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12 Zodiac Signs: ज्योतिष में 12 राशियां ही क्यों? भविष्य जानने के कौन-कौन से तरीके बने
12 Zodiac Signs History: मेष से मीन तक 12 राशियों की शुरुआत कहां से हुई? जानिए बेबीलोन, भारत, चीन, अफ्रीका, माया, मिस्र, ग्रीस और यूरोप की भविष्यवाणी परंपराओं और ज्योतिष के पीछे की दिलचस्प कहानी।
12 Zodiac Signs History Why 12 Zodiac Signs Explained in Hindi
12 Zodiac Signs History: अखबार का राशिफल कॉलम हो या मोबाइल ऐप पर आने वाला दैनिक राशिफल, हर जगह बारह राशियों का जिक्र होता है, मेष से लेकर मीन तक। यह संख्या इतनी आम हो चुकी है कि हम कभी सोचते ही नहीं कि आखिर बारह की यह गिनती आई कहां से। और दिलचस्प बात यह है कि सिर्फ भारत या पश्चिमी दुनिया ही नहीं, बल्कि इंसानी सभ्यता के हर कोने में लोगों ने अपने अपने तरीके से भविष्य जानने और अनिश्चितता को समझने की कोशिश की है। क्या है बारह राशियों की असली कहानी?दुनिया की दूसरी सभ्यताओं ने इसी सवाल का जवाब किन अलग अलग तरीकों से ढूंढा?
बारह राशियों की जड़ें कहां से आईं
बारह राशियों की पूरी अवधारणा मूल रूप से प्राचीन मेसोपोटामिया की बेबीलोन सभ्यता से शुरू हुई मानी जाती है, जो आज के इराक के आसपास के इलाके में करीब तीन हजार साल पहले फल फूल रही थी। बेबीलोन के खगोलशास्त्री रात के आकाश को बेहद बारीकी से देखा करते थे। उन्होंने पाया कि सूरज साल भर में आकाश में तारों के जिस काल्पनिक रास्ते से गुजरता हुआ दिखाई देता है, उस पूरे रास्ते के इर्द गिर्द बारह अलग अलग तारा समूह या नक्षत्र मौजूद हैं। उन्होंने इस पूरे रास्ते को बारह बराबर हिस्सों में बांट दिया, और हर हिस्से को उस वक्त वहां मौजूद तारा समूह के आकार के हिसाब से कोई जानवर या इंसानी आकृति का नाम दे दिया, जैसे मेढ़ा, बैल, बिच्छू या मछली। यही आगे चलकर बारह राशियां कहलाईं।
बारह की संख्या ही क्यों चुनी गई
यह सवाल भी दिलचस्प है कि आखिर बारह की ही संख्या क्यों चुनी गई, तेरह या दस क्यों नहीं। इसके पीछे दो व्यावहारिक वजहें मानी जाती हैं। पहली वजह है चांद का चक्र। एक चंद्र महीना यानी अमावस्या से अगली अमावस्या तक का समय करीब उनतीस दिन का होता है, और एक पूरे सौर वर्ष में यह चक्र लगभग बारह बार दोहराता है। इसी वजह से बारह का आंकड़ा समय नापने के लिए बेहद स्वाभाविक और व्यावहारिक साबित हुआ। दूसरी वजह है बेबीलोन सभ्यता की अपनी गिनती की प्रणाली। जो हमारी आज की दस आधारित गिनती के बजाय साठ आधारित प्रणाली पर टिकी थी। साठ की संख्या बारह से आसानी से विभाजित हो जाती है, और बारह खुद भी दो, तीन, चार और छह से आसानी से बंट जाती है, जिससे गणना करना कहीं ज्यादा आसान हो जाता था। यही व्यावहारिक सुविधा आगे चलकर घंटे को साठ मिनट में बांटने और चौबीस घंटे के दिन जैसी आज की समय व्यवस्था में भी झलकती है।
यह अवधारणा भारत और बाकी दुनिया तक कैसे पहुंची
बेबीलोन की यह खगोलीय समझ धीरे धीरे व्यापार और सांस्कृतिक आदान प्रदान के जरिए यूनान यानी ग्रीस पहुंची, जहां ग्रीक विद्वानों ने इसे अपनी खगोल विद्या और दर्शन के साथ मिलाकर और भी विकसित किया। इसके बाद सिकंदर के आक्रमण और उसके बाद के दौर में यही ज्ञान भारत तक भी पहुंचा, जहां इसे भारतीय खगोलशास्त्रियों ने अपनी पहले से मौजूद वैदिक खगोल परंपरा के साथ जोड़ लिया। भारतीय ज्योतिष में बारह राशियों के साथ साथ एक और अनूठी प्रणाली भी मौजूद है जिसे नक्षत्र कहा जाता है। इसमें आकाश को सत्ताईस हिस्सों में बांटा गया है। यह प्रणाली चांद की गति पर आधारित है, जबकि राशि चक्र सूरज की गति पर आधारित है। यानी भारत में यह दोनों प्रणालियां साथ साथ इस्तेमाल होती रहीं।
चीन ने अपनाया एक बिल्कुल अलग रास्ता
चीन में भविष्य से जुड़ी सबसे मशहूर परंपरा है आई चिंग, जिसे परिवर्तनों की किताब भी कहा जाता है। यह किसी तारा समूह पर आधारित नहीं बल्कि खास तरह की रेखाओं और चिन्हों पर आधारित एक प्रणाली है। जिसमें सिक्के या खास डंडियां फेंककर एक खास पैटर्न बनाया जाता है। फिर उस पैटर्न का मतलब एक प्राचीन किताब में खोजा जाता है। इसके अलावा चीन की एक और मशहूर परंपरा है चीनी राशि चक्र। जिसमें बारह जानवरों का इस्तेमाल होता है, लेकिन यह पश्चिमी राशियों की तरह महीनों पर नहीं बल्कि पूरे बारह साल के चक्र पर आधारित है। यानी हर साल एक खास जानवर का माना जाता है, जैसे चूहे का साल, बैल का साल और इसी तरह आगे।
अफ्रीका और अमेरिका की अपनी परंपराएं
पश्चिम अफ्रीका में योरूबा समुदाय की एक बेहद पुरानी और जटिल भविष्यवाणी प्रणाली है जिसे इफा कहा जाता है। इसमें एक विशेष पुजारी खास बीजों या हथेली के मेवों को फेंककर बनने वाले पैटर्न को पढ़ता है। और हर पैटर्न से जुड़ी हजारों पुरानी कहानियों और कविताओं के आधार पर सलाह दी जाती है। यह प्रणाली आज भी पश्चिम अफ्रीका और कैरेबियाई देशों में जीवित है। इसी तरह मध्य अमेरिका की माया सभ्यता ने भी समय और भविष्य को समझने के लिए एक बेहद जटिल कैलेंडर प्रणाली विकसित की थी, जिसमें एक खास दो सौ साठ दिन का पवित्र कैलेंडर शामिल था, जिसे त्ज़ोल्किन कहा जाता है। इसका इस्तेमाल धार्मिक अनुष्ठानों और शुभ मुहूर्त तय करने के लिए किया जाता था।
यूरोप की प्राचीन सभ्यताओं के तरीके
प्राचीन ग्रीस और रोम में भविष्य जानने के लिए पक्षियों की उड़ान और उनकी आवाज को देखकर भविष्यवाणी करने की प्रथा बेहद प्रचलित थी, जिसे ऑगरी कहा जाता था। इसके लिए खास तौर पर प्रशिक्षित पुजारी नियुक्त किए जाते थे। इसी दौर में इट्रस्केन और बाद में रोमन सभ्यता में एक और तरीका भी लोकप्रिय था। इसमें बलि दिए गए जानवरों के अंदरूनी अंगों, खासकर लिवर के आकार को देखकर भविष्यवाणी की जाती थी। ग्रीस में डेल्फी नाम की जगह पर एक मशहूर मंदिर भी था, जहां की पुजारिन को देवताओं का संदेश देने वाला माध्यम माना जाता था। दूर दूर से राजा और आम लोग वहां अपने भविष्य से जुड़े सवाल लेकर आते थे। उत्तरी यूरोप के नॉर्स और जर्मेनिक समुदायों में लकड़ी या पत्थर पर खास चिन्ह बनाकर रूण कहे जाने वाले टुकड़े फेंकने की परंपरा थी, जिसे आज भी कुछ लोग एक सांस्कृतिक अभ्यास के तौर पर अपनाते हैं।
मिस्र और भूमि आधारित तरीके
प्राचीन मिस्र में भी आकाश को अलग अलग हिस्सों में बांटने की अपनी परंपरा थी, जिसमें छत्तीस अलग अलग तारा समूहों का इस्तेमाल समय और मौसम जानने के लिए किया जाता था। यह प्रणाली भी आगे चलकर बेबीलोन और ग्रीक परंपरा के साथ मिलकर आज के ज्योतिष का हिस्सा बनी। इसके अलावा दुनिया के कई हिस्सों में भूमि पर बने पैटर्न या रेत में बनने वाले निशान देखकर भविष्यवाणी करने की परंपरा भी रही है, जिसे भूमि भविष्यवाणी या ज्योमेंसी कहा जाता है, जिसमें बेतरतीब ढंग से बनाए गए बिंदुओं के पैटर्न को पढ़कर सवालों के जवाब खोजे जाते थे।
हस्तरेखा और टैरो जैसी बाद की परंपराएं
हथेली की रेखाओं को देखकर भविष्य बताने की परंपरा, जिसे हस्तरेखा विज्ञान कहा जाता है। भारत और कई पुरानी सभ्यताओं में अलग अलग रूप में मौजूद रही है। वहीं टैरो कार्ड, जिसे आज बहुत से लोग प्राचीन भविष्यवाणी की तकनीक समझते हैं, असल में मध्यकालीन यूरोप में एक सामान्य खेल के ताश के पत्तों के रूप में शुरू हुआ था। इसे भविष्यवाणी के लिए इस्तेमाल करने की परंपरा कहीं बाद में, अठारहवीं सदी के आसपास शुरू हुई।
इन सारी परंपराओं में एक साझा इंसानी सोच झलकती है
इतनी अलग अलग और दूर दूर की सभ्यताओं में भविष्य जानने के इतने अलग अलग तरीके विकसित होना यह दिखाता है कि अनिश्चितता को समझने और नियंत्रित करने की इच्छा हर इंसानी समाज में एक जैसी रही है। चाहे वह तारों को देखना हो, हड्डियां फेंकना हो या पक्षियों की उड़ान पढ़ना हो, हर तरीके के पीछे एक ही बुनियादी मानवीय जरूरत छिपी है, अनजान भविष्य से जुड़ी बेचैनी को किसी तरह शांत करना और जीवन में एक व्यवस्था और अर्थ ढूंढना। आधुनिक विज्ञान इनमें से किसी भी तरीके की भविष्यवाणी करने की क्षमता को प्रमाणित नहीं मानता, लेकिन यह जरूर मानता है कि यह परंपराएं मानव इतिहास, संस्कृति और मनोविज्ञान को समझने के लिए बेहद मूल्यवान हैं।
पश्चिमी ज्योतिष में भी तारों का महत्व
एक दिलचस्प तथ्य यह है कि पश्चिमी ज्योतिष में इस्तेमाल होने वाली राशियां आज भी उन्हीं तारा समूहों के नाम पर टिकी हैं जो बेबीलोन के दौर में सूरज के रास्ते में मौजूद थे। लेकिन पृथ्वी के धीमे झुकाव बदलने की वजह से, जिसे खगोल विज्ञान में अयनांश या प्रीसेशन कहा जाता है। आज असल में सूरज उन तारा समूहों के मुकाबले करीब एक महीने आगे खिसक चुका है। यानी अगर आज की तारीख में आकाश को दोबारा उसी तरह बांटा जाए जैसे बेबीलोन के लोगों ने किया था, तो ज्यादातर लोगों की राशि बदल जाएगी। एक और मजेदार तथ्य यह है कि आकाश में असल में तेरहवां तारा समूह भी मौजूद है, जिसे ओफीयुकस कहा जाता है, और सूरज साल के कुछ दिनों के लिए इसी क्षेत्र से भी गुजरता है, लेकिन परंपरागत रूप से इसे कभी भी बारह राशियों की सूची में शामिल नहीं किया गया, ताकि बारह की सुविधाजनक और सांकेतिक संख्या बनी रह सके।
बारह राशियों की कहानी असल में हजारों साल पुरानी खगोलीय समझ, व्यावहारिक गणना और सांस्कृतिक आदान प्रदान का एक दिलचस्प मेल है, जो बेबीलोन से शुरू होकर ग्रीस और भारत होते हुए आज तक चली आ रही है। लेकिन यह भी उतना ही दिलचस्प है कि दुनिया के हर कोने में सभ्यताओं ने अपने अपने तरीके से भविष्य को समझने की कोशिश की, चाहे वह चीन की आई चिंग हो, अफ्रीका की इफा प्रणाली हो, माया सभ्यता का पवित्र कैलेंडर हो या यूरोप के रूण पत्थर। यह सारी परंपराएं मिलकर यह बताती हैं कि भविष्य जानने की चाहत कोई एक संस्कृति की खासियत नहीं, बल्कि यह पूरी इंसानियत की एक साझा और बेहद पुरानी कहानी है।


