सारे आरोपी बरी, तो फिर किसने की थी कृष्णानंद की हत्या?

आशुतोष सिंह

वाराणसी: पूर्वांचल के बहुचर्चित कृष्णानंद राय हत्याकांड में सीबीआई कोर्ट पर लोगों की निगाहें सालों से लगी थीं। तारीख पर तारीख और गवाह दर गवाह के बाद आखिरकार अदालत ने इस मामले में अपना फैसला सुना दिया। अदालत ने वारदात के आरोपी बाहुबली मुख्तार अंसारी समेत पांच लोगों को इस मामले में बरी कर दिया। इस फैसले से पिछले 14 सालों से इंसाफ की जंग लड़ रहीं कृष्णानंद राय की पत्नी अलका राय और उनके परिवार को झटका लगा है। अदालत के इस फैसले के बाद अब सवाल उठने लगे हैं कि फिर कृष्णानंद राय की हत्या फिर किसने की? अगर मुख्तार अंसारी गिरोह ने गोलियां नहीं बरसाईं तो वो कौन थे जिन्होंने 29 नवंबर 2005 को भांवरकोल इलाके में कृष्णानंद राय समेत सात लोगों को मौत की नींद सुला दिया। इस हत्याकांड में एके-47 से सैकड़ों राउंड फायरिंग की गयी थी।

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पोस्टमार्टम में सात शवों से 67 गोलियां निकाली गयी थीं। इस तरह की घटना कोई सामान्य अपराधी या छोटा-मोटा गिरोह नहीं कर सकता। इसलिए यह सवाल उठने लगा है कि फिर किसने इस घटना को अंजाम दिया। फिलहाल इस मामले पर कृष्णानंद राय के परिवार ने पूरी तरह चुप्पी साध ली है। परिवार का कोई सदस्य बोलने को तैयार नहीं है। दूसरी ओर इंसाफ की उम्मीद पाले सालों से सलाखों के पीछे कैद मुख्तार अंसारी के समर्थक बेहद खुश हैं। इस बीच यूपी सरकार ने कहा है कि वह सीबीआई कोर्ट के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील करेगी। खैर जरायम की दुनिया से शुरू हुई इस अदावत ने कैसे सियासी रूप ले लिया, यह कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है।

मनोज सिन्हा बने राजनीतिक गुरु

जरायम की दुनिया में कृष्णानंद राय को जहां माफिया डॉन बृजेश का साथ मिला तो दूसरी ओर सियासी मैदान में उन्हें मनोज सिन्हा जैसा कद्दावर गुरु मिल गया। बताया जाता है कि चंद सालों की मेहनत में ही कृष्णानंद राय ने मुख्तार अंसारी के तिलिस्म को तोड़ दिया। मनोज सिन्हा गाजीपुर में बीजेपी के बड़े नेता हैं और उनकी भी सियासी लड़ाई अंसारी परिवार से रही है। 1999 के चुनाव में मुख्तार अंसारी के बड़े भाई अफजाल अंसारी लोकसभा चुनाव में मनोज सिन्हा को हरा चुके थे। ऐसे में गाजीपुर के अंदर मनोज सिन्हा को भी एक ऐसे नेता की तलाश थी जो उनके साथ अंसारी परिवार को कड़ी टक्कर दे सके।

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बताया जाता है कि बीजेपी के अंदर मनोज सिन्हा ने कृष्णानंद राय को खूब आगे बढ़ाया। उनकी ही पैरवी पर पार्टी ने मुहम्मदाबाद से साल 2002 के विधानसभा में कृष्णानंद को टिकट दे दिया। इस चुनाव में तेजतर्रार कृष्णानंद राय ने मुहम्मदाबाद से अंसारी परिवार के शिबगतुल्लाह अंसारी को धूल चटा दी। इस चुनावी नतीजे के बाद कृष्णानंद और अंसारी परिवार की दुश्मनी और बढ़ गई। मनोज सिन्हा कृष्णानंद परिवार के साथ हमेशा चट्टान की तरह रहे। कृष्णानंद की हत्या के बाद हुए उपचुनाव में जब उनकी पत्नी अलका राय चुनाव मैदान में उतरीं तो मनोज सिन्हा ने उनका पूरा साथ दिया। इसके बाद के दौर में भी इस परिवार को मनोज सिन्हा की सरपरस्ती मिलती रही।

काफिले पर एके 47 से हुआ था हमला

बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय के बढ़ते कद से घबराए उनके दुश्मनों ने उन्हें रास्ते से हटाने की साजिश रची। इसके लिए तारीख चुनी गई 29 नवंबर 2005। कृष्णानंद राय अपने साथियों के साथ एक कार्यक्रम से लौट रहे थे तभी एके 47 से लैस बदमाशों ने उनकी गाड़ी को घेर लिया और ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। बताया जाता है कि बदमाशों ने सैकड़ों राउंड गोलियां चलाईं और इस धुंआधार फायरिंग में सात लोगों की मौत हुई थी। बदमाशों सातों को छलनी कर दिया। सभी शवों में से 67 गोलियां मिली थीं। इस हमले में भाजपा विधायक कृष्णानंद राय और उनके छह साथियों मुहम्मदाबाद के पूर्व ब्लाक प्रमुख श्यामाशंकर राय, भांवरकोल ब्लाक के मंडल अध्यक्ष रमेश राय, अखिलेश राय, शेषनाथ पटेल, मुन्ना यादव व उनके अंगरक्षक निर्भय नारायण उपाध्याय की मारे गए थे। घटना के बाद आरोप लगा कि कृष्णानंद राय के धुर विरोधी मुख्तार अंसारी ने उनकी हत्या कराई है। हालांकि मुख्तार अंसारी उस वक्त जेल की सलाखों के पीछे थे। कहा जाता है कि मुख्तार अंसारी ने अपने खास गुर्गे मुन्ना बजरंगी के सहारे इस वारदात को अंजाम दिलाया था।

तब दहल उठा था पूर्वांचल

विधायक कृष्णानंद राय समेत सात लोगों की एक साथ हत्या से गाजीपुर जनपद दहल उठा था। इस हत्याकांड से पूरे यूपी सहित बिहार में भी हडक़ंप मच गया था। हत्याकांड के विरोध में लगभग एक सप्ताह तक गाजीपुर, बलिया, आजमगढ़ व वाराणसी में आगजनी, तोडफ़ोड़ आंदोलनों का दौर चलता रहा। उस समय पूरा पूर्वांचल सहमा हुआ दिख रहा था। आंदोलन की कमान पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह संभाले हुए थे। तत्कालीन सपा सरकार प्रदेश की जांच एजेंसी की रिपोर्ट को सही ठहरा रही थी, जबकि भाजपा पूरे मामले की जांच सीबीआई से कराने पर अड़ी थी। राजनाथ सिंह वाराणसी में लगभग पंद्रह दिनों तक धरने पर बैठे रहे। बताया जा रहा है कि उस वक्त की सपा सरकार ने बीजेपी की मांग को ठुकरा दिया। इसके बाद राजनाथ सिंह का अनशन आमरण अनशन में बदल गया। इस बीच बीजेपी ने उत्तर प्रदेश से न्याय यात्रा निकालने का निर्णय लिया। इस बीच न्याय यात्रा को हरी झंडी दिखाने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी 14 दिसंबर 2005 को वाराणसी पहुंचे। बताया जाता है कि बीजेपी के तेवर के आग राज्य और केंद्र सरकार को झुकना पड़ा और बीजेपी की मांग को मानते हुए केंद्र ने सीबीआई जांच को हरी झंडी दे दी। इसके बाद मुकदमे का दौर शुरू हुआ, जो लगभग 14 साल तक चला।

बीजेपी मनाती है बलिदान दिवस

विधायक कृष्णानंद राय के बलिदान को याद करने के लिए भाजपा हर साल 29 नवंबर को शहादत दिवस मनाती है। तब से अब तक स्व. कृष्णानंद राय व उनके सहयोगियों को याद करने के लिए शहीद पार्क मुहम्मदाबाद में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया जाता है। कृष्णानंद राय की प्रथम पुण्यतिथि पर उनके पैतृक गांव गोड़उर में भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण अडवाणी, राजनाथ सिंह सहित कई दिग्गज पहुंचे थे। गाजीपुर के मुहम्मदाबाद इलाके में कृष्णानंद राय आज भी एक बड़े फैक्टर के तौर पर माने जाते हैं।

कहीं खुशी, कहीं गम

सीबीआई अदालत के इस फैसले के बाद दोनों ही खेमों से अलग-अलग प्रतिक्रिया आ रही है। वाराणसी में तो मुख्तार अंसारी के समर्थकों न पटाखे फोडक़र अपनी खुशी का इजहार किया। इस फैसले के बाद मुख्तार अंसारी के बेटे अब्बास अंसारी ने अदालत का शुक्रिया किया है। सोशल मीडिया पर वीडियो जारी करते हुए अब्बास अंसारी ने कहा कि लंबे समय बाद उनके परिवार के लिए एक खुशी का लम्हा आया है। उन्होंने कहा कि अदालत पर उन्हें पूरा भरोसा था और आज उनके परिवार को इंसाफ मिला। दूसरी ओर कृष्णानंद राय खेमे में फैसले के बाद मायूसी दिखी।

कृष्णानंद को मिली थी बृजेश सिंह की सरपरस्ती

गाजीपुर और खासतौर से मुहम्मदाबाद में अगर कृष्णानंद राय मजबूत हुए तो इसके पीछे सबसे बड़ा रोल था मुख्तार अंसारी के विरोधी बृजेश सिंह का। कहा जाता है कि मुख्तार से दुश्मनी निकालने के लिए बृजेश सिंह ने कृष्णानंद राय को बढ़ावा देना शुरू कर दिया। बृजेश ने उन्हें आर्थिक मदद देने के साथ ही अंदरखाने उनकी बीजेपी के कई नेताओं से सेटिंग करा दी। बृजेश की सरपरस्ती में कृष्णानंद राय ने बेखौफ अंदाज में मुख्तार को चुनौती देना शुरू कर दिया। विधानसभा चुनाव में अंसारी परिवार को पटखनी देने के बाद उसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा बढऩे लगी थी। बताया जा रहा है कि मुहम्मदाबाद इलाके में ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत के चुनावों में कृष्णानंद राय का दखल बढ़ गया। कुछ सालों में ही वे अंसारी परिवार के लिए खतरा बन गए। अंसारी परिवार के आवास, जिसे बडक़ा फाटक कहा जाता है, का रुतबा घटने लगा था। स्थानीय अधिकारी भी अंसारी परिवार की अनदेखी करने लगे थे और कृष्णानंद राय की जी हजूरी। ऐसे में जोर आजमाइश में कृष्णानंद बीस नजर आने लगे।

कृष्णानंद राय बनने लगे थे मुख्तार के लिए ‘कांटा’

बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय और मुख्तार अंसारी के बीच दुश्मनी की शुरुआत नब्बे के दशक के आखिरी सालों में हुई। उस वक्त गाजीपुर और उसके आसपास के जिलों में माफिया डॉन मुख्तार अंसारी की बादशाहत चलती थी। सरकारी ठेकों पर मुख्तार गैंग का कब्जा था। आलम यह था कि मुख्तार के गुर्गों के अलावा ठेके का पर्चा लेने की कोई जुर्रत नहीं करता था। आर्थिक साम्राज्य इतना मजबूत था कि मुख्तार की तूती मुंबई से लेकर गल्फ तक बोलती थी। राजनीति में भी अंसारी परिवार का दबदबा था। कम्युनिस्ट पार्टी से शुरू हुआ अंसारी परिवार का सफर बाद में सपा और बसपा तक पहुंच गया। इस दौरान उन्होंने कौमी एकता दल के नाम से पार्टी भी बनाई। मुख्तार अंसारी गैंग की दहशत कुछ इस कदर थी कि उनके धुर विरोधी बृजेश सिंह भी गाजीपुर में उन्हें सीधी टक्कर देने से बचते थे। बृजेश सिंह वाराणसी की सीमा तक ही सिमट जाते थे। हालांकि 2001 में बृजेश सिंह का नाम उसरी चट्टी में मुख्तार के काफिले पर हमला करने में आया था। इस घटना में बृजेश सिंह की ओर से तीन लोग मारे गए थे जबकि मुख्तार की ओर से दो लोग। उस दौर में यह चर्चा फैली थी कि इस घटना में बृजेश सिंह को भी गोली लगी और उनकी मौत हो गई, लेकिन बाद में यह चर्चा गलत साबित हुई।

ऐसे वक्त में मुख्तार अंसारी के गढ़ मुहम्मदाबाद के एक युवा नेता ने उन्हें चुनौती देनी शुरू की। इस युवा ने न सिर्फ सरकारी ठेकों पर ताकत दिखाई बल्कि उसने अंसारी परिवार की राजनीतिक जमीन भी छीन ली। उस युवा का नाम था कृष्णानंद राय। कृष्णानंद राय ने बेहद कम समय में ही जरायम की दुनिया से लेकर सियासी मैदान में अपना सिक्का चलाना शुरू कर दिया। यह बात मुख्तार अंसारी को नागवार गुजरने लगी। पहले तो वो कृष्णानंद राय की अनदेखी करता रहा, लेकिन जब विधानसभा चुनाव में मुहम्मदाबाद सीट अंसारी परिवार के हाथ से फिसली तो मुख्तार बौखला गया। बताया जाता है कि इसके बाद दोनों गुटों में अदावत सीधी हो गई।