Gorakhpur: भारतीय ज्ञान परम्परा दे रही समग्र दृष्टिकोण: महंत अवेद्यनाथ लेक्चर सीरीज में प्रो. तोमर
Mahant Avedyanath Lecture Series: महंत अवेद्यनाथ स्मृति व्याख्यानमाला का शुभारंभ, प्रो. तोमर बोले- भारतीय ज्ञान परंपरा आज भी विश्व में प्रासंगिक और प्रेरणादायी
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Gorakhpur: भारतीय संस्कृति और सभ्यता ने सदियों से विज्ञान, गणित, खगोल, चिकित्सा, आयुर्वेद, योग और दर्शन जैसे अनेक क्षेत्रों में अद्वितीय योगदान दिया है। भारतीय मनीषियों ने अपने गहन चिंतन और अनुसंधान से न केवल अपने देश में बल्कि वैश्विक स्तर पर भी विज्ञान और ज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान हासिल किया। ऋग्वेद, आयुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद चारों वेदों में प्राकृतिक विज्ञान, चिकित्सा और गणित के सिद्धांतों का वर्णन मिलता है। उपनिषद जो वेदों के ही हिस्से हैं, भारतीय दर्शन का केंद्र बिंदु माने जाते हैं। सदियों से भारतीय ज्ञान परम्परा विश्व को जीवन का समग्र दृष्टिकोण दिखा रही है।
उक्त बातें बुधवार को महाराणा प्रताप महाविद्यालय, जंगल धूसड़, गोरखपुर में आयोजित ‘राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज स्मृति सप्तदिवसीय व्याख्यानमाला’ के उद्घाटन समारोह में बतौर मुख्य अतिथि प्रो. गिरीन्द्र सिंह तोमर सदस्य, आयुष- एनटीईपी कोलैबोरेशन तकनीकी समूह, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार ने अपने संबोधन में कही। प्रो. तोमर ने समारोह के उद्घाटन सत्र के अध्यक्ष महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. प्रदीप कुमार राव के साथ मां सरस्वती, मां भारती और महंत अवेद्यनाथ जी के चित्रों पर पुष्पार्चन व दीप प्रज्ज्वलित कर व्याख्यानमाला का शुभारंभ किया।
इस अवसर पर प्रो. तोमर ने कहा कि ज्ञान वह सूचना, तथ्य, समझ और अनुभव है जिसे व्यक्ति द्वारा सीखा, अर्जित या समझा जाता है। यह किसी विशेष विषय या वस्तु के बारे में गहन जानकारी और समझ का परिणाम होता है। उन्होंने आगे कहा कि वेदों में उल्लिखित योग आज भारत की चहारदीवारी से निकलकर वैश्विक क्षितिज पर प्रतिष्ठित हो रहा है। 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस आज वैश्विक स्तर पर मनाया जा रहा है। इसके अतिरिक्त आयुर्वेदिक जीवन शैली, स्वास्थ्य संरक्षण व संवर्धन के उपाय तथा इसकी निरापद चिकित्सा के साथ-साथ इसकी समग्र उपागम विश्व चिकित्सा जगत के आकर्षण का केंद्र बनती जा रही है। भारतीय ज्ञान विज्ञान को विश्व के अनेक देशों के साथ भी साझा किया जाना चाहिए। आयुष मंत्रालय भारत सरकार के सहयोग से आज विश्व के अनेक देशों में आयुर्वेद को मान्य चिकित्सा पद्धति के रूप में स्वीकार्यता मिल चुकी है।
प्रो. तोमर ने कहा कि हम सबके लिए यह प्रसन्नता का विषय है की नई शिक्षा नीति में भारतीय ज्ञान परंपरा को स्कूलों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल कर लिया गया है। इससे हमारी नई पीढ़ी हमारे ज्ञान परंपरा के गौरव से परिचित हो सकेगी। उन्होंने आगे कहा कि भारतीय ज्ञान- विज्ञान परंपरा न केवल प्राचीन काल में बल्कि आज भी विज्ञान, चिकित्सा, गणित और अन्य क्षेत्रों में अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए हैं। भारत के मनीषियों और वैज्ञानिकों का योगदान आने वाले समय में भी अमूल्य होगा। भारतीय ज्ञान की यह परंपरा हर पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत है। उन्होंने कहा कि विकास के शिखर पर वहीं पहुंचते हैं, जो अपने इतिहास पर गौरवान्वित होकर वर्तमान में कठोर परिश्रम द्वारा ध्येयपथ पर अग्रसर होते हैं।
साधना, सेवा व राष्ट्रभक्ति का संगम था महंत अवेद्यनाथ जी का जीवन: डॉ. प्रदीप राव
व्याख्यानमाला के उद्घाटन समारोह में महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. प्रदीप कुमार राव ने कहा कि आज हम सब एक ऐसे महामानव के स्मरण में एकत्र हुए हैं, जिनका जीवन साधना, सेवा और राष्ट्रभक्ति का अद्भुत संगम था। महंत अवेद्यनाथ जी महाराज कम आयु में ही अध्यात्म और समाज सेवा के पथ पर अपने कदम बढ़ा दिए। वे गोरखनाथ मठ की उस गौरवशाली परंपरा से जुड़े, जिसकी जड़ें महायोगी गोरखनाथ जी तक पहुंचती हैं। उन्होंने कहा कि महंत अवेद्यनाथ जी महाराज का व्यक्तित्व कठोर साधना, अनुशासन और स्पष्टवादिता से परिपूर्ण था। उनका मानना था कि सच्चा संत वही है, जो अपने व्यक्तिगत जीवन को संयम, त्याग और सेवा का उदाहरण बनाए। व्याख्यानमाला की प्रस्ताविकि प्रस्तुत करते हुए डॉ. राव ने कहा कि यह महाविद्यालय अपने स्थापना काल से प्रत्येक वर्ष व्याख्यानमाला आयोजित करता रहा है। इसके उद्देश्यों को बताते हुए उन्होंने कहा कि व्याख्यानमाला के माध्यम से हम सभी को गोरक्षपीठ की यशस्वी परम्परा को स्मरण करते हुए अपने दायित्वों का भी स्मरण करना होगा। भारत को भारतवर्ष बनाने के लिए जिस प्रकार की शिक्षा व्यवस्था की परिकल्पना से सन् 1932 में महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद् की स्थापना हुई । यह महाविद्यालय अपने संस्थापकों के सपनों को साकार करते हुए प्रतिवर्ष यह व्याख्यानमाला नियोजित रुप से आयोजित करता रहा है।
डॉ. राव ने कहा कि महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद् का उद्देश्य विद्यार्थियों में शिक्षा के साथ संस्कार रोपित करना है। हम अपने संस्थापको के उद्देश्यों व लक्ष्यों को योजनाबद्ध तरीके से कार्य करते हुए, भारत की सनातन संस्कृति के निर्वाहन पर बल देते हुए, विद्यार्थियों में संस्कारयुक्त शिक्षा के साथ आदर्श व्यक्तित्व का विकास करा सकते है। उद्घाटन सत्र का संचालन महाविद्यालय की बीएड विभाग की अध्यक्ष श्रीमती शिप्रा सिंह ने किया। इस अवसर पर महाविद्यालय के सभी शिक्षक सहित अनेक विद्यार्थी उपस्थित रहे।