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Harela Kab Hai 2026: हरेला पर्व 2026 कब है? जानें क्यों और कब बोए जाते हैं 7 तरह के अनाज
Harela Kab Hai 2026: हरेला पर्व जुलाई 2026 में कब मनाया जाएगा। जानें हरेला की तिथि, पूजा विधि, सात अनाज, धार्मिक महत्व और उत्तराखंड की खास परंपरा। क्यों मनाते है किसकी पूजा करते है...
Harela Kab Hai हर साल सूर्य के राशि परिवर्तन के साथ आषाढ़ में कर्क संक्राति के दिन हरेला मनाया जाता है ये उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति पर्व है। यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि नेचर , पर्यावरण और खेती पर आधारित जीवनशैली का पर्व है। हर साल कर्क संक्रांति के अवसर पर मनाया जाने वाला हरेला हरियाली, अच्छी फसल, सुख-समृद्धि और परिवार के मंगल की कामना का प्रतीक है। इसे विशेष रूप से उत्तराखंड के कुमाऊं और कई गढ़वाली क्षेत्रों में बड़े उत्साह के साथ मनाते है।
हरेला पर्व कब है 2026?
साल 2026 में हरेला पर्व 16 जुलाई, गुरुवार को मनाया जाएगा। यह दिन सूर्य मिथुनसे कर्क राशि में प्रवेश करेंगे यानी कर्क संक्रांति होगा। इसी शुभ अवसर पर उत्तराखंड के लोग प्रकृति के प्रति आभार देते हुए हरेला पर्व मनाते हैं और हरियाली के संरक्षण का संकल्प लेते हैं।
हरेला पर्व की कैसे मनाते है।
हरेला के लगभग 10 दिन पहले इसकी तैयारी शुरू होती हैं। घर की महिलाएं या परिवार के बुजुर्ग साफ मिट्टी से भरे एक छोटे पात्र या टोकरे में सात प्रकार के अनाज के बीज बोते हैं। इन बीजों को प्रतिदिन श्रद्धा के साथ पानी दिया जाता है ताकि वे अंकुरित होकर हरे-पीले पौधों का रूप ले सकें।
दसवें दिन इन हरे अंकुरों को शुभ मुहूर्त में काटा जाता है और भगवान शिव तथा माता पार्वती को चढाया जाता है। इस त्योहार के एक दिन पहले की शाम को हरकाली पूजा होती है। इस पूजा में शुद्ध मिट्टी लेकर उससे भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश और कार्तिकेय जी की मूर्ति तैयार की जाती है। इसके बाद इन मूर्तियों को सजाया जाता है। फिर भगवान को फल, पूड़ी, खीर, गुड़-आटे के चीला का भोग लगाया जाता है। इसके बाद 10 दिन पहले बोए गए हरेले के सामने भगवान की प्रतिमाओं को रखकर विधि-विधान पूजा की जाती है। ये पूजा घर के बुजुर्ग सदस्य द्वारा करने की परंपरा है।इसके बाद परिवार के सभी सदस्यों के सिर पर हरेला रखकर उनके सुख, स्वास्थ्य और लंबी आयु की कामना की जाती है। इस पारंपरिक रस्म को स्थानीय भाषा में हरेला पतीसना कहते है।
हरेला के लिए कौन-कौन से बीज बोए जाते हैं?
हरेला बोने के लिए आमतौर पर सात प्रकार के अनाजों का उपयोग किया जाता है। इनमें प्रमुख रूप से—धान,गेहूं,जौ, मक्का,उड़द,गहत (कुल्थ),सरसों इन बीजों का अंकुरित होना आने वाले मौसम में अच्छी खेती, समृद्धि और जीवन में नई ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। हरेला बोते और काटते समय कई स्थानों पर पारंपरिक लोकगीत भी गाए जाते हैं, जिससे इस पर्व की सांस्कृतिक सुंदरता और बढ़ जाती है।
हरेला पर्व का महत्व
हरेला पर्व भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा से जुड़ा है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक पूजा करने और हरेला अर्पित करने से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि और खुशहाली बनी रहती है, सामाजिक दृष्टि से यह पर्व लोगों को प्रकृति के संरक्षण, पेड़-पौधे लगाने और पर्यावरण बचाने का संदेश देता है। यही कारण है कि आज हरेला को केवल एक लोकपर्व नहीं, बल्कि 'ग्रीन फेस्टिवल' के रूप में भी पहचान मिल रही है। उत्तराखंड में इस अवसर पर कई स्थानों पर वृक्षारोपण अभियान भी चलाए जाते हैं।
हरेला पर्व क्यों है खास?
हरेला केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि आपसी प्रेम, एकता और सामूहिक मंगल की भावना को भी मजबूत करता है।कहते हैं हरेला जितना बड़ा होगा उतना ही फसल से लाभ होगा। इस पर्व में शिव पार्वती की पूजा का विधान है। किसान इस दिन भगवान से अच्छी फसल के लिए प्रार्थना करते हैं।


