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पंचायतों को ​मिलते हैं करोड़ों, पर नहीं मिलता हिसाब, शासन में दबी जांच

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Published on 7 April 2016 6:02 AM GMT

पंचायतों को ​मिलते हैं करोड़ों, पर नहीं मिलता हिसाब, शासन में दबी जांच
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लखनऊ: पंचायतीराज व्यवस्था गांव के लोगों की लोकतंत्र में प्रभावी भागीदारी का माध्यम है। इसमें ग्राम और क्षेत्र पंचायतों के विकास के लिए करोड़ों रुपए भी आते हैं। लेकिन, जब बात आती है उन पैसों के हिसाब की तो विभागीय अधिकारी चुप्पी साध लेते हैं। राज्य के कौशांबी जिले में ऐसा ही मामला सामने आया है। इसमें करोड़ो रुपयों का निजी हित में इस्तेमाल किया गया।

क्या है मामला

कौशांबी जिले में ग्राम और क्षेत्र पंचायतों को करोड़ों रुपए दिए गए। अकेले क्षेत्र पंचायत मूरतगंज को ​वर्ष 2010 से लेकर 2015 तक 3.19 करोड़ मिले। इन पांच सालों में इन पैसों का क्या इस्तेमाल हुआ। जब इस बारे में कुछ पता नहीं चल सका तो डीएम ने इसका संज्ञान लिया। तब सामने आया कि वित्तीय वर्ष समाप्त होने के बाद भी किसी भी ग्राम और क्षेत्र पंचायत ने खर्च का ब्यौरा नहीं दिया है।

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डीएम का पत्र भी रहा बेअसर

आपको बता दें कि इसको लेकर डीएम अखंड प्रताप सिंह ने सभी खंड विकास अधिकारी और सहायक विकास अधिकारी को पत्र भी लिखा। इसमें कहा गया है कि वित्तीय वर्ष समाप्त होने के बाद भी किसी विकास खंड ने अब तक खर्च की गई धनराशि का ब्यौरा नहीं दिया है, लेकिन इसका भी कोई असर नहीं हुआ।

वेतन रोका गया, फिर भी नहीं मिला ब्यौरा

उन्होंने साफ तौर पर पत्र में लिखा था कि अगर 25 फरवरी तक खर्च के सापेक्ष उपभोग प्रमाण पत्र उपलब्ध नहीं कराया जाता है तो संबंधित अधिकारियों का वेतन नहीं दिया जाएगा। इसके बाद कई पंचायत अधिकारियों का वेतन रोका भी गया है, पर अभी तक खर्च का ब्यौरा उपलब्ध नहीं हो पाया है। इसके पहले सीडीओ ने भी दो बार पत्र लिखकर पिछले पांच सालों में लिए गए धन के सापेक्ष उपभोग प्रमाण पत्र मांगा था, लेकिन उसे भी अनसुना कर दिया गया।

निजी कामों में खर्च किया पैसा

इसे देखते हुए कमिश्नर इलाहाबाद राजन शुक्ला ने प्रमुख सचिव पंचायतीराज को जांच और कार्यवाही के लिए पत्र लिखा, लेकिन प्रकरण शासन में दब गया। इसमें कहा गया है कि पांच वर्षों में पंचायतों को दिए गए करोड़ो रूपये का निजी हित में इस्तेमाल किया गया है।

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शासन में दबी है घोटाले की फाइल

विभागीय सूत्रों के अनुसार कमिश्नर इलाहाबाद ने 4 मार्च को प्रमुख सचिव पंचायतीराज को पत्र लिखा था ताकि इस घोटाले से पर्दा उठ सके। पर अब तक इसका भी संज्ञान नहीं ​लिया गया है।

राज्य वित्त और 13 वां वित्त आयोग से मिलती है धनराशि

भारतीय संविधान के प्रावधानों के अनुसार हर पांच वर्ष पर केन्द्रीय वित्त आयोग का गठन होता है। यह आयोग केन्द्रीय करों में राज्यों के हिस्से तथा राज्यों को मिलने वाले अनुदान के बार में अपनी अनुशंसा देता है। उसकी अनुशंसाओं के अनुसार भारत सरकार केन्द्रीय करों में राज्यों का हिस्सा तय करती है और इसी के अनुसार केंद्र से राज्यों को विकास कार्यों के लिए धनराशि दी जाती है।

अभी तक कमिश्नर का पत्र नहीं मिला : प्रमुख सचिव

इस बारे में जानकारी के लिए जब प्रमुख सचिव पंचायती राज चंचल कुमार तिवारी से बात की गई तो उन्होंने बताया कि अभी कमिश्नर इलाहाबाद का पत्र उनको प्राप्त नहीं हुआ है।

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