Papankusha Ekadashi Vrat Katha 2026: पापांकुशा एकादशी पर जरूर पढ़ें यह व्रत कथा, मिलेगा मोक्ष?

Papankusha Ekadashi Vrat Katha 2026: पापांकुशा एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा के साथ पढ़ें क्रोधन बहेलिए की प्राचीन व्रत कथा। जानें व्रत का महत्व, पूजा के नियम और इस दिन क्या दान करना चाहिए।

Suman  Mishra (Astrologer)
Published on: 21 Oct 2026 7:30 PM IST
Papankusha Ekadashi
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Papankusha Ekadashi Vrat Katha पापांकुशा एकादशी का हिंदू धर्म में विशेष महत्व माना जाता है। यह व्रत अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के पद्मनाभ स्वरूप की पूजा करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत को श्रद्धा और नियम के साथ करने से व्यक्ति को अपने पापों से मुक्ति पाने और जीवन में सद्कर्मों की ओर बढ़ने की प्रेरणा मिलती है। एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा के साथ व्रत कथा सुनने का भी विशेष महत्व बताया गया है।

पापांकुशा एकादशी की कथा में एक ऐसे बहेलिए का वर्णन मिलता है, जिसने अपना पूरा जीवन हिंसा और गलत कामों में बिताया था। जब उसे अपनी मृत्यु का समय नजदीक होने का पता चला, तो वह भयभीत हो गया। इसके बाद उसने ऋषि से पापों से मुक्ति पाने का उपाय पूछा। ऋषि ने उसे ऐसा रास्ता बताया, जिससे उसके जीवन की दिशा बदल गई। आइए जानते हैं पापांकुशा एकादशी की पूरी व्रत कथा और इसका धार्मिक महत्व।

पापांकुशा एकादशी व्रत कथा (Papankusha Ekadashi Vrat Katha)

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के बारे में पूछा। उन्होंने जानना चाहा कि इस एकादशी का क्या नाम है, इसका व्रत किस प्रकार करना चाहिए और इसे रखने से क्या फल मिलता है।

तब भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि इस एकादशी को पापांकुशा एकादशी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और व्रत करने से व्यक्ति को अपने पापों से मुक्ति पाने का अवसर मिलता है। इस व्रत के साथ दान-पुण्य और अच्छे कर्मों का भी विशेष महत्व है। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को एक बहेलिए की कथा सुनाई।

जब मृत्यु के भय से घबरा गया बहेलिया

प्राचीन समय में विंध्य पर्वत के क्षेत्र में क्रोधन नाम का एक बहेलिया रहता था। उसका स्वभाव बहुत कठोर था। वह जीव-जंतुओं का शिकार करता और हिंसा करने से पीछे नहीं हटता था। उसने अपने जीवन में दूसरों को कष्ट पहुंचाने और गलत कामों में बहुत समय बिताया। उसे न तो अपने कर्मों की चिंता थी और न ही उनके परिणामों का भय।

समय बीतता गया और धीरे-धीरे उसकी उम्र बढ़ने लगी। एक दिन उसके जीवन में ऐसा मोड़ आया, जिसने उसे भीतर तक हिला दिया। कथा के अनुसार, यमदूत उसके पास आए और उसे बताया कि उसके जीवन का अंतिम समय नजदीक है। जल्द ही उसकी मृत्यु होगी और उसे अपने कर्मों का फल भोगने के लिए यमलोक जाना पड़ेगा।

यह सुनकर क्रोध घबरा गया। उसे अपने जीवन में किए गए पाप याद आने लगे। वह सोचने लगा कि यदि मृत्यु के बाद उसे अपने कर्मों का दंड मिला, तो वह उन कष्टों को कैसे सह पाएगा। पहली बार उसे अपने गलत कामों का एहसास हुआ और वह उनसे छुटकारा पाने का रास्ता खोजने लगा।

अंगिरा ऋषि से मांगी पापों से मुक्ति की राह

मृत्यु के भय से परेशान क्रोधन एक दिन अंगिरा ऋषि के आश्रम पहुंचा। उसने ऋषि को प्रणाम किया और अपनी परेशानी बताई। उसने स्वीकार किया कि उसने जीवनभर हिंसा की और अनेक गलत काम किए हैं। अब जब उसका अंतिम समय निकट है, तो वह अपने पापों से मुक्त होना चाहता है।

क्रोधन ने ऋषि से विनती की कि वे उसे ऐसा उपाय बताएं, जिससे वह अपने बुरे कर्मों के बंधन से छुटकारा पा सके और मृत्यु के बाद सद्गति प्राप्त कर सके।

अंगिरा ऋषि ने उसकी बात ध्यान से सुनी। उन्होंने उसे समझाया कि मनुष्य को अपने कर्मों के प्रति जागरूक होना चाहिए। जीवन में किए गए गलत कामों का एहसास होने पर उसे सही मार्ग अपनाने का प्रयास करना चाहिए। ऋषि ने क्रोधन को पापांकुशा एकादशी का व्रत करने की सलाह दी।

उन्होंने बताया कि अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी पर भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। व्रत के नियमों का पालन करते हुए भगवान का स्मरण करना और श्रद्धा के साथ कथा सुनना भी महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही दान-पुण्य और अच्छे कर्मों को जीवन में स्थान देना चाहिए।

बहेलिए ने रखा पापांकुशा एकादशी का व्रत

अंगिरा ऋषि की बात सुनकर क्रोधन को उम्मीद की नई किरण दिखाई दी। उसने ऋषि को प्रणाम किया और उनके बताए उपाय का पालन करने का निश्चय किया। वह अपने घर लौट आया और एकादशी तिथि आने की प्रतीक्षा करने लगा।

जब अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी आई, तो क्रोधन ने पापांकुशा एकादशी का व्रत रखा। उसने भगवान विष्णु की पूजा की और पूरी श्रद्धा के साथ उनका स्मरण किया। उसने व्रत के नियमों का पालन किया और रात में जागकर भगवान की आराधना की। अगले दिन उचित समय पर पारण करके अपना व्रत पूरा किया।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु की कृपा से क्रोधन को अपने पापों से मुक्ति मिली और मृत्यु के बाद उसे मोक्ष प्राप्त हुआ। इस प्रकार पापांकुशा एकादशी की कथा यह संदेश देती है कि मनुष्य को अपने गलत कर्मों का एहसास होने पर सही मार्ग अपनाने का प्रयास करना चाहिए। सच्ची श्रद्धा, आत्मचिंतन और अच्छे कर्म जीवन को नई दिशा दे सकते हैं।

पापांकुशा एकादशी पर क्या करना चाहिए?

पापांकुशा एकादशी के दिन भगवान विष्णु के पद्मनाभ स्वरूप की पूजा करने की परंपरा है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार व्रत रखते हैं। इस दिन कुछ विशेष बातों का ध्यान रखा जा सकता है।

भगवान विष्णु की पूजा करें: सुबह स्नान के बाद पूजा स्थल पर भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीपक जलाएं और उनका स्मरण करें।

व्रत कथा सुनें: पूजा के समय पापांकुशा एकादशी की कथा सुनें या पढ़ें। धार्मिक मान्यता में कथा श्रवण को व्रत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है।

दान-पुण्य करें: जरूरतमंद लोगों को भोजन, जल, वस्त्र या अपनी सामर्थ्य के अनुसार उपयोगी वस्तुएं दान करें।

मन और वाणी पर संयम रखें: किसी को अपशब्द कहने, झूठ बोलने और दूसरों को कष्ट पहुंचाने से बचें।

भगवान का स्मरण करें: दिन में समय निकालकर विष्णु मंत्र का जाप करें और भजन-कीर्तन करें।

पापांकुशा एकादशी व्रत का धार्मिक महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पापांकुशा एकादशी का व्रत व्यक्ति को धर्म, संयम और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने, व्रत कथा सुनने और दान-पुण्य करने का विशेष महत्व बताया गया है। कथा में क्रोधन का जीवन इस बात की ओर संकेत करता है कि गलतियों का एहसास होने पर व्यक्ति को अपने व्यवहार में बदलाव लाने का प्रयास करना चाहिए।

पापांकुशा एकादशी केवल उपवास रखने तक सीमित नहीं है। यह दिन अपने कर्मों पर विचार करने, दूसरों के प्रति दया रखने और जरूरतमंदों की सहायता करने का संदेश भी देता है। श्रद्धालु मानते हैं कि भगवान विष्णु की भक्ति और अच्छे कर्मों से जीवन में शांति मिलती है। इसलिए इस दिन पूजा-पाठ के साथ अपने आचरण को बेहतर बनाने का संकल्प लेना भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

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Suman Mishra (Astrologer)

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मैं वर्तमान में न्यूजट्रैक और अपना भारत के लिए कंटेट राइटिंग कर रही हूं। इससे पहले मैने रांची, झारखंड में प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में रिपोर्टिंग और फीचर राइटिंग किया है और ईटीवी में 5 वर्षों का डेस्क पर काम करने का अनुभव है। मैं पत्रकारिता और ज्योतिष विज्ञान में खास रुचि रखती हूं। मेरे नाना जी पंडित ललन त्रिपाठी एक प्रकांड विद्वान थे उनके सानिध्य में मुझे कर्मकांड और ज्योतिष हस्त रेखा का ज्ञान मिला और मैने इस क्षेत्र में विशेषज्ञता के लिए पढाई कर डिग्री भी ली है

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