New Bill 2026: जन्म-मृत्यु पंजीकरण कानून में बड़ा बदलाव, अब देर से रजिस्ट्रेशन कराना होगा मुश्किल

Birth-Death Registration Amendment Bill 2026: केंद्र सरकार के नए जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण संशोधन विधेयक 2026 में क्या बदला? देर से रजिस्ट्रेशन पर क्या होंगे नए नियम और आम लोगों पर इसका क्या असर पड़ेगा, जानिए पूरी जानकारी।

Neel Mani Lal
Published on: 31 July 2026 7:28 PM IST
Birth-Death Registration Amendment Bill 2026
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Birth-Death Registration Amendment Bill 2026

Birth-Death Registration Amendment Bill 2026: जन्म और मृत्यु का पंजीकरण एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। इसे सिर्फ एक मामूली लिखापढ़ी समझना भारी भूल है। ये सिर्फ एक कागजी कार्रवाई नहीं होते बल्कि किसी व्यक्ति की कानूनी पहचान, नागरिक अधिकारों और सरकारी योजनाओं का आधार होते हैं। इसी व्यवस्था को और ज्यादा पारदर्शी तथा भरोसेमंद बनाने के लिए केंद्र सरकार ‘पंजीकरण जन्म एवं मृत्यु (संशोधन) विधेयक, 2026’ लेकर आई है।

सरकार का कहना है कि नए संशोधन का मुख्य उद्देश्य जन्म और मृत्यु के समय पर रजिस्ट्रेशन को बढ़ावा देना, फर्जी प्रमाणपत्रों पर रोक लगाना और नागरिक रिकॉर्ड की विश्वसनीयता बढ़ाना है। लेकिन कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इससे देर से पंजीकरण कराने वाले लोगों के लिए प्रक्रिया पहले से अधिक कठिन हो सकती है।

क्या है नया बदलाव?

मौजूदा व्यवस्था में अगर जन्म या मृत्यु का रजिस्ट्रेशन निर्धारित समय सीमा के काफी बाद कराया जाता है, तो अलग-अलग स्तर की अनुमति लेकर यह प्रक्रिया पूरी की जा सकती है। लेकिन नए विधेयक में सबसे बड़ा बदलाव यह प्रस्तावित किया गया है कि अगर जन्म या मृत्यु की घटना के दो साल से ज्यादा समय बाद पंजीकरण कराया जाता है, तो सिर्फ प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश पर ही उसका पंजीकरण किया जा सकेगा।

पहले कई राज्यों में ऐसे मामलों में एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट या अन्य प्रशासनिक अधिकारियों की अनुमति से भी पंजीकरण संभव था। लेकिन अब ऐसा नहीं हो सकेगा। सरकार का मानना है कि न्यायिक जांच से फर्जी दस्तावेज तैयार कराने की संभावना कम होगी।

सरकार को बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी?

गृह मंत्रालय का कहना है कि जन्म प्रमाणपत्र अब सिर्फ जन्म का रिकॉर्ड नहीं रह गया है। यह स्कूल में प्रवेश, पासपोर्ट, आधार, मतदाता सूची, सरकारी नौकरी, सामाजिक कल्याण योजनाओं और कई अन्य सरकारी सेवाओं में पहचान का महत्वपूर्ण दस्तावेज बन चुका है। इसी तरह मृत्यु प्रमाणपत्र संपत्ति के उत्तराधिकार, बीमा दावों, बैंक खातों के निपटान और सरकारी रिकॉर्ड अपडेट करने के लिए आवश्यक होता है।

सरकार का तर्क है कि बरसों बाद बिना पर्याप्त जांच के जन्म या मृत्यु का पंजीकरण होने से फर्जी पहचान, अवैध दस्तावेज और धोखाधड़ी की आशंका बढ़ जाती है। इसलिए देर से होने वाले पंजीकरण की प्रक्रिया को अधिक सख्त बनाया जा रहा है।

आम लोगों पर क्या होगा असर?

अगर किसी परिवार में बच्चे का जन्म या किसी व्यक्ति की मृत्यु होने के बाद समय पर पंजीकरण करा दिया जाता है, तो इस संशोधन का उन पर लगभग कोई अतिरिक्त प्रभाव नहीं पड़ेगा। लेकिन अगर कोई व्यक्ति कई साल बाद जन्म प्रमाणपत्र बनवाना चाहता है या किसी पुरानी मृत्यु का रिकॉर्ड दर्ज कराना चाहता है, तो अब उसे न्यायिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है। इससे समय, दस्तावेज और कानूनी औपचारिकताएं पहले की तुलना में बढ़ सकती हैं।

क्या समय पर पंजीकरण पहले जैसा ही रहेगा?

समय पर रजिस्ट्रेशन करवाने में कोई बदलाव नहीं किया गया है। नए विधेयक का उद्देश्य समय पर होने वाले पंजीकरण की प्रक्रिया को कठिन बनाना नहीं है। भारत में जन्म और मृत्यु का पंजीकरण अब भी निर्धारित समय सीमा के भीतर स्थानीय रजिस्ट्रार, नगर निकाय, ग्राम पंचायत या अस्पताल के माध्यम से सामान्य प्रक्रिया के अनुसार कराया जा सकता है। बदलाव मुख्य रूप से बहुत अधिक देरी से होने वाले पंजीकरण पर केंद्रित है।

पहले से हुए डिजिटल बदलाव भी रहेंगे लागू

यह संशोधन 2023 में लागू किए गए व्यापक सुधारों के बाद आया है, जिनके तहत जन्म और मृत्यु पंजीकरण को राष्ट्रीय डिजिटल डेटाबेस से जोड़ा गया था। जन्म प्रमाणपत्र को कई सरकारी सेवाओं के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज का दर्जा दिया गया और डिजिटल प्रमाणपत्र जारी करने की व्यवस्था भी शुरू की गई। सरकार अब इस डिजिटल प्रणाली को और अधिक विश्वसनीय बनाना चाहती है ताकि राष्ट्रीय नागरिक रिकॉर्ड अधिक सटीक और अद्यतन रहे।

क्या हैं इस कानून के संभावित फायदे?

सरकार का मानना है कि इस संशोधन से फर्जी जन्म प्रमाणपत्र और मृत्यु प्रमाणपत्र बनवाने के मामलों पर अंकुश लगेगा। सरकारी रिकॉर्ड अधिक विश्वसनीय होंगे और स्कूल, पासपोर्ट, चुनाव, सामाजिक योजनाओं तथा अन्य सरकारी सेवाओं में एक समान और प्रमाणिक डेटा उपलब्ध होगा। इससे नागरिक पहचान प्रणाली भी मजबूत होगी। दूसरी तरफ कुछ कानूनी विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि देश के दूरदराज और आदिवासी इलाकों में आज भी कई जन्म और मृत्यु समय पर दर्ज नहीं हो पाते। ऐसे में यदि दो वर्ष बाद हर मामले में न्यायिक मजिस्ट्रेट की अनुमति अनिवार्य हो जाती है, तो गरीब और ग्रामीण परिवारों के लिए प्रक्रिया अधिक जटिल और खर्चीली हो सकती है। इसलिए उनका सुझाव है कि वास्तविक मामलों में प्रक्रिया को सरल और सुलभ बनाए रखने की व्यवस्था भी साथ-साथ विकसित की जाए।

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