Sonbhadra: रेणुका नदी में खनन पर घमासान, परमिट, पेनाल्टी और धारा परिवर्तन पर मचा बवाल

Sonbhadra: सोनभद्र की रेणुका नदी में बालू खनन को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। नदी की धारा मोड़ने, सर्वेक्षण रिपोर्ट से अधिक परमिट जारी होने और खनन पट्टों की पारदर्शिता को लेकर ग्रामीणों ने गंभीर सवाल उठाए हैं।

Update:2026-06-20 14:14 IST

Sand Mining

Sonbhadra: बालू के नीचे दब गई रेणुका! प्रवाह बाधित, 90 लाख की पेनाल्टी मैनेज, पश्चिम में पट्टा, पूरब से निकासी, पहले कहा-बालू नहीं, बाद में दोगुना से ज्यादा दे दिया परमिट :

सोनभद्र। रेणुका नदी में संचालित बालू खनन को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। नदी की प्राकृतिक धारा से कथित छेड़छाड़, खनन पट्टों की वैधता, जारी किए गए परमिटों और विभागीय निगरानी को लेकर एक के बाद एक सवाल खड़े हो रहे हैं। ताजा घटनाक्रम में निषाद समाज ने प्रश्न तो खड़ा किया ही है। स्थानीय ग्रामीणों ने आरोप लगाए हैं कि खनन गतिविधियों के लिए नदी की धारा इस तरह मोड़ दी गई है कि कई स्थानों पर मूल जल प्रवाह बालू के विस्तार में ही विलीन होता दिखाई दे रहा है। 90 लाख पेनाल्टी मैनेज करने का तरीका भी लोगों के बीच खासा चर्चा में है।

ग्रामीणों का दावा है कि खनन पट्टा पश्चिमी हिस्से में आवंटित है, वहीं बड़े पैमाने पर बालू की निकासी पूर्वी किनारे की ओर से किए जाने के आरोप लग रहे हैं। इसके लिए नदी के भीतर राख, मिट्टी और पत्थरों से अस्थायी बांध बनाकर जलधारा का रुख बदला गया है। आरोप है कि इस प्रक्रिया ने नदी के प्राकृतिक स्वरूप को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।

खनन पट्टा पाने वाली कंपनियों के संचालन पर लगातार सवाल:

केवल खनन गतिविधियां ही नहीं, बल्कि रेणुका नदी में आवंटित दोनों खनन पट्टों के अस्तित्व और संचालन को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। ओमेक्स मिनरल लिमिटेड के निदेशक के नाम पर हुए पत्राचार और कंपनी के संचालन को लेकर विभिन्न स्तरों पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। आरकेटीसी (आर.के. ट्रांसपोर्ट एंड कंस्ट्रक्शन लिमिटेड) के संबंध में भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि कंपनी पिछले दो वर्षों से कथित रूप से भ्रामक दावों के आधार पर संचालित हो रही है।

हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और इनमें कितनी सच्चाई है, इसका निष्कर्ष केवल निष्पक्ष जांच के बाद ही सामने आ सकता है। लेकिन जिस तरह लगातार नए तथ्य और दस्तावेज सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बन रहे हैं, उसने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है।

अवैध खनन पर लगाई 90 लाख की पेनाल्टी तो फिर कैसे सर्वेक्षण रिपोर्ट से दोगुना जारी कर दिया परमिट:

विवाद का एक बड़ा केंद्र वह मामला भी है जिसमें प्री-मानसून सर्वेक्षण में दिखाई गई बालू की मात्रा से कहीं अधिक मात्रा के लिए परिवहन परमिट जारी किए जाने के आरोप लगाए जा रहे हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि जब पूर्व में संबंधित खनन क्षेत्र पर लगभग 90 लाख रुपये की पेनाल्टी लगाए जाने की जानकारी सामने आई थी और उस दौरान यह दावा किया गया था कि संबंधित क्षेत्र में पर्याप्त बालू उपलब्ध ही नहीं है, तो फिर बाद में बड़े पैमाने पर खनिज परिवहन की अनुमति किस आधार पर दी गई।

दोनों पट्टों को खुला संरक्षण देने के लगाए जा रहे आरोप :

ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया है कि खनन विभाग द्वारा दोनों पट्टों को खुला संरक्षण दिया जा रहा है। उनका कहना है कि लगातार शिकायतों और आरोपों के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं होने से संदेह और गहरा रहा है। हालांकि विभागीय अधिकारियों की ओर से इन आरोपों पर अब तक कोई विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

जिलाधिकारी से जांच की उठाई गई मांग :

ग्राम सभा रेड़िया और मीतापुर क्षेत्र के ग्रामीणों ने भी नदी की धारा बाधित करने के मामले पर जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपकर पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। उनका कहना है कि नदी की धारा से छेड़छाड़ केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं बल्कि हजारों लोगों की आजीविका, भू-जल संतुलन और भविष्य की जल सुरक्षा से जुड़ा विषय है।

इस तरह के उठाए जा रहे हैं सवाल?

क्या खनन कार्य के लिए रेणुका नदी की प्राकृतिक धारा को कृत्रिम रूप से मोड़ा गया?

पश्चिमी पट्टा क्षेत्र के बावजूद पूर्वी किनारे से बालू निकासी के आरोपों में कितनी सच्चाई है?

प्री-मानसून सर्वेक्षण और जारी परमिटों के आंकड़ों में अंतर क्यों दिखाई दे रहा है?

90 लाख रुपये की पेनाल्टी और बाद की प्रशासनिक प्रक्रियाओं का आधार क्या था?

खनन पट्टों और कंपनियों के संचालन को लेकर उठ रहे सवालों की जांच कब होगी?

क्या नदी संरक्षण और खनन नियमन की जिम्मेदार एजेंसियां पर्याप्त निगरानी कर रही हैं?

संभावित जांच और प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी निगाहें: रेणुका नदी का यह मामला अब केवल खनन विवाद तक सीमित नहीं रह गया है। नदी की बदलती धारा, पर्यावरणीय प्रभाव, खनन पट्टों की पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे कई मुद्दे एक साथ केंद्र में आ गए हैं। निगाहें संभावित जांच और प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हैं, जो इन आरोपों की सच्चाई सामने ला सकती हैं।

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