Maa Kalratri Vrat Katha: रक्तबीज का अंत करने के लिए मां ने लिया उग्र रूप, जानें मां कालरात्रि की कथा

Maa Kalratri Vrat Katha in Hindi: शारदीय नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा का विशेष महत्व है। जानें मां कालरात्रि के प्राकट्य से जुड़ी मान्यताएं, रक्तबीज के वध की पौराणिक कथा, देवी के उग्र स्वरूप का रहस्य, पूजा का धार्मिक महत्व और मां कालरात्रि के शक्तिशाली मंत्र।

Suman  Mishra (Astrologer)
Published on: 17 Oct 2026 7:00 AM IST
Maa Kalratri Vrat Katha: रक्तबीज का अंत करने के लिए मां ने लिया उग्र रूप, जानें मां कालरात्रि की कथा
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Maa Kalratri Vrat Katha in Hindi शारदीय नवरात्रि के सातवें दिन मां दुर्गा के सातवें स्वरूप मां कालरात्रि की पूजा की जाती है। देवी का यह स्वरूप जितना उग्र दिखाई देता है, उतना ही कल्याणकारी भी माना जाता है। इसी कारण मां कालरात्रि को शुभंकरी है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवी की आराधना करने से भक्तों को साहस मिलता है और वे भय तथा नकारात्मकता से मुक्ति की कामना करते हैं।

मां कालरात्रि का स्वरूप अन्य देवी रूपों से अलग है। उनका वर्ण गहरा है, बाल खुले हुए हैं और तीन नेत्र हैं। वे गर्दभ यानी गधे पर सवार रहती हैं और उनके गले में विद्युत के समान चमकने वाली माला का वर्णन मिलता है। देवी के इस स्वरूप को दुष्ट शक्तियों के विनाश और धर्म की रक्षा से जोड़कर देखा जाता है। नवरात्रि में मां कालरात्रि की पूजा के साथ उनकी कथा सुनने का भी विशेष महत्व माना जाता है। आइए जानते हैं मां कालरात्रि से जुड़ी पौराणिक कथा और उनके मंत्र।

मां कालरात्रि की व्रत कथा (Maa Kalratri Vrat Katha in Hindi)

देवी महात्म्य में वर्णित रक्तबीज के वध की कथा मां दुर्गा के उग्र स्वरूप और दुष्ट शक्तियों के विनाश से जुड़ी है। यह कथा शुंभ-निशुंभ के विरुद्ध देवी के युद्ध के दौरान आता है। कथा में बताया गया है कि जब चंड और मुंड जैसे असुर मारे गए, तब दैत्यराज शुंभ क्रोध से भर उठा। उसने अपनी विशाल सेना को देवी से युद्ध करने के लिए भेज दिया।

असुरों की सेना ने देवी चंडिका को चारों ओर से घेर लिया। युद्ध की स्थिति गंभीर होती गई और देवताओं की सहायता के लिए उनकी शक्तियां देवी के पास पहुंचीं। ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नरसिंही और ऐंद्री जैसी देवशक्तियां अपने-अपने दिव्य स्वरूप और आयुधों के साथ युद्ध में शामिल हुईं। सभी ने मिलकर असुरों का सामना करना शुरू किया।

इसी बीच देवी के उग्र स्वरूप और उनकी सहायक शक्तियों ने असुर सेना पर प्रहार किया। युद्ध में अनेक दैत्यों का संहार हुआ, लेकिन तभी रक्तबीज नाम का शक्तिशाली असुर मैदान में आ पहुंचा। उसकी शक्ति के कारण देवताओं और देवी की सेना के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो गई।

रक्तबीज के रक्त से पैदा होने लगे हजारों असुर

पौराणिक कथा के अनुसार, रक्तबीज को एक विशेष शक्ति प्राप्त थी। उसके शरीर से रक्त की जो भी बूंद धरती पर गिरती, उससे उसी के समान बलशाली एक नया असुर उत्पन्न हो जाता था। जब देवशक्तियों ने उस पर अस्त्र-शस्त्रों से प्रहार किया, तो उसका रक्त जमीन पर गिरने लगा। देखते ही देखते रक्त की बूंदों से अनेक नए असुर पैदा हो गए।

जितना अधिक रक्तबीज घायल होता, उतने ही अधिक असुर युद्धभूमि में दिखाई देने लगते। इससे देवी की सेना के लिए संकट बढ़ गया। देवशक्तियां लगातार युद्ध कर रही थीं, लेकिन रक्तबीज के रक्त से उत्पन्न होने वाले असुरों की संख्या कम होने के बजाय बढ़ती जा रही थी।

स्थिति को समझते हुए देवी चंडिका ने एक विशेष उपाय किया। उन्होंने चामुंडा से कहा कि रक्तबीज के शरीर से निकलने वाले रक्त को धरती पर गिरने से पहले ही अपने मुख में समेट लें, ताकि रक्त की बूंदों से नए असुर पैदा न हो सकें।

मां चामुंडा ने इस तरह किया रक्तबीज का अंत

देवी चंडिका के निर्देश पर चामुंडा ने अपना मुख फैलाया और रक्तबीज के शरीर से निकलने वाले रक्त को धरती पर गिरने से पहले ही पीना शुरू कर दिया। रक्त की बूंदों से पैदा होने वाले असुरों को भी उन्होंने समाप्त करना शुरू कर दिया। इस तरह नए असुरों के पैदा होने का सिलसिला रुकने लगा।

उधर, देवी चंडिका ने रक्तबीज पर लगातार प्रहार किए। जब उसके शरीर से रक्त निकलना बंद हो गया, तब उसकी शक्ति भी क्षीण पड़ गई। अंत में देवी ने उसका वध कर दिया। रक्तबीज के मारे जाने पर देवताओं ने प्रसन्न होकर देवी की स्तुति की।

यह कथा बताती है कि जब किसी संकट को सामान्य उपायों से दूर करना संभव न हो, तब उसके मूल कारण को समाप्त करना जरूरी होता है। धार्मिक दृष्टि से रक्तबीज का अंत बुराई और विनाशकारी शक्तियों पर देवी की विजय का प्रतीक माना जाता है।

मां कालरात्रि की पूजा का क्या है महत्व?

मां कालरात्रि को शक्ति और निर्भीकता प्रदान करने वाली देवी माना जाता है। उनका उग्र स्वरूप इस बात का प्रतीक है कि धर्म की रक्षा के लिए बुराई का सामना करना आवश्यक है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, नवरात्रि के सातवें दिन उनकी पूजा करने से भक्त अपने जीवन से भय, बाधाओं और नकारात्मकता को दूर करने की प्रार्थना करते हैं।

मां कालरात्रि को शुभंकरी भी कहा जाता है, क्योंकि उनका स्वरूप उग्र होने के बावजूद भक्तों के लिए कल्याणकारी माना गया है। उनकी आराधना में श्रद्धा, संयम और मन की एकाग्रता को महत्व दिया जाता है।

मां कालरात्रि के मंत्र

नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा के दौरान भक्त देवी के मंत्रों का जाप करते हैं। देवी की स्तुति के लिए प्रचलित मंत्रों में ये मंत्र शामिल हैं।

मंत्र 1

दंष्ट्राकरालवदने शिरोमालाविभूषणे।

चामुण्डे मुण्डमथने नारायणि नमोऽस्तु ते॥

मंत्र 2

या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

धार्मिक मान्यता है कि मां कालरात्रि की श्रद्धापूर्वक पूजा और मंत्र जाप से मन में साहस तथा सकारात्मक भाव बनाए रखने की प्रेरणा मिलती है। नवरात्रि में देवी के इस स्वरूप की आराधना बुराई पर अच्छाई की जीत और भय पर साहस की विजय का संदेश देती है।

Suman  Mishra (Astrologer)
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Suman Mishra (Astrologer)

Astrologer Mail ID - suman1711@gmail.comsuman1711@gmail.com

मैं वर्तमान में न्यूजट्रैक और अपना भारत के लिए कंटेट राइटिंग कर रही हूं। इससे पहले मैने रांची, झारखंड में प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में रिपोर्टिंग और फीचर राइटिंग किया है और ईटीवी में 5 वर्षों का डेस्क पर काम करने का अनुभव है। मैं पत्रकारिता और ज्योतिष विज्ञान में खास रुचि रखती हूं। मेरे नाना जी पंडित ललन त्रिपाठी एक प्रकांड विद्वान थे उनके सानिध्य में मुझे कर्मकांड और ज्योतिष हस्त रेखा का ज्ञान मिला और मैने इस क्षेत्र में विशेषज्ञता के लिए पढाई कर डिग्री भी ली है

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