युवाओं ने बदली गाजीपुर की सूरत, दीवारों को मिली नई शक्ल

गाजीपुर: बदला-बदला सा नजर आने लगा है गाजीपुर। शहर वही है, बस सूरत बदली-बदली सी नजर आ रही है। चंद युवाओं की जिद और जुनून ने इस शहर की तस्वीर बदल दी। जो लोग कल तक सडक़ किनारे बदरंग हो चुकी दीवारों को देख नाक मुंह सिकोड़ते थे, अब उनकी भी आंखें फटी की फटी रह जा रही हैं। पोस्टरों से पटी रहने वाली सरकारी दीवारें अब नया शक्ल ले चुकी हैं। अब ये दीवारें खूबसूरत पेंटिंग से जगगमग है। छात्रों की कोशिशों ने शहर को एक नई सूरत दे दी है। आज हर तरफ छात्रों के इस अभिनव प्रयोग की तारीफ हो रही है।

घाटों को भी दी नई शक्ल

सिद्धार्थ की यह कोशिश सिर्फ सरकारी दीवारों तक ही सीमित नहीं है। उन्होंने गंगा किनारे घाटों की तस्वीर बदलने की भी ठान ली है। जहां चारों-तरह उठती दुर्गंध से लोगों का दम घुटता था,आज उस जगह की मिसाल दी जा रही है। अब यहंा की फिजा पवित्रता का एहसास दिलाती है तो स्वच्छता के संदेश दूर-दूर तक सुनाई पड़ते हैं। कुछ ऐसा ही गाजीपुर का कलेक्टर घाट। कभी इसकी पहचान शौचालय घाट के रूप में होती थी, लेकिन युवाओं की कोशिश ने इस घाट की किस्मत पलट दी। इस घाट पर दो साल पहले तक गंदगी का साम्राज्य हुआ करता था। जगह-जगह बिखरे कूड़े और मल-मूत्र को देख लोग दुखी हो जाते थे। लेकिन अब यहंा की तस्वीर बदल गई है। सुबह-शाम सिर्फ शहर ही नहीं बल्कि बाहर से आने वाले सैलानी भी घूमते मिलते हैं। चमचमाती सीढिय़ों के बीच हरे-भरे पौधे दिल को सुकून पहुंचाते हैं। परिवर्तन द्वार से घुसते ही गंगा किनारे एक अलग दुनिया दिखती है। सामुदायिक शौचालय के कारण लोगों को अब भटकना नहीं पड़ता।

इस खबर को भी देखें: लखनऊ मेट्रो को देना पड़ सकता है 10 लाख तक जुर्माना, पैसेंजर बोला- करूंगा केस

स्थानीय लोग भी कर रहे हैं पहल

सिद्धार्थ की करीब डेढ़ साल की मेहनत ने कलेक्टर घाट को एक नए मुकाम तक पहुंचा दिया है। दरअसल सिद्धार्थ के काम करने का अंदाज भी कुछ अलग है। वीआईपी कल्चर से दूर उन्होंने परिवर्तन द्वार का उद्घाटन स्थानीय बुजुर्गों से करवाया। यही नहीं घाट किनारे लगे पौधों की जालियों पर भी स्थानीय बुजुर्गों का नाम लिखवाया।
 सिद्धार्थ बताते हैं कि उनकी इस सोच के पीछे एक बड़ी वजह है। जब तक स्थानीय लोग उनकी इस मुहिम से नहीं जुड़ते, ये काम पूरा नहीं हो पाता। इस घाट की पहचान स्थानीय लोगों से है। मुहिम से जुड़ाव के साथ लोगों की जिम्मेदारी भी बढ़ाने की कोशिश की गई है।

जोश भरते हैं सिद्धार्थ

युवाओं की अगुवाई कर रहे हैं उम्मीद परिवार के अध्यक्ष सिद्धार्थ राय। उम्र छोटी जरुर है, लेकिन उनके इरादे काफी बड़े हैं। वे नेता भी हैं, लेकिन जरा हटकर। केंद्रीय मंत्री मनोज के निजी सहायक हैं, लेकिन सौम्यता इनकी पहचान है। यूं तो उनका वक्त राजनीतिक कार्यों में अधिक बीतता है,लेकिन जब भी वक्त मिलता है तब वे शहर के लिए कुछ अलग सोचते हैं। उनकी कोशिश है कि शहर साफ-सुथरा बने। इसकी शुरुआत उन्होंने सरकारी भवनों से की। अपनी मुहिम को परवान चढ़ाने के लिए सिद्धार्थ शहर के अलग-अलग स्कूलों में गए। टीचरों से बात की। छात्रों को समझाया। उन्हें स्वच्छता के लिए प्रेरित किया। नतीजा आज सबके सामने हैं। सिद्धार्थ बताते हैं कि सरकारी दफ्तरों की दीवारों पर तरह-तरह के पोस्टर चस्पा किए हुए मिलते हैं। कुछ जगहों पर पान की पीक दिखाई पड़ती है। इन तस्वीरों को देखने के बाद बाहर से आने वाले लोगों के जेहन में शहर को लेकर गलत तस्वीर बनती है। इसीलिए हमने शहर में सफाई को लेकर मुहिम छेड़ी। वॉल पेंटिंग के जरिए हम उन लोगों को आईना दिखाना चाहते हैं जो दीवारों को गंदा करते हैं। यकीनन ये काम आसान नहीं है, लेकिन हमारी उम्मीदें जरूर परवान चढ़ेंगी।

रोज शाम को सफाई में जुट जाते हैं

शहर के चंद युवाओं की मेहनत ने रंग दिखाना शुरू कर दिया है। जी हां, उम्मीद परिवार ने सरकारी कार्यालयों की दीवारों को साफ करने का बीड़ा उठाया है। इस काम में भागीदार बने हैं शहर के दर्जनों स्कूलों के छात्र और छात्राएं। प्रतिदिन शाम चार बजे से छह बजे तक युवाओं की पलटन शहर के अलग-अलग हिस्सों में दीवारों की सफाई करती नजर आती है। दीवारों पर चस्पा पोस्टरों को हटाने के साथ ही उनकी रंगाई-पुताई की जाती है। इसके बाद इन दीवारों पर खूबसूरत पेंटिंग उकेरी जाती है। शहर को सजाने और संवारने का जुनून कुछ इस कदर है कि दिनभर की पढ़ाई और कोचिंग के बाद छात्र तय समय पर पहुंच जाते हैं। इनमें कुछ ऐसे छात्र भी हैं जो पंद्रह से बीस किमी की दूरी तय करके आते हैं। इन्हीं में से एक है मयंक जायसवाल। मयंक की बस यही हसरत है कि उसका शहर औरों से अलग दिखे।