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सावन में जरूर करें रुद्राष्टकम का पाठ, इन 8 श्लोकों में समाई है भगवान शिव की महिमा Rudrashtakam में
Rudrashtakam Stotram in Hindi: आज से सावनन शुरु हो गया है। इस सावन शिव की कृपा के लिए करें इस स्तोत्रम का पाठ, मतलब कि सावन में रुद्राष्टकम का पाठ भगवान शिव को शीघ्र प्रसन्न करने वाला माना जाता है। जानें रुद्राष्टकम का महत्व, इसके लाभ, कब करें पाठ और पढ़ें संपूर्ण रुद्राष्टकम हिंदी अर्थ सहित।
Rudrashtakam Stotram in Hindi: सावन का महीना शुरु हो गया और शिव मंदिरों शिव स्तुति मंत्र के साथ जलाभिषेक होने लगा है। भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे पवित्र है सावन। इस पूरे महीने में शिव जलाभिषेक, रुद्राभिषेक, महामृत्युंजय मंत्र और शिव स्तुति का पाठ करते हैं। इन्हीं में से एक अत्यंत प्रभावशाली स्तुति रुद्राष्टकमहै।
मान्यता है कि सावन में श्रद्धा और विश्वास के साथ रुद्राष्टकम का पाठ करने से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों पर अपनी कृपा बरसाते हैं।इससे मन को शांति मिलती है, नकारात्मक विचार दूर होते हैं और जीवन में आने वाली कई परेशानियों से राहत मिलने की भावना मजबूत होती है।
रुद्राष्टकम क्या है?
रुद्राष्टकम भगवान शिव की महिमा का वर्णन करने वाला 8 श्लोकों का प्रसिद्ध संस्कृत स्तोत्र है, जिसकी रचना महान संत गोस्वामी तुलसीदास ने की थी। इस स्तोत्र में भगवान शिव के निराकार, निर्गुण, दयालु और कल्याणकारी स्वरूप का सुंदर वर्णन है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसका नियमित पाठ करने से मन को शांति मिलती है, भय और तनाव दूर होते हैं तथा जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
लोकमान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीराम ने भी लंका विजय से पहले रामेश्वरम में भगवान शिव की आराधना की थी। तभी से शिव स्तुति और रुद्राष्टकम का महत्व और भी बढ़ गया। आज भी सावन के सोमवार, प्रदोष व्रत और महाशिवरात्रि पर लाखों शिव भक्त इसका पाठ करते हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने इस स्तोत्र में भगवान शिव के शांत, करुणामय, निराकार और कल्याणकारी स्वरूप का सुंदर चित्रण किया। 'रुद्र' भगवान शिव का एक स्वरूप है और 'अष्टकम' का अर्थ है आठ श्लोकों वाली स्तुति। इसलिए इसे रुद्राष्टकम कहा जाता है।
संपूर्ण रुद्राष्टकम (हिंदी अर्थ सहित)
1. नमामीशमीशान निर्वाणरूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपम्।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं
चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम्॥
अर्थ: मैं भगवान शिव को प्रणाम करता हूं, जो मोक्ष स्वरूप, सर्वव्यापी, वेदों के सार, निर्गुण, निराकार और पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त हैं।
2. निराकारमोंकारमूलं तुरीयं
गिरा ज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम्।
करालं महाकाल कालं कृपालं
गुणागार संसारपारं नतोऽहम्॥
अर्थ: मैं उन भगवान शिव को नमन करता हूं जो निराकार हैं, ओंकार के मूल हैं, महाकाल के भी महाकाल हैं, दयालु हैं और संसार से पार लगाने वाले हैं।
3. तुषाराद्रि सङ्काश गौरं गभीरं
मनोभूत कोटि प्रभा श्रीशरीरम्।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा
लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा॥
अर्थ: भगवान शिव का स्वरूप हिमालय जैसा उज्ज्वल है। उनके मस्तक पर गंगा विराजमान हैं, भाल पर चंद्रमा और गले में सर्प सुशोभित हैं।
4. चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं
प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं
प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥
अर्थ: मैं नीलकंठ, दयालु, प्रसन्न मुख वाले, बाघ की खाल धारण करने वाले और सभी के स्वामी भगवान शंकर की आराधना करता हूं।
5. प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं
अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम्।
त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं
भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम्॥
अर्थ: मैं माता पार्वती के स्वामी भगवान शिव को प्रणाम करता हूं, जो त्रिशूल धारण करने वाले, तेजस्वी और सभी दुखों का नाश करने वाले हैं।
6. कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी
सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी।
चिदानन्द सन्दोह मोहापहारी
प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥
अर्थ: हे भगवान शिव! आप कल्याणकारी हैं, भक्तों को आनंद देने वाले हैं और मोह का नाश करने वाले हैं। कृपया मुझ पर अपनी कृपा बनाए रखें।
7. न यावदुमानाथ पादारविन्दं
भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं
प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम्॥
अर्थ: जब तक मनुष्य भगवान शिव के चरणों की भक्ति नहीं करता, तब तक उसे सच्चा सुख और शांति प्राप्त नहीं होती।
8. न जानामि योगं जपं नैव पूजां
नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम्।
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं
प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो॥
अर्थ: हे भोलेनाथ! मैं विधि-विधान से पूजा करना नहीं जानता। मैं केवल आपको प्रणाम करता हूं। कृपया जन्म-मरण और दुखों से मेरी रक्षा करें।
फलश्रुति
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति॥
अर्थ: जो व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति के साथ रुद्राष्टकम का पाठ करता है, भगवान शिव उस पर प्रसन्न होकर अपनी कृपा बरसाते हैं।
सावन में रुद्राष्टकम का पाठ करने का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सावन में भगवान शिव की पूजा का विशेष फल मिलता है। ऐसे में रुद्राष्टकम का पाठ करने से भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त होता है।इसलिए-
भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है।
मन को शांति और सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।
भय, तनाव और नकारात्मकता कम होती है।
परिवार में सुख-शांति और सौहार्द बना रहता है।
आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग खुलता है।
आत्मविश्वास और मानसिक शक्ति बढ़ती है।
कहते है कि कि भगवान श्रीराम ने लंका विजय से पहले रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना कर भगवान शिव की आराधना की थी। इसी संदर्भ में रुद्राष्टकम का उल्लेख भी श्रद्धा के साथ किया जाता है।
रुद्राष्टकम का पाठ कब करना चाहिए?
रुद्राष्टकम का पाठ किसी भी दिन किया जा सकता है, लेकिन इन अवसरों पर इसका विशेष महत्व माना जाता है—
सावन के सोमवार,प्रदोष व्रत ,महाशिवरात्रि , मासिक शिवरात्रि,ब्रह्म मुहूर्त या सुबह स्नान के बाद, शिवलिंग के सामने दीपक जलाकर, रुद्राष्टकम का पाठ करते समय रखें इन बातों का ध्यान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।
भगवान शिव को जल, बेलपत्र और धतूरा अर्पित करें।
दीपक और धूप जलाकर शांत मन से पाठ करें।
जल्दबाजी में नहीं, बल्कि भाव और श्रद्धा के साथ प्रत्येक श्लोक का उच्चारण करें।
पाठ के बाद "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जाप करना भी शुभ माना जाता है।
रुद्राष्टकम के अंतिम श्लोक में कहा गया है कि जो व्यक्ति सच्ची श्रद्धा और भक्ति के साथ इस स्तोत्र का पाठ करता है, भगवान शिव उस पर शीघ्र प्रसन्न होते हैं और अपनी कृपा प्रदान करते हैं। भक्तों का विश्वास है कि नियमित पाठ से मन में भक्ति, जीवन में सकारात्मकता और भगवान शिव के प्रति अटूट आस्था बढ़ती है।
नोट : ये जानकारियां धार्मिक आस्था और मान्यताओं पर आधारित हैं। Newstrack.com इसकी पुष्टि नहीं करता है।इसे सामान्य रुचि को ध्यान में रखकर लिखा गया है


