Karwa Chauth First Vrat: पहले करवा चौथ पर शुक्र अस्त का साया? आइए जाने क्या करना चाहिए

Karwa Chauth First Vrat Shukra Asta Ka Saya: शुक्र अस्त होने पर पहली बार करवा चौथ का व्रत रखने का क्या नियम है?

Newstrack Network
Published on: 21 Oct 2026 2:08 PM IST
Karwa Chauth First Vrat Shukra Asta Ka Saya | Astrology in Hindi | Newstrack | Latest Hindi News
X

Karwa Chauth First Vrat Shukra Asta Ka Saya | Astrology in Hindi | Newstrack | Latest Hindi News

Karwa Chauth First Vrat Shukra Asta Ka Saya: इस प्रश्न का उत्तर है कि धर्मशास्त्रों की एक महत्वपूर्ण परंपरा में शुक्र अस्त होने पर नए व्रत का विधिवत आरंभ निषिद्ध माना गया है। लेकिन कुछ अन्य विद्वान करवा चौथ जैसे निश्चित तिथि पर आने वाले व्रत को इस निषेध से अलग मानते हैं। इसलिए यह कहना कि शास्त्रों में कहीं भी पहला करवा चौथ रखने की मनाही नहीं है, सही नहीं होगा। इसी तरह यह कहना भी उचित नहीं होगा कि ऐसी स्थिति में व्रत रखने से निश्चित रूप से पति या पत्नी को अनिष्ट होगा।

इस विषय में सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण 'धर्मसिंधु' नामक धर्मशास्त्रीय निबंधग्रंथ में मिलता है। इसमें पहले कभी न किए गए व्रत के आरंभ और व्रत के उद्यापन को गुरु आदि ग्रहों के अस्त होने की स्थिति में वर्जित बताया गया है। इसलिए जो परिवार धर्मसिंधु के व्रतारंभ संबंधी नियमों का पालन करते हैं, उनके लिए शुक्रास्त के दौरान पहली बार करवा चौथ का औपचारिक संकल्प लेना टालना शास्त्रीय रूप से समर्थित विकल्प है।

दूसरी ओर, करवा चौथ की निर्धारित चतुर्थी पर पूजा, उपवास और चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा अलग विषय है। कुछ ज्योतिषाचार्य मानते हैं कि शुक्रास्त का निषेध विवाह जैसे नए मांगलिक संस्कारों पर लागू होता है, करवा चौथ की नियमित तिथि पर होने वाली पूजा पर नहीं।

अब इसके मूल प्रमाण समझिए...

1. धर्मसिंधु में व्रत आरंभ करने का क्या नियम है?

पंडित काशीनाथ उपाध्याय द्वारा रचित धर्मसिंधु हिंदू धार्मिक आचार, तिथि, व्रत और संस्कारों के निर्णय से संबंधित महत्वपूर्ण निबंधग्रंथ है। इसका रचनाकाल लगभग 1790–91 माना जाता है।

इसके प्रथम परिच्छेद के 'व्रतपरिभाषा' प्रकरण के उपलब्ध मराठी अनुवाद में स्पष्ट निर्देश है कि पहले कभी न किए गए व्रत का आरंभ अथवा व्रत का उद्यापन, गुरु आदि ग्रहों के अस्त होने पर नहीं करना चाहिए। इसमें अन्य निषिद्ध योगों और तिथियों का भी उल्लेख है। 

यहाँ तीन बातें विशेष रूप से ध्यान देने योग्य हैं।

पहली, ग्रंथ में केवल विवाह, गृहप्रवेश या मुंडन जैसे संस्कारों की चर्चा नहीं है, बल्कि नए व्रत के आरंभ का अलग से निषेध बताया गया है।

दूसरी, इसमें 'व्रतारंभ' और 'व्रतोद्यापन' को दो अलग धार्मिक क्रियाओं के रूप में लिया गया है। इसलिए व्रत करना और किसी व्रत का पहली बार औपचारिक संकल्प लेना एक ही बात नहीं है।

तीसरी, यह सामान्य व्रतारंभ संबंधी नियम है। उपलब्ध अंश में करवा चौथ या नवविवाहिता का अलग नाम लेकर निषेध नहीं किया गया है। इसलिए करवा चौथ पर इस नियम को लागू करना एक धर्मशास्त्रीय व्याख्या है, कोई प्रत्यक्ष और स्वतंत्र करवा चौथ संबंधी वचन नहीं।

इस प्रमाण के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि शुक्र अस्त होने पर नए करवा चौथ व्रत का विधिवत आरंभ टालने की परंपरा का धर्मशास्त्रीय आधार मौजूद है। इसे केवल लोकमान्यता या निराधार अंधविश्वास कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।

2. गुरु और शुक्र के अस्त होने का अलग विधान

धर्मसिंधु के प्रथम परिच्छेद में 'गुरुशुक्रास्तादिकांतील वर्ज्य कर्मे' अर्थात गुरु और शुक्र के अस्त होने पर वर्जित कर्मों का अलग प्रकरण है।

इसके उपलब्ध अनुवाद में बताया गया है कि जिन कर्मों को मलमास में वर्जित माना गया है, उनमें से संबंधित कर्म गुरु और शुक्र के अस्त होने तथा उनके बाल्य और वार्धक्य की अवस्थाओं में भी वर्जित होते हैं। इन अवधियों के निर्धारण के लिए अलग-अलग परंपरागत मतों का भी उल्लेख है। 

इसका अर्थ यह है कि शुक्रास्त का निषेध केवल विवाह तक सीमित नहीं है। किन धार्मिक कार्यों को टालना चाहिए, इसका निर्णय उस कार्य की प्रकृति, उसका संकल्प और संबंधित विधानों से होता है।

लेकिन शुक्र के अस्त होने का अर्थ यह नहीं है कि समस्त पूजा, जप, ध्यान, प्रार्थना अथवा पहले से चले आ रहे व्रत बंद कर दिए जाएँ। नए मांगलिक अनुष्ठान और पहले से निर्धारित धार्मिक कर्तव्य में धर्मशास्त्रीय अंतर किया जाता है।

3. नारद पुराण में चतुर्थी व्रत का प्रमाण

नारद पुराण के पूर्वभाग, चतुर्थ पाद के अध्याय 113 में वर्ष के विभिन्न महीनों की चतुर्थियों पर किए जाने वाले व्रतों का उल्लेख मिलता है। इस अध्याय की शुरुआत में सनातन ऋषि चतुर्थी व्रतों का महत्व बताते हैं और स्त्री तथा पुरुष दोनों द्वारा इनके पालन की चर्चा करते हैं।

इसके बाद विभिन्न चतुर्थियों पर भगवान गणेश की उपासना, दान तथा व्रत के विधान बताए जाते हैं। 

इसका करवा चौथ से संबंध समझना आवश्यक है। करवा चौथ भी कृष्ण पक्ष की चतुर्थी का व्रत है, जिसमें गणेश पूजा का महत्वपूर्ण स्थान है। हालांकि नारद पुराण के इस सामान्य चतुर्थी-व्रत प्रकरण से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि शुक्रास्त में नए करवा चौथ व्रत का आरंभ विशेष रूप से अनुमत है।

नारद पुराण का यह प्रमाण चतुर्थी व्रतों की धार्मिक परंपरा को स्थापित करता है, लेकिन धर्मसिंधु के व्रतारंभ संबंधी निषेध को स्वयं निरस्त नहीं करता।

4. फिर कुछ ज्योतिषाचार्य पहला करवा चौथ रखने की अनुमति क्यों देते हैं?

इस विषय में विद्वानों के मत अलग हैं। अक्टूबर 2026 में उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पंडित मनीष शर्मा ने कहा है कि शुक्र अथवा किसी दूसरे ग्रह के अस्त होने से करवा चौथ जैसे व्रत के पालन पर प्रतिबंध नहीं लगता और नवविवाहित महिलाएँ भी इसे कर सकती हैं। 

इसके विपरीत, 2022 में लखनऊ के ज्योतिषाचार्य एस.एस. नागपाल ने शुक्रास्त की स्थिति में नवविवाहिताओं को पहला करवा चौथ व्रत आरंभ न करने की सलाह दी थी। उसी समय आचार्य शक्तिधर त्रिपाठी ने व्रत जारी रखने और व्रत का उद्यापन करने के बीच अंतर स्पष्ट किया था। 

इन मतभेदों के पीछे मुख्य प्रश्न है कि करवा चौथ को किस प्रकार का धार्मिक अनुष्ठान माना जाए।

एक मत के अनुसार, विवाह के बाद पहली बार करवा चौथ का विधिवत संकल्प लेना नए व्रत का आरंभ है। इसलिए इस पर गुरु-शुक्रास्त का सामान्य निषेध लागू होगा।

दूसरे मत के अनुसार, करवा चौथ किसी मनमाने दिन शुरू किया जाने वाला मांगलिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक निश्चित चतुर्थी को संपन्न होने वाला पर्व है। इसलिए उस दिन की पूजा और उपवास को शुक्रास्त के कारण छोड़ना आवश्यक नहीं।

दोनों व्याख्याओं में वास्तविक अंतर यही है। यह केवल आस्था बनाम अंधविश्वास का विवाद नहीं, बल्कि व्रतारंभ संबंधी सामान्य नियम और विशेष तिथि पर किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठान के बीच संबंध की व्याख्या का विषय है।

5. इस वर्ष 2026 में क्या स्थिति है?

इस बार करवा चौथ गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026 को है। 

विभिन्न प्रकाशित ज्योतिषीय गणनाओं में अक्टूबर 2026 के दौरान शुक्रास्त का उल्लेख मिलता है। शुक्र के पुनः उदय की तारीख को लेकर 28, 29 और 30 अक्टूबर तक के अलग-अलग विवरण प्रकाशित हुए हैं। लखनऊ की एक दृक्गणित पंचांग गणना में 29 अक्टूबर को शुक्रास्त की समाप्ति दिखाई गई है। 

इसलिए इस वर्ष एक अतिरिक्त सावधानी आवश्यक है। यदि शुक्र का उदय करवा चौथ के दिन ही हो रहा हो, तो उसका सटीक समय, स्थानीय पंचांग और बाल्यकाल संबंधी परंपरा देखे बिना पूरे दिन को नए व्रतारंभ के लिए अनुमत या निषिद्ध घोषित नहीं करना चाहिए।

खगोलीय दृष्टि से शुक्रास्त का अर्थ सूर्य के निकट होने के कारण शुक्र का आकाश में दिखाई न देना है। इससे वैवाहिक जीवन पर कोई अनिवार्य प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, इसका वैज्ञानिक प्रमाण स्थापित नहीं है। मांगलिक कार्यों से संबंधित निषेध धार्मिक-ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित हैं।

6. तो नवविवाहित महिला को क्या करना चाहिए?

धर्मसिंधु के सामान्य व्रतारंभ नियम को मानने वाले परिवार के लिए अधिक परंपरानुकूल रास्ता यह होगा कि शुक्रास्त के दौरान पहली बार लंबे समय तक पालन किए जाने वाले करवा चौथ व्रत का औपचारिक संकल्प अथवा आरंभ न किया जाए। महिला उस दिन अपनी श्रद्धा के अनुसार गणेश, शिव और पार्वती की पूजा तथा पति के कल्याण की प्रार्थना कर सकती है। अगले वर्ष अनुकूल परिस्थितियों में विधिवत व्रतारंभ किया जा सकता है।

लेकिन जिन परिवारों की परंपरा में करवा चौथ को निर्धारित तिथि का स्वतंत्र व्रत माना जाता है और शुक्रास्त में भी उसके पालन की अनुमति है, वहाँ पहली बार व्रत रखना भी एक प्रचलित धार्मिक विकल्प है। ऐसी स्थिति में व्रत रखने से अनिवार्य अनिष्ट होने का कोई प्रमाणित आधार नहीं है।

जो महिलाएँ पहले से करवा चौथ करती आ रही हैं, उनके लिए शुक्रास्त के कारण नियमित व्रत छोड़ने की सामान्य आवश्यकता नहीं मानी जाती। हाँ, औपचारिक उद्यापन के लिए अलग नियम देखना चाहिए।

अंतिम निष्कर्ष

यदि आपका प्रश्न विशेष रूप से यह है कि शुक्रास्त में विवाह के बाद पहली बार करवा चौथ व्रत शुरू करने की शास्त्रीय मनाही है या नहीं, तो उत्तर है—हाँ, धर्मसिंधु में नए व्रत के आरंभ का सामान्य निषेध मौजूद है, जिसे पहले करवा चौथ पर लागू किया जा सकता है।

लेकिन करवा चौथ का नाम लेकर ऐसा कोई सर्वमान्य, प्रत्यक्ष शास्त्रीय निषेध उपलब्ध प्रमाणों में स्थापित नहीं हुआ है। इसीलिए कुछ विद्वान पहला करवा चौथ रखने की अनुमति भी देते हैं।

मेरी सलाह है कि यदि परिवार शास्त्रीय व्रतारंभ के नियमों का कठोरता से पालन करता है, तो नए व्रत का औपचारिक आरंभ शुक्रास्त में न करना अधिक सावधानीपूर्ण निर्णय होगा। परंतु जो नवविवाहिता अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत रखती है, उसके मन में अनिष्ट या दोष का भय पैदा करना भी उचित नहीं है।

Newstrack Network
ABOUT THE AUTHOR

Newstrack Network

Newstrack Desknewstracknetwork@gmail.com

Newstrack is one of the most Trusted and Popular news portal of India. Remain updated and aware, only on Newstrack

Next Story