Ajit Singh Inspirational Story: कौन हैं झोला मैन? जो अपनी सैलरी से बाँट चुके 80 हजार कपड़े के थैले

Ajit Singh Inspirational Story: जानिए ‘झोला मैन ऑफ इंडिया’ अजीत प्रताप सिंह की प्रेरणादायी कहानी, जो अपनी सैलरी से हर महीने करीब 2000 कपड़े के झोले मुफ्त बांटकर सिंगल-यूज़ प्लास्टिक के खिलाफ अभियान चला रहे हैं।

Update:2026-07-07 10:06 IST

Ajit Singh Inspirational Story

Ajit Singh Inspirational Story: "मैं धरती माँ का सबसे छोटा बेटा हूँ, बस इसकी थोड़ी सेवा कर लेता हूँ। अपनी आवश्यकताओं को कम करके, जो लेता हूँ उससे ज़्यादा देता हूँ।" ये पंक्तियाँ उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में तैनात एक साधारण से दिखने वाले असाधारण सरकारी अधिकारी अजीत प्रताप सिंह की हैं। आज के दौर में जहाँ पर्यावरण प्रदूषण एक वैश्विक समस्या बन चुका है, वहीं अजीत प्रताप सिंह अपनी निष्ठा और अनोखे प्रयासों से समाज को एक नई दिशा दिखा रहे हैं। देश उन्हें आदर से 'झोला मैन ऑफ इंडिया' के नाम से जानता है।

एक यात्रा, जिसने बदल दी ज़िंदगी (मिशन की शुरुआत)

अजीत प्रताप सिंह वर्ष 1999 से ग्राम विकास अधिकारी (VDO) के पद पर कार्यरत हैं। इस मुहिम की शुरुआत साल 2004 में उनकी उत्तराखंड की एक पारिवारिक यात्रा के दौरान हुई थी।


वहाँ उन्होंने देखा कि लोग पॉलिथीन की जगह कागज़ के थैलों या अखबारों का इस्तेमाल कर रहे थे क्योंकि वहाँ प्लास्टिक पर प्रतिबंध था। उनके मन में सवाल उठा कि "ऐसा पूरे भारत में क्यों नहीं हो सकता?" बस यहीं से उन्होंने सिंगल-यूज़ प्लास्टिक के खिलाफ जंग छेड़ने की ठान ली।

अपनी सैलरी से बाँटते हैं हज़ारों कपड़े के झोले

अजीत प्रताप सिंह का यह अभियान किसी सरकारी फंड या डोनेशन के भरोसे नहीं चलता। वे हर महीने अपनी सैलरी का लगभग 10% हिस्सा(करीब 7,000 रुपये) इस नेक काम के लिए अलग रखते हैं।

कबाड़ से जुगाड़: वे कपड़ा व्यापारियों से थान के बचे हुए आख़िरी टुकड़े (कतरनें) लागत मूल्य पर खरीदते हैं।





रोजगार और सहयोग: इसके बाद वे स्थानीय दर्जियों से इन कपड़ों के मजबूत थैले (झोले) तैयार करवाते हैं।




वे हर महीने लगभग 2,000 कपड़े के झोले मुफ्त बाँटते हैं। अब तक वे 80,000 से भी अधिक झोले लोगों को वितरित कर चुके हैं।




15 मिनट का 'पेप टॉक' और अनूठा गणित

अजीत जी किसी को भी झोला ऐसे ही नहीं थमा देते। वे अपनी गाड़ी की डिग्गी और दफ़्तर की अलमारी में हमेशा सैकड़ों झोले रखते हैं। जो भी व्यक्ति उनसे मिलने आता है, वे उससे केवल 15 मिनट का समय मांगते हैं। वे उसे प्लास्टिक से होने वाले नुकसान के प्रति जागरूक करते हैं, सिंगल-यूज़ प्लास्टिक न इस्तेमाल करने की शपथ दिलाते हैं और फिर झोला भेंट करते हैं।

उनका एक सीधा सा गणित है जो लोगों के दिमाग पर गहरा असर छोड़ता है:

"अगर एक व्यक्ति रोज़ औसतन 10 प्लास्टिक की थैलियों का इस्तेमाल करता है, तो वह साल में हज़ारों थैलियाँ कचरे में फेंकता है। लेकिन कपड़े का एक मजबूत झोला लगभग 5 साल चलता है। इस तरह एक झोले का इस्तेमाल करके कोई भी व्यक्ति 5 साल में करीब 18,250 प्लास्टिक बैग्स को पर्यावरण में जाने से रोक सकता है।"

केवल झोला ही नहीं, पर्यावरण संरक्षण के अन्य अनोखे संकल्प

अजीत प्रताप सिंह का पर्यावरण प्रेम सिर्फ कपड़े के झोलों तक सीमित नहीं है। वे अपनी दैनिक दिनचर्या में भी पर्यावरण को सबसे ऊपर रखते हैं:

1. कार कभी पानी से नहीं धोई: उनके पास पिछले 20 से अधिक वर्षों से कार है, लेकिन उन्होंने आज तक उसे पानी से नहीं धुलवाया। वे रोज़ सुबह सिर्फ एक गीले कपड़े से गाड़ी पोंछते हैं और फिर सूखे कपड़े से साफ करते हैं, ताकि पानी की बर्बादी रोकी जा सके।




2. लीकेज रोकने की किट: वे अपनी कार की डिग्गी में हमेशा नल की टोटियाँ (Faucets), टेप और ज़रूरी औज़ार रखते हैं। रास्ते में जहाँ कहीं भी उन्हें कोई सार्वजनिक नल टपकता या टूटा दिखता है, वे उसे तुरंत ठीक कर देते हैं।





3. शादी-समारोहों में सीख: वे जब भी किसी शादी या समारोह के निमंत्रण में जाते हैं, तो आयोजकों से हाथ जोड़कर अनुरोध करते हैं कि वे थर्माकोल या प्लास्टिक के बर्तनों की जगह पत्तलों और मिट्टी के कुल्हड़ों का इस्तेमाल करें।




4. देहदान का संकल्प: उन्होंने लखनऊ के राम मनोहर लोहिया अस्पताल को अपनी मृत्यु के बाद देहदान करने का संकल्प लिया है। उनका मानना है कि मृत्यु के बाद भी उनका शरीर पर्यावरण को प्रदूषित (धुआं) न करे, बल्कि चिकित्सा अनुसंधान के काम आ सके।

साल 2014 में 'स्वच्छ भारत मिशन' की शुरुआत के बाद उनके काम को वरिष्ठ अधिकारियों और प्रशासन द्वारा भी बेहद सराहना मिली। अजीत प्रताप सिंह जैसे लोग समाज के लिए वो सच्चे 'सुपरहीरो' हैं जो बिना किसी तामझाम या व्यक्तिगत स्वार्थ के चुपचाप पृथ्वी को बचाने में लगे हैं।उनका जीवन हमें सिखाता है कि सरकार या प्रशासन के भरोसे बैठने के बजाय, यदि हर नागरिक अपने स्तर पर एक छोटा सा बदलाव भी अपना ले, तो हम आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित और स्वच्छ धरती सौंप सकते हैं।

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