FIFA World Cup 2002: Ronaldo की ऐतिहासिक वापसी, Brazil बना Champion
FIFA World Cup 2002 History: 1998 और 2002 के बीच की कहानी सिर्फ विश्वकप की नहीं थी बल्कि फुटबॉल के दुनिया भर में फैलने की भी थी...
Fifa World Cup 2002
FIFA World Cup 2002 History: 1998 का फ्रांस विश्वकप खत्म हुआ तो फुटबॉल जगत के सामने कई सवाल खड़े थे। फ्रांस पहली बार चैंपियन बना था। ज़िदान नए बादशाह के तौर पर उभरे थे। दूसरी तरफ ब्राज़ील की हार और खासकर रोनाल्डो की रहस्यमयी बीमारी पर बहस अब भी चल रही थी। चार साल तक यही सवाल पूछा जाता रहा कि फाइनल से कुछ घंटे पहले आख़िर हुआ क्या था जिसने दुनिया के सबसे खतरनाक स्ट्राइकर को बेअसर कर दिया।
जब विश्वकप पहली बार एशिया पहुंचा
1998 और 2002 के बीच की कहानी सिर्फ विश्वकप की नहीं थी बल्कि फुटबॉल के दुनिया भर में फैलने की भी थी। एशिया में करोड़ों नए दर्शक इस खेल से जुड़ रहे थे।जापान और दक्षिण कोरिया ने अपने फुटबॉल ढांचे में भारी निवेश किया था। फीफा भी चाहती थी कि विश्वकप सच में वैश्विक आयोजन बने। इसी सोच से 2002 की मेज़बानी पहली बार दो देशों को दी गई - दक्षिण कोरिया और जापान को।
यह इतिहास में पहली बार था जब विश्वकप यूरोप और अमेरिका से बाहर, एशिया की धरती पर खेला जा रहा था। पहली बार दो देश मिलकर मेज़बानी कर रहे थे। इस टूर्नामेंट के लिए खास तौर पर 'फीवरनोवा' नाम की रंगीन गेंद बनाई गई थी, जिसकी हल्की बनावट को कई खिलाड़ियों ने आलोचना का विषय बनाया।
फ्रांस और अर्जेंटीना: दो बड़े झटके
टूर्नामेंट से पहले सबसे बड़ा सवाल फ्रांस को लेकर था। गत चैंपियन और यूरोपीय चैंपियन और सबसे बड़ा दावेदार। पर विश्वकप का इतिहास बार-बार साबित करता है कि यहां पुरानी धारणा पल भर में टूट सकती है।
उद्घाटन मैच में ही फ्रांस को सेनेगल ने 1-0 से हरा दिया। सिर्फ हार नहीं थी बल्कि एक एलान था कि अब छोटी कहलाने वाली टीमें भी बड़े नामों को टक्कर देने लगी हैं। पापा बउबा दिओप के उस विजयी गोल के बाद जर्सी उतारकर किया गया जश्न इस विश्वकप की पहली बड़ी तस्वीर बना। फ्रांस इस झटके से उबर नहीं सका। ज़िदान चोट से जूझ रहे थे। टीम गोल के लिए तरस गई और गत चैंपियन बिना एक भी गोल किए पहले ही दौर में बाहर हो गया। इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ।
अर्जेंटीना के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। 'ग्रुप ऑफ डेथ' में इंग्लैंड, स्वीडन और नाइजीरिया के सामने वे मैदान पर अपनी कागज़ी ताक़त नहीं दिखा सके। इंग्लैंड के बेकहम ने पेनाल्टी पर गोल करके 1998 के अपने लाल कार्ड का बदला ले लिय और अर्जेंटीना आंसुओं के साथ घर लौट गया।
रोनाल्डो: एक फिल्मी कहानी जैसी वापसी
इस बीच दुनिया की नज़रें एक खिलाड़ी पर टिकी थीं - रोनाल्डो। 1998 के बाद उनके करियर पर मुसीबतों का पहाड़ टूटा था। घुटनों की गंभीर चोटों ने उन्हें करीब दो साल मैदान से दूर रखा। कई डॉक्टरों को लगा वे फिर पहले जैसे नहीं हो पाएंगे। पर महान खिलाड़ी असंभव हालात से भी लौट आते हैं।
2002 में रोनाल्डो सिर्फ खिलाड़ी नहीं थे बल्कि वापसी की कहानी थे। इस टूर्नामेंट में उनकी एक अजीब त्रिकोणीय हेयरस्टाइल चर्चा में रही। बाद में उन्होंने खुद बताया कि यह जानबूझकर किया था ताकि मीडिया का ध्यान उनकी चोट से हटकर बालों पर चला जाए और यह तरकीब काम कर गई। उनके साथ टीम में रिवाल्डो और रोनाल्डिन्हो भी थे। इन तीनों को 'थ्री आर' कहा गया - रोनाल्डो, रिवाल्डो, रोनाल्डिन्हो। रिवाल्डो की सटीकता, रोनाल्डिन्हो की कल्पना, और रोनाल्डो की घातक फिनिशिंग - यह तिकड़ी किसी भी डिफेंस के लिए डरावनी थी।
दक्षिण कोरिया: मेज़बान का सपनों जैसा सफर
इस बीच एक और कहानी सबका ध्यान खींच रही थी, दक्षिण कोरिया। मेज़बान देश ने पुर्तगाल को हराया फिर इटली को बाहर किया फिर स्पेन को पेनाल्टी शूटआउट में हराया। पहली बार कोई एशियाई टीम सेमीफाइनल तक पहुंची। कुछ रेफरी फैसलों पर विवाद भी हुआ। इटली और स्पेन दोनों नाराज़ रहे पर इससे यह सच नहीं बदलता कि कोरिया ने एशियाई फुटबॉल के आत्मविश्वास को नई ऊंचाई दी। डच कोच गुस हिडिंक कोरिया में राष्ट्रीय हीरो बन गए। इटली के खिलाफ आन जुंग-ह्वान के 'गोल्डन गोल' ने इतिहास रच दिया हालांकि इसके बाद उनके इतालवी क्लब पेरुगिया ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया।
ब्राज़ील: एक बेदाग़ सफर
दूसरी तरफ ब्राज़ील का सफर लगभग बेदाग़ था। ग्रुप स्टेज के सभी मैच जीते। बेल्जियम को हराया, इंग्लैंड के खिलाफ यादगार मुकाबला जीता, जिसमें रोनाल्डिन्हो का गोलकीपर डेविड सीमैन के सिर के ऊपर से निकला 40 गज का फ्री-किक आज भी सबसे चतुर गोलों में गिना जाता है। सेमीफाइनल में तुर्की को हराकर फाइनल का टिकट मिला।
फाइनल: ओलिवर कान की एक चूक
फाइनल में सामना जर्मनी से था, दो सबसे कामयाब फुटबॉल देशों की भिड़ंत, ब्राज़ील चार बार का चैंपियन, जर्मनी तीन बार का, और दिलचस्प बात यह कि दोनों पहली बार विश्वकप में आमने-सामने आ रहे थे। 30 जून 2002, योकोहामा। पहला हाफ संतुलित रहा। जर्मन गोलकीपर ओलिवर कान पूरे टूर्नामेंट में लगभग अभेद्य रहे थे, फाइनल से पहले ही उन्हें टूर्नामेंट का "गोल्डन बॉल" मिल चुका था, विश्वकप इतिहास में यह सम्मान पाने वाले इकलौते गोलकीपर। पर फाइनल में उंगली की चोट उन पर भारी पड़ गई। दूसरे हाफ में वह पल आया जिसने सब बदल दिया। रिवाल्डो का शॉट कान के हाथों से छिटक गया, रोनाल्डो वहीं मौजूद थे, गोल, ब्राज़ील 1-0 आगे। कुछ देर बाद रिवाल्डो ने चतुराई से गेंद छोड़ी, रोनाल्डो ने दूसरा गोल कर दिया, 2-0, फाइनल लगभग तय हो गया।
पांचवां ताज, और एक इंसान की निजी जंग
आख़िरी सीटी बजी, ब्राज़ील पांचवीं बार चैंपियन बना। यह सिर्फ टीम की जीत नहीं थी, रोनाल्डो की निजी जंग जीतने की कहानी थी। 1998 की निराशा, घुटनों की गंभीर चोटें, लंबा पुनर्वास, शक और आलोचना और फिर फाइनल में दो गोल। यह खेल इतिहास की सबसे बड़ी वापसी कहानियों में शामिल हो गई। आठ गोलों के साथ वे टूर्नामेंट के टॉप स्कोरर बने। कप्तान काफू लगातार तीन फाइनल (1994, 1998, 2002) खेलने वाले दुनिया के इकलौते खिलाड़ी बने। ब्राज़ील ने अपने सभी सात मैच जीतकर शत-प्रतिशत रिकॉर्ड के साथ यह खिताब जीता।
जो आगे आने वाला था
2002 का विश्वकप कई वजहों से ऐतिहासिक है। एशिया को फुटबॉल के केंद्र में लाना, अफ्रीकी और एशियाई टीमों का बढ़ता आत्मविश्वास, और सबसे ऊपर, रोनाल्डो की अमरता। पर फुटबॉल तेज़ी से बदल रहा था। यूरोप की लीगें और ताक़तवर हो रही थीं, एक नई पीढ़ी उभर रही थी। पुर्तगाल में एक युवा विंगर दिख रहा था। अर्जेंटीना में एक किशोर अपनी पहचान बना रहा था। दुनिया उनके नाम अभी ठीक से नहीं जानती थी पर कुछ साल बाद पूरा फुटबॉल जगत उन्हीं दो खिलाड़ियों के इर्द-गिर्द घूमने वाला था - क्रिस्टियानो रोनाल्डो और लियोनेल मेसी।