Lucknow News: यह शहर है, यहां संवेदना नहीं बचती साहेब!
Lucknow News: लखनऊ के अलीगंज अग्निकांड पर आधारित यह लेख केवल एक हादसे की कहानी नहीं, बल्कि शहरों में बढ़ती संवेदनहीनता, प्रशासनिक लापरवाही और सामाजिक विघटन पर गंभीर सवाल उठाता है।
Lucknow Aliganj Fire (Image Credit-Newstrack)
Lucknow Aliganj Fire: कल यानी जून के अंतिम सोमवार को लखनऊ में जो हुआ, वह केवल एक हादसा नहीं था। वह इस शहर के चेहरे पर पड़ा एक और ऐसा काला दाग था, जिसे कुछ दिन बाद हम हमेशा की तरह भूल जाएंगे। जैसे हम पहले भी कई हादसों को भूलते आए हैं। जैसे हर बड़े शहर के लोग भूल जाते हैं। शहरों की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं होती कि वहां हादसे होते हैं, बल्कि यह होती है कि वहां संवेदनाएं धीरे-धीरे मरने लगती हैं और हर हादसे हम भूलते जाते हैं।
तथाकथित अदब और नफासत के इस शहर में कल ही पंद्रह नौनिहाल जिंदगियों को आग ने लील लिया। केवल आग ही क्यों कहें, सही यह है कि उन मासूमों को व्यवस्था ने, भ्रष्टाचार ने, विकास प्राधिकरण ने और जेब गर्म करने की सरकारी रीति-नीति ने मिलकर जिंदा जला दिया।
अलीगंज का यह इलाका आज किसी सपनों की फैक्ट्री जैसा दिखता है। हर गली और हर मोड़ पर बड़े-बड़े होर्डिंग्स टंगे हैं। तरह-तरह के शिक्षा संस्थान, पीजी, हॉस्टल्स, कोचिंगें और रेस्तराओं की यहाँ भरमार है। यहाँ हर सुबह एक नई उम्मीद लेकर युवाओं की एक फौज उतरती है। विशेषकर लखनऊ के आसपास के जिलों और पूर्वी उत्तर प्रदेश के सुदूर गांवों-कस्बों से आए लड़के-लड़कियां यहाँ आते हैं, जिनकी आँखों में अपने और अपने बूढ़े माता-पिता के सपनों का भारी बोझ होता है। लेकिन अफ़सोस कि इन मासूम सपनों और इस बेतहाशा भीड़ को नोट छापने की मशीन समझकर भुनाती हुई गगनचुंबी इमारतें भी इसी इलाके का एक स्याह सच हैं।
ऐसी ही एक अभागी बहुमंजिला इमारत सेक्टर-डी में थी। ठीक लोकसेवा आयोग परीक्षा भवन के बिल्कुल पीछे। इस इमारत में ज़िन्दगी और मौत का कैसा अजीब और खतरनाक ताना-बाना बुना गया था। नीचे पालतू पशुओं का क्लीनिक और उनके सामान की दुकान थी। ठीक उसी के ऊपर एक कोचिंग सेंटर, एक एनिमेशन इंस्टीट्यूट और कबाड़ का गोदाम भी चल रहा था। सब कुछ एक ही कंक्रीट के संकरे ढांचे में ठंसा हुआ था। बिल्डिंग की ज़मीन दो हज़ार फ़ुट से भी कम थी।
फिर एक ऐसा खौफनाक सोमवार आया, जब एक छोटी सी चिंगारी ने विकराल रूप ले लिया। देखते ही देखते उस ज़हरीले काले धुएँ और लपटों ने मासूम ज़िन्दगियों को हमेशा-हमेशा के लिए लील लिया। वे बच्चे जो सुबह अपनी किताबों में अपना भविष्य ढूंढने आए थे, शाम को उनके बस्ते अधजली लाशों के पास पड़े मिले। कई हंसते-खेलते परिवारों की रीढ़ हमेशा के लिए टूट गई। हज़ारों सपने पल भर में तबाह हो गए।
सच तो ये है कि यहाँ मरना और जीना अब महज़ एक आँकड़ा बनकर रह गया है। महज़ एक सरकारी संख्या। यहाँ समाज नहीं, सिर्फ लोग रह रहे हैं। समाज तो आज भी गाँव में रहता है साहेब। शहरों की सड़कें केवल डामर और कंक्रीट से नहीं बनतीं हैं। वे उन अनगिनत कहानियों से बनती हैं, जो हर दिन इनमें चुपचाप दब जाती हैं। किसी का सपना टूटता है। किसी का घर उजड़ता है। किसी मां की गोद सूनी होती है। किसी बच्चे के सिर से पिता का साया उठ जाता है। और फिर अगले ही दिन वही सड़कें सामान्य हो जाती हैं। ट्रैफिक चलता रहता है। हॉर्न बजते रहते हैं। लोग ऑफिस पहुंचते रहते हैं। चाय की दुकानों पर राजनीतिक बहसें होती रहती हैं। मानो कुछ हुआ ही न हो। शायद यही शहर होने की एक अनिवार्य कीमत है।
गांवों में किसी एक घर में दुख आता है तो पूरा गांव उदास हो जाता है। चौपालों पर चर्चा होती है। लोग सारा काम छोड़कर पीड़ित के घर पहुंच जाते हैं। शोक केवल परिवार का नहीं रहता, पूरे समाज का हो जाता है। लेकिन आधुनिक शहर में दुख अब एक निजी संपत्ति बन गया है। मौत व्यक्तिगत घटना बन जाती है। त्रासदी समाचार बन जाती है। और संवेदना महज़ एक औपचारिकता। यहाँ बगलगीर को जानना भी कु्फ्र माना जाता है। यहां घरों से मांगलिक काम अब नहीं होते। उनके लिए होटल व मैरिज लॉन कुकुरमुत्ते की तरह चारों तरफ पसर गये हैं। विवाह के लिए बस एक-दो घंटे का समय यहाँ बमुश्किल निकाला जाता है। इससे कई गुना अधिक समय तो बैंड बाजे पर थिरकने तथा फ़ोटोग्राफ़ी पर खर्च कर दिया जाता है। तेरहवीं तो अब गये ज़माने की बात होती जा रही है। मरने पर आर्य समाजी या गायत्री परिवार का होना फ़ैशन हो उठा है।
यहाँ हर आदमी बोतल का आदी हो चुका है, चाहे वह पानी की बोतल हो या मदिरा की। जितना समय यहाँ रील बनाने व सोशल मीडिया पर स्क्रॉल करने में दिया जाता है, उससे कहीं कम समय पढ़ने व सोने के लिए बचता है। यहाँ लोग पास-पास तो रहते हैं, पर साथ-साथ नहीं रहते। हर घर में सदस्यों की संख्या के मुताबिक़ अलग टॉयलेट, अलग साबुन, अलग बेड रूम, अलग तौलिया और अलग कंघी होती है। कोई किसी को किसी भी मामले में बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। जब कोई किसी को बर्दाश्त ही नहीं कर सकता, तो किसी में लगाव व प्रेम कैसे होगा। वैसे प्रेम तो यहाँ तमाम विज्ञापनों से पटी उस दिवार सरीखा हो गया है, जिस पर साफ़ अक्षरों में लिखा हो- “स्टिक नो बिल्स”।
यहां लाइफ नहीं, बल्कि नाइट लाइफ तलाशी जाती है। यहां रात रंगीन होती है और दिन उजास। यहां तो अब ब्रेकअप भी सेलिब्रेट होता है। आदमी उसके फोन, गाडी और बंगले की कीमत से पहचाना जाता है। यहां मनुष्य के आंतरिक मूल्य यानी वैल्यू, बाजार के मनी में बदल जाते हैं। यहां भाई-बहन, माता-पिता या चाचा-चाची का आत्मीय रिश्ता लुप्तप्राय है। यहां होते हैं ब्रदर-सिस्टर, ममी-डैड, अंकल-आंटी। बस खेल खत्म।
किसी हादसे के बाद हमेशा की तरह का जाना-पहचाना सरकारी मंज़र शुरू होता है। राजनेता आते हैं। बड़े-बड़े अफसर अपनी गाड़ियों के हूटर बजाते हुए पहुंचते हैं। टीवी के कैमरों के सामने औपचारिक शोक संदेश पढ़े जाते हैं। जांच कमेटियों के खोखले वादे किए जाते हैं। यह प्रशासनिक तंत्र का रूटीन काम है, जो वे कागज़ों पर बेहद संजीदगी से पूरा कर दिखाते हैं। कुछ घंटों तक सोशल मीडिया पर तस्वीरें घूमती रहती हैं। लोगों में दुख जताया जाता है। कुछ व्यवस्था को कोसते हैं। कुछ राजनीति को। कुछ रील्स और वीडियो बना लेते हैं। कुछ व्यूज बटोर लेते हैं। फिर धीरे-धीरे सब सामान्य हो जता है।
हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हम सूचना के युग में जी रहे हैं। लेकिन संवेदना के युग में नहीं। आज हमारे मोबाइल में दुनिया भर की डरावनी खबरें आती हैं। हम हर दिन किसी न किसी दुर्घटना, हत्या, आत्महत्या, युद्ध, बाढ़, भूकंप, विस्फोट और मौत की खबर पढ़ते हैं। इतनी मौतें देख चुके हैं कि मौत भी अब हमें चौंकाती नहीं। इतना दुख देख चुके हैं कि दुख भी अब हमें बेचैन नहीं करता। हम कुछ सेकंड के लिए स्क्रीन पर ठिठकते हैं, फिर अगले वीडियो पर स्क्रॉल कर जाते हैं। धीरे-धीरे हमारी आंखों ने दूसरों के दुख को बहुत ही सामान्य मान लिया है।
यह केवल लखनऊ की अकेली कहानी नहीं है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, चेन्नई - हर छोटा बड़ा शहर इसी संवेदनहीन बीमारी से बुरी तरह ग्रस्त है। यहां लोग हजारों की अंधी भीड़ में रहते हैं। लेकिन बिल्कुल अकेले मर जाते हैं। यहां वर्षों तक रहने वाले लोग एक-दूसरे की खुशियों और दुखों से पूरी तरह अनजान रहते हैं। यहां रिश्ते नहीं, सिर्फ कामकाजी नेटवर्क बनते हैं। यहां मनुष्य नहीं रहते, सिर्फ वर्चुअल प्रोफाइल रहते हैं।
कभी इसी लखनऊ को तहजीब का शहर कहा जाता था। अदब का शहर। नफासत का शहर। यहां भाषा में मिठास थी। व्यवहार में अपनापन था। अजनबी भी यहाँ अपने लगते थे। किसी के घर दुख हो तो बिना बुलाए पूरा मोहल्ला स्वतः पहुंच जाता था। किसी की बेटी की शादी हो तो पूरा इलाका मददगार बनकर खड़ा हो जाता था। किसी के घर मौत हो जाए तो कई दिनों तक लोग उस परिवार को अकेला नहीं छोड़ते थे। लेकिन आधुनिकता की अंधी दौड़ ने धीरे-धीरे उस पुराने लखनऊ को भी शहर बना डाला। अब यहां भी गाड़ियों की रफ्तार इंसानों की सांसों से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है। समय इतना महंगा हो गया है कि लोग रुककर किसी तड़पते घायल की मदद करने से भी बुरी तरह डरते हैं। कहीं पुलिस के चक्कर न पड़ जाएं। कहीं दफ्तर के लिए देर न हो जाए। कहीं अपनी निजी सुविधा प्रभावित न हो जाए। परिणाम यह है कि सड़क पर तड़पता हुआ आदमी भी कई बार तमाशा बन जाता है और लोग दूर खड़े होकर उसका वीडियो बनाने लगते हैं।
यह केवल कानून या व्यवस्था का प्रशासनिक संकट नहीं है। यह समाज के भीतर पैदा हुई संवेदनात्मक थकान का भयानक संकट है। हम इतने व्यस्त हो गए हैं कि दूसरों का दुख अब हमें एक फालतू बोझ लगने लगा है। हम इतने प्रतिस्पर्धी हो गए हैं कि दूसरे की पीड़ा हमें अपनी अंधी दौड़ से भटकाने वाली चीज लगती है। हमने तथाकथित सफलता को इतना बड़ा एकमात्र लक्ष्य बना लिया है कि मनुष्यता बहुत पीछे छूटती जा रही है। और यही हमारी सभ्यता का सबसे बड़ा खतरा है। किसी भी सभ्यता का पतन तब नहीं होता जब उसकी कंक्रीट की इमारतें गिरती हैं। उसका असली पतन तब शुरू होता है जब उसके भीतर की करुणा मरने लगती है। जब लोगों के दिलों में दूसरों के लिए जगह कम होने लगती है। जब किसी की दर्दनाक मौत केवल एक सांख्यिकीय आंकड़ा बनकर रह जाती है। जब किसी हंसते-खेलते परिवार की पूरी बर्बादी अखबार की केवल एक मामूली हेडलाइन बनकर सिमट जाती है।
मंगलवार की सुबह के ठीक दस बजे हैं। अलीगंज का सेक्टर-डी। किसी भी आम दिन की तरह काम पर जाने वालों का एक लंबा तांता मेन रोड पर लगा हुआ है। लगातार भारी ट्रैफिक चल रहा है। लेकिन लोक सेवा आयोग परीक्षा भवन के पीछे का रास्ता पूरी तरह बंद है। पुलिसवालों ने रस्सा बांध कर कोई सौ मीटर का रास्ता ब्लॉक कर दिया है। किसी को पैदल जाने तक की इजाजत नहीं दी जा रही है। इसी बंद सड़क पर वो अभागी बिल्डिंग खड़ी है, जिसने कल ही पंद्रह जिंदगियों और उनके मासूम परिवारों को जिंदा खा लिया था। इस रास्ते को आम लोग ट्रैफिक के दबाव से बचने के लिए शॉर्टकट की तरह इस्तेमाल करते हैं। लेकिन आज उनको निराश होकर लौट जाना पड़ रहा है। बैरिकेड के एक तरफ पेड़ों की छांव में मीडिया वाले अपने कैमरे ताने खड़े हैं। ढेरों पुलिसवाले तैनात हैं। कुछ तमाशबीन भी गर्दन उचकाकर देख रहे हैं। उस झुलसी हुई बिल्डिंग के सामने जलनिगम की सीवर साफ करने वाली टैंकर ट्रक मशीन खड़ी है। पानी के टैंकर लगे हैं। एक बड़ी जेसीबी भी खड़ी है। बिजली वाले पास के पोल पर चढ़ कर कुछ तारों को काट-जोड़ रहे हैं। नगर निगम की एक ट्रैक्टर ट्रॉली भी खड़ी है, जिसमें हादसे का मलबा और कूड़ा भरा साफ़ दिखाई दे रहा है।
इस बदकिस्मत बिल्डिंग के ठीक पीछे सेक्टर-डी की रिहाइशी कॉलोनी के ढेरों मकान हैं। आज कॉलोनी की सभी भीतरी सड़कों पर भारी ट्रैफिक है क्योंकि बैरियर की वजह से लोग इधर-उधर की गलियों से निकलने की फिराक में हैं। बाहर की सड़क पर ट्रैफिक का भारी शोर है। लेकिन कॉलोनी वालों के घरों में एक अजीब सा, डरावना सन्नाटा पसरा हुआ है। एक गेट पर स्तब्ध खड़े अवधेश वर्मा बताते हैं कि रात भर पूरी कॉलोनी में मातम पसरा रहा। शायद ही कल रात किसी के घर में खाना बना हो। लोग गहरे सदमे में हैं। वे बताते हैं कि हादसे के बाद से ही इलाके की बिजली कटी हुई है और रात भर प्रशासनिक गाड़ियां आती-जाती रहीं। एक अन्य मकान में भट्ट परिवार रहता है। उनके घर के एक बुजुर्ग ने कांपती आवाज़ में बताया कि उस बिल्डिंग का खौफनाक मंज़र और बच्चों की वे दर्दनाक चीखें कोई चाहकर भी कभी भुला नहीं सकता। वह पूरी कॉलोनी के लिए जिंदगी भर का एक गहरा ट्रॉमा बन गया है। उनकी बातों में हताशा और निराशा साफ़ झलकती है कि चंद रुपयों के लालच में आज हर कोई मासूमों की जानें ले रहा है। कॉलोनी में एक छोटी सी दुकान चलाने वाले ने अपना नाम तो नहीं बताया, लेकिन बुझी हुई आँखों से कहा कि जिस इमारत में आग लगी थी, उसके दोनों तरफ बिल्कुल सटे हुए रिहाइशी मकान हैं; वे लोग इस समय किस हाल में और कितने गहरे डर में जी रहे हैं, यही सबसे बड़ी चिंता है।
लेकिन इस मूक संवेदना की भी एक बहुत क्रूर सीमा है। इस शोकग्रस्त कॉलोनी से बाहर आते ही महज 100 मीटर की दूरी पर बड़े मंगल के कम से कम छह भव्य भंडारे सज रहे हैं। कुछ ही दूरी पर आंचलिक विज्ञान सिटी के बगल में स्थित मंदिर में लाउडस्पीकर पर पूरी तेज आवाज में भजन बज रहे हैं। दो-दो भंडारों के टेंट तने हुए हैं। वहीं कड़ाही में पूड़ी-सब्जी छन रही है। शर्बत बांटा जा रहा है। श्रद्धालुओं की एक भारी भीड़ मंदिर में उमड़ रही है।
सच ये भी है कि यहां यानी शहर में आने के बाद इंसानों की आंख का पानी भी उतर जाता है। रोबोट भी तो ऐसे ही होते हैं।
आज सेक्टर-डी और पुरनिया के आस-पास ट्रैफिक पुलिस भी मुस्तैद दिख रही है। थोड़ा आगे सेक्टर-के की तरफ कोचिंगों की भारी भरमार है। कुछ दूर तक देखने पर उनमें बाहर एक अजीब सा सन्नाटा दिखा। या तो वे अभी खुली नहीं थीं या फिर प्रशासन की किसी संभावित दंडात्मक कार्रवाई की आशंका में आनन-फानन में बन्द कर दी गई हैं। सड़क पर चाय-नाश्ते की गुमटियां और ठेके हमेशा की तरह सज चुके थे, जहां पढ़ाई की तैयारी करने वाले स्टूडेंट दिखते युवाओं की आमदरफ्त और हंसी-मजाक हमेशा की तरह बदस्तूर चल रहा था।
यही हमारे समाज की सबसे चुभने वाली हकीकत है। उस घटनास्थल से महज़ कुछ मीटर की दूरी पर सजे चाट के ठेले, बिरयानी की दुकानें या चाय के कैफे एक दिन के लिए भी बंद हुए? इस शहर के आम लोग उन अभागे बच्चों के गम में दो मिनट के लिए भी शांत हुए? अलीगंज के मौज-मस्ती और रसूख के नामी ठिकाने इस मातम में वीरान हुए? यहाँ के स्थानीय व्यापारियों ने इन मासूमों की दर्दनाक मौत के खिलाफ स्वतः स्फूर्त अपनी दुकानें बंद कर कोई सामूहिक आक्रोश जताया? दूसरी कोचिंग चलाने वाले मुनाफाखोरों ने उन 'लाक्षागृह' जैसी अवैध इमारतों के बायकॉट का एलान किया, जहाँ वे हर महीने बच्चों से मोटी फीस तो वसूलते हैं। लेकिन सुरक्षा के नाम पर एक सिंगल एग्जिट गेट तक नहीं देते? उस पूरे मोहल्ले की हवा में कोई स्थायी मुर्दनी छाई? कोई इन मासूमों के लिए इंसाफ की मांग लेकर सड़कों पर उतरा? इस बदसूरत होते शहर में किसी वास्तविक सामूहिक शोक का अहसास भी हुआ? जवाब है- कुछ भी ऐसा नहीं हुआ।
दिल को चीर देने वाली नग्न हकीकत तो यह है सोमवार की रात को ही जहाँ यह भीषण हादसा हुआ, उससे कुछ सौ मीटर की दूरी पर शराब के ठेकों के सामने रोज़ की तरह लोग लंबी कतारों में अनुशासित खड़े थे। रेस्तरां के भीतर लोग तरह-तरह के ज़ायके का लुत्फ़ ले रहे थे। बाज़ारों में वही पुरानी रौनक और वही व्यापारिक चहल-पहल थी। किसी भी चेहरे पर न कोई शिकन थी, न आँखों में पश्चाताप का पानी और न ही भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ कोई गुस्सा। हर कोई इस बात से पूरी तरह मुतमईन और निश्चिंत था कि "हादसा मेरे घर में तो नहीं हुआ ना, जो मरा वह कोई मेरा अपना सगा तो नहीं था, फिर मुझे क्या फर्क पड़ता है!" घटनास्थल के पास अगर कुछ था, तो बस सड़क पर खड़े कुछ तमाशबीनों का हुजूम, जो कौतूहलवश अपनी गाड़ियां धीमी करके वहाँ रुक गए थे। पुलिस के भारी पहरे के कारण कोई उस बदकिस्मत इमारत के करीब फटक भी नहीं पा रहा था। यही हैं हमारी 'मुर्दा संवेदनाएं', जो हर बड़े हादसे के बाद कुछ चंद घंटों के लिए सोशल मीडिया पर जागती हैं और फिर गहरी नींद में सो जाती हैं। समाज की यही भयानक बेरुखी और यही संवेदनहीनता इन बड़े मुनाफाखोरों और भ्रष्ट अफसरों के हौसलों को बार-बार भड़काती है। वे फिर से मासूम जिंदगियों को पैसों की भट्टी में स्वाहा कर देते हैं। वे हंसते-खेलते परिवारों को जीते-जी श्मशान बना देते हैं।
सोमवार के हादसे के बाद लखनऊ की रात शायद कुछ अभागे घरों में कभी खत्म नहीं होगी। कुछ माताएं अब भी पागलों की तरह रो रही होंगी। कुछ पिता अब भी काठ बने स्तब्ध बैठे होंगे। कुछ छोटे बच्चे अब भी समझ नहीं पा रहे होंगे कि अचानक उनकी पूरी दुनिया क्यों उजड़ गई। उनके लिए यह टीवी की कोई साधारण खबर नहीं है। यह जीवन भर का एक अंतहीन घाव है। लेकिन यह शहर बिना रुके आगे बढ़ रहा है। बाज़ार फिर पूरी सजधज के साथ खुल गये हैं। दफ्तर चल रहे हैं। स्कूल में पढ़ाई होने लगी है। ट्रैफिक फिर से जाम हो रहा है। लोग फिर से किसी अंधी दौड़ की जल्दी में दिखने लगे हैं। सोशल मीडिया पर शाम तक कोई नया ट्रेंडिंग विषय आ ही गया है। कोई नया राजनीतिक विवाद शुरू हो चुका है। टीवी पर नई बहसें जन्म लेने लगी हैं। और सोमवार का यह भीषण हादसा धीरे-धीरे स्मृतियों की धूल में हमेशा के लिए दब रहा है, यही इस आधुनिक शहर का मूल स्वभाव बन चुका है।
लेकिन शायद हमें इस संवेदनहीन स्वभाव के खिलाफ अब लड़ना होगा। शायद हमें अपने भीतर बची हुई थोड़ी सी करुणा को हर हाल में बचाना होगा। शायद हमें यह याद रखना होगा कि किसी भी महान शहर की पहचान उसकी ऊंची इमारतें और चमचमाते मॉल नहीं होते। बल्कि उसके संवेदनशील लोग होते हैं। और जिस दिन लोग दूसरों के दर्द पर रुकना और तड़पना बंद कर देते हैं, उस दिन शहर चाहे जितना आधुनिक हो जाए, वह भीतर से पूरी तरह उजड़ जाता है। इसलिए आज, इस भयानक हादसे के बाद, लखनऊ के हर बाशिंदे से सिर्फ एक तीखा सवाल पूछा जाना चाहिए - क्या हम सचमुच एक बेहतर और विकसित शहर बन रहे हैं? या फिर हम केवल एक बड़ी, तेज़ और अधिक संवेदनहीन इंसानी भीड़ में बदलते जा रहे हैं? क्योंकि साहेब, शहरों की सबसे बड़ी त्रासदी अचानक होने वाले हादसे नहीं होते। सबसे बड़ी त्रासदी यह होती है कि यहां हादसों के बाद धीरे-धीरे संवेदना मर जाती है। और याद रखिएगा साहेब, जब संवेदना मर जाती है, तब शहर बचते नहीं हैं, वे केवल नक्शों पर बसते हैं।