Navaratri 2026: भारत का नवसंवत्सर, सनातन अपनाइए और सृष्टि बचाइए – आचार्य संजय तिवारी
Navaratri 2026: नवरात्रि 2026 पर आचार्य संजय तिवारी का संदेश: सनातन अपनाइए, शक्ति साधना करें और सृष्टि को बचाइए। नवसंवत्सर का पावन अवसर।
Navaratri 2026(Photo-Social Media)
Navaratri 2026: 1960853127वें नववर्ष की उत्साहमयी तरंगे हर भारतीय के मन को स्पर्श करें। इतने वर्ष बीत चुके हैं, जिनका इतिहास हमारे पास उपलब्ध है। इस अवधि में कई युद्धों का भी इतिहास रहा। स्वयं मां दुर्गा की दुर्गविनाशिनी, महिषासुर संहारिणी और रक्तबीज नाशिनी स्वरूप की गाथाओं को हम आज से नौ दिनों तक स्मरण करेंगे। आज विश्व जिस युद्ध और संकट को देख और झेल रहा है, ऐसे संघर्ष इस सृष्टि में अनेक बार हुए हैं और आगे भी होंगे। किंतु सनातन वैदिक आर्य हिंदू संस्कृति के सान्निध्य में जीवन के शुद्ध संकेत सदैव उपलब्ध रहते हैं।
सृष्टि समय के साथ चलती रही, और सृजन-सृजन में स्पंदन की धार लिए वैभव है। यह नवसंवत्सर पावन, मनभावन, नवमन, आंगन-आँगन सेवा, सार और समर्पण लाने वाला है। प्राचेतस के श्लोक, गीता के स्वर, गायत्री के अक्षर, ब्रह्म कृपा, गंगा की कल-कल धारा और सागर के गीत संकल्पों को पवित्र करते हैं। नचिकेता के प्रश्नों का आधार और उपनिषदों की भाषा का स्वर इस नवसंवत्सर में जीवित है। प्रत्येक अध्याय और उप-आध्याय समय, ऋतु और भारत संवत्सर के महत्व को गाते हैं। जगद्जननी मां जगदंबा की आराधना से श्रीराम के जन्म तक, त्रेता युग में आसुरी सभ्यता को पराजित करने में 10 दिन लगे थे और द्वापर में अधर्म को 18 दिनों में हराया गया। माता दुर्गा ने नौ दिन युद्ध करने के बाद विजय प्राप्त की। उनके सनातन संततियों द्वारा जुटाई गई शक्ति का परीक्षण आज भी होता है।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, नवसंवत्सर:
सनातन संस्कृति में वर्ष का प्रथम दिन। इस दिन मातृ शक्ति को सादर वंदन करें। या देवि सर्वभूतेषु…
आज से नौ दिन हर घर में शक्ति साधना, आराधना, पूजा, वंदना, स्तुति और आरती होगी। इस अवसर पर सम्पूर्ण भारत सनातन संकल्प ले। लगभग डेढ़ हजार वर्षों के संघर्ष के बाद विशुद्ध सनातन की स्थापना का संयोग बना है। कोरोना जैसी वैश्विक त्रासदी ने सिद्ध कर दिया कि जीवन को सुरक्षित रखने का एकमात्र उपाय सनातन जीवन संस्कृति है।
याद रखिए:
"या देवि सर्वभूतेषु, लज्जा रूपेण संस्थिता।"
लज्जा भी स्वयं देवी हैं। सनातन जीवन संस्कृति का आधार शुद्धता और सत्य है। वाणी, वस्त्र, शरीर, निवास, आवास, गोष्ठ, संबंध, कुटुंब, समाज, कर्म, चिंतन और व्यवहार के प्रत्येक विंदु पर केवल शुद्धता चाहिए। गायत्री (मंत्र), गंगा (जल), गौ (पशुधन), तुलसी (वनस्पति एवं औषधियां), गौरी (स्त्री), गोविंद (ईश्वर) और गुरु (पथप्रदर्शक) – ये सभी सनातन के आधार तत्व हैं। इनके बिना सनातन संस्कृति सम्पूर्ण नहीं होती।
आजादी तक यह सब सुरक्षित था। लेकिन स्वतंत्रता के बाद हमने पश्चिमी प्रगति को आदर्श मानना शुरू कर दिया और दोहन की अंधी धार में बह गए। लगभग 2300 वर्ष पूर्व आचार्य चाणक्य ने कहा था, “आस्था तुम्हारी है, वह डिग कैसे सकती है। अपनी आस्था पर भरोसा रखो, तुम्हें कभी कोई सभ्यता पराजित नहीं कर पाएगी।”
हमने चाणक्य को न सुना और न उनका अनुकरण किया। अमानवीय कबीलों से उपजी सभ्यताओं में आदर्श खोजने लगे। अपना भोजन, विज्ञान, ज्ञान, संस्कार, जीवनमूल्य और व्यवस्थाएं हमें पिछड़ी लगने लगीं। पश्चिमी अमानवीय पकवानों में आनंद मिलने लगा। पहले हम घर के चौके में पाते थे, अब होटल में। रसोई कंगाल, बाथरूम मालामाल। यह चैत्र नवरात्र कई स्थानों पर गुड़ी पड़वा के रूप में मनाया जाता है। लोक में इस दिन नए अन्न ग्रहण का विधान और नए वस्त्र पहनने की परंपरा है। गुरु पर्व और गुड़ी पड़वा का अंतर समझें। गुरु से ज्ञान लेकर सृष्टि के संचालन में सभी की भूमिका होती है। शिक्षा देने वालों को ही गुरु मान लिया गया। अभी यह सौभाग्य समझिए। सनातन अपनाइए। सृष्टि बचाइए।