फिर बीएचयू का ‘इम्तिहान’, आरोपी प्रोफेसर की बर्खास्तगी की मांग

फिर बीएचयू का 'इम्तिहान', आरोपी प्रोफेसर की बर्खास्तगी की मांग

आशुतोष सिंह
वाराणसी : गले में तख्तियां, हाथों में ढपली और आजादी के नारों से गूंजता बनारस हिंदू विश्वविद्यालय। सितंबर महीने का दूसरा हफ्ता अभी शुरू ही हुआ था कि विवाद ने एक बार फिर से यूनिवर्सिटी के दरवाजे पर दस्तक दे दी। इस बार भी कमोबेश वैसी ही तस्वीरें थी, जो 2017 में दिखाई पड़ी थीं। ऐसा लग रहा है कि सितंबर महीना एक बार फिर से बीएचयू प्रशासन का इम्तिहान ले रहा है। छेड़छाड़ के आरोपी प्रोफेसर को बर्खास्त करने की मांग को लेकर छात्राओं का एक दल बीते दिनों धरने पर बैठा तो विश्वविद्यालय प्रशासन की सांसें फूलने लगीं। रेक्टर, चीफ प्रॉक्टर से लेकर सीनियर प्रोफेसर्स तक ये समझ नहीं पा रहे थे कि हालात को कैसे काबू में लाया जाए? अगर छात्राओं के साथ सख्ती करतें तो बदनामी का डर और अगर झुकते तो खुद की बेइज्जती। खैर पूरे 25 घंटे तक छात्राओं ने अपने आंदोलन को जिंदा रखा और तब तक जिंदा रखा जबतक बीएचयू प्रशासन ने उनके आगे घुटने नहीं टेक दिए। बीएचयू प्रशासन ने आरोपी प्रोफेसर को लंबी छुट्टी पर भेज किसी तरह अपनी गर्दन बचाई।

सितंबर में क्यों सुलगता है बीएचयू
हाल के सालों में बीएचयू में एक रवायत बन चुकी है। लोग कहने लगे हैं कि सितंबर महीना विश्वविद्यालय के लिए ‘काल’ बन चुका है। पिछले तीन सालों से हर बार सितंबर महीने में विश्वविद्यालय में कोई न कोई बवाल देखने को मिल रहा है। इस साल भी सितंबर महीना यूनिवर्सिटी प्रशासन का इम्तिहान ले रहा है। याद करिए साल 2017। सितंबर महीने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी के दौरे पर थे। यूनिवर्सिटी से थोड़ी ही दूर पीएम रुके हुए थे। इसी बीच कैंपस में छेडख़ानी की बढ़ती घटनाओं को लेकर छात्राओं ने मोर्चा खोल दिया। सैकड़ों छात्राएं लाव-लश्कर के साथ कैंपस के सिंहद्वार पर डट गईं। आधी आबादी ने नारेबाजी शुरू कर दी। कुछ छात्राओं ने सिर तक मुंडवा दिए। तीन दिनों तक धरना चलता रहा और आखिरकार 23 सिंतबर की रात बीएचयू के माथे पर वो कलंक लग गया, जिसकी टीस उसे सालों तक सालती रहेगी। छात्राओं पर लाठीचार्ज की तस्वीरों ने यूनिवर्सिटी के गरिमापूर्ण इतिहास पर काला दाग लगा दिया। इस घटना के बाद तत्कालीन वीसी जीसी त्रिपाठी को अपनी कुर्सी तक गंवानी पड़ी।

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2018 में भी हुआ था कैंपस में बवाल
23 सितंबर 2018 को आंदोलन की वर्षगांठ मना रही छात्राओं और कुछ छात्रों में झड़प हो गई थी। मामला बढऩे पर छात्राएं महिला महाविद्यालय के गेट पर धरने पर बैठ गई थीं। प्रशासनिक हस्तक्षेप के बाद वे शांत हुईं थीं। दोनों पक्षों की ओर केस दर्ज कराया गया था। वहीं इसके तुरंत बाद जूनियर रेजिडेंट और छात्रों के बीच विवाद ने हिंसक रूप अख्तियार कर लिया था। इसके बाद यूनिवर्सिटी बंद करने के साथ ही पांच हॉस्टलों को खाली करने का निर्देश दिया गया था। इससाल भी सितंबर में छेडख़ानी मामला यूनिवर्सिटी प्रशासन का इम्तिहान ले रहा है। सूत्रों के मुताबिक 2017 की लाठीचार्ज की घटना के विरोध में इस साल भी छात्राओं का एक गुट दूसरी वर्षगांठ मनाने की तैयारी में है। अंदरखाने इसकी तैयारी भी चल रही है। वर्षगांठ पर कैंपस में मार्च निकालने के साथ ही एक बड़ी सभा की तैयारी है। बताया जा रहा है कि जिस तरह छेडख़ानी के आरोपी प्रोफेसर के मामले में छात्राओं के सामने बीएचयू प्रशासन ने घुटने टेके हैं, उससे इनका मनोबल बढ़ गया है। लिहाजा अब ये अपनी ताकत का एहसास करना चाहती हैं। विरोध करने वाली अधिकांश छात्राएं वामपंथी संगठनों से जुड़ी हैं, जो पहले भी समय-समय पर महिला हित की बातें करती रही हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन की चिंता इस बात को लेकर है कि वो आखिर कैसे इन आंदोलनों को दबाए क्योंकि छात्राएं जिन मुद्दों को लेकर आंदोलन करती रही हैं, वो विश्वविद्यालय में पिछले कई सालों से चले आ रहे हैं। इन मुद्दों को लेकर कई बार छात्राएं और विश्वविद्यालय प्रशासन आमने-सामने आ चुका है।

आरोपी प्रोफेसर की बर्खास्तगी की मांग
सिंतबर महीने में हुए ताजा बवाल के जड़ में आखिर है क्या? पूरा मसला जुड़ा है जंतु विज्ञान के प्रोफेसर एसके चौबे से। आरोप है कि पिछले साल सितंबर महीने में विवि का एक दल शैक्षणिक टूर पर उड़ीसा गया हुआ था। इस दल में छात्रों के अलावा कई छात्राएं भी शामिल थीं। प्रोफेसर एसके चौबे इस दल की अगुवाई कर रहे थे। आरोप है कि एसके चौबे ने इस दौरान टूर में शामिल कई छात्राओं के साथ अभद्र व्यवहार किया। उनकी शारीरिक बनावट पर गंदी टिप्पणी की। उनकी बदमिजाजी का वीडियो भी सामने आया, जिसमें वो बीच पर छात्राओं के साथ भद्दे-भद्दे मजाक कर रहे हैं। टूर से लौटने के बाद छात्राओं ने एक सुर से प्रोफेसर की शिकायत वाइसचांसलर से की। इसके बाद वीसी ने आतंरिक शिकायत कमेटी यानी आईसीसी बनाई गई। प्रारंभिक जांच में प्रोफेसर एसके चौबे के खिलाफ शिकायत सही पाई गई। कमेटी की अनुशंसा पर विश्वविद्यालय ने उन्हें निलंबित कर दिया। इस बीच जांच पूरी हुई तो नई कहानी सामने आई। जांच समिति ने छात्रों के आरोपों को सही पाया लेकिन प्रोफसर एसके चौबे के खिलाफ जो कार्रवाई की गई, उसने छात्राओं को नाराज कर दिया। जून 2019 में हुई कार्यपरिषद की बैठक में कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर प्रोफेसर को सेंसर कर दिया गया। मतलब वो पढ़ाने के सिवाय विश्वविद्यालय की किसी गतिविधि में न तो शामिल हो सकते थे और न ही किसी जिम्मेदारी वाले पद पर नियुक्त हो सकते थे। यही नहीं, वो बाहर भी किसी पद के लिए आवेदन नहीं कर सकते थे। लेकिन ये बात छात्राओं को नागवार गुजरी। उन्हें ये कतई मंजूर नहीं था कि जिस प्रोफेसर के खिलाफ छेड़छाड़ जैसे गंभीर आरोप लगे हो, वो उन्हें पढ़ाए। लिहाजा छात्राओं ने मोर्चा खोल दिया।

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यूनिवर्सिटी प्रशासन टेकने पड़े घुटने
प्रोफेसर एसके चौबे का विरोध कर रही छात्राएं 14 सिंतबर को शाम 7 सात बजे अचानक धरने पर बैठ गई। खबर मिलते ही विश्वविद्याल प्रशासन के होश फाख्ता हो गए। दूसरी ओर छात्राओं की संख्या धीरे-धीरे बढऩे लगी। मीडिया के कैमरे चमकने लगे। हालात दो साल पुराने जैसे थे। विश्वविद्यालय के अधिकारी छात्राओं को मनाने में जुटे थे, लेकिन छात्राएं बगैर किसी ठोस आश्वासन के उठने को तैयार नहीं थी। दूसरी ओर अधिकारियों की परेशानी ये थी कि वीसी शहर से बाहर गए थे। लिहाजा वो कोई निर्णय लेने की स्थिति में नहीं थे। इस बीच छात्राएं पूरी रात धरने पर बैठी रहीं। आंदोलन के अगले दिन 15 सितंबर को बवाल बढऩे का दिन था। रविवार की छुट्टी होने के चलते अधिक संख्या में छात्राएं आंदोलन में शामिल हो सकती थीं। इसे देखते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन ने गल्र्स हास्टलों में अघोषित कफ्र्यू लगा दिया। हॉस्टलों के दरवाजे बंद कर दिए गए। अगर बहुत जरूरी हुआ तो वार्डेन की परमिशन के बाद ही बाहर जा सकती थी। विश्वविद्यालय के इस कदम की खूब आलोचना हुई। धरने में शामिल एमए की छात्रा आकांक्षा कहती हैं कि विश्वविद्यालय प्रशासन इस बात से डर गया कि कहीं साल 2017 वाली स्थिति न आ जाए। उनके मुताबिक हमारी मुख्य मांग तो यही थी कि इतने गंभीर आरोप जिस प्रोफेसर पर लगे हों, उन्हें बर्खास्त किया जाए। हमारी कुछ और भी मांगें थीं जो नहीं मानी गई हैं। जब शाम को छात्राओं की संख्या बढऩे लगी तो वीसी ने छात्राओं को वार्ता के लिए बुलाया। इस दौरान ये तय हुआ कि आरोपी प्रोफेसर को लंबी छुट्टी पर भेजा जा रहा है। साथ ही आंतरिक शिकायत कमेटी अपने फैसले पर फिर से विचार करेगी।

राष्ट्रीय महिला आयोग ने भेजा नोटिस
छात्राओं के इस आंदोलन के बाद भी बीएचयू प्रशासन की मुश्किलें कम नहीं हो रही हैं। इस घटना को राष्ट्रीय महिला आयोग ने गंभीरता से लिया है। उसने विश्वविद्यालय प्रशासन को नोटिस भेजकर पूछा है कि आखिर क्यों छेड़छाड़ के आरोपी प्रोफेसर को बहाल किया गया। सिर्फ महिला आयोग ही नहीं कांग्रेस भी इस आंदोलन में कूद पड़ी है। कांग्रेस की ओर से यूपी प्रभारी प्रियंका वाड्रा ने सोशल मीडिया के जरिए बीएचयू प्रशासन पर सवाल उठाए। छात्राओं के आंदोलन की तस्वीरों को शेयर करते हुए प्रियंका गांधी ने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा कि बीएचयू की छात्राओं को बार-बार विरोध करने के लिए बाहर निकलना पड़ता है, क्योंकि उनको सुरक्षा की गारंटी नहीं मिलती। एक प्रोफेसर पर कई सारी लड़कियों द्वारा की गई शिकायत, शिकायत समिति द्वारा सही पाई गई, लेकिन कार्रवाई के नाम पर निल बटे सन्नाटा। बेटी बचाओ अभियान अब बेटियां खुद चलाएंगी!

आरोपी प्रोफेसर की बर्खास्तगी की मांग
सिंतबर महीने में हुए ताजा बवाल के जड़ में आखिर है क्या? पूरा मसला जुड़ा है जंतु विज्ञान के प्रोफेसर एसके चौबे से। आरोप है कि पिछले साल सितंबर महीने में विवि का एक दल शैक्षणिक टूर पर उड़ीसा गया हुआ था। इस दल में छात्रों के अलावा कई छात्राएं भी शामिल थीं। प्रोफेसर एसके चौबे इस दल की अगुवाई कर रहे थे। आरोप है कि एसके चौबे ने इस दौरान टूर में शामिल कई छात्राओं के साथ अभद्र व्यवहार किया। उनकी शारीरिक बनावट पर गंदी टिप्पणी की। उनकी बदमिजाजी का वीडियो भी सामने आया, जिसमें वो बीच पर छात्राओं के साथ भद्दे-भद्दे मजाक कर रहे हैं। टूर से लौटने के बाद छात्राओं ने एक सुर से प्रोफेसर की शिकायत वाइसचांसलर से की। इसके बाद वीसी ने आतंरिक शिकायत कमेटी यानी आईसीसी बनाई गई। प्रारंभिक जांच में प्रोफेसर एसके चौबे के खिलाफ शिकायत सही पाई गई। कमेटी की अनुशंसा पर विश्वविद्यालय ने उन्हें निलंबित कर दिया। इस बीच जांच पूरी हुई तो नई कहानी सामने आई। जांच समिति ने छात्रों के आरोपों को सही पाया लेकिन प्रोफसर एसके चौबे के खिलाफ जो कार्रवाई की गई, उसने छात्राओं को नाराज कर दिया। जून 2019 में हुई कार्यपरिषद की बैठक में कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर प्रोफेसर को सेंसर कर दिया गया। मतलब वो पढ़ाने के सिवाय विश्वविद्यालय की किसी गतिविधि में न तो शामिल हो सकते थे और न ही किसी जिम्मेदारी वाले पद पर नियुक्त हो सकते थे। यही नहीं, वो बाहर भी किसी पद के लिए आवेदन नहीं कर सकते थे। लेकिन ये बात छात्राओं को नागवार गुजरी। उन्हें ये कतई मंजूर नहीं था कि जिस प्रोफेसर के खिलाफ छेड़छाड़ जैसे गंभीर आरोप लगे हो, वो उन्हें पढ़ाए। लिहाजा छात्राओं ने मोर्चा खोल दिया।