AI Business Tips: बिना बड़ी पूंजी के बिजनेस कैसे शुरू किया जा सकता है? राजीव दुबे ने AI पर क्या कहा

AI Business Tips: अमेरिका में लंबे समय से कारोबार कर रहे राजीव दुबे के अनुसार सफल कारोबारी वह नहीं है जो बाजार बदलने के बाद अपनी रणनीति बदले, बल्कि वह है जो बदलाव के संकेत पहले पहचानकर तैयारी शुरू कर दे।

Yogesh Mishra
Published on: 4 Oct 2026 6:47 PM IST
AI Business Tips Interview Rajeev Dubey | AI Se Business Kaise Kaise Shuru Karen | Newstrack Hindi
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AI Business Tips Interview Rajeev Dubey | AI Se Business Kaise Kaise Shuru Karen | Newstrack Hindi

AI Business Tips: दुनिया में कारोबार का इतिहास केवल उन कंपनियों की कहानी नहीं है जिन्होंने सही उत्पाद बनाया या सही समय पर निवेश किया। बल्कि उन लोगों की कहानी भी है जिन्होंने बदलते समय के संकेत दूसरों से पहले पढ़ लिए। तकनीक बदलती है। उपभोक्ता की जरूरतें बदलती हैं। सरकारों की नीतियाँ बदलती हैं, युद्ध और आर्थिक संकट आते हैं।कभी कोई नई तकनीक देखते-देखते पूरे उद्योग की कार्यप्रणाली बदल देती है। ऐसे में सफल कारोबारी वह नहीं है, जो हर संकट से बच जाए।क्योंकि यह संभव ही नहीं है। बल्कि वह है जो संकट आने से पहले अपने कारोबार को इतना लचीला बना ले कि बदलती परिस्थितियों में वह केवल बचा न रहे। बल्कि नए अवसर भी तलाश सके। अमेरिका के ओहायो में स्थित अमेरिकन बिजनेस सॉल्यूशंस इंक. के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी राजीव दुबे की कारोबारी यात्रा इसी सोच का उदाहरण है। उनकी सबसे महत्वपूर्ण सीख सीधी है—समझदार कारोबारी बाजार के बदल जाने के बाद अपनी रणनीति नहीं बदलता।वह बाजार किस ओर जा रहा है, इसे पहले समझने की कोशिश करता है।

राजीव दुबे की कहानी इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि यह अचानक मिली कारोबारी सफलता की कहानी नहीं है। उपलब्ध कारोबारी अभिलेखों के अनुसार अमेरिकन बिजनेस सॉल्यूशंस की स्थापना 1998 में हुई थी।यह कंपनी आज भी ओहायो के लुईस सेंटर से संचालित होती है। कंपनी सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं और सॉफ्टवेयर समाधान के क्षेत्र में काम करती है। अमेरिका के Better Business Bureau में भी राजीव दुबे को कंपनी का संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी दर्ज किया गया है, जबकि Inc. की कारोबारी प्रोफाइल में कंपनी को 2016 की Inc. 5000 सूची में शामिल बताया गया है। कंपनी स्वयं बैंकिंग और वित्त, बीमा, सार्वजनिक क्षेत्र, शिक्षा, दूरसंचार, परिवहन और खुदरा जैसे क्षेत्रों में तकनीकी सेवाएँ देने की बात करती है। यानी जिस छोटे और सतर्क कदम से यह यात्रा शुरू हुई थी, वह समय के साथ एक लंबे कारोबारी अनुभव में बदल गई।

भारत से अमेरिका और नौकरी से कारोबार तक

राजीव दुबे 1993 में भारत से अमेरिका पहुँचे। उनकी शुरुआत एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में हुई। लगभग पाँच वर्षों के भीतर वह उपाध्यक्ष के स्तर तक पहुँचे। इसके बाद उन्होंने नौकरी की सुरक्षित दुनिया छोड़कर उद्यमिता की राह चुनी। लेकिन उनकी कहानी उस लोकप्रिय कारोबारी धारणा से अलग है, जिसमें सफलता को अक्सर बहुत बड़ा जोखिम उठाने, भारी पूंजी लगाने और तेजी से विस्तार करने से जोड़ दिया जाता है। दुबे स्वयं स्वीकार करते हैं कि वह कभी बहुत बड़े जोखिम लेने वाले व्यक्ति नहीं रहे। जब उन्होंने अपना कारोबार शुरू किया तो उनके पास लगाने के लिए बड़ी पूंजी नहीं थी। इसलिए कंपनी को एक झटके में बड़ा बनाने के बजाय उन्होंने छोटे-छोटे कदम उठाए, संपर्क बनाए, ग्राहकों का विश्वास अर्जित किया और धीरे-धीरे अपना कारोबारी दायरा बढ़ाया।


यह अनुभव आज के स्टार्टअप दौर में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। पिछले कुछ वर्षों में उद्यमिता की चर्चा अक्सर इस तरह हुई है मानो कंपनी बनाने का अर्थ पहले निवेश जुटाना, फिर तेजी से विस्तार करना और उसके बाद लाभ के बारे में सोचना हो। लेकिन दुनिया में लाखों सफल कारोबार इसके उलट रास्ते से बने हैं—पहले ग्राहक, फिर आय, उसके बाद विस्तार। दुबे की कारोबारी सोच इसी दूसरे मॉडल के करीब दिखाई देती है। पूंजी की कमी ने उनकी गति भले धीमी रखी। लेकिन इसने उन्हें अनुशासन सिखाया। जब हर नया कर्मचारी, नया कार्यालय या नया निवेश अपनी कमाई से करना हो तो कारोबारी निर्णय अधिक सावधानी से लिए जाते हैं। इस मॉडल में गलत फैसले की गुंजाइश कम होती है।लेकिन टिकाऊ कारोबार बनने की संभावना बढ़ सकती है।

जिस कारोबार को समझते हों, शुरुआत वहीं से करें

नए उद्यमियों को लेकर दुबे की एक और महत्वपूर्ण सलाह है कि केवल इसलिए किसी क्षेत्र में प्रवेश नहीं करना चाहिए कि वहाँ अचानक बहुत पैसा दिखाई दे रहा है। बेहतर रास्ता यह है कि व्यक्ति पहले उस क्षेत्र से कारोबार शुरू करे जिसे वह समझता है। दुबे स्वयं सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र से आए थे, इसलिए उनकी पहली कंपनी भी इसी क्षेत्र में बनी। होटल और रियल एस्टेट जैसे दूसरे कारोबारों में उन्होंने बाद में प्रवेश किया, जब उन क्षेत्रों के बारे में पर्याप्त जानकारी, अनुभव और संपर्क विकसित हो चुके थे।

इसमें उद्यमिता का एक बुनियादी सिद्धांत छिपा है। बाजार में अवसर पहचानना और किसी कारोबार को चलाना दो अलग क्षमताएँ हैं। बाहर से कोई उद्योग बहुत लाभकारी दिखाई दे सकता है। लेकिन उसकी आपूर्ति शृंखला, ग्राहक व्यवहार, लागत संरचना, नियम-कानून और प्रतिस्पर्धा को समझे बिना उसमें निवेश करना बहुत महंगा प्रयोग साबित हो सकता है। दुबे इसलिए पहले किसी क्षेत्र में दूसरों के साथ काम करने, उसे समझने और उसके बाद स्वतंत्र निवेश करने को अधिक व्यावहारिक मानते हैं। उनका अपना उद्यमी बनने का निर्णय भी केवल पैसा कमाने की इच्छा से नहीं आया था। बल्कि यह देखने की इच्छा से आया कि अपनी क्षमता को वह कितनी दूर तक ले जा सकते हैं।

बाजार के अच्छे दिन हमेशा नहीं रहते

राजीव दुबे ने सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग का वह दौर देखा है जब Y2K, इंटरनेट कंपनियों के उभार और दुनिया भर में बढ़ते तकनीकी खर्च ने इस क्षेत्र में असाधारण अवसर पैदा किए। मांग इतनी तेजी से बढ़ी कि आईटी से बाहर के लोग भी इस उद्योग की ओर आकर्षित हुए। लेकिन किसी भी तेजी से बढ़ते बाजार के साथ एक लगभग सार्वभौमिक नियम जुड़ा होता है—जहाँ असाधारण मुनाफा दिखाई देता है, वहाँ नए प्रतिस्पर्धी बहुत तेजी से आते हैं। धीरे-धीरे बाजार में भीड़ बढ़ती है। कीमतों पर दबाव आता है और जो अवसर कभी असाधारण दिखाई देता था, वह सामान्य कारोबार में बदलने लगता है।


यहीं दुबे कारोबारियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण चेतावनी देते हैं। अर्थव्यवस्था और उद्योग सीधी रेखा में नहीं चलते। उनमें तेजी और मंदी के चक्र आते हैं। इसलिए किसी कंपनी को केवल यह नहीं देखना चाहिए कि उसका कारोबार आज कितना अच्छा चल रहा है। उसे यह भी पूछते रहना चाहिए कि पाँच वर्ष बाद उसके ग्राहक किस चीज के लिए भुगतान करेंगे। यदि किसी उद्योग में प्रवेश की बाधाएँ कम हो रही हैं, प्रतिस्पर्धी तेजी से बढ़ रहे हैं, तकनीक पुराने काम को सस्ता कर रही है या ग्राहक की जरूरत बदल रही है तो ये भविष्य के संकेत हैं। जब बदलाव कंपनी की आय और मुनाफे में साफ दिखाई देने लगे, तब अक्सर रणनीति बदलने में देर हो चुकी होती है।

एआई केवल नई तकनीक नहीं, कारोबार की लागत का नया गणित

आज इसी तरह का सबसे बड़ा परिवर्तन कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई के कारण दिखाई दे रहा है। दुबे इसे केवल एक नई तकनीकी लहर के रूप में नहीं देखते। उनके अनुसार शुरुआती दौर में कंपनियों को एआई पर अधिक पैसा खर्च करना पड़ेगा। क्योंकि उन्हें नई प्रणालियाँ खरीदनी होंगी। अपने पुराने ढाँचे से जोड़ना होगा और कर्मचारियों को प्रशिक्षित करना होगा। लेकिन कंपनियाँ यह खर्च इसलिए करेंगी क्योंकि अंततः उनका उद्देश्य उत्पादकता बढ़ाना और लागत कम करना होगा।

सॉफ्टवेयर उद्योग का उदाहरण इस बदलाव को आसानी से समझाता है। लगभग तीन दशक पहले एक ही प्रोग्रामर कई बार समस्या के विश्लेषण से लेकर डिजाइन, कोड लिखने, परीक्षण, उसे लागू करने और बाद में रखरखाव तक कई जिम्मेदारियाँ संभालता था। उद्योग बड़ा हुआ तो यही काम अलग-अलग विशेषज्ञों में बँटते चले गए—विश्लेषक, डेवलपर, गुणवत्ता परीक्षण विशेषज्ञ और परियोजना प्रबंधक जैसी भूमिकाएँ विकसित हुईं। अब एआई इस प्रक्रिया को एक बार फिर उलटी दिशा में ले जा सकता है। जो काम पहले कई लोगों की टीम करती थी, उसका बड़ा हिस्सा एआई उपकरणों से लैस एक या दो कुशल लोग कर सकते हैं।

लेकिन यहाँ एक सावधानी जरूरी है। इसका अर्थ यह मान लेना नहीं होना चाहिए कि पाँच कर्मचारियों का काम निश्चित रूप से एक व्यक्ति करेगा और बाकी चार नौकरियाँ समाप्त हो जाएँगी। 2026 में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की उपलब्ध शोध-समीक्षा बताती है कि एआई से उत्पादकता में वास्तविक सुधार दिखाई दे रहा है। लेकिन इसका असर असमान है और अभी बड़े पैमाने पर रोजगार समाप्त होने के ठोस प्रमाण सीमित हैं। चिंता खासकर युवा और शुरुआती स्तर के कर्मचारियों के अवसरों को लेकर अधिक है। अमेरिका के स्टैनफोर्ड डिजिटल इकोनॉमी लैब ने भी 2026 के अपने अद्यतन अध्ययन में अर्थव्यवस्था भर में व्यापक रोजगार विस्थापन नहीं पाया।लेकिन एआई के अधिक प्रभाव वाले व्यवसायों में युवा कर्मचारियों के रोजगार पर दबाव बढ़ने के संकेत दर्ज किए।

सॉफ्टवेयर विकास में तस्वीर और भी रोचक है। सितंबर 2026 में संशोधित एक NBER अध्ययन ने पाँच लाख से अधिक सॉफ्टवेयर डेवलपरों के आँकड़ों का अध्ययन किया। उसमें पाया गया कि उन्नत एआई कोडिंग उपकरणों से कोड संबंधी गतिविधि में बहुत बड़ी वृद्धि संभव हुई। लेकिन यही वृद्धि अंतिम उत्पाद या वास्तविक रिलीज तक पहुँचते-पहुँचते काफी कम हो गई। इसका अर्थ है कि एआई मनुष्य की उत्पादकता कई गुना बढ़ा सकता है। लेकिन कंपनी चलाने की पूरी प्रक्रिया केवल कोड लिखने से पूरी नहीं होती—निर्णय, समन्वय, गुणवत्ता, ग्राहक की जरूरत और अंतिम जिम्मेदारी में मनुष्य की भूमिका बनी रहती है।

केवल ‘एआई का कारोबार’ खोजने की भूल न करें

दुबे की एआई संबंधी सोच का शायद सबसे उपयोगी हिस्सा यह है कि वह लोगों को केवल ‘एआई में कुछ करने’ की दौड़ में शामिल होने की सलाह नहीं देते। उनके अनुसार बेहतर सवाल यह है कि एआई किस वास्तविक उद्योग की कौन-सी समस्या हल कर सकता है? तकनीक अपने आप में तभी स्थायी कारोबार बनती है जब वह किसी वास्तविक जरूरत से जुड़ती है।

इसलिए आने वाले वर्षों में सबसे मजबूत कंपनियाँ जरूरी नहीं कि वे हों जिनके नाम में एआई लगा हो। वे अस्पतालों के कामकाज को अधिक कुशल बनाने वाली कंपनियाँ हो सकती हैं। बीमा दावों की प्रक्रिया तेज करने वाले मंच हो सकते हैं। बैंकिंग धोखाधड़ी पकड़ने वाली प्रणालियाँ हो सकती हैं, दवाओं और रोग निदान में सहायता देने वाले समाधान हो सकते हैं या वृद्ध लोगों की देखभाल को बेहतर बनाने वाली सेवाएँ हो सकती हैं। तकनीक तब आर्थिक मूल्य पैदा करती है, जब वह समय बचाए। लागत घटाए, गुणवत्ता बढ़ाए या किसी ऐसी समस्या को हल करे जिसके समाधान के लिए ग्राहक वास्तव में भुगतान करना चाहता है।

स्वास्थ्य सेवा बन सकती है अगला बड़ा अवसर

इसी कारण राजीव दुबे स्वास्थ्य सेवा को अगले दो-तीन वर्षों और उससे आगे के लिए महत्वपूर्ण कारोबारी क्षेत्रों में देखते हैं। इसके पीछे केवल तकनीकी संभावना नहीं बल्कि अमेरिका की जनसांख्यिकी भी है। अमेरिकी जनगणना ब्यूरो के अनुसार 2030 तक बेबी बूम पीढ़ी के सभी लोग 65 वर्ष से अधिक उम्र के हो जाएंगे और लगभग हर पाँच में से एक अमेरिकी सेवानिवृत्ति की उम्र में होगा।वृद्ध होती आबादी का असर पहले से दिखाई भी दे रहा है। जनगणना ब्यूरो के आँकड़ों के अनुसार 2013 से 2020 के बीच बुजुर्गों के लिए सहायक आवास सुविधाओं के राजस्व में 34.4 प्रतिशत और घरेलू स्वास्थ्य सेवाओं के राजस्व में 50.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी।

यही वह क्षेत्र है जहाँ दुबे एआई और मानव श्रम के बीच प्रतिस्पर्धा के बजाय दोनों के मेल की बड़ी संभावना देखते हैं। एआई अस्पतालों में प्रशासनिक प्रक्रियाएँ तेज कर सकता है। रोगी अभिलेखों का विश्लेषण कर सकता है। चिकित्सकों को निर्णय लेने में सहायता दे सकता है। कर्मचारियों का समय बचा सकता है और देखभाल की लागत घटाने में मदद कर सकता है। लेकिन वृद्ध व्यक्ति की देखभाल, नर्सिंग, पुनर्वास, मानसिक सहारा और प्रत्यक्ष मानवीय संपर्क को पूरी तरह मशीन के हवाले नहीं किया जा सकता। इसलिए स्वास्थ्य सेवा उन क्षेत्रों में से हो सकती है जहाँ तकनीक रोजगार को केवल समाप्त करने के बजाय उसकी प्रकृति बदल देगी।

अनिश्चितता से डरना नहीं, उसके लिए पैसा और गुंजाइश बचाकर रखना जरूरी

आज कारोबारी दुनिया के सामने केवल एआई का बदलाव नहीं है। युद्ध, व्यापारिक तनाव, शुल्क, आपूर्ति शृंखला में व्यवधान, ब्याज दरों का उतार-चढ़ाव, आव्रजन नीतियाँ और अचानक बदलते सरकारी नियम किसी भी कंपनी की योजना प्रभावित कर सकते हैं। दुबे का मानना है कि अनिश्चितता कोई असाधारण परिस्थिति नहीं बल्कि कारोबार की स्थायी वास्तविकता है। कोई कारोबारी अगला युद्ध या अगला वैश्विक संकट नहीं बता सकता। लेकिन वह इतना जरूर कर सकता है कि संकट आने पर उसके पास नकदी, संचालन क्षमता और रणनीति बदलने की गुंजाइश हो।

यही कारण है कि वह पर्याप्त वित्तीय संसाधन और परिचालन लचीलापन बनाए रखने को महत्वपूर्ण मानते हैं। अत्यधिक कर्ज, बहुत तेजी से किया गया विस्तार और एक ही ग्राहक या बाजार पर निर्भरता अच्छे समय में लाभ बढ़ा सकती है। लेकिन संकट में यही चीजें कंपनी की सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती हैं। दूसरी ओर नकदी सुरक्षित रखने, खर्च को नियंत्रित रखने, कई तरह के ग्राहकों और क्षेत्रों में उपस्थिति बनाने और नई परिस्थितियों के अनुसार तेजी से दिशा बदलने वाली कंपनी संकट में भी अवसर तलाश सकती है। दुबे के अनुसार खतरे और अवसर अक्सर साथ-साथ आते हैं। फर्क केवल इतना होता है कि कौन उनके आने से पहले तैयार था।

क्या अमेरिका में भारतीयों के लिए अब भी अवसर हैं?

अमेरिका में आव्रजन को लेकर लगातार चलने वाली राजनीतिक बहस और सोशल मीडिया पर फैलने वाली आशंकाओं के बीच दुबे का अनुभव अपेक्षाकृत संतुलित तस्वीर पेश करता है। वह मानते हैं कि अमेरिका में सही कौशल और अनुभव वाले लोगों के लिए अब भी पर्याप्त अवसर है। लेकिन आज अमेरिका को केवल ‘नौकरी पाने की जगह’ मानकर जाना पर्याप्त रणनीति नहीं है। व्यक्ति को यह पता होना चाहिए कि वह कौन-सा कौशल लेकर जा रहा है, किस उद्योग में उसकी मांग है, किस कंपनी या अवसर को लक्ष्य बना रहा है और अगले कुछ वर्षों में उस कौशल की उपयोगिता किस दिशा में जाएगी।

यह अंतर महत्वपूर्ण है। तीन दशक पहले किसी खास तकनीकी कौशल का ज्ञान अपने आप में बड़ा लाभ हो सकता था। आज तकनीक इतनी तेजी से बदल रही है कि एक बार सीखा हुआ कौशल पूरे करियर की गारंटी नहीं दे सकता। एआई इस परिवर्तन को और तेज कर रहा है। इसलिए भविष्य का सफल पेशेवर वह होगा जो केवल किसी सॉफ्टवेयर या तकनीक को चलाना नहीं जानता। बल्कि समस्या को समझता है। नई तकनीक जल्दी सीख सकता है और अपने क्षेत्र के ज्ञान के साथ एआई का इस्तेमाल करना जानता है।

आव्रजन पर दुबे की सलाह भी व्यावहारिक है। सोशल मीडिया पर नीतिगत बदलावों को कई बार इस तरह प्रस्तुत किया जाता है जैसे अमेरिका में विदेशी पेशेवरों के लिए सारे रास्ते बंद हो रहे हों। वास्तविकता अधिक जटिल है। नीतियाँ बदल सकती हैं। नियम कठोर या उदार हो सकते हैं। अलग-अलग वीजा श्रेणियों पर अलग प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए अफवाहों की जगह सही दस्तावेज, वैध अवसर और अद्यतन नियमों के आधार पर निर्णय लेना अधिक महत्वपूर्ण है। अमेरिका स्वयं भी वृद्ध होती आबादी और बदलती श्रम संरचना से गुजर रहा है। अमेरिकी जनगणना ब्यूरो की जनसंख्या परियोजनाएँ बताती हैं कि आने वाले दशकों में अंतरराष्ट्रीय प्रवासन देश की जनसंख्या वृद्धि में और महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

आने वाले कारोबारी दौर का असली मंत्र—तकनीक के साथ क्षेत्र विशेषज्ञता

राजीव दुबे की तीन दशक से अधिक लंबी अमेरिकी यात्रा को केवल एक भारतीय पेशेवर की सफलता की कहानी के रूप में पढ़ना शायद इसके सबसे महत्वपूर्ण हिस्से को छोड़ देना होगा। इसका बड़ा सबक यह है कि किसी एक तकनीक, उद्योग या तेजी के दौर को स्थायी मान लेना कारोबारी भूल है। सूचना प्रौद्योगिकी ने असाधारण अवसर दिए। फिर उसमें प्रतिस्पर्धा बढ़ी। अब एआई उसी उद्योग की लागत, रोजगार और उत्पादकता का गणित बदल रहा है। लेकिन एआई भी अंतिम मंजिल नहीं है। इसके बाद कोई दूसरी तकनीक आएगी और कारोबार फिर बदलेगा।

इसलिए आने वाले वर्षों में सबसे महत्वपूर्ण क्षमता शायद किसी एक तकनीक में महारत नहीं। बल्कि बदलाव को पहचानने और उसके अनुसार स्वयं को ढालने की क्षमता होगी। कारोबारी के लिए इसका अर्थ है कि वह लगातार अपने बाजार को पढ़े, अपने ग्राहकों की बदलती जरूरतों को समझे। अनावश्यक कर्ज और खर्च से बचे। नकदी और परिचालन गुंजाइश बनाए रखे और नई तकनीक को केवल फैशन समझकर नहीं बल्कि वास्तविक कारोबारी समस्या के समाधान के रूप में अपनाए। पेशेवरों के लिए इसका अर्थ है कि वे अपने मूल क्षेत्र का ज्ञान गहरा करें और एआई को उस ज्ञान का प्रतिस्पर्धी मानने के बजाय अपनी क्षमता बढ़ाने के औजार में बदलें।

राजीव दुबे की सोच का सार शायद एक वाक्य में समेटा जा सकता है—बाजार में सबसे सुरक्षित वह नहीं है जो आज सबसे मजबूत है, बल्कि वह है जो कल की दिशा को आज पहचान रहा है। कारोबार में भविष्य को पूरी तरह देख पाना संभव नहीं है। लेकिन उसके संकेत पढ़े जा सकते हैं। एआई, वृद्ध होती आबादी, स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती मांग और तेजी से बदलता वैश्विक आर्थिक वातावरण ऐसे ही संकेत हैं। जो कंपनियाँ इन बदलावों के आने का इंतजार करेंगी, उन्हें बाद में अपने अस्तित्व के लिए बदलना पड़ सकता है। जो इन्हें पहले समझेंगी, उनके लिए यही बदलाव अगले बड़े कारोबारी अवसर का दरवाजा खोल सकता है।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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