FIFA World Cup 2018: जब एम्बाप्पे का तूफान उठा और मेसी-रोनाल्डो का सपना टूट गया

FIFA World Cup 2018 की पूरी कहानी पढ़ें—एम्बाप्पे के विस्फोटक उदय, फ्रांस की खिताबी वापसी, क्रोएशिया के ऐतिहासिक सफर और मेसी-रोनाल्डो की अधूरी विश्वकप तलाश तक।

Update:2026-07-03 20:33 IST

FIFA World Cup 2018: 2014 का ब्राज़ील विश्वकप खत्म हुआ तो फुटबॉल दो अलग कहानियों के बीच खड़ा था। एक तरफ जर्मनी था जिसने सालों की योजना और अनुशासन से शिखर छुआ था। दूसरी तरफ लियोनेल मेसी थे जो ट्रॉफी से कुछ कदम दूर रह गए थे। माराकाना में हार के बाद ट्रॉफी को निहारते उनकी तस्वीर लोगों के दिमाग़ में अटकी रह गई थी। क्रिस्टियानो रोनाल्डो भी क्लब फुटबॉल में सब कुछ जीत चुके थे पर विश्वकप में वैसा असर नहीं छोड़ पाए थे। 2018 से पहले दुनिया के दो सबसे बड़े खिलाड़ियों की सबसे बड़ी अधूरी कहानी अब भी विश्वकप ही थी।

जब तकनीक फुटबॉल का हिस्सा बन गई

यह वह दौर था जब तकनीक खेल को बदलने को तैयार थी। फीफा ने इस विश्वकप में पहली बार ‘VAR’ यानी वीडियो असिस्टेंट रेफरी तकनीक लागू की जिससे रेफरी के फैसलों की गलतियां कम हुईं। मेज़बानी रूस को मिली थी। सोवियत संघ टूटने के बाद रूस का यह पहला इतना बड़ा खेल आयोजन था। शुरुआती शंकाओं के बावजूद आयोजन बहुत कामयाब रहा। बड़े स्टेडियम और आधुनिक सुरक्षा प्रबंध के साथ रूस ने दुनिया का दिल जीत लिया। इस टूर्नामेंट की आधिकारिक गेंद ‘टेल्स्टार 18’ थी। ये 1970 की मूल टेल्स्टार गेंद का हाई-टेक संस्करण था जिसमें एक NFC चिप भी लगी थी।

मेसी और रोनाल्डो: करियर का आख़िरी मौका

विश्वकप शुरू होने से पहले सबसे बड़ा सवाल था कि क्या मेसी और रोनाल्डो अपनी सबसे बड़ी कमी पूरी कर पाएंगे। दोनों तीस साल पार कर चुके थे। दोनों कई बार बैलन डी'ओर जीत चुके थे। दोनों ने क्लब फुटबॉल में लगभग सब कुछ हासिल किया था पर विश्वकप अब भी दूर था। बहुत से जानकारों को लगा कि यह उनके करियर का आख़िरी सच्चा मौका हो सकता है।

शुरुआत में लगा दोनों इतिहास लिखेंगे। पुर्तगाल-स्पेन मैच में रोनाल्डो ने हैट्रिक लगाकर सबको चौंका दिया। उनका आख़िरी फ्री-किक गोल विश्वकप के सबसे यादगार पलों में शामिल हो गया। दूसरी तरफ मेसी की शुरुआत कमज़ोर रही। आइसलैंड के खिलाफ पेनाल्टी चूक गए। अर्जेंटीना जूझता दिखा और पूरी टीम सिर्फ मेसी के निजी जादू पर टिकी लग रही थी।

जर्मनी का पतन

ग्रुप स्टेज में कई चौंकाने वाले नतीजे आए। गत चैंपियन जर्मनी को सबसे बड़ा झटका लगा। वह दक्षिण कोरिया से हारकर पहले ही दौर में बाहर हो गए। 1938 के बाद पहली बार ऐसा हुआ कि कोई गत चैंपियन ग्रुप स्टेज से आगे नहीं बढ़ पाया। इसे ‘गत चैंपियन का अभिशाप’ कहा जाने लगा क्योंकि 2002 में फ्रांस, 2010 में इटली, 2014 में स्पेन के बाद यह लगातार चौथी बार था जब कोई यूरोपीय गत चैंपियन पहले दौर में ही बाहर हुआ।

बेल्जियम की गोल्डन जेनरेशन शानदार खेल दिखा रही थी। डी ब्रॉइन, हज़ार्ड, लुकाकू, कूर्तुआ, सबसे चमकीली टीमों में एक। पर सबसे संतुलित टीम फ्रांस थी।

एम्बाप्पे: एक उन्नीस साल का तूफान

फ्रांस के पास ग्रीज़मैन, पोग्बा, कांते, वराने जैसे अनुभवी नाम थे। पर सबसे बड़ा आकर्षण था एक उन्नीस साल का खिलाड़ी। जिसकी गति और हिम्मत ने सबका ध्यान खींच लिया था। नाम था, किलियन एम्बाप्पे। उन्हें देखकर बहुत से लोगों को युवा पेले की याद आती थी। विस्फोटक रफ़्तार, डिफेंडरों को पीछे छोड़ने की कला, और गोल करने की भूख, सब एक साथ। टूर्नामेंट से पहले शायद ही किसी को अंदाज़ा था कि वे इतनी जल्दी वैश्विक सितारा बन जाएंगे।

अर्जेंटीना बनाम फ्रांस: जिस दिन एक नया सितारा फूटा

नॉकआउट दौर में अर्जेंटीना और फ्रांस का मुकाबला टूर्नामेंट के सबसे रोमांचक मैचों में एक बना। मेसी ने पूरी कोशिश की। पर एम्बाप्पे उस दिन किसी और ही स्तर पर खेल रहे थे। उनकी रफ़्तार ने अर्जेंटीनी डिफेंस को बार-बार तोड़ा। उन्होंने दो गोल किए और फ्रांस 4-3 से जीता। इसी मैच में फ्रांस के बेंजामिन पावर्ड ने हवा में तैरता हुआ एक अद्भुत गोल किया जो पूरे टूर्नामेंट का ‘सर्वश्रेष्ठ गोल’ चुना गया। उन्नीस साल की उम्र में एम्बाप्पे ने वह असर छोड़ दिया जो कई खिलाड़ी पूरे करियर में नहीं छोड़ पाते।

कुछ ही दिनों बाद रोनाल्डो का सफर भी खत्म हो गया। उरुग्वे ने पुर्तगाल को हराया। दो सबसे बड़े सितारे एक ही दौर में बाहर हो गए जो साफ संकेत था, नई पीढ़ी अब मंच पर आ चुकी है।

क्रोएशिया: चालीस लाख लोगों का देश फाइनल तक

क्वार्टर फाइनल और सेमीफाइनल में फ्रांस लगातार मज़बूत होता गया। बेल्जियम ने ब्राज़ील को हराकर सबको चौंकाया पर सेमीफाइनल में फ्रांस के सामने वे भी रुक गए। दूसरी तरफ क्रोएशिया ने गज़ब का हौसला दिखाया। लुका मोड्रिच के नेतृत्व में लगातार कठिन मुकाबले जीते और पहली बार फाइनल में पहुंचे। चालीस लाख की आबादी वाले देश का फाइनल तक पहुंचना अपने आप में असाधारण था। डेनमार्क, रूस और इंग्लैंड के खिलाफ उनके तीनों नॉकआउट मैच अतिरिक्त समय और पेनाल्टी शूटआउट तक गए। उनका कभी हार न मानने वाला जज़्बा दुनिया के लिए मिसाल बन गया।

फाइनल: फ्रांस की दूसरी ताजपोशी

15 जुलाई 2018। मॉस्को का लुझ्निकी स्टेडियम। फ्रांस बनाम क्रोएशिया मैच। क्रोएशिया ने पूरे टूर्नामेंट संघर्ष दिखाया था। फैंस को उम्मीद थी कि इतिहास बनेगा। पर फ्रांस के पास ज़्यादा गहराई और ज़्यादा ऊर्जा थी। मैच रोमांचक रहा। गोल हुए। जवाबी गोल हुए। आख़िर फ्रांस 4-2 से जीत गया।

एम्बाप्पे ने फाइनल में भी गोल किया, और पेले के बाद फाइनल में गोल करने वाले सबसे युवा खिलाड़ियों में शामिल हो गए। फ्रांस दूसरी बार चैंपियन बना। कोच दिदिएर डेस्चैम्प्स ने इतिहास रच दिया, मारियो ज़ागालो और फ्रांज़ बेकेनबाउर के बाद खिलाड़ी (1998 के कप्तान) और कोच (2018) दोनों के तौर पर विश्वकप जीतने वाले दुनिया के तीसरे इंसान बने।

जो आगे आने वाला था

1998 में ज़िदान की जीत के बीस साल बाद, एक नई पीढ़ी ने फ्रांस को फिर शिखर पर पहुंचा दिया। पर इस जीत का सबसे बड़ा चेहरा बने एम्बाप्पे, सिर्फ उन्नीस साल की उम्र में दुनिया के सबसे बड़े सितारों में शामिल। क्रोएशिया के मोड्रिच को उनके थकाने वाले जुझारू खेल के लिए "गोल्डन बॉल" मिला, उपविजेता होकर भी उनके चेहरे पर पूरी दुनिया का सम्मान था।

2018 का विश्वकप कई स्तरों पर ऐतिहासिक रहा, यह दिखाता है कि कैसे एक युवा खिलाड़ी रातोंरात वैश्विक पहचान बना सकता है, और यह भी कि सिर्फ निजी महानता काफी नहीं होती, एक संतुलित टीम ही आख़िर में जीतती है। मेसी और रोनाल्डो की असाधारण प्रतिभा के बावजूद उनकी टीमें नहीं जीत सकीं, फ्रांस की सामूहिक ताक़त ही शिखर तक पहुंची।

पर 2018 की सबसे बड़ी विरासत शायद यह थी कि इसने 2022 की कहानी तैयार कर दी। मेसी अब करियर के आख़िरी पड़ाव पर थे, रोनाल्डो भी उम्र के असर का सामना कर रहे थे, एम्बाप्पे नई पीढ़ी का सबसे बड़ा दावेदार बन चुके थे। और पूरी दुनिया के सामने एक सवाल था, क्या मेसी कभी विश्वकप जीत पाएंगे, क्या वे माराडोना और पेले की कतार में खड़े हो सकेंगे। चार साल बाद यह सवाल फुटबॉल का सबसे बड़ा सवाल बनने वाला था, विश्वकप पहली बार अरब दुनिया में होगा, कतर पूरी दुनिया का ध्यान खींचेगा, और वहां एक ऐसी कहानी लिखी जाएगी जिसे बहुत से जानकार विश्वकप इतिहास की सबसे महान कहानियों में गिनते हैं।

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