के साथ ही हिन्दुत्व पर जोर देते हुए चुनाव मैदान में उतरी। इस लोकसभा चुनाव के पहले भी भाजपा का अन्य राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों की प्रयोगशाला में ‘हिन्दुत्व’ के रसायन का प्रयोग सफल हो चुका था।

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दरअसल भाजपा रणनीतिकारों को पता था कि मुस्लिम वोट उसे नाममात्र के ही मिलते हैं। इसलिए उसकी नजर वास्तव में मुस्लिम नहीं, हिंदू वोट पर रही। पार्टी की रणनीति थी कि कांग्रेस इसका विरोध करे ताकि उसके ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की राजनीति पर लोग विश्वास न करे। भाजपा को पता था कि कांग्रेस इसका जितना विरोध करेगी, भाजपा को उसका उतना ही लाभ मिलेगा क्योंकि पिछले कई चुनावों से हिंदू समाज में अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के खिलाफ विरोध भाव स्थापित हो चुका है। इसलिए भाजपा ने पहले राम मंदिर निर्माण के सहारे हिन्दुत्ववादी माहौल बनाने की रणनीति बनाई। फिर पुलवामा अटैक के बाद इसे राष्ट्रवाद की तरफ मोड़कर पहली बार एक नया प्रयोग किया।

योगी सरकार ने भी खेला हिंदुत्व का कार्ड
पिछले दो साल के कार्यकाल में योगी सरकार राम मंदिर निर्माण के लक्ष्य के साथ हिंदुत्व को सर्वोपरि रखने की तमाम कोशिशें दिखाती रहीं। अयोध्या में सरयू तट पर भगवान राम की 100 मीटर ऊंची प्रतिमा स्थापित करने की घोषणा, दिवाली के मौके पर एक साल लाखों दीयों को प्रज्ज्वलित कर त्रेता युग जैसा वातावरण बनाना, मॉडल्स को भगवान राम और माता सिया बनाकर हेलीकॉप्टर से पुष्पक विमान जैसा आभास देना और उनका बिल्कुल उसी तरह स्वागत करना मानो भगवान राम प्रकट हुए हों, ये सब संकेत अयोध्या और राम ही भाजपा के एजेंडे में शीर्ष पर रहे।

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इतना ही नहीं, पूरे उत्तर प्रदेश को भगवा रंग में रंगने की कोशिशें करना भी इसी कड़ी का हिस्सा रहा। फिर चाहे वह सरकारी बसों, सरकारी अस्पताल के बिस्तरों की चादर का रंग या फिर सचिवालय की इमारत को भगवा रंग में रंगने का मामला ही क्यों न हो। इससे पार्टी की हिन्दुत्ववादी सोच का अहसास हिन्दू जनमानस को होने लगा था। यह माहौल योगी सरकार के गठन के बाद से ही शुरू हो चुका था।
लोकसभा चुनाव के पहले भाजपा कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक अपनी पहुंच बनाने और कांग्रेस मुक्त भारत के नारे को लेकर जिस तरह से गंभीर रहीउसके मद्देनजर मध्यप्रदेश राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव बेहद अहम रहे। असम और मणिपुर जीतकर भाजपा नॉर्थ-ईस्ट में धमक पहले ही जमा चुकी थी। इसके बाद नॉर्थ ईस्ट के इलाकाई दलों के साथ गठबंधन करके पूरे इलाके पर कब्जा बनाने की दिशा में काम किया।

नाकाम रही राहुल की रणनीति
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सॉफ्ट हिंदुत्व की तरफ अपना झुकाव दिखाया। पिछले साल. गुजरात के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने सॉफ्ट हिंदुत्व की नीति अपनाई ताकि अल्पसंख्यक परस्त पार्टी की उसकी छवि दूर हो सके। इसी नीति के तहत राहुल गांधी मंदिर दर्शन करते रहे। जब वे सोमनाथ मंदिर गए तो उनके धर्म पर भी सवाल खड़ा हो गया। उस समय कुछ लोगों को लगा होगा कि कांग्रेस अपनी अल्पसंख्यक परस्त छवि से बाहर निकलने के लिए गंभीर है, लेकिन इस धारणा पर सवाल खड़ा होने में ज्यादा समय नहीं लगा। उधर समाजवादी पार्टी ने भी अपनी रणनीति बदली और मुस्लिम वोटों को लेकर ज्यादा दिलचस्पी दिखाई। पार्टी सुप्रीमो अखिलेश यादव जब चुनाव प्रचार के लिए गुजरात गए थे तो द्वारिकाधीश के दर्शन के बाद जनसभाएं की। यहीं नहीं समाजवादी पार्टी सैफई में भगवान विष्णु की बड़ी मूर्ति लगाने की बात करती रही। मकसद साफ था कि सपा भी यूपी 2017 के विधानसभा चुनाव की तरह भाजपा को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण का मौका नहीं देना चाहती थी।

जिस भाजपा पर ममता सांप्रदायिक होने का आरोप लगाती रही है उसी भाजपा की बढ़ती ताकत से ममता खुद का झुकाव हिंदुत्व की तरफ दिखाती रही। दरअसल पश्चिम बंगाल की कुछ विधानसभा सीटों के उपचुनाव में भाजपा भले ही हारी, लेकिन उसके बढ़ते वोटों ने टीएमसी की नींद उड़ा दी और पार्टी ने पश्चिम बंगाल में 18 सीटें जीतने में कामयाबी हासिल की। भाजपा के इसी बढ़ते जनाधार का परिणाम हालिया लोकसभा चुनाव में दिखाई दिया और भाजपा ने अपने हार्ड हिन्दुत्व के चलते 18 सीटों पर विजय हासिल की।

ममता नहीं भांप सकी भाजपा की ताकत
भाजपा की रणनीति की यह खासियत है कि वो विरोधी दलों की ताकत को ही उसकी कमजोरी भी बना देती है। मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोपों से घिरी ममता अब हिंदुत्व की छांव तले सियासत की जमीन तलाशें तो अचरज नहीं होना चाहिए। लोकसभा चुनाव के पहले ममता बनर्जी ने ‘नरम हिंदुत्व’ का प्रयास किया। बीरभूम में ममता बनर्जी की इजाजत से टीएमसी ने ब्राह्मण सम्मेलन बुलाया और सम्मेलन में 8 हजार ब्राह्मणों को ममता बनर्जी की तरफ से भगवद्गीता भेंट की गई। ममता गंगासागर के दौरे पर भी और एक घंटा कपिलमुनि आश्रम में भी रुकी थीं। इसी तरह पुरी की यात्रा के दौरान जगन्नाथ मंदिर भी गई थीं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की रणनीति की असली वजह ग्रामीण इलाकों में बीजेपी का बढ़ता प्रभाव है जिसने टीएमसी की बेचैनी बढ़ा दी है। विधानसभा चुनाव, निकाय चुनाव और उपचुनावों के नतीजे पश्चिम बंगाल में भाजपा के बढ़ते जनाधार का संकेत दे चुके थेे। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने पश्चिम बंगाल में लोकसभा की दो सीटें जीती थीं जबकि विधानसभा चुनाव में तीन सीटें जीतकर खाता भी खोल दिया था, लेकिन भाजपा की इस बढ़ती ताकत को ममता भांप न सकीं।

गुजरात चुनाव में कांग्रेस की रणनीति के धर्मपरिवर्तन को देखने के बाद ममता बनर्जी भी खुद को हिंदूवादी साबित करना चाहती थीं। तभी उनकी सरकार ने तारापीठ, तारकेश्वर और कालीघाट मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए बोर्ड का गठन किया है। बहरहाल सारी कवायद चुनावों पर ही जा कर टिकती है। ममता पश्चिम बंगाल में होने वाले पंचायत चुनावों से साल 2019 के लोकसभा चुनाव का मिजाज नहीं समझ सकीं।

अब भाजपा की नजर दक्षिण पर
लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद साफ हो गया है कि आखिर योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने के पीछे कौन सी महत्वपूर्ण वजह रही होगी। अब भाजपा विकास के साथ हिंदुत्व के रथ पर चढ़कर दक्षिण में अपने विजय रथ को आगे बढ़ाना चाहती है। तभी भाजपा ने फायरब्रांड नेता और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ की कट्टरवादी छवि का चुनाव में लाभ उठाया। योगी की छवि भगवाधारी फायर ब्रांड नेता की है। हिंदुत्व को लेकर योगी अपने बेबाक बयानों के लिए जाने जाते हैं। यूपी के बाहर हाल के सालों में सांप्रदायिक हिंसा के मामले तेजी से उभरे हैं। ऐसे में वोटों के धु्रवीकरण के लिए योगी को भेजना एक सोची समझी रणनीति का ही हिस्सा रहा है।

भाजपा जानती है कि दक्षिण के दरवाजे खोलने के लिए भगवा ही सबसे बड़ी ताकत होगी। हिंदुत्व और विकास के रथ पर भाजपा की आक्रामकता को देखते हुए कांग्रेस भी हिंदुत्व की दुहाई देती रही है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी लगातार एक साल से हिन्दुत्ववादी छवि बनाने में लगे थे। उन्होंने मंदिर परिक्रमा से लेकर जनेऊ पहनने तक का काम किया। भाजपा ने एक रणनीति के तहत कांग्रेस के हिन्दुत्व की पोल खोल दी और तीन तलाक विरोधी विधेयक की राह में उसने राज्यसभा में जिस तरह अड़ंगा डाला, उससे साफ हो गया कि कांग्रेस मुस्लिम वोटों के लिए कितनी फिक्रमंद है।
कांग्रेस का ‘धर्मपरिवर्तन’ भले ही भाजपा की राह में रोड़ा नहीं बन पाया, लेकिन इसके बावजूद भविष्य की राजनीति के लिए उसे फूंक-फूंक कर कदम रखना होगा। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस अब भी अल्पसंख्यक परस्त पार्टी है? अथवा क्या कांग्रेस वास्तव में हिंदुत्व को लेकर नरम है या हिंदुओं को भ्रम में रखना चाहती है? कहीं ऐसा तो नहीं कि कांग्रेस खुद ही नीतिगत भ्रम का शिकार है?