Purushottam Maas 2026 Katha: न अस्त्र से न शस्त्र से… फिर कैसे हुआ हिरण्यकश्यप का वध? जानिए पुरुषोत्तम मास का रहस्य

Purushottam Maas 2026 Ki Rahasyamayi Katha: क्यों कहा जाता है इसे सबसे पुण्यदायी महीना, जानिए नृसिंह अवतार और अधिकमास की रहस्यमयी कथा

Jyotsana Singh
Published on: 18 May 2026 3:30 PM IST (Updated on: 18 May 2026 3:32 PM IST)
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Purushottam Maas 2026 Ki Katha

Purushottam Maas 2026 Ki Rahasyamayi Katha: भारतीय धार्मिक संस्कृति त्योहारों, उत्सवों, सेवा भाव व आस्था का अद्भुत संगम है। इस सनातन परंपरा में वर्ष भर कुछ समय ऐसे माने गए हैं, जब साधना, भक्ति और आत्मशुद्धि का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। पुरुषोत्तम मास भी ऐसा ही एक दुर्लभ और अत्यंत पुण्यदायी काल माना गया है। वर्ष 2026 में ज्येष्ठ माह के दौरान 17 मई से 15 जून तक पुरुषोत्तम मास का संयोग है। इसके बाद 16 जून से निज ज्येष्ठ मास प्रारंभ होगा। हिंदू धर्म में यह महीना केवल पंचांग की गणना का हिस्सा नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जागरण, संयम और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त करने का अवसर माना जाता है।

मान्यता है कि इस महीने में किए गए जप, तप, दान, स्नान, व्रत और पूजा का फल सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक मिलता है। यही कारण है कि साधु-संतों से लेकर गृहस्थ तक इस पूरे मास को अत्यंत श्रद्धा और नियमों के साथ बिताने का प्रयास करते हैं। पुरुषोत्तम मास को लेकर धर्मग्रंथों में अनेक कथाएं, रहस्य और परंपराएं वर्णित हैं, जो इसे अन्य महीनों से अलग और विशेष बनाती हैं।

क्या होता है पुरुषोत्तम मास?

हिंदू पंचांग चंद्रमा की गति के आधार पर चलता है, जबकि सौर वर्ष सूर्य की गति के अनुसार माना जाता है। चंद्र वर्ष और सौर वर्ष के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर आ जाता है। यही अंतर हर तीसरे वर्ष लगभग एक महीने के बराबर हो जाता है। इस अंतर को संतुलित करने के लिए हिंदू पंचांग में एक अतिरिक्त मास जोड़ा जाता है, जिसे अधिकमास कहा जाता है।

प्राचीन समय में इस अतिरिक्त महीने को 'मलमास' कहा जाता था। चूंकि इस महीने में कोई बड़े मांगलिक कार्य नहीं किए जाते थे, इसलिए लोग इसे अशुभ समझने लगे थे। लेकिन बाद में भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम देकर 'पुरुषोत्तम मास' बना दिया। तभी से यह महीना अत्यंत पवित्र और फलदायी माना जाने लगा।

क्यों कहलाता है ‘पुरुषोत्तम’ मास?

‘पुरुषोत्तम’ भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण का एक विशेष नाम है। इसका अर्थ होता है, 'सभी पुरुषों में श्रेष्ठ' या 'सर्वोत्तम ईश्वर'। मान्यता है कि जब अधिकमास अपनी उपेक्षा और अपमान से दुखी होकर भगवान विष्णु के पास पहुंचा, तब भगवान ने उसे सम्मान देते हुए कहा कि अब से यह महीना उनके नाम से जाना जाएगा।

कथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने कहा था कि जो भी श्रद्धा और भक्ति के साथ इस महीने में पूजा-पाठ, दान और साधना करेगा, उसे कई गुना पुण्य प्राप्त होगा। तभी से अधिकमास 'पुरुषोत्तम मास' कहलाने लगा। यह कथा इस बात का प्रतीक भी मानी जाती है कि ईश्वर किसी भी उपेक्षित वस्तु या व्यक्ति को सम्मान और महत्व दे सकते हैं।

हिरण्यकश्यप और नृसिंह अवतार से जुड़ी कथा

पुरुषोत्तम मास की एक प्रमुख पौराणिक कथा दैत्यराज हिरण्यकश्यप और भगवान नृसिंह अवतार से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि हिरण्यकश्यप ने कठोर तपस्या करके ब्रह्माजी से ऐसा वरदान प्राप्त कर लिया था, जिससे उसकी मृत्यु लगभग असंभव हो गई थी। उसने वरदान में कहा था कि वह न मनुष्य से मरेगा, न पशु से, न दिन में, न रात में, न घर के भीतर, न बाहर, न अस्त्र से, न शस्त्र से और न ही वर्ष के 12 महीनों में उसकी मृत्यु हो। वरदान मिलने के बाद वह अत्याचारी बन गया और उसने भगवान विष्णु की भक्ति पर रोक लगाने का प्रयास किया। लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त निकला। प्रह्लाद की रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए भगवान विष्णु ने अद्भुत लीला रची। मान्यता है कि भगवान ने सबसे पहले 12 महीनों को 13 महीनों में बदलकर अधिकमास बनाया, जिससे हिरण्यकश्यप का वरदान निष्प्रभावी हो गया। इसके बाद भगवान नृसिंह रूप में प्रकट हुए और संध्या समय देहरी पर अपने नाखूनों से हिरण्यकश्यप का वध कर दिया। यह कथा केवल धार्मिक विश्वास नहीं, बल्कि यह संदेश भी देती है कि अहंकार कितना भी बड़ा क्यों न हो, अंत में सत्य और धर्म की ही विजय होती है।

पुरुषोत्तम मास में क्यों बढ़ जाता है पुण्य?

धर्मशास्त्रों में इस महीने को तपस्या, आत्मसंयम और ईश्वर भक्ति का श्रेष्ठ समय माना गया है। ऐसा विश्वास है कि इस दौरान किया गया प्रत्येक शुभ कार्य कई गुना फल देता है। यही कारण है कि लोग इस महीने में विशेष रूप से दान, व्रत, भजन और सेवा कार्य करते हैं। इस मास में विशेष रूप से भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण और नृसिंह भगवान की पूजा का महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दौरान किए गए छोटे-से-छोटे पुण्य कार्य भी जीवन में सुख-समृद्धि और मानसिक शांति प्रदान करते हैं। कई लोग इस पूरे महीने में नियमित रूप से गीता पाठ, विष्णु सहस्रनाम और भागवत कथा का श्रवण भी करते हैं।

पुरुषोत्तम मास में क्या करना चाहिए?

पुरुषोत्तम मास को सात्विकता और संयम का महीना माना गया है। इस दौरान श्रद्धालु अपनी क्षमता और श्रद्धा के अनुसार विभिन्न नियमों का पालन करते हैं। माना जाता है कि इस समय मन, वचन और कर्म की शुद्धता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक होता है। लोग इस महीने में ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं और अधिक से अधिक समय भगवान की भक्ति में बिताने का प्रयास करते हैं। कई श्रद्धालु फलाहार, एक समय भोजन या व्रत भी रखते हैं। इसके अलावा गरीबों को दान देना, मंदिरों में दीपदान करना और तीर्थ यात्रा करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस महीने में क्रोध, झूठ, निंदा और नकारात्मक विचारों से दूर रहना चाहिए। इस खास महीने में केवल बाहरी पूजा ही नहीं, बल्कि मन की पवित्रता को भी उतना ही महत्व दिया गया है।

33 देवताओं की पूजा का विशेष महत्व

पुरुषोत्तम मास में 33 देवताओं की पूजा का भी विशेष महत्व बताया गया है। इनमें भगवान विष्णु के विभिन्न स्वरूप जैसे हरि, माधव, गोविंद, वामन, दामोदर, श्रीपति और नारायण शामिल हैं।

मान्यता है कि इन स्वरूपों की श्रद्धापूर्वक पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में सुख, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति आती है। यही कारण है कि इस महीने में विष्णु सहस्रनाम का पाठ और श्रीकृष्ण भक्ति को विशेष फलदायी माना गया है।

क्यों नहीं किए जाते मांगलिक कार्य?

पुरुषोत्तम मास में विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन और नए व्यवसाय की शुरुआत जैसे मांगलिक कार्य सामान्यतः नहीं किए जाते। इसका कारण यह है कि यह महीना सांसारिक भोग-विलास से अधिक आध्यात्मिक साधना और आत्मचिंतन के लिए समर्पित माना गया है।

हालांकि, पूजा-पाठ, यज्ञ, कथा, दान और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए यह समय अत्यंत शुभ माना गया है। संत-महात्मा इसे ईश्वर के निकट जाने और अपने जीवन को बेहतर बनाने का श्रेष्ठ अवसर बताते हैं।

वैज्ञानिक और ज्योतिषीय दृष्टि से भी खास है यह महीना

अधिकमास केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि भारतीय खगोल विज्ञान की अद्भुत समझ का उदाहरण भी है। भारतीय पंचांग में चंद्र और सौर गणना के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए यह अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है। यही वजह है कि हिंदू त्योहार ऋतुओं के अनुसार लगभग स्थिर बने रहते हैं। ज्योतिष शास्त्र में भी पुरुषोत्तम मास को मानसिक शुद्धि, कर्म सुधार और आध्यात्मिक ऊर्जा बढ़ाने वाला समय माना गया है। इस दौरान ध्यान और साधना करने से मन अधिक स्थिर और सकारात्मक होता है।

पुरुषोत्तम मास केवल आधिकारिक पूजा-पाठ का महीना नहीं, बल्कि जीवन को भीतर से बदलने का अवसर माना गया है।

Jyotsana Singh

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