China Gold Buying: आखिर कितना सोना खरीदेगा चीन? 8 महीने में 1,000 टन से ज्यादा गोल्ड खरीदा, क्या भारत में बढ़ेंगे दाम?

China Gold Buying: चीन ने जनवरी से अगस्त 2026 के बीच 1,000 टन से ज्यादा सोना आयात किया। जानिए चीन की रिकॉर्ड खरीदारी के पीछे की वजह, अमेरिकी बॉन्ड से दूरी और भारत में दिवाली तक सोने की कीमतों पर क्या पड़ सकता है असर।

Jyotsana Singh
Published on: 13 Oct 2026 10:49 AM IST (Updated on: 13 Oct 2026 10:49 AM IST)
China Gold Buying: Over 1,000 Tonnes Imported in 8 Months, Will Gold Prices Rise in India?
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China Gold Buying: Over 1,000 Tonnes Imported in 8 Months, Will Gold Prices Rise in India?

China Gold Buying: चीन की सोना खरीदने की रफ्तार ने पूरी दुनिया के बाजार का ध्यान खींचा है। जनवरी से अगस्त के बीच चीन ने 1,000 टन से ज्यादा सोने का आयात किया, जिसकी कुल कीमत करीब 158.8 अरब डॉलर बताई गई। यह आंकड़ा इसलिए चौंकाने वाला है, क्योंकि चीन ने पूरे साल 2025 में 886 टन सोना आयात किया था। यानी पिछले साल जितना सोना खरीदा गया था, उससे भी ज्यादा खरीदारी चीन ने इस साल के शुरुआती आठ महीनों में ही कर ली। चीन की इस रणनीति का असर केवल अंतरराष्ट्रीय गोल्ड मार्केट तक सीमित नहीं है। भारत जैसे बड़े सोना उपभोक्ता देश के लिए भी यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण माना जा रहा है। देश में धनतेरस और दिवाली के दौरान सोने की मांग बढ़ जाती है। ऐसे में क्या चीन की लगातार खरीदारी से भारत में सोने के दाम और बढ़ सकते हैं? आखिर चीन इतना सोना क्यों जमा कर रहा है और इसका भारतीय ग्राहकों पर क्या असर पड़ सकता है? आइए जानते हैं इस पर विस्तार से -

चीन आखिर क्यों खरीद रहा है इतना सोना?

चीन की सोना खरीदने की रणनीति के पीछे अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने और अपने विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत बनाने की कोशिश एक बड़ी वजह मानी जा रही है। CNBC की रिपोर्ट के मुताबिक, जूलियस बेयर ग्रुप के विश्लेषक कार्स्टन मेनके ने भी चीन की इस खरीदारी को डॉलर पर निर्भरता घटाने की कोशिश से जोड़ा है।

दरअसल, किसी भी देश का केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर, दूसरी विदेशी मुद्राओं, सरकारी बॉन्ड और सोने जैसी संपत्तियों को रखता है। जरूरत पड़ने पर इनका इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय भुगतान करने और देश की अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने के लिए किया जा सकता है। लेकिन दूसरे देशों की वित्तीय व्यवस्था में रखी संपत्तियों पर प्रतिबंध लगने का जोखिम भी रहता है। ऐसे में सोना केंद्रीय बैंकों के लिए अपने रिजर्व में विविधता लाने का एक महत्वपूर्ण विकल्प बन जाता है। सोने की खासियत यह है कि यह किसी दूसरे देश की सरकार द्वारा जारी किया गया कर्ज नहीं है। हालांकि, इसकी कीमतों में भी उतार-चढ़ाव होता है और इसे सुरक्षित रखने की लागत आती है। इसके बावजूद चीन जैसे देश इसे लंबे समय की आर्थिक सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण मानते हैं।

रूस पर प्रतिबंध के बाद चीन ने क्यों बदली रणनीति?

फरवरी 2022 में रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद अमेरिका और यूरोपीय देशों ने रूस के लगभग 300 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार को फ्रीज कर दिया था। इसके कारण रूस अपने इन विदेशी वित्तीय संसाधनों का स्वतंत्र रूप से इस्तेमाल नहीं कर सका। इस घटनाक्रम ने दुनिया के कई देशों के सामने यह सवाल खड़ा कर दिया कि यदि किसी देश का विदेशी मुद्रा भंडार दूसरे देशों की वित्तीय व्यवस्था पर निर्भर है, तो राजनीतिक तनाव के समय उस पर प्रतिबंध लगने का जोखिम कितना बड़ा हो सकता है।

चीन भी लंबे समय से अपने विदेशी मुद्रा भंडार में विविधता लाने और अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है। सोना इस रणनीति का एक अहम हिस्सा है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, वित्तीय सुरक्षा और अपने रिजर्व को संतुलित रखने की जरूरत भी इसके पीछे महत्वपूर्ण कारण माने जा रहे हैं।

अमेरिकी बॉन्ड से दूरी और सोने पर बढ़ता भरोसा

चीन केवल सोने की खरीद नहीं बढ़ा रहा, बल्कि अमेरिकी सरकारी बॉन्ड में अपनी हिस्सेदारी भी कम कर रहा है। CNBC के आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई में अमेरिकी ट्रेजरी सिक्योरिटीज में चीन की हिस्सेदारी घटकर करीब 618 अरब डॉलर रह गई, जो लगभग 18 वर्षों का निचला स्तर बताया गया।

अमेरिकी ट्रेजरी सिक्योरिटीज वे बॉन्ड हैं, जिन्हें अमेरिका अपनी वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए जारी करता है। चीन लंबे समय तक इनका बड़ा विदेशी खरीदार रहा है। अब सोने की खरीद बढ़ाने और अमेरिकी बॉन्ड में हिस्सेदारी घटाने से संकेत मिलता है कि चीन अपने विदेशी मुद्रा भंडार की संरचना में बदलाव कर रहा है।

चीन के केंद्रीय बैंक की लगातार खरीदारी से बढ़ी हलचल

चीन के केंद्रीय बैंक पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना (PBOC) की सोना खरीदने की गतिविधियां भी बाजार के लिए अहम हैं। CNBC के आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में बैंक ने करीब 23 टन सोना खरीदा। यह पिछले तीन वर्षों में किसी एक महीने की सबसे बड़ी खरीद बताई गई। इसके साथ ही केंद्रीय बैंक की लगातार 23वें महीने सोना खरीदने की गतिविधि जारी रही।

केंद्रीय बैंक जब लगातार सोना खरीदते हैं, तो निवेशक इसे लंबे समय तक बनी रहने वाली मांग के संकेत के रूप में देखते हैं। इससे बाजार में सोने की कीमतों को सहारा मिल सकता है। वित्त विशेषज्ञों के अनुसार केवल केंद्रीय बैंकों की खरीदारी से ही कीमतें तय नहीं होतीं। निवेशकों की मांग, अमेरिकी डॉलर की मजबूती, ब्याज दरों और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों का भी बड़ा असर पड़ता है।

भारत में सोने की कीमतों पर क्या होगा असर?

भारत दुनिया के बड़े सोना उपभोक्ता देशों में शामिल है। यहां सोने की मांग का बड़ा हिस्सा आभूषणों, शादी-विवाह और त्योहारों से जुड़ा है। धनतेरस और दिवाली जैसे मौकों पर खरीदारी बढ़ने से बाजार में मांग को अतिरिक्त सहारा मिलता है। ऐसे समय में चीन जैसे बड़े खरीदार की गतिविधियां भारतीय बाजार के लिए भी महत्वपूर्ण हो जाती हैं।

अगर चीन की खरीदारी के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की मांग बढ़ती है और कीमतों में तेजी आती है, तो भारत में भी सोना महंगा हो सकता है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत बढ़ने के साथ रुपये की कमजोरी आयात लागत को और बढ़ा सकती है।

घरेलू मांग, आयात शुल्क, रुपये-डॉलर की विनिमय दर और स्थानीय बाजार की परिस्थितियां भी सोने के भाव को प्रभावित करती हैं। इसलिए यह अभी यह पूरी तरह से स्पष्ट भी हुआ है कि, चीन की खरीदारी के कारण दिवाली तक सोने की कीमतों में निश्चित रूप से बड़ी बढ़ोतरी होगी।

अमेरिकी महंगाई के आंकड़े तय करेंगे सोने की अगली चाल

सोने की कीमतों की दिशा तय करने में अमेरिका के महंगाई आंकड़ों और फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीति की भी महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। अमेरिकी कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) से पता चलता है कि वहां वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें किस रफ्तार से बढ़ रही हैं। इन आंकड़ों के आधार पर निवेशक अनुमान लगाते हैं कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक ब्याज दरों को लेकर आगे क्या फैसला कर सकता है। अगर महंगाई उम्मीद से ज्यादा रहती है, तो फेडरल रिजर्व ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचा बनाए रख सकता है। ऐसी स्थिति में सोने पर दबाव पड़ सकता है, क्योंकि सोना अपने निवेशकों को ब्याज नहीं देता। इसके उलट, ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद बढ़ने या वास्तविक ब्याज दरों में गिरावट आने से सोने की मांग को समर्थन मिल सकता है। डॉलर की मजबूती भी सोने के भाव को प्रभावित करती है। डॉलर कमजोर होने पर अन्य मुद्राओं में सोना खरीदना अपेक्षाकृत सस्ता हो सकता है, जबकि मजबूत डॉलर कीमतों पर दबाव डाल सकता है।

क्या अभी सोना खरीदना सही रहेगा?

वित्त विशेषज्ञों के अनुसार चीन की रिकॉर्ड खरीदारी सोने की दीर्घकालिक मांग के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है, लेकिन केवल इस खबर के आधार पर खरीदारी का फैसला करना सही नहीं होगा। त्योहारों के लिए सोना खरीदने वाले ग्राहकों को बाजार के ताजा भाव, आभूषणों के मेकिंग चार्ज और लागू करों को ध्यान में रखना चाहिए। निवेश करने वालों के लिए भी यह समझना जरूरी है कि सोने की कीमतें तेजी से बढ़ने के बाद नीचे आ सकती हैं। चीन की रणनीति बताती है कि दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं अपने वित्तीय भंडार को सुरक्षित और विविध बनाने पर ध्यान दे रही हैं। इसका असर अंतरराष्ट्रीय सोना बाजार और भारत की कीमतों पर पड़ सकता है, लेकिन सोने की अगली चाल चीन की मांग के साथ अमेरिकी ब्याज दरों, डॉलर और रुपये की स्थिति से तय होगी। भारतीय ग्राहकों के लिए यही जरूरी है कि वे केवल तेजी की आशंका देखकर जल्दबाजी में खरीदारी करने के बजाय अपनी जरूरत और बजट के हिसाब से फैसला लें।

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Jyotsana Singh is an Tech/Auto and Tourism Desk Content Writer at Newstrack.com.

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