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BRICS Summit 2026: BRICS के पास 4 अरब लोग, 6,000+ परमाणु हथियार… अगर एक देश होता तो कितनी बड़ी ताकत बनता?
BRICS Summit 2026: 11 देशों को एक देश मानें तो आबादी, परमाणु हथियार, अर्थव्यवस्था, ऊर्जा और सैन्य ताकत के मामले में यह कितना शक्तिशाली होता? जानें पूरी तस्वीर।
BRICS Summit 2026: 4 Billion People, 6,000+ Nuclear Weapons—How Powerful Would It Be?
BRICS Summit 2026: दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 इन दिनों विदेशी राजनयिकों की उपस्थिति से गुलजार हो रहा है। 12 और 13 सितंबर को होने वाली इन बैठकों में दुनिया की तेजी से बदलती भू-राजनीति की तस्वीर भी स्पष्ट दिखाई देगी। कभी सिर्फ चार देशों से शुरू हुआ BRICS आज 11 सदस्य देशों का बड़ा समूह बन चुका है। भारत, चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के साथ मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया भी इसके सदस्य हैं। ऐसे में एक सवाल लगातार चर्चा में है कि अगर BRICS के सभी सदस्य देशों को एक काल्पनिक देश मान लिया जाए, तो यह देश दुनिया की दूसरी बड़ी ताकतों के मुकाबले कितना शक्तिशाली होगा?आइए इस विषय पर जानते हैं विस्तार से -
करीब आधी दुनिया की आबादी BRICS के साथ
BRICS की सबसे बड़ी ताकत उसकी आबादी है। 11 सदस्य देशों को मिलाकर इसकी आबादी करीब 4 अरब के आसपास पहुंचती है। यानी दुनिया की लगभग आधी आबादी किसी न किसी BRICS सदस्य देश में रहती है। इतनी बड़ी आबादी का मतलब केवल ज्यादा लोग नहीं है, बल्कि यह दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में से एक होने का संकेत भी है।
भारत और चीन जैसे देशों की वजह से BRICS के पास विशाल उपभोक्ता बाजार है। इसके अलावा इंडोनेशिया, ब्राजील, ईरान, मिस्र और अन्य सदस्य देश भी अपने-अपने क्षेत्र में बड़े बाजार हैं। अगर इन्हें एक देश की तरह देखा जाए तो यह दुनिया का सबसे बड़ा आबादी वाला देश होता।
क्षेत्रफल में भी BRICS की पकड़ बेहद मजबूत
आबादी के बाद क्षेत्रफल की बात करें तो BRICS की तस्वीर और भी बड़ी दिखाई देती है। रूस, चीन, भारत और ब्राजील जैसे विशाल देशों की मौजूदगी के कारण 11 सदस्य देशों का कुल क्षेत्रफल करीब 4.77 करोड़ वर्ग किलोमीटर माना जाता है। यह दुनिया के कुल भू-क्षेत्र का लगभग 32 फीसदी है।
इतने बड़े क्षेत्र में अलग-अलग तरह के प्राकृतिक संसाधन, समुद्री तट, कृषि भूमि, खनिज और ऊर्जा स्रोत मौजूद हैं। रूस और चीन से लेकर ब्राजील, भारत और मध्य पूर्व तक फैला यह समूह रणनीतिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण भूभाग को कवर करता है।
अर्थव्यवस्था में G7 अभी भी आगे
BRICS की आर्थिक ताकत काफी बड़ी है, लेकिन लेकिन अगर अर्थव्यवस्था का हिसाब डॉलर में कुल GDP के आधार पर लगाया जाए, तो तस्वीर बदल जाती है। सदस्य देशों की संयुक्त अर्थव्यवस्था वैश्विक GDP का करीब 40 फीसदी हिस्सा रखती है। क्रय शक्ति समानता यानी PPP के आधार पर BRICS का आर्थिक वजन G7 से भी आगे निकल चुका है।
डॉलर के आधार पर नाममात्र GDP की बात करें तो अमेरिका, जापान, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली और कनाडा वाला G7 अभी भी आगे है। यही वजह है कि BRICS की आर्थिक ताकत बड़ी होने के बावजूद वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में G7 और खासकर अमेरिका का प्रभाव अभी भी ज्यादा है।
सैनिकों की संख्या में BRICS की बड़ी बढ़त
सैन्य शक्ति की बात करें तो भारत, चीन और रूस BRICS को बहुत मजबूत बनाते हैं। चीन के पास दुनिया की सबसे बड़ी सक्रिय सेनाओं में से एक है, जबकि भारत और रूस भी बड़ी सैन्य ताकत रखते हैं। इसके अलावा ईरान, मिस्र, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों की सैन्य क्षमताएं भी इस समूह की कुल ताकत बढ़ाती हैं। दिए गए आंकड़ों के मुताबिक BRICS के 11 देशों के पास कुल सक्रिय सैन्यकर्मियों की संख्या करीब 70 लाख से अधिक बैठती है। इसकी तुलना में G7 देशों की सक्रिय सैन्य ताकत काफी कम है।
परमाणु हथियारों में भी BRICS बेहद ताकतवर
BRICS की सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत रूस, चीन और भारत उसके तीन परमाणु शक्ति संपन्न सदस्य हैं। उपलब्ध 2026 के आकलनों के मुताबिक इन तीनों देशों के पास मिलाकर 6,000 से ज्यादा परमाणु हथियार हैं। इसमें रूस की हिस्सेदारी सबसे बड़ी है। चीन तेजी से अपने परमाणु हथियारों का विस्तार कर रहा है, जबकि भारत भी परमाणु हथियार और मिसाइल क्षमता लगातार मजबूत कर रहा है। वहीं यहां यह समझना जरूरी है कि इन तीनों देशों के परमाणु हथियार किसी साझा BRICS कमान के अधीन नहीं हैं।
तेल और ऊर्जा के मामले में भी बड़ा खिलाड़ी
BRICS की ताकत का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा ऊर्जा है। सऊदी अरब, रूस, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और ब्राजील जैसे सदस्य दुनिया के बड़े तेल उत्पादकों में शामिल हैं। चीन और भारत दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ताओं में हैं।
इस तरह BRICS में तेल उत्पादन करने वाले देश और तेल की बड़ी मांग वाले देश दोनों मौजूद हैं। इससे समूह को वैश्विक ऊर्जा बाजार में महत्वपूर्ण स्थान मिलता है। अगर इसे एक काल्पनिक देश माना जाए तो उसके पास ऊर्जा उत्पादन और खपत दोनों के लिहाज से असाधारण क्षमता होगी।
दुर्लभ खनिजों में BRICS के काम आती है चीन की ताकत
आज की अर्थव्यवस्था में सिर्फ तेल ही महत्वपूर्ण नहीं है। इलेक्ट्रिक वाहन, मोबाइल, कंप्यूटर, सेमीकंडक्टर, रक्षा उपकरण और नवीकरणीय ऊर्जा तकनीक के लिए दुर्लभ खनिज बेहद जरूरी हो गए हैं। इस क्षेत्र में चीन की भूमिका बहुत बड़ी है। दुनिया की दुर्लभ खनिज सप्लाई चेन में चीन का दबदबा है। BRICS में शामिल दूसरे देशों के पास भी अलग-अलग खनिज और प्राकृतिक संसाधन हैं। ऐसे में भविष्य की तकनीकी और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा में यह समूह महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
फिर भी डॉलर के सामने बड़ी है BRICS की चुनौती
इतनी बड़ी आबादी, अर्थव्यवस्था, ऊर्जा और सैन्य ताकत के बावजूद BRICS के सामने सबसे बड़ी चुनौती वैश्विक वित्तीय व्यवस्था है। अमेरिकी डॉलर आज भी दुनिया की प्रमुख रिजर्व करेंसी है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार तथा वित्तीय लेनदेन में उसका प्रभाव बहुत बड़ा है। BRICS देश डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था विकसित करने पर काम कर रहे हैं। समूह में साझा मुद्रा की चर्चा भी होती रही है, लेकिन इस पर सदस्य देशों के बीच अभी पूरी सहमति नहीं है।
BRICS की सबसे बड़ी ताकत ही उसकी कमजोरी
BRICS में जितने ज्यादा देश जुड़े हैं, उतनी ही इसकी विविधता बढ़ी है। लेकिन यही विविधता कई बार चुनौती भी बन जाती है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक भारत और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है। रूस के पश्चिमी देशों के साथ संबंध बेहद तनावपूर्ण हैं, जबकि भारत, यूएई और अन्य सदस्य देशों के पश्चिम के साथ भी मजबूत व्यापारिक और रणनीतिक संबंध हैं।
इसलिए BRICS को अभी G7 या NATO जैसी एकजुट राजनीतिक या सैन्य शक्ति की श्रेणी में नहीं रक्खा जा सकता। यह मुख्य रूप से आर्थिक और राजनीतिक सहयोग का मंच है, जहां सदस्य देशों के अपने-अपने हित भी शामिल होते हैं।
क्या BRICS भविष्य में G7 को चुनौती दे सकता है?
एक्सपर्ट्स के मुताबिक अगर केवल आबादी, क्षेत्रफल, ऊर्जा, प्राकृतिक संसाधन, व्यापार और क्रय शक्ति को देखा जाए तो BRICS निश्चित रूप से दुनिया के सबसे शक्तिशाली समूहों में शामिल है। लेकिन वित्तीय व्यवस्था, डॉलर, विकसित अर्थव्यवस्थाओं और वैश्विक संस्थानों पर प्रभाव के मामले में G7 अभी भी मजबूत स्थिति में है। यही वजह है कि 2026 का ब्रिक्स शिखर सम्मेलन सिर्फ एक कूटनीतिक बैठक नहीं है। यह उस बदलती दुनिया की तस्वीर भी पेश करता है, जहां वैश्विक शक्ति धीरे-धीरे कई केंद्रों में बंट रही है।


