India Business Laws: भारत में बिजनेस करना होगा आसान? संसदीय समिति ने कानून और अनुपालन घटाने की बताई राह

India Business Laws: भारत में कारोबार के सामने 1,536 कानून, 69 हजार से अधिक अनुपालन और हजारों फाइलिंग का बोझ है। संसदीय समिति ने नियमों को सरल बनाने, डिजिटलीकरण, सेल्फ सर्टिफिकेशन और रिस्क-बेस्ड रेगुलेशन की सिफारिश की है।

Update:2026-08-10 18:21 IST

India Business Laws (Image Credit-Social Media)

नई दिल्ली। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और सरकार पिछले एक दशक से ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ तथा अनुपालन का बोझ घटाने पर जोर दे रही है। इसके बावजूद देश में कारोबार करने वाली कंपनियों के सामने केंद्र, राज्य और स्थानीय स्तर के कानूनों तथा नियमों का विशाल ढांचा अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। संसद की वाणिज्य संबंधी स्थायी समिति की नवीनतम रिपोर्ट ‘Doing Business in India: The Way Forward’ में इस नियामकीय जटिलता को व्यापार और निवेश के रास्ते की महत्वपूर्ण बाधाओं में गिना गया है। समिति की 201वीं रिपोर्ट 7 अगस्त 2026 को संसद के दोनों सदनों के पटल पर रखी गई।

उद्योग जगत की ओर से समिति को बताया गया कि भारत का समूचा कारोबारी नियामकीय ढांचा करीब 1,536 केंद्रीय और राज्य कानूनों, 69 हजार से अधिक अनुपालन आवश्यकताओं और 6,600 से अधिक वैधानिक फाइलिंग एवं सूचनाओं तक फैला हुआ है। पुराने अध्ययनों में इसका सटीक आंकड़ा 1,536 अधिनियम, 69,233 अनुपालन और 6,618 फाइलिंग बताया गया था। हालांकि यह समझना जरूरी है कि किसी एक सामान्य कंपनी को इन सभी कानूनों का पालन एक साथ नहीं करना पड़ता। उसके ऊपर लागू नियम कारोबार की प्रकृति, भौगोलिक विस्तार, कर्मचारी संख्या, उत्पादन, पर्यावरणीय जोखिम और संबंधित राज्य के आधार पर बदलते हैं।

कंपनी बढ़े तो नियमों की परतें भी बढ़ती जाती हैं

समस्या केवल कानूनों की संख्या की नहीं, बल्कि अलग-अलग स्तरों पर लागू होने वाले नियमों की है। कोई छोटा उद्यम एक राज्य में सीमित कर्मचारियों के साथ काम करता है तो उसका अनुपालन भार अपेक्षाकृत कम हो सकता है, लेकिन जैसे-जैसे वही कंपनी दूसरे राज्यों में विस्तार करती है, नए कारखाने खोलती है, कर्मचारियों की संख्या बढ़ाती है या अलग-अलग उत्पाद श्रेणियों में प्रवेश करती है, उसके ऊपर नए श्रम, कर, पर्यावरण, सुरक्षा, उद्योग, नगरपालिका और लाइसेंस संबंधी नियम जुड़ते जाते हैं।यही कारण है कि उद्योग जगत ‘नियमों की संख्या’ से कहीं अधिक नियमों के ओवरलैप, दोहराव, अलग-अलग अधिकारियों की व्याख्या और बार-बार होने वाली फाइलिंग को समस्या मानता है।

40 हजार से अधिक अनुपालन हटे, फिर भी समस्या पूरी खत्म नहीं

सरकार ने पिछले वर्षों में नियमों को तर्कसंगत बनाने के लिए बड़े स्तर पर अभियान चलाया है। उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 42 हजार से अधिक अनुपालन आवश्यकताओं को कम या समाप्त किया जा चुका है। कई प्रक्रियाओं को ऑनलाइन किया गया है, पुराने कानून हटाए गए हैं और अनेक अपराधों को आपराधिक दायरे से निकालकर नागरिक दंड के दायरे में लाया गया है। इसके बावजूद संसदीय समिति के सामने उद्योग प्रतिनिधियों ने कहा कि अलग-अलग कानूनों में समान जानकारी बार-बार मांगना, केंद्र और राज्य के नियमों में अंतर तथा कई विभागों से अलग-अलग मंजूरी लेना अभी भी संचालन लागत बढ़ाता है।

यानी सुधार हुआ है, लेकिन उद्योग की शिकायत है कि compliance reduction को केवल नियम हटाने तक सीमित न रखकर पूरी प्रक्रिया को एकीकृत और सरल बनाने की जरूरत है।

श्रम कानून सबसे जटिल क्षेत्रों में

व्यवसाय अनुपालन में सबसे अधिक जटिलता ऐतिहासिक रूप से श्रम कानूनों से जुड़ी रही है। पुराने नियामकीय अध्ययन में राज्यों में ही 423 श्रम संबंधी अधिनियम, 31,605 अनुपालन और 2,913 फाइलिंग दर्ज की गई थीं।श्रम विषय संविधान की समवर्ती सूची में है। इसलिए केंद्र और राज्यों दोनों को कानून बनाने का अधिकार है। इसी वजह से लंबे समय तक कंपनियों को केंद्रीय और राज्य स्तर के अलग-अलग श्रम कानून, रजिस्टर, नोटिस, निरीक्षण और रिटर्न की व्यवस्था से गुजरना पड़ता रहा।

केंद्र सरकार ने 29 पुराने केंद्रीय श्रम कानूनों को चार श्रम संहिताओं में समेटने का प्रयास किया है, लेकिन उनके प्रभावी क्रियान्वयन और राज्यों के नियमों के साथ तालमेल का प्रश्न कारोबारियों के लिए महत्वपूर्ण बना हुआ है।

नियम एक हों, व्याख्या भी एक जैसी हो

उद्योग जगत की सबसे बड़ी शिकायतों में से एक यह है कि समान नियमों की व्याख्या अलग-अलग राज्यों या अधिकारियों द्वारा अलग तरीके से हो सकती है। इसका सबसे अधिक असर उन कंपनियों पर पड़ता है जिनका कारोबार कई राज्यों में है।उदाहरण के लिए किसी उत्पाद, श्रम प्रक्रिया या पर्यावरणीय मंजूरी के लिए एक राज्य में जिस दस्तावेज को पर्याप्त माना जाता है, दूसरे राज्य में उसी विषय पर अतिरिक्त कागजात मांगे जा सकते हैं। इससे कंपनियों को अलग-अलग अनुपालन टीम, वकील और सलाहकार रखने पड़ते हैं।संसदीय समिति का जोर इसीलिए standardisation और digitisation पर है।

टैक्स और कस्टम प्रक्रिया और सरल बनाने की सिफारिश

समिति ने उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग और संबंधित मंत्रालयों से कहा है कि कर और सीमा शुल्क नियमों को और सरल बनाया जाए। दस्तावेजों की संख्या कम हो, अनुमतियां डिजिटल हों और एक ही जानकारी अलग-अलग विभागों को बार-बार देने की जरूरत न पड़े।व्यापार के लिए समय स्वयं एक लागत है। यदि किसी आयात, निर्यात, निर्माण अथवा लाइसेंस की मंजूरी में अनिश्चित समय लगता है तो कंपनी को इन्वेंटरी, गोदाम, ब्याज और कर्मचारियों पर अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ता है।

इसलिए समिति का जोर केवल नियम कम करने पर नहीं, बल्कि approval time को predictable बनाने पर भी है।

हर कंपनी का बार-बार निरीक्षण क्यों? जोखिम आधारित व्यवस्था की सिफारिश

समिति ने risk-based regulation अपनाने पर विशेष जोर दिया है। इसके पीछे विचार यह है कि हर कंपनी और हर उद्योग को एक ही स्तर के निरीक्षण से गुजरने की जरूरत नहीं होती।कम जोखिम वाले प्रतिष्ठानों के लिए स्व-प्रमाणन और थर्ड-पार्टी सर्टिफिकेशन बढ़ाया जा सकता है, जबकि उच्च जोखिम वाले उद्योगों में सरकारी निरीक्षण अधिक सख्त हो।इससे ईमानदारी से नियमों का पालन करने वाले व्यवसायों को अनावश्यक निरीक्षण और कागजी कार्रवाई से राहत मिल सकती है और नियामक एजेंसियां अपने संसाधन उन क्षेत्रों पर केंद्रित कर सकती हैं जहां वास्तविक जोखिम अधिक है।

सेल्फ सर्टिफिकेशन बढ़ाने की सलाह

समिति ने स्व-प्रमाणन यानी Self Certification की व्यवस्था बढ़ाने की भी सिफारिश की है। इस मॉडल में कंपनी स्वयं यह प्रमाणित करती है कि वह निर्धारित नियमों का पालन कर रही है।लेकिन इसका अर्थ नियंत्रण समाप्त करना नहीं है। गलत प्रमाणन मिलने पर भारी दंड और जोखिम आधारित ऑडिट की व्यवस्था साथ-साथ रखी जा सकती है।दुनिया के कई देशों में इसी मॉडल का इस्तेमाल इसलिए किया जाता है ताकि सरकार हर छोटे कारोबारी की हर गतिविधि को पहले से अनुमति देने के बजाय बाद में जोखिम के आधार पर जांच करे।

थर्ड-पार्टी सर्टिफिकेशन से सरकारी विभागों का बोझ घट सकता है

संसदीय समिति ने कुछ नियामकीय क्षेत्रों में मान्यता प्राप्त स्वतंत्र संस्थाओं को जांच और प्रमाणन की भूमिका देने का सुझाव भी दिया है। यह मॉडल भवन सुरक्षा, मशीनरी परीक्षण, पर्यावरण और गुणवत्ता नियंत्रण जैसे क्षेत्रों में उपयोगी हो सकता है।यदि सही तरीके से लागू किया जाए तो इससे सरकारी निरीक्षण एजेंसियों पर दबाव घट सकता है और उद्योग को मंजूरी तेजी से मिल सकती है।हालांकि ऐसी व्यवस्था में थर्ड-पार्टी एजेंसियों की स्वतंत्रता और जवाबदेही सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक होगा।

ई-कॉमर्स में ‘डार्क पैटर्न’ पर सख्ती की जरूरत

रिपोर्ट केवल उद्योग की सहूलियत की बात नहीं करती, बल्कि उपभोक्ता हित को भी महत्व देती है। समिति ने डिजिटल मंचों पर डार्क पैटर्न और भ्रामक विज्ञापन रोकने की सिफारिश की है।डार्क पैटर्न वे डिजिटल डिजाइन तकनीकें हैं जिनके जरिए किसी ग्राहक को अनजाने में सदस्यता लेने, अतिरिक्त शुल्क स्वीकार करने या ऐसी चीज खरीदने के लिए प्रेरित किया जाता है जिसे वह मूल रूप से नहीं चाहता था।कारोबार आसान बनाने का अर्थ उपभोक्ता संरक्षण कमजोर करना नहीं है—समिति का दृष्टिकोण इन दोनों के बीच संतुलन बनाने का है।

सर्च हिस्ट्री देखकर कीमत बदलने पर भी सवाल

समिति ने डायनमिक प्राइसिंग के कुछ रूपों पर भी चिंता जताई है। विशेष रूप से ऐसे मामलों में जहां उपभोक्ता की सर्च हिस्ट्री, लोकेशन या व्यवहार संबंधी डेटा के आधार पर चेकआउट के दौरान कीमत बढ़ सकती है।समिति ने उपभोक्ताओं को गुमराह करने या व्यक्तिगत डेटा का अनुचित इस्तेमाल कर कीमतें बदलने वाली प्रथाओं पर नियंत्रण की सिफारिश की है।यह मुद्दा आने वाले वर्षों में ई-कॉमर्स, होटल बुकिंग, एयरलाइन टिकट, ऑनलाइन टैक्सी और डिजिटल सेवाओं के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

छोटी कंपनियों पर अनुपालन का भार ज्यादा महसूस होता है

बड़ी कंपनियों के पास कानूनी, टैक्स और अनुपालन विशेषज्ञों की पूरी टीम होती है। किसी छोटे या मध्यम उद्यम के पास यह सुविधा नहीं होती। इसलिए समान नियम का आर्थिक बोझ छोटे कारोबार पर अनुपातिक रूप से अधिक पड़ता है।किसी बड़ी कंपनी के लिए एक अतिरिक्त कानूनी फाइलिंग केवल प्रशासनिक खर्च हो सकती है, लेकिन छोटे उद्यम के लिए उसे पूरा करने के लिए बाहरी सलाहकार रखने की जरूरत पड़ सकती है।इसी कारण MSME क्षेत्र लंबे समय से सरल और एकीकृत अनुपालन व्यवस्था की मांग करता रहा है।

कानून कम करना और कानून कमजोर करना अलग बातें

नियामकीय सुधार की बहस में यह अंतर भी महत्वपूर्ण है कि ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ का अर्थ पर्यावरण, श्रमिक सुरक्षा या उपभोक्ता अधिकारों के नियम समाप्त करना नहीं होना चाहिए।समिति के सुझावों का मूल उद्देश्य नियमों के उद्देश्य को खत्म करना नहीं, बल्कि दोहराव, अनावश्यक कागजी कार्रवाई और पुराने प्रावधानों को कम करना है।श्रमिकों का वेतन, कार्यस्थल सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण, उत्पाद गुणवत्ता और उपभोक्ता हित जैसे मूल मानकों का पालन आवश्यक रहेगा।

असली चुनौती—केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों को एक मंच पर लाना

भारत के कारोबार नियमन की सबसे बड़ी जटिलता संघीय व्यवस्था से भी जुड़ी है। कंपनी कानून केंद्र के अधीन हो सकता है, लेकिन जमीन, बिजली, पानी, प्रदूषण, अग्नि सुरक्षा, दुकान एवं प्रतिष्ठान, नगरपालिका अनुमति और श्रम संबंधी अनेक विषयों में राज्य तथा स्थानीय निकायों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।इसलिए केवल केंद्र सरकार अपने कानून सरल कर दे तो पूरी समस्या समाप्त नहीं होती।

असली सफलता तब होगी जब केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों की मंजूरियां एक डिजिटल व्यवस्था में जुड़ें और कंपनी को अलग-अलग कार्यालयों में एक ही जानकारी बार-बार न देनी पड़े।

भारत ने लंबा रास्ता तय किया, लेकिन अगला सुधार ज्यादा कठिन

पिछले दशक में डिजिटल पंजीकरण, GST, ऑनलाइन टैक्स भुगतान, दिवाला कानून, सिंगल विंडो व्यवस्था और हजारों अनुपालन कम किए जाने से कारोबारी वातावरण बदला है। लेकिन अब बचे हुए सुधार ज्यादा जटिल हैं, क्योंकि वे केवल एक फार्म हटाने का प्रश्न नहीं बल्कि अलग-अलग सरकारों, विभागों और नियामकों के बीच समन्वय का सवाल हैं।संसदीय समिति की रिपोर्ट का संदेश भी यही है—भारत में कारोबार की राह पहले से आसान हुई है, लेकिन नियमों का विशाल और कई स्तरों वाला ढांचा अब भी कंपनी के समय, लागत और विस्तार की क्षमता को प्रभावित करता है।

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