लखनऊ में 77% महिलाएं वर्कफोर्स से बाहर, पुरुषों की भागीदारी 74.9%; डिग्री के बाद भी करियर का संकट

Lucknow News: MoSPI के आंकड़ों के मुताबिक लखनऊ में 15 वर्ष से अधिक उम्र की सिर्फ 23.2% महिलाएं श्रम बल का हिस्सा हैं, जबकि पुरुषों की भागीदारी 74.9% है। 30-59 वर्ष की 68.9% महिलाएं NEET श्रेणी में हैं।

Update:2026-08-24 17:54 IST

Lucknow News (Image Credit-Social Media)

लखनऊ। इंजीनियरिंग, एमबीए और पीएचडी जैसी उच्च डिग्रियां हासिल करने के बावजूद राजधानी लखनऊ में महिलाओं की एक बड़ी आबादी मुख्यधारा के रोजगार और करियर से बाहर हो रही है। केंद्र सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा जारी आवधिक श्रम बल आंकड़ों के अनुसार, लखनऊ में 15 वर्ष से अधिक उम्र की मात्र 23.2 प्रतिशत महिलाएं ही कार्यबल (Labour Force) का हिस्सा हैं—यानी वे या तो नौकरी कर रही हैं या सक्रिय रूप से काम की तलाश कर रही हैं। इसके विपरीत, इसी आयु वर्ग में पुरुषों की श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) 74.9 प्रतिशत दर्ज की गई है। 

इसका सीधा अर्थ यह है कि राजधानी में 100 में से लगभग 77 महिलाएं आर्थिक गतिविधियों से पूरी तरह बाहर हैं, जो शहरी समाज में लैंगिक असमानता और प्रतिभा के भारी नुकसान की चिंताजनक तस्वीर पेश करता है।

करियर के सबसे अहम पड़ाव (30-59 वर्ष) पर 68.9% महिलाएं 'खाली'

रिपोर्ट में 'नॉट इन एजुकेशन, एम्प्लॉयमेंट और ट्रेनिंग' (NEET) श्रेणी का विश्लेषण और भी चौंकाने वाला है:

15 से 59 आयु वर्ग: लखनऊ में 15 से 59 वर्ष की कुल 60.4 प्रतिशत महिलाएं ऐसी हैं जो न तो कोई औपचारिक पढ़ाई कर रही हैं, न कहीं नौकरी कर रही हैं और न ही किसी तरह का व्यावसायिक प्रशिक्षण ले रही हैं।

30 से 59 वर्ष (करियर का पीक समय): 30 से 59 वर्ष के आयु वर्ग में यह अनुपात और बढ़कर 68.9 प्रतिशत पर पहुंच जाता है। यानी जिस उम्र में व्यक्ति अपने करियर के शीर्ष पर होता है, उस दौरान करीब 69% शिक्षित महिलाएं घर संभालने तक सीमित हो जाती हैं।

पुरुषों से तुलना: पुरुषों में 30 से 59 वर्ष के बीच यह दर मात्र 8.7 प्रतिशत है। यह विशाल अंतर दर्शाता है कि उम्र बढ़ने और पारिवारिक जिम्मेदारियां बढ़ने के साथ महिलाओं का करियर ग्राफ नीचे गिरता जाता है, जबकि पुरुषों का करियर लगातार आगे बढ़ता है।

कॅरिअर से दूर होने की मुख्य वजहें

विशेषज्ञों और रिपोर्ट के विश्लेषण के मुताबिक, महिलाओं के नौकरी छोड़ने या वर्कफोर्स से बाहर होने के पीछे केवल व्यक्तिगत इच्छा नहीं, बल्कि मजबूत सामाजिक और संरचनात्मक बाधाएं जिम्मेदार हैं:

1. घरेलू जिम्मेदारियां और 'अनपेड केयर वर्क': शादी के बाद घर-परिवार और बच्चों की पूरी देखरेख का जिम्मा पारंपरिक रूप से महिलाओं पर ही डाल दिया जाता है।

2. शिशुगृह (क्रेच) और डे-केयर की कमी: कार्यस्थलों या रिहायशी इलाकों में किफायती, सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण चाइल्डकेयर/क्रेच सुविधाओं के अभाव में माताओं को नौकरी छोड़ने पर मजबूर होना पड़ता है।

3. पारिवारिक स्थानांतरण व बुजुर्गों की सेवा: पति की नौकरी दूसरे शहर में ट्रांसफर होने पर पत्नी को अपना करियर छोड़ना पड़ता है। इसके अलावा, घर के बुजुर्गों और बीमार परिजनों की देखभाल का भार भी अंततः महिलाओं पर ही आता है।

4. सुरक्षा और देर रात का कामकाजी माहौल: सार्वजनिक परिवहन में सुरक्षा की चिंताएं, देर रात तक काम करने की बाध्यता और कार्यस्थलों पर सुरक्षित माहौल की कमी भी महिलाओं को कदम पीछे खींचने पर विवश करती है।

5. करियर ब्रेक के बाद री-एंट्री में मुश्किलें: मातृत्व या पारिवारिक कारणों से 2-3 साल का ब्रेक लेने के बाद कॉर्पोरेट व निजी क्षेत्र में महिलाओं को दोबारा सम्मानजनक पद और वेतन पर काम मिलना बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

विशेषज्ञ राय: घर के काम का बंटवारा और नीतियां बदलना जरूरी

"लखनऊ की यह तस्वीर स्पष्ट संकेत देती है कि आर्थिक विकास के लिए केवल महिलाओं को पढ़ाना काफी नहीं है, बल्कि सामाजिक मानसिकता में बदलाव भी उतना ही जरूरी है। पुरुषों को भी घर और बच्चों की जिम्मेदारियां साझा करनी होंगी। जिन महिलाओं ने शादी, मातृत्व या पारिवारिक कारणों से नौकरी छोड़ी है, उनके लिए विशेष री-एंट्री प्रोग्राम और कार्यस्थलों पर अनुकूल नीतियां बनानी होंगी। जब शिक्षित और हुनरमंद महिलाएं कार्यबल से जुड़ेंगी, तभी उनके ज्ञान का लाभ परिवार के साथ-साथ पूरे देश की अर्थव्यवस्था को मिल सकेगा।"

— डॉ. रोली मिश्रा, विभागाध्यक्ष, अर्थशास्त्र विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय

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