Raakh Series: राख वेब-सीरीज में दिखाया गया सबसे बड़ा झूठ, जो असल कहानी से बिल्कुल अलग है

Is Raakh Series Based On True Story: राख वेब-सीरीज प्राइम वीडियो पर रिलीज हुई है, इन दिनों सुर्खियों में है, जानिए इस वेब-सीरीज की वास्तविक कहानी किसपर आधारित है

Update:2026-06-15 16:55 IST

Raakh Series Based On True Story (Image Credit- Social Media)

Raakh Series Real Story: राख सीरीज इन दिनों प्राइम वीडियो पर ट्रेडिंग लिस्ट में है। इस वेब-सीरीज को दर्शक काफी पसंद कर रहे हैं। इस वेब-सीरीज में कुल 8 एपिसोड है। जिसे दर्शकों का भरपूर प्यार मिल रहा है। इस वेब-सीरीज की कहानी की बात करे, तो रिपोर्ट के अनुसार, इस वेब-सीरीज की कहानी वास्तविक घटनाओं पर आधारित है। लेकिन आपको बता दे कि राख वेब-सीरीज में जो कहानी दिखाई गई है, कुछ ऐसी चीजे भी है, जो वास्तविक कहानी से अलग है। चलिए जानते हैं राख वेब-सीरीज के बारे में सबकुछ

क्या राख सीरीज वास्तविक कहानी पर आधारित है (Is Raakh Based On True Story In Hindi)-

प्राइम वीडियो पर 'राख' के रिलीज होने से भारत के सबसे भयावह आपराधिक मामलों में से एक फिर से चर्चा में आ गया है। अली फजल और सोनाली बेंद्रे अभिनीत यह क्राइम ड्रामा 1978 के कुख्यात रंगा-बिल्ला कांड से प्रेरित है, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया था। दिल्ली के भाई-बहन गीता चोपड़ा और संजय चोपड़ा के अपहरण और हत्या ने न केवल पूरे देश को दहला दिया, बल्कि कई भारतीय परिवारों के अपने बच्चों की सुरक्षा के बारे में सोचने के तरीके को भी बदल दिया। यह इतिहास के सबसे मशहूर आपराधिक घटनाओं में से एक पर आधारित है। 

1970 के दशक के उत्तरार्ध में दिल्ली में घटित 'राख' एक क्रूर अपराध के बाद के हालातों के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसने परिवारों को तबाह कर दिया और पूरे शहर को भय में जीने पर मजबूर कर दिया। अली फजल ने सब-इंस्पेक्टर जयप्रकाश की भूमिका निभाई है, जबकि सोनाली बेंद्रे एक स्कूल शिक्षिका और त्रासदी से जूझ रही एक शोकाकुल माँ का किरदार निभा रही हैं।



बता दे कि राख वेब-सीरीज में जो कहानी दिखाई गई है, वो वास्तविक कहानी से थोड़ी-बहुत अलग है। वेब-सीरीज में मुख्य नायक के रूप में पुलिस को दर्शाया गया है। जिसका किरदार अली फैजल निभा रहे हैं। लेकिन वास्तविक कहानी के असली हीरो दो भाई-बहन और सेना के जवान है। 

रिपोर्ट के अनुसार इस कहानी की शुरूआत 26 अगस्त, 1978 को शुरू हुआ। 16 वर्षीय गीता चोपड़ा और उनके छोटे भाई 13 वर्षीय संजय चोपड़ा भारतीय नौसेना अधिकारी कैप्टन मदन मोहन चोपड़ा के बच्चे थे। परिवार दिल्ली के धौला कुआं इलाके में रहता था।

26 अगस्त की शाम को गीता को ऑल इंडिया रेडियो के लोकप्रिय युवा वाणी कार्यक्रम में भाग लेना था। संजय भी उनके साथ यात्रा कर रहे थे। बताया जाता है कि उस शाम भारी बारिश के कारण यात्रा बाधित हो गई। डॉ. सुश्री नंदा से कुछ दूर तक लिफ्ट लेने के बाद, भाई-बहन को गोले डाक खाना के पास छोड़ दिया गया, जो रेडियो स्टेशन से कुछ दूरी पर था। वे कभी रेडियो स्टेशन नहीं पहुंचे।

जब परिवार ने गीता का कार्यक्रम सुनने के लिए रेडियो स्टेशन खोला, तो उन्हें किसी और की आवाज़ सुनकर गहरा सदमा लगा। चिंतित होकर कैप्टन चोपड़ा रेडियो स्टेशन गए और पता चला कि उनके बच्चे वहाँ पहुँचे ही नहीं थे। तुरंत ही उनकी तलाश शुरू कर दी गई। दो दिन तक लापता बच्चों का कोई पता नहीं चला। फिर, एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, 28 अगस्त को एक चरवाहे ने जंगल में उनके शव बरामद किए। इस खबर से पूरे देश में सनसनी फैल गई। पोस्टमार्टम में पता चला कि दोनों बच्चों के शरीर पर चाकू के कई घाव थे। जांचकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि बच्चों की हत्या धारदार हथियार से की गई थी। इस क्रूर अपराध ने जनता को दहला दिया और यह मामला राष्ट्रीय मुद्दा बन गया। अखबारों में इस घटना को खूब छापा गया और अधिकारियों पर दोषियों की पहचान करके उन्हें गिरफ्तार करने का दबाव बढ़ गया।

रंगा और बिल्ला को किसने पकड़ा (Who Were Caught Ranga And Billa)-

रिपोर्ट के अनुसार,  कुलजीत सिंह, जिसे रंगा के नाम से जाना जाता था, और जसबीर सिंह, जिसे बिल्ला के नाम से जाना जाता था। आरोपी लगभग दो सप्ताह तक फरार रहे। उनकी गिरफ्तारी 8 सितंबर, 1978 को हुई, जब वे दिल्ली जा रही कालका मेल ट्रेन में सवार हुए। हालांकि, वे गलती से सैन्य कर्मियों के लिए आरक्षित डिब्बे में घुस गए। जब ​​लांस नायक गुरतेज सिंह और एवी शेट्टी ने उनसे पहचान पत्र दिखाने को कहा, तो उनके घबराए हुए व्यवहार ने तुरंत संदेह पैदा कर दिया। उस समय की रिपोर्टों के अनुसार, एक संदिग्ध ने दूसरे से पहले से भरा हुआ पहचान पत्र दिखाने को कहा, जिससे सैनिकों का संदेह और बढ़ गया। संयोग से, गुरतेज सिंह के पास एक हिंदी अखबार था जिसमें देश के सबसे वांछित भगोड़ों में से एक की तस्वीर छपी थी। समानता को देखते हुए, सैनिकों ने दोनों पर कड़ी नजर रखी और ट्रेन के दिल्ली पहुंचने पर सुबह लगभग 3:30 बजे उन्हें पुलिस के हवाले कर दिया। इस गिरफ्तारी ने भारत की सबसे बड़ी आपराधिक जांचों में से एक में एक बड़ी सफलता हासिल की।

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