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युद्ध की पदचाप

कोरोना वायरस को लेकर आप के सामने कई सवाल होंगे। होने भी चाहिए। क्योंकि मानवता या यूं कह सकते हैं कि सृष्टि ने अपने जन्म से अब तक ऐसा कोई समय नहीं देखा। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया ने लगातार यह कोशिश की कि ऐसे हालात बनें ही न। लेकिन कोरोना वायरस केसंक्रमण को देख लगता है

suman
Updated on: 1 May 2020 2:28 PM GMT
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योगेश मिश्र / नीलमणि लाल

कोरोना वायरस को लेकर आप के सामने कई सवाल होंगे। होने भी चाहिए। क्योंकि मानवता या यूं कह सकते हैं कि सृष्टि ने अपने जन्म से अब तक ऐसा कोई समय नहीं देखा। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया ने लगातार यह कोशिश की कि ऐसे हालात बनें ही न। लेकिन कोरोना वायरस केसंक्रमण को देख लगता है कि दुनिया की ओर से विश्व युद्ध से बचने की कि जा रहा कोशिशें सिर्फ़ काग़ज़ी हैं। हवा हवाई हैं। किसी भी युद्ध में तो सिर्फ़ दोनों देश की सीमाएँ तंग रहती है। अगर परमाणु अस्त्र का इस्तेमाल नहीं किया जाये तो दुनिया हैरान परेशान नहीं रहती है। लेकिन कोरोना के संक्रमण ने समूची दुनिया को ठहरने का हुक्म सुना दिया है। दुनिया ने एक अजब ग़ज़ब शक्ल अख़्तियार कर ली है। जिसमें मृत्यु भी है। भय भी है। आशंका भी है। अर्थव्यवस्था के चौपट होने कीबात भी है। वह सब कुछ है, जो किसी युद्ध के बाद और युद्ध के बीच हो सकता है। युद्ध से ज़्यादतहस नहस का दंश भी है।

यही वजह है कि कोरोना को केवल महामारी मानने की गलती नहीं की जानी चाहिए । इसमें किसी युद्ध की पदचाप भी सुनी जानी चाहिए।

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विश्व में युद्ध कौशल पारंपरिक हथियारों और रणनीति से बहुत आगे जा चुका है। अर्थव्यवस्थाओं की तबाही, सप्लाई चेन को छिन्न-भिन्न करना, महत्वपूर्ण उद्योगों की बर्बादी, जनता के बीच कन्फ़्यूजन और दहशत फैलाना, नये समय के युद्ध की रणनीति है। इसके लिए जैविक छेड़छाड़ ही बहुत है। यह सच्चाई है कि लोग एटम बम, रेडिएशन या विकिरण से कतई नहीं डरते। लेकिन जहरीले खाने, जहरीली दवा या संक्रमित हवा की दहशत जबर्दस्त होती है।

अदृश्य हथियार

जैविक युद्ध के हथियार किसी लैब में गोपनीय तरीके से बनाए जा सकते हैं। लैब का पता लगा पाना नामुमकिन है। जासूसी उपग्रह और अन्य अत्याधुनिक जासूसी उपकरण भी ऐसे लैब को पकड़ नहीं सकते।कोरोना वायरस भी संभवतः ऐसा ही राक्षस है जो किसी लैब में बनाया गया हो सकता है।

आरोप दर आरोप

कोरोना वायरस को जैविक हथियार बताने का मसला तब शुरू हुआ जब अमेरिकी सीनेटर टॉम कॉटन ने आरोप लगाया कि यह वायरस वुहान की प्रयोगशाला में तैयार किया गया था। इस आरोप को इंटरनेशनल लॉ के विशेषज्ञ डॉ फ्रांसिस बॉयल के बयानों से बल भी मिला। डॉ बॉयल ‘जैविक हथियार आतंकवाद विरोधी कानून’ के निर्माता हैं। वह मानते हैं कि कोरोना वायरस एक जैविक हथियार है, जिसे डीएनए जिनेटिक इंजीनियरिंग से बनाया गया है।

प्रयोगशाला में उत्पत्ति

फ़्रान्स के नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक लुक मांटेग्नर भी ने दावा किया है कि नॉवेल कोरोना वायरस की उत्पत्ति एक प्रयोगशाला में की गई। यह मानव निर्मित है। फ़्रान्स के सी न्यूज़ चैनल को दिए इंटरव्यू में एचआईवी के सह खोजकर्ता फ्रांसीसी वैज्ञानिक लुक मॉटेंग्नर ने बताया कि नॉवेल कोरोना वायरस के जीनोम में एचआईवी के तत्वों और यहाँ तक कि मलेरिया के भी कुछ तत्व होने की आशंका है।

कोरोना प्राकृतिक नहीं

जापान के नोबेल पुरस्कार विजेता डॉक्टर टासुकू होती ने भी यह दावा किया है कि कोरोना प्राकृतिक नहीं है। यह जिस तरह यह स्विट्ज़रलैंड जैसे ठंडे देशों में क़हर बरपा रहा है वैसे ही यह गर्म रेगिस्तानी देशों में भी फैल रहा है। यदि यह मानव निर्मित नहीं होता तो रेगिस्तानी देशों में प्रभाव दिखाता और ठंडे देशों में दम तोड़ देता। यदि ठंडे देशों में प्रभावी होता तो रेगिस्तानी देशों में दम तोड़ देता। पर ऐसा नहीं है। डॉ. टासुकू ने वायरस पर ४० साल रिसर्च किया है। चीन के मुंह लेबोरेटरी में भी चार साल काम किया है। उनका कहना है कि मैं अपने समय के लेबोरेटरी के साथियों को फ़ोन महीने भर से लगा रहा हूँ पर कोई भी फ़ोन नहीं उठा रहा है।

कनाडा में चोरी

मारूफ रजा नाम के एक कालमिस्ट ने अपने कॉलम में अंग्रेज़ी अख़बार में ब्लाग लिखने वाले संजीव शुक्ला के हवाले से कई बेहद चौंकाने वाले रहस्योद्घाटन किये हैं। जिसके मुताबिक़ पिछले वर्ष अगस्त में कनाडा की पुलिस ने विन्नीपेग (जहाँ कनाडा के एक मात्र चौथे स्तर की माइक्रोबायोलॉजी लैब है) में बौद्धिक संपदा चुराने के आरोप में चीन के एक जोड़े को गिरफ़्तार किया। दोनों वुहान स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ़ वायरोलॉजी का दौरा भी कर चुके थे।

अमेरिका में गिरफ्तारी

चीनी वैज्ञानिकों को अमेरिका में प्रयोगशालाओं से जानकारी और जैव रासायनिक सामग्री चुराने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है। अमेरिकी न्याय विभाग ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के एक प्रोफ़ेसर चार्ल्स लेइबर की वुहान विश्वविद्यालय के साथ संबद्धता के कारण गिरफ़्तारी की। उन्हें ५०००० डॉलर और अपने ख़र्च के लिए 1 लाख 58 हज़ार डॉलर प्रतिमाह मिलते थे। वह अन्य वैज्ञानिकों को लुभाने के लिए लाखों डॉलर का एक कार्यक्रम भी चला रहे थे ताकि वे अपने अनुसंधान विशेषज्ञता चीन के साथ साझा कर सकें। चीन जाने के लिए विमान में सवार चीनी नागरिक जेंग झाओ की गिरफ़्तारी के बाद उसके पास से अमेरिकी विश्वविद्यालय के अनुसंधान केन्द्र से चुराई गई जैविक सामग्रियों की 21 शीशियां पकड़ी गईं थीं।

संजीव शुक्ला ने यह भी बताया कि चीनी सेना के जनरल झैंग शिबो ने अपनी किताब ‘वार्स न्यू हाईलैंड’ २०१७ में नस्लीय जैवीय हमलों का ज़िक्र किया है। उससे पहले २०१५ में चाइनीज़ एकेडमी ऑफ़ मिलिट्री मेडिकल साइंसेज के उपाध्यक्ष हे फुचु ने युद्ध की नई रणनीति के तौर पर जैविक चीज़ों का ज़िक्र किया था ।

चीन में 5 जैविक हथियार लैब

चीन इस समय पाँच जैव रासायनिक हथियार प्रयोगशालाओं की स्थापना कर रहा है। जबकि अमेरिका, यूरोप, रूस और ऑस्ट्रेलिया में ऐसी लगभग पचास प्रयोगशालाएं काम कर रही हैं या निर्माणाधीन हैं। यही नहीं, सच्चाई तो यह भी है कि इबोला या मारबर्ग जैसे ख़तरनाक वायरस का अध्ययन देश में वायरस का आयात किये बिना नहीं किया जा सकता है।

चीन पर राजनीति

कोरोना वायरस के लिए चीन पर सीधे और घुमाफिरा कर आरोप लग रहे हैं। चूंकि वायरस चीन से निकल कर दुनिया में फैला और इसने सब जगह तबाही मचाई। इसलिए दोष चीन पर जा रहा है।

- अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि चीन ने जानबूझ कर वायरस बाकी दुनिया में फैलने दिया, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता।

- आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने कहा है कि कोरोना वायरस के प्रसार की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। विदेश मंत्री मरिसे पाइने ने इस बारे में अमेरिका, जर्मनी औरफ्रां स के नेताओं से बात भी की है।

- ब्राज़ील के शिक्षा मंत्री ने कहा है कि कोरोना वायरस महामारी और चीन की वैश्विक कब्जेदारी की योजना के बीच संबंध है।

- यूरोपीय यूनियन ने कहा कि इस बात के सबूत हैं कि चीन कोरोना वायरस महामारी के लिए अपनी ज़िम्मेदारी से बचने के लिए पूरा प्रयास कर रहा है। अब वह यह भी दिखाने में लगा है कि उसने बाकी दुनिया की बहुत मदद की है।

- जर्मनी के गृह मंत्रालय ने कहा है कि चीनी राजनयिक जर्मनी के सरकारी अधिकारियों से मिल कर उनसे चीन के बारे में पॉज़िटिव बयान देने को कह रहे हैं। जर्मनी ने साफ कहा कि ‘संघीय सरकार ऐसे किसी आग्रह को नहीं मानेगी।‘

- ब्रिटेन के मंत्री माइकल गोव ने कहा है चीन ने कोरोना वायरस के बारे में बहुत सी बातें छिपायी हैं और उसे इस संकट के गुजर जाने के बाद अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के सवालों और जांच का सामना करना पड़ेगा।

- इजरायल के बीगिन सादात सेंटर फॉर स्ट्रेटिजिक स्टडीज़ का कहना है कि चीन के 40 केन्द्रों में जैविक हथियार बनाने का काम होता है। इबोला की दवाई बनाने वाले चीन के अकादेमी ऑफ मिलिटरी मेडिकल साइन्सेज के बारे में कहा जाता है कि यहाँ रखे इबोला वायरस जैविक हथियार का हिस्सा हैं। इबोला को जैविक आतंकवाद का ‘ए’ कैटेगरी एजेंट कहा जाता है।

क्या है जैविक युद्ध का हथियार

जैविक हथियार में बैक्टीरिया, वायरस, जहर और रसायन - सभी कुछ आते हैं, जो प्राकृतिक भी होते हैं और लैब में बनाए भी जाते हैं। जैविक युद्ध के हथियारों की ताकत, उनका जीवन काल, मारक क्षमता और उनके इलाज की क्षमता अलग-अलग होती है। इनकी कीमत नाभिकीय हथियार से काफी कम और तबाही मचाने की ताकत कई गुना ज्यादा होती है। जैविक हथियार बम या मिसाइल से भी डेलीवर किए जा सकते हैं। या फिर पानी, खाद्य पदार्थ या इन्सानों के जरिये फैलाए जा सकते हैं।

लंबे अरसे से हैं हमारे बीच

जैविक हथियार कोई आज का आविष्कार नहीं हैं बल्कि ये लंबे अरसे से हमारे बीच मौजूद हैं।

ईसा पूर्व 431 से 405 में यूनान के दो सबसे ताकतवर राज्यों – एथेंस और स्पार्टा के बीच ‘पेलोपोन्नेसियन युद्ध’ लड़ा गया था और तब भी एथेंस वालों ने दुश्मन पर कुओं में जहर घोलने और प्लेग फैलाने का आरोप लगाया था।

मानव नरसंहार के लिए जैविक हथियारों के इस्तेमाल का दस्तावेजी प्रमाण सन 1347 से मिलता है। उस समय मंगोल सेनाओं ने प्लेग फैलाया था जिससे 25 से 30 करोड़ लोग मारे गए थे। इस वाकये को ‘ब्लैक डेथ’ कहा जाता है। मंगोल हमलावर प्लेग से मारे गये लोगों की लाशों को दुश्मन के बीच कने और संक्रमण फैलाने में माहिर माने जाते थे।

18वीं सदी में अमेरिका में फ्रेंच और मूल रेड इंडियंस के बीच युद्ध के दौरान सर जेफरी अमहेर्स्ट के नेतृत्ववाली ब्रिटिश सेना ने रेड इंडियंस को ऐसे कंबल बांटे जिनका इस्तेमाल चेचक के रोगियों द्वारा किया गया था। इरादा था कि रेड इंडियंस के बीच चेचक फैला दिया जाये।

जैविक हथियारों का इस्तेमाल विश्व युद्ध में भी किया गया था जब जर्मनी ने दुश्मन की सेनाओं के घोड़ों और अन्य पशुओं में ‘ग्लैंडर्स’ नामक बीमारी फैलाई थी। इसके अलावा रूसी प्रतिरोध को कमजोर करने के लिए सेंट पीटर्सबर्ग में प्लेग फैलाने की कोशिश की गई थी।

जापान दूसरे विश्व युद्ध

जापान ने भी दूसरे विश्व युद्ध में चीन के खिलाफ प्लेग, ऐनथ्रैक्स, येलो फीवर, टाइफाइड और कई अन्य बीमारियाँ फैलाने के लिए जैविक एजेन्टों का इस्तेमाल किया था। जापान ने चीन के कम से कम 11 शहरों में हवा, पानी और खाद्य पदार्थों को संक्रमित कर दिया था।

सोवियत यूनियन ने 1942 में जर्मन सेनाओं के खिलाफ ‘टूलरेमिया’ नाम के वायरस का इस्तेमाल किया था जिससे सांस की बीमारी फैल जाती थी। इसके लिए भूसे को संक्रमित किया गया था।

विश्व युद्धों के बाद अमेरिका-रूस के बीच शीत युद्ध के काल में कई देशों ने जैविक हथियार बनाने के लिए बड़े पैमाने पर रिसर्च और डेवलपमेंट प्रोग्राम चलाये। जो जैविक हथियार मौजूद थे उनको और शक्तिशाली बनाया गया और कई अन्य खतरनाक संक्रामक एजेंट तैयार किए गए। इनमें ऐनथ्रैक्स, बोटुलिज़्म, चेचक, प्लेग, और इबोला वायरस जैसे ढेरों संक्रामक एजेंट शुमार हैं जिनका इस्तेमाल जैविक हथियार के रूप में किया जा सकता है।

अमेरिका पर क्यूबा ने जैविक हथियारों के इस्तेमाल के आरोप लगाए थे। क्यूबा का कहना था कि अमेरिका ने उसकी फसलें बर्बाद करने के लिए जैविक हथियार का प्रयोग किया था।

2011 में ओसामा बिन लादेन ने ऐसे ही एक हथियार के इस्तेमाल की नाकामयाब कोशिश की थी।

1925 में लगा था प्रतिबंध

जिनेवा प्रोटोकॉल के तहत 1925 में जैविक युद्ध के समस्त तरीकों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। इसके बाद जैविक हथियारों के खिलाफ 1975 में एक इंटरनेशनल संधि भी हुई। 26 मार्च, 1975 को लागू हुई इस संधि पर आज तक 183 देशों ने हस्ताक्षर किए हैं। इस संधि के तहत कोई भी देश न तो जैविक युद्ध के तरीके अपना सकता है और न ही बीमारी को हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर सकता है।

अमेरिका ने घोषित तौर पर 1969 में अपने जैविक हथियारों के जखीरे को नष्ट कर दिया था। तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने जैविक हथियार बनाने के केन्द्रों को शांतिपूर्ण बायोमेडिकल और बायो-डिफेंस रिसर्च केंर्डों में तब्दील कर दिया था और अमेरिका के सहयोगी देशों ने भी अपने जखीरे नष्ट कर दिये थे।

असलियत कुछ और है : असलियत यह है कि इस संधि का कोई भी असर नहीं हुआ है। संधि के तहत किसी को भी निरीक्षण और रिपोर्टिंग का अधिकार नहीं है और कोई भी देश गुप्त रूप से जैविक हथियार अब भी बना सकता है। 1992 में बोरिस येल्तसिन ने स्वीकार भी किया था कि सोवियत यूनियन ने अपनेजै विक हथियार प्रोग्राम को चुपचाप जारी रखा है।

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जैविक युद्ध और आतंकवाद

जैविक युद्ध और जैविक आतंकवाद दो अलग अलग चीजें हैं। युद्ध के हथियारों के रूप में जैविक मूल के टॉक्सिन या सूक्ष्म जीवों का इस्तेमाल जैविक हथियार कहा जाता है।‘यानी जहर या प्लेग जैसे सूक्ष्म विषाणुओं का इस्तेमाल किसी सेना के खिलाफ जानबूझ कर किया जाना जैविक युद्ध है। इसका उद्देश्य बड़ी संख्या में सेना का संहार करना है।

दूसरी ओर जैविक आतंकवाद का मकसद नरसंहार से ज्यादा आतंक, अफरातफरी और सामाजिक अव्यवस्था फैलाना होता है। इसका टारगेट नागरिक होते हैं। जैविक आतंकवाद का पहला वाकया है अमेरिका के ओरेगॉन में 1984 में ‘साल्मोनेला’ विषाणु का प्रसार। इससे 751 लोग बीमार पड़ गए थे। 90 के दशक में जापान में औम संप्रदाय के टोक्यो में एनथ्रैक्स फैलाने की कोशिश की थी। असफल रहने पर इन लोगों ने रसायनिक हथियारों से हमला किया था।

इराक युद्ध के दौरान भी जैविक आतंकवाद के इस्तेमाल के संकेत मिले। माना जाता है कि जानबूझकर कई तरह के विषाणु फैलाये गए थे। 2001 में अमेरिका के कई सीनेटरों और मीडिया संस्थानों को एनथ्रैक्स और प्लेग के वायरस संक्रमित पत्र भेजे गए। इन कृत्यों का मकसद आतंक फैलाना था। इन वायरसों से 5 लोग मारे भी गए थे।

बहुत से देशों के पास हैं जैविक हथियार

माना जाता है कि आज 16 देशों के पास जैविक हथियार हैं। ये देश हैं – कनाडा, चीन, क्यूबा, फ्रांस, जर्मनी, ईरान, इराक, इजरायल, जापान, लीबिया, नॉर्थ कोरिया, रूस, साउथ अफ्रीका, सीरिया, यूनाइटेड किंगडम और अमेरिका। भले ही सभी देशों ने जैविक हथियारों के खिलाफ संधि पर हस्ताक्षर किए हैं लेकिन यह कोई नहीं जनता कि कोई भी देश इसका पालन कर रहा है कि नहीं।

चीन नॉर्थ कोरिया के पास जखीरा

बैक्टीरिया और वायरस के बारे में तो निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता। लेकिन चीन और नॉर्थ कोरिया के पास केमिकल हथियारों के रूप में जैविक हथियारों का जखीरा मौजूद है। चीन का कहना है कि उसने कभी भी जैविक हथियारों को नहीं बनाया है लेकिन अमेरिका का आरोप है कि चीन इस बारे में झूठ बोलता है और वह जैविक हथियारों पर व्यापक रूप से काम कर रहा है।

अमेरिका के स्टेट डिपार्टमेंट की 1993 की एक रिपोर्ट के मुताबिक चीन ने संधि पर हस्ताक्षर करने के बाद भी अपना कार्यक्रम जारी रखा है। 2019 की रिपोर्ट में कहा गया था कि चीन बायोलोजिकल रिसर्च में लिप्त है जिसका मकसद दो तरफा हो सकता है। रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका को इसकी जानकारी नहीं है कि चीन ने अपने ‘जैविक हथियार प्रोग्राम को नष्ट किया भी है कि नहीं।‘

जहां तक नॉर्थ कोरिया की बात है तो 2012 में साउथ कोरिया के एक श्वेत पत्र में बताया गया था कि नॉर्थ कोरिया के पास एनथ्रैक्स, चेचक समेत कई बीमारियों के वायरस बनाने की क्षमता मौजूद है।

आसान है ये हथियार बनाना

जैविक हथियार विकसित करने के लिए आवश्यक सामग्री आसानी से और सस्ते में हासिल की जा सकती है। एनथ्रैक्स जैसी बीमारी फैलाने वाले विषाणु को लैब में बनाने की जरूरत नहीं है क्योंकि वह प्राकृतिक रूप से ही मौजूद है। ऐसे ही तमाम और विषाणु हैं जो प्राकृतिक रूप से हमारे इर्द गिर्दहैं। और जिनको जैविक हथियार बनाना है वे आसानी से उपयुक्त उपकरण भी हासिल कर सकते हैं। इसके लिए वही उपकरण चाहिए होते हैं जो मेडिकल या डिफेंस रिसर्च में काम आते हैं। जैविक हथियारों के इस्तेमाल को आसानी से प्राकृतिक प्रकोप के तौर पर पेश किया जा सकता है और किसी पर दोष साबित कर पाना बेहद मुश्किल होता है।

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जीन एडिटिंग

आज के समय में जीन एडिटिंग यानी जीन में बदलाव लाने के लिए काफी उपाय ढूंढ लिए गए हैं।‘क्रिस्पर’ नाम वाले सिस्टम समेत जीन एडिटिंग के कई टूल मौजूद हैं, जिनके जरिये वैज्ञानिक किसी सूक्ष्म जीव के डीएनए को बदल सकते हैं। वैसे तो यह काम बीमारियों का इलाज ढूँढने और दवाओं के रिसर्च में किया जाता है लेकिन किसी कि बदनीयती हो तो नरसंहार का काम भी हो सकता है।

इस काम को ‘क्रिस्पर’ सिस्टम ने बहुत आसान कर दिया है। अब तो विषाणु के जीन में बदलाव करना बेहद सस्ता भी हो गया है। 2014 में वांडेरबिल्ट यूनिवर्सिटी के एक वैज्ञानिक ने कहा था कि जिस काम में पहले 18 महीने और 20 हजार डालर लगते थे अब वह काम मात्र तीन हफ्ते और 3 हजार डालर में हो जाता है। ये लागत लगातार घटी भी है। चीन अपनी रिसर्च लैब में ‘क्रिस्पर’ तकनीक का व्यापक इस्तेमाल करता है।

अब जो उपकरण और तकनीक मौजूद हैं उसके जरिये कोई भी राष्ट्र नया विषाणु विकसित कर सकता है या विषाणु में मनचाहा बदलाव कर सकता है। ये विषाणु तेजी से फैल सकते हैं, गंभीर बीमारी पैदा कर सकते हैं, लाइलाज हो सकते हैं या इनका इलाज दुष्कर हो सकता है। आज के नॉवेल कोरोना वायरस में ऐसे ही गुण मौजूद हैं।

जैविक बनाम एटमी हथियार

किस देश के पास कौन से जैविक और रसायनिक हथियार हैं,यह पक्के तौर पर नहीं पता है। लेकिन व्यापक नरसंहार का एक और जरिया है - एटमी हथियार। इसके खिलाफ भी संधि हुई है लेकिन तमाम देशों के पास ऐसे हथियारों का जखीरा मौजूद है।

देश --- एटमी हथियारों की तादाद

रूस – —-6370

अमेरिका ——-5800

फ्रांस ———300

चीन ———290

यूनाइटेड किंगडम —-215

पाकिस्तान ——-150

भारत ————130

इजरायल———-80

नॉर्थ कोरिया ———20

इस लिहाज़ से इस सच्चाई से कैसे आँख मूँद कर बैठ सकते हैं कि पूरे विश्व में पोलियो एवं चेचक का ख़ात्मा हो चुका है परंतु बहुत से देशों के पास आज भी इन रोगों के जीवाणु सुरक्षित हैं।

लेखिका फेंग वेंग को जान से मारने की धमकी

कोरोना के दौरान के घटनाक्रम को वहां डायरी के जरिए सबके सामने लाने वाली लेखिका फेंग फेंग को अब जान से मारने की धमकियां दी जा रही हैं। उन पर आरोप है कि फेंग की वजह से ही पूरी दुनिया में चीन की बदनामी हुई है।

वुहान की 64 साल की लेखिका फेंग फेंग को 2019 में लेखन के लिए देश का सर्वोच्च सम्मान मिल चुका है। उन्होंने वुहान डायरी के नाम से वुहान के बारे में बहुत कुछ लिखा है। वुहान में कोरोना का पहला मामला पिछले साल दिसंबर में सामने आया था। चीन की सरकार ने यहां 30 जनवरी,2020 को बेहद सख्त लॉकडाउन घोषित किया था जो 8 अप्रैल तक चला।

इसी दौरान फेंग ने वुहान डायरी के नाम से यहां की तस्वीर खींची। शुरुआत में उन्होंने शहर की हल्की-फुल्की बातों को ही लिखा कि कैसे शहर की झील बिल्कुल शांत हो गई है। उसका पानी कितना उदास दिखता है। उनका कमरा सूरज की किरणों से कैसे रोशन हो रहा है। पड़ोसी लोग कैसे एक- दूसरे की मदद कर रहे हैं।

फेंग ने वुहान डायरी में यह भी बताया कि अस्पतालों में मरीजों के लिए जगह नहीं है। लोगों को जबरन भगाया जा रहा है। वहां के लोग मास्क की कमी की वजह से दिक्कत झेल रहे हैं। उन्होंने एक डॉक्टर दोस्त के हवाले से यह भी लिखा कि यह बीमारी बहुत तेजी से इंसान से इंसान में फैल रही है, लेकिन कुछ नहीं किया गया। इस पर उन्हें देश विरोधी करार दिया गया।

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