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तीन तरह के पितर, 12 तरह के श्राद्ध..., जानें किस पितर के लिए कैसे करें तर्पण
Shraddha Pitru Paksha: प्राचीन काल से ही पितरों को तृप्तक रने के लिए श्राद्ध और तर्पण की परंपरा चली आ रही है। पुराणों में पितरों और श्राद्ध के कई प्रकार बताये गये है।
Shraddha Pitru Paksha
Shraddha Pitru Paksha: पितृपक्ष चल रहा है। इस दौरान पितरों को पिंडदान और तर्पण किया जाता है। हिंदू धर्म में श्राद्ध का अर्थ होता है श्रद्धा के साथ किया गया कार्य। प्राचीन काल से ही पितरों को तृप्तक रने के लिए श्राद्ध और तर्पण की परंपरा चली आ रही है। पुराणों में पितरों और श्राद्ध के कई प्रकार बताये गये है।
कितने प्रकार के होते है पितर?
हिंदू धर्म मान्यताओं के अनुसार पितृपक्ष के दौरान पितर अपने वंशजों के घर आते हैं और उन्हें अपना आशीर्वाद देते हैं। पितरों को देवताओं के बराबर का दर्जा दिया गया है। लेकिन यह बात सभी को पता होनी चाहिए कि आखिर पितर कितने तरह के होते हैं और किस पितर को पिंडदान करना है। पुराणों के मुताबिक पितरों तीन तरह के होते हैं। नित्य पितर, नैमित्तिक और साप्तमिक पितर।
नित्य पितरः नित्य पितर वह होते हैं जिनका श्राद्ध और तर्पण नियमित रुप से किया जता है। विष्णु पुराण के मुताबिक जो पितर अपने वंशजों से आत्मा की शांति के लिए निरंतर तर्पण की अपेक्षा करते हैं। उन्हें ही नित्य पितर कहा जाता है। यह प्रकृति के जड़-चेतन और हर जीवधारी के शरीर का निर्माण करते हैं। इन पितरों को ईश्वर का स्थान मिला हुआ है। इन पितरों के तर्पण से वंश की रक्षा होती है। ब्रह्म पुराण में भी इसका जिक्र मिलता है।
नैमित्तिक पितरः इन पितरों का विशेष अवसरों पर तर्पण किया जाता है। जैसे विशेष घटनाओं या फिर मृत्यु की तिथि। स्कंद पुराण में नैमित्तिक पितरों को हविर्भुज (अग्नि में अर्पित किये गये भोजन को ग्रहण करने वाले) कहा गया है। वहीं मनु स्मृति में इन्हें आज्यपा (घी से हवि ग्रहण करने वाले) माना गया है। जोकि चार वर्णो की तरह चार रूपों में बांटे गये हैं। सोमपा, हविर्भुज, आज्यपा और सुकालिन।
साप्तमिक पितरः भविष्ण और मत्स्य पुराण में साप्तमिक पितरों का वर्णन मिलता है। यह विशेष साप्ताहिक अवसरों या साप्ताहिक से जुड़े पितर होते है। यह पितर सपिण्डन (मृत्यु के बाद की प्रक्रिया) के बाद पितृ योनी में चले जाते हैं। इन्हें शिव गणों की तरह मान्यता मिली है।
इसी तरह पुराणों में 12 तरह के श्राद्ध बताए गए हैं, जो विभिन्न अवसरों पर आधारित हैं। मत्स्य पुराण में 3, स्मृतिग्रंथ में 5 और भविष्य पुराण में तो करीब 96 ऐसे अवसर बताये गये हैं। जिनमें यह श्राद्ध किया जा सकता है, इनमें अमावस्या और पूर्णिमा भी शामिल हैं। पौराणिक वर्णन के आधार पर 12 तरह के श्राद्ध का वर्णन किया गया है।
नित्य श्राद्धः यह श्राद्ध हर दिन किया जाता है। जिसमें जल, दूध, तिल आदि से पितरों का तर्पण होता है। विष्णु पुराण में इसे विशेष महत्व दिया गया है।
काम्य श्राद्धः संतान प्राप्ति या फिर उसके स्वास्थ्य के लिए पितरों से आशीर्वाद मांगने को किया गया श्राद्ध काम्य श्राद्ध कहा जाता है। इसे इच्छा पूर्ति भी माना जाता है। भागवत पुराण में इस श्राद्ध का जिक्र है।
नैमित्तिक श्राद्धः विशेष अवसरों पर किया जाने वाला श्राद्ध जैसे पुत्र मृत्यु तिथि पर किया जाता है। ब्रह्म और शिव पुराण में इसे देवताओं को समर्पित श्राद्ध बताया गया है।
वृद्धि श्राद्धः यह श्राद्ध परिवार में वृद्धि के लिए किया जाता है। जैसे विवाह के समय पितरों की पूजा को वृद्धि श्राद्ध कहा गया है। मत्स्य पुराण में इसका वर्णन मिलता है।
सपिण्डन श्राद्धः किसी भी व्यक्ति की मृत्यु हो जाने के बाद सपिण्डन संस्कार के समय यह श्राद्ध किया जाता है। इस श्राद्ध का वर्णन नारद पुराण में विस्तार से किया गया है।
गोष्ठी श्राद्धः यह बेहद विशेष श्राद्ध है और समूह में ही किया जाता है। गोष्ठी श्राद्ध कम ही किया जाता है।
पार्वण श्राद्धः यह पितृ पक्ष के दौरान किया जाने वाला मुख्य श्राद्ध है। इसका जिक्र सभी पुराणों में मिलता है। वामन पुराण इसका वर्णन विस्तार से किया गया है।
प्रेत श्राद्धः प्रेत योनि में फंसे पितरों के लिए किये जाने वाला यह श्राद्ध विशेष महत्व रखता है। इस श्राद्ध पुरोहित या फिर ज्योतिष के सुझाव के बिना नहीं की जा सकती है।
दैविक श्राद्धः यह श्राद्ध देवताओं से जुड़ा हुआ है।
यात्रार्थ श्राद्धः यात्रा के समय इस श्राद्ध का जिक्र किया गया है।
कर्मांग श्राद्धः कर्मों के अंग के आधार पर इस श्राद्ध का वर्णन किया गया है।
पुष्टयर्थ श्राद्धः पितरों से आशीर्वाद लेने, पोषण और शक्ति के लिए यह श्राद्ध किया जाता है।


