Credit Card की Limit कैसे तय होती है? Bank कैसे तय करता है कितनी Limit मिलेगी

Credit Card की Limit कौन तय करता है? जानिए CIBIL Score, Income, Existing Loan, Credit Utilization, Payment History और Bank के Risk Model से Limit कैसे तय होती है।

Yogesh Mishra
Published on: 22 Aug 2026 7:05 PM IST
Credit Card Limit Explained in Hindi
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Credit Card Limit Explained in Hindi 

Credit Card Limit Explained in Hindi: क्रेडिट कार्ड पर 50,000, 2 लाख, 5 लाख या 10 लाख रुपये की लिमिट किसी एक साधारण फार्मूले से तय नहीं होती। अंतिम लिमिट कार्ड जारी करने वाला बैंक या वित्तीय संस्थान तय करता है, न कि सिबिल। सिबिल सिर्फ आपका ऋण-इतिहास और उससे निकला क्रेडिट स्कोर उपलब्ध कराता है। बैंक उस जानकारी के साथ आपकी आय, नौकरी या व्यवसाय की स्थिरता, पहले से चल रहे कर्ज, पुराने भुगतान, बैंक खाते का व्यवहार, उम्र और अपने आंतरिक जोखिम-मॉडल को जोड़कर अनुमान लगाता है कि आपको कितना बिना जमानत वाला कर्ज देना उसके लिए उचित होगा। सिबिल भी स्पष्ट करता है कि ऋण या कार्ड स्वीकृत करने का अंतिम निर्णय पूरी तरह ऋणदाता का होता है।

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि क्रेडिट कार्ड वास्तव में भुगतान का साधन कम और बार-बार इस्तेमाल किया जा सकने वाला बिना जमानत का ऋण अधिक है। बैंक आपको कह रहा है कि ‘आप इस सीमा तक हमारा पैसा इस्तेमाल कर सकते हैं और बाद में लौटा सकते हैं।’ यदि कार्ड की सीमा 3 लाख है तो इसका अर्थ यह नहीं कि बैंक मानता है कि आप हर महीने 3 लाख चुका सकते हैं। इसका अर्थ है कि उसके जोखिम-मॉडल के अनुसार कुल 3 लाख तक का खुला ऋण आपके प्रोफाइल के लिए स्वीकार्य माना गया है।

बैंक का सबसे पहला सवाल - यह व्यक्ति कर्ज चुकाता कैसे है?

यहीं क्रेडिट ब्यूरो की भूमिका आती है। भारत में सिबिल जैसे ब्यूरो बैंकों और वित्तीय संस्थानों से ऋण संबंधी जानकारी लेते हैं। आपकी रिपोर्ट में पुराने और मौजूदा ऋण, क्रेडिट कार्ड, वर्तमान बकाया, भुगतान का इतिहास और नए ऋण के लिए की गई पूछताछ जैसी जानकारी रहती है। सिबिल स्कोर 300 से 900 के बीच होता है और यह आपके पुराने ऋण-व्यवहार का सांख्यिकीय सार है। अधिक स्कोर सामान्यतः कम ऋण-जोखिम का संकेत माना जाता है, लेकिन स्कोर अकेले कार्ड की सीमा तय नहीं करता।

मान लीजिए दो लोगों की मासिक आय 1 लाख रुपये है। दोनों समान उम्र के हैं और दोनों एक ही बैंक में कार्ड के लिए आवेदन करते हैं। पहले व्यक्ति का स्कोर 810 है। उसने पिछले दस वर्षों में गृह ऋण, वाहन ऋण और दो कार्ड संभाले हैं। कभी भुगतान डिफ़ॉल्ट नहीं हुआ। दूसरे व्यक्ति का स्कोर 680 है, उसकी दो बार किश्त देर से गई है और पिछले कार्ड पर बकाया लंबे समय तक ऊँचा रहा। बैंक की नजर में दोनों की आय समान होने के बावजूद दोनों समान जोखिम नहीं हैं।

पहले व्यक्ति को संभवतः अधिक लिमिट मिलेगी। दूसरे को कम लिमिट, अधिक सावधानी या कभी-कभी कार्ड ही नहीं मिलेगा। लेकिन सिर्फ अच्छा सिबिल स्कोर भी पर्याप्त नहीं है। बैंक का अगला सवाल है कि आप कमाते कितना हैं? आय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बैंक अंततः यही जानना चाहता है कि हर महीने आपके पास कर्ज चुकाने के लिए नकदी कितनी आती है। नौकरीपेशा व्यक्ति से वेतन-पर्ची, बैंक विवरण या अन्य आय प्रमाण माँगा जा सकता है। स्व-रोजगार या व्यवसायी व्यक्ति के मामले में आयकर रिटर्न, बैंक खाते का व्यवहार और व्यवसाय की आय महत्वपूर्ण हो सकती है। सिबिल स्वयं बताता है कि कार्ड की सीमा तय करते समय ऋणदाता आय, आय का स्रोत, क्रेडिट स्कोर, भुगतान इतिहास और दूसरे व्यक्तिगत विवरण देख सकता है।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। 2 लाख रुपये कमाने वाला व्यक्ति भी जोखिमपूर्ण हो सकता है अगर उसकी 1.40 लाख रुपये की मासिक किश्तें पहले से चल रही हों। इसलिए बैंक अगला हिसाब करता है कि कमाई के मुकाबले पहले से कितनी देनदारी है।

मान लीजिए आपकी मासिक शुद्ध आय 1,20,000 रुपये है। आपका होम लोन 35,000 रुपये, वाहन लोन 15,000 रुपये और पर्सनल लोन 10,000 रुपये मासिक है। यानी 60,000 रुपये पहले ही तय कर्ज भुगतान में जा रहा है। बैंक को अब आपकी 1.20 लाख रुपये आय नहीं, बल्कि उस आय पर पहले से मौजूद कर्ज का भार दिखाई देगा। इसीलिए ऋणदाता अक्सर कुल मासिक ऋण भुगतान बनाम मासिक आय का अनुपात देखते हैं। सिबिल की ऋण-स्वीकृति संबंधी जानकारी भी बताती है कि बैंक मौजूदा किश्तों और वेतन के अनुपात को देखते हैं; बहुत अधिक अनुपात होने पर नए ऋण की स्वीकृति कठिन हो सकती है। यही कारण है कि बहुत अच्छी तनख्वाह वाला व्यक्ति भी अपेक्षा से कम कार्ड सीमा पा सकता है।

आपने अपना पुराना क्रेडिट कार्ड कैसे इस्तेमाल किया?

मान लीजिए आपके पास पहले से 5 लाख रुपये लिमिट वाला कार्ड है। यदि आप हर महीने केवल 20 से 30 हजार रुपये खर्च करते हैं और पूरा बिल समय पर चुका देते हैं तो बैंक को संकेत मिलता है कि आप क्रेडिट पर निर्भर नहीं हैं। लेकिन यदि हमेशा 4.70 लाख से 4.90 लाख रुपये तक लिमिट का उपयोग करते हैं, लगातार न्यूनतम भुगतान करते हैं और बकाया घूमता रहता है तो बैंक के मॉडल में यह आर्थिक दबाव का संकेत हो सकता है। इसे क्रेडिट उपयोग अनुपात कहा जाता है – यानी उपलब्ध लिमिट में से कितना हिस्सा इस्तेमाल हो रहा है। सिबिल स्पष्ट करता है कि बहुत अधिक उपयोग यह संकेत दे सकता है कि व्यक्ति कर्ज पर जरूरत से अधिक निर्भर है और इससे जोखिम की धारणा बढ़ सकती है। एक रोचक बात यह है कि बैंक केवल यह नहीं देखता कि आपने भुगतान किया या नहीं। वह भुगतान का ढंग भी देख सकता है।

हर महीने पूरा बिल चुकाना एक व्यवहार है। बार-बार न्यूनतम राशि भरना दूसरा। लगातार सीमा के करीब रहना तीसरा। नकद अग्रिम लेना चौथा। बार-बार कार्ड सीमा पार करने की कोशिश करना पाँचवाँ।

यानी बैंक के लिए आपकी वित्तीय कहानी केवल ‘डिफॉल्ट किया या नहीं’ जितनी सरल नहीं है। फिर आता है क्रेडिट इतिहास की उम्र। यदि किसी व्यक्ति ने दस वर्षों तक अलग-अलग ऋण जिम्मेदारी से संभाले हैं तो बैंक के पास उसका व्यवहार समझने के लिए लंबा रिकॉर्ड है। नया ग्राहक जिसने कभी ऋण लिया ही नहीं, जरूरी नहीं कि खराब हो; समस्या यह है कि बैंक के पास यह जानने का पर्याप्त प्रमाण नहीं है कि वह कर्ज को कैसे संभालेगा। सिबिल भी पुराने और लंबे क्रेडिट इतिहास को स्थिरता का सकारात्मक संकेत मानता है।

यहीं एक दिलचस्प विरोधाभास पैदा होता है। कोई युवा कह सकता है कि “मैंने कभी कर्ज नहीं लिया, इसलिए मेरा रिकॉर्ड सबसे अच्छा होना चाहिए।” लेकिन बैंक के लिए प्रश्न होगा कि हमें पता कैसे कि आप कर्ज चुकाएँगे? यही वजह है कि पहली बार कार्ड लेने वाले व्यक्ति को अक्सर अपेक्षाकृत छोटी लिमिट मिल सकती है। बैंक पहले उसका व्यवहार देखता है। यदि वह छह महीने, एक वर्ष या दो वर्ष तक जिम्मेदारी से कार्ड चलाता है तो सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव आ सकता है।

इसके बाद बैंक देखता है कि आपने हाल में कितनी बार नया कर्ज माँगा है। हर बार जब आप नया कार्ड या ऋण लेने के लिए आवेदन करते हैं, संबंधित ऋणदाता आपकी क्रेडिट रिपोर्ट की पूछताछ कर सकता है और उसका रिकॉर्ड बनता है। बहुत कम समय में बहुत सारी ऐसी पूछताछ बैंक को यह संकेत दे सकती हैं कि व्यक्ति अचानक बड़े पैमाने पर कर्ज तलाश रहा है। सिबिल भी बताता है कि थोड़े समय में बार-बार नए ऋण के आवेदन स्कोर पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।

कल्पना कीजिए किसी व्यक्ति ने तीन हफ्ते में पाँच बैंकों से क्रेडिट कार्ड, दो व्यक्तिगत ऋण और एक उपभोक्ता ऋण के लिए आवेदन किया। भले उसने अभी भुगतान नहीं चूका हो, बैंक सोच सकता है कि इसे अचानक इतना कर्ज क्यों चाहिए?यानी ऋण की भूख भी जोखिम संकेत हो सकती है।

नौकरी भी कार्ड लिमिट को क्यों प्रभावित करती है?

इसलिए कि आय की मात्रा के साथ आय की स्थिरता भी महत्वपूर्ण है। दो लोग हर महीने 1 लाख रुपये कमाते हैं। एक बड़ी स्थापित कंपनी में कई वर्षों से स्थायी वेतनभोगी है। दूसरा ऐसा व्यवसाय करता है जिसकी आय कभी 2 लाख और कभी 30 हजार रुपये होती है। बैंक दोनों को समान नहीं देख सकता, क्योंकि भविष्य की आय की विश्वसनीयता अलग है।इसीलिए रोजगार का प्रकार, नौकरी की अवधि, कंपनी या व्यवसाय का स्वरूप और आय की नियमितता आंतरिक जोखिम-मूल्यांकन में भूमिका निभा सकते हैं। सिबिल की ऋण-स्वीकृति संबंधी सामग्री में भी रोजगार की स्थिति और स्थिर आय को महत्वपूर्ण तत्व बताया गया है। इसका अर्थ यह नहीं कि व्यवसायी को हमेशा कम सीमा मिलेगी। मजबूत आयकर रिकॉर्ड, लंबा व्यवसाय इतिहास और अच्छा बैंक व्यवहार हो तो व्यवसायी को बहुत बड़ी सीमा भी मिल सकती है।

आपका अपना बैंक आपको दूसरे बैंक से ज्यादा सीमा क्यों दे सकता है?

क्योंकि आपके मुख्य बैंक के पास आपके बारे में अतिरिक्त जानकारी हो सकती है।मान लीजिए आपका वेतन हर महीने पिछले पाँच वर्षों से उसी बैंक खाते में आ रहा है। बैंक देख सकता है कि कितनी आय आती है, औसत शेष कितना रहता है, खर्च का व्यवहार कैसा है, कहीं चेक बार-बार तो नहीं लौटते, आपके पास सावधि जमा या निवेश हैं या नहीं और दूसरे बैंकिंग उत्पादों का व्यवहार कैसा है।ऐसे ग्राहक को बैंक बिना नया आय प्रमाण माँगे पहले से स्वीकृत कार्ड दे सकता है।यानी सिबिल पूरी वित्तीय तस्वीर का एक हिस्सा है; जिस बैंक के साथ आपका पुराना संबंध है उसके पास अपनी आंतरिक जानकारी भी होती है।

जोखिम-मॉडल क्या करता है?

यहीं आधुनिक बैंकिंग का सबसे महत्वपूर्ण लेकिन आम ग्राहक से छिपा हिस्सा आता है।बैंक लाखों पुराने ग्राहकों का डेटा रखते हैं। वे जानते हैं कि किन प्रकार के ग्राहकों ने समय पर भुगतान किया और किनमें बाद में चूक हुई। इस पुराने डेटा से सांख्यिकीय और मशीन-आधारित मॉडल बनाए जाते हैं।

उदाहरण के लिए मॉडल यह सीख सकता है कि किसी खास प्रोफाइल में जोखिम बढ़ता है जब कई बातें एक साथ हों : आय कम हो, मौजूदा ऋण अधिक हो, क्रेडिट उपयोग बहुत ऊँचा हो, हाल में कई नए ऋण लिए गए हों और भुगतान में कुछ देरी का इतिहास हो। इसके उलट जोखिम कम हो सकता है यदि आय स्थिर हो, भुगतान इतिहास लंबा और साफ हो, मौजूदा देनदारी कम हो और कार्ड हमेशा पूरा चुकाया जाता हो। बैंक हर कारक का वजन सार्वजनिक नहीं करते। यही उनका मालिकाना जोखिम मॉडल होता है। इसलिए दो बैंकों में एक ही व्यक्ति को अलग-अलग सीमा मिल सकती है। एक बैंक 1.5 लाख रुपये दे सकता है। जबकि दूसरा 3 लाख रुपये ।

तीसरा बैंक आवेदन ही अस्वीकार कर सकता है। क्योंकि उनकी जोखिम सहने की क्षमता, ग्राहक रणनीति और गणना पद्धति अलग हो सकती है।

क्या बैंक यह अनुमान लगाता है कि आप भविष्य में डिफॉल्ट करेंगे?

ठीक यही मूल काम है। ऋण देने वाला किसी व्यक्ति के चरित्र पर नैतिक फैसला नहीं कर रहा। वह एक संभावना निकालने की कोशिश कर रहा है कि अगर हम इस व्यक्ति को इतना खुला कर्ज दें तो अगले कुछ महीनों या वर्षों में डिफ़ॉल्ट होने की संभावना कितनी है? फिर दूसरा प्रश्न कि अगर वह चूक गया तो हमारा संभावित नुकसान कितना होगा?

क्रेडिट कार्ड बिना जमानत वाला ऋण है। गृह ऋण में बैंक के पास मकान होता है, वाहन ऋण में वाहन। क्रेडिट कार्ड के 3 लाख रुपये खर्च हो गए और ग्राहक दिवालिया हो गया तो बैंक के पास बेचने के लिए कोई निश्चित संपत्ति नहीं है। इसीलिए कार्ड सीमा में जोखिम-मॉडल बहुत महत्वपूर्ण है।

अमीर व्यक्ति को सीधे 20 लाख रुपये की लिमिट क्यों नहीं दे दी जाती?

क्योंकि आय और ऋण चुकाने की इच्छा अलग बातें हैं। कोई व्यक्ति सालाना 50 लाख रुपये कमाता हो सकता है, लेकिन उसका भुगतान इतिहास खराब हो। दूसरा 15 लाख कमाता है लेकिन दस साल से हर बिल समय पर चुकाता है। बैंक दूसरे को कुछ परिस्थितियों में अधिक भरोसेमंद मान सकता हैइसीलिए भुगतान क्षमता और भुगतान व्यवहार दोनों अलग-अलग देखे जाते हैं।

यानी क्षमता बताती है कि आप चुका सकते हैं या नहीं। इतिहास बताता है कि आप चुकाते हैं या नहीं। और बैंक को दोनों चाहिए।

कार्ड की सीमा शुरू में कम और बाद में ज्यादा क्यों हो जाती है?

मान लीजिए बैंक ने आपको पहली बार 80,000 रुपये की लिमिट दी। आपने एक वर्ष तक हर महीने 20 से 30 हजार खर्च किया और पूरा बिल समय पर चुका दिया। आय भी बढ़ी और कोई नया भारी कर्ज नहीं लिया। अब बैंक के पास आपके बारे में पहले से ज्यादा प्रमाण है।वह लिमिट बढ़ाकर 1.5 लाख या 2 लाख की पेशकश कर सकता है। दूसरी तरफ यदि सीमा 2 लाख है और आप लगातार 1.95 लाख तक खर्च करके केवल न्यूनतम भुगतान कर रहे हैं तो बैंक सीमा बढ़ाने के बजाय अधिक सतर्क हो सकता है। कुछ स्थितियों में बैंक सीमा घटा भी सकता है, विशेष रूप से यदि ग्राहक का जोखिम प्रोफाइल खराब हो जाए।

क्या ऊंची लिमिट खराब होती है?

नहीं। स्वयं बड़ी सीमा खराब नहीं है। अगर आपके पास 5 लाख की लिमिट है और आप 40 हजार रुपये खर्च करके पूरा भुगतान करते हैं तो आपका उपयोग अनुपात कम रहेगा। समस्या तब है जब बड़ी सीमा को व्यक्ति अतिरिक्त आय समझ ले। 5 लाख की लिमिट का मतलब यह नहीं कि आपके पास 5 लाख हैं। इसका मतलब यह है कि बैंक आपको अधिकतम 5 लाख तक उधार देने को तैयार है। यह बहुत महत्वपूर्ण मानसिक अंतर है।

सिबिल स्कोर आखिर किन चीजों से बनता है?

सिबिल सार्वजनिक रूप से अपने पूरे गणितीय सूत्र का खुलासा नहीं करता, लेकिन वह चार प्रमुख तत्वों की ओर संकेत करता है - भुगतान इतिहास, क्रेडिट उपयोग, क्रेडिट इतिहास की अवधि और नए ऋण की पूछताछ। देर से भुगतान, चूक और अत्यधिक उपयोग जोखिम बढ़ा सकते हैं; लंबा जिम्मेदार इतिहास स्थिरता का संकेत दे सकता है। लेकिन बैंक का अपना जोखिम स्कोर इससे बड़ा हो सकता है।सिबिल का स्कोर पूछता है - आपका अब तक का ऋण व्यवहार कैसा रहा?बैंक का आंतरिक मॉडल पूछता है कि अगर हम आज आपको 3 लाख और दे दें तो आगे क्या होने की संभावना है? यही दोनों में सबसे बड़ा फर्क है।

क्या 750 स्कोर होते ही बड़ी सीमा निश्चित है?

नहीं। 750 या उससे ऊपर को आम तौर पर अच्छा माना जाता है, लेकिन यह कोई कानूनी सीमा नहीं है कि 750 पर कार्ड मिलना ही चाहिए। सिबिल स्वयं स्पष्ट करता है कि उच्च स्कोर स्वीकृति की संभावना बढ़ाता है, अंतिम निर्णय ऋणदाता का है। इसलिए 800 स्कोर वाले व्यक्ति को भी कार्ड नहीं मिल सकता यदि उसकी आय बैंक के मानदंड से कम हो, नौकरी बहुत नई हो, मौजूदा देनदारी बहुत ज्यादा हो या बैंक की आंतरिक नीति उस ग्राहक-वर्ग को स्वीकार न करती हो। इसके विपरीत पहली बार ऋण लेने वाले व्यक्ति का स्कोर न बना हो, लेकिन बैंक उसे वेतन खाते के आधार पर छोटी सीमा वाला कार्ड दे सकता है।

फिक्स्ड डिपॉजिट के बदले कार्ड क्यों आसानी से मिलता है?

क्योंकि उसमें बैंक का जोखिम बहुत कम हो जाता है। ऐसे कार्ड को सुरक्षित क्रेडिट कार्ड कहा जाता है। आप उदाहरण के लिए 1 लाख रुपये की सावधि जमा बैंक के पास रखते हैं और उसके आधार पर कार्ड सीमा मिलती है। यदि आप भुगतान नहीं करते तो बैंक के पास जमानत मौजूद है। सिबिल भी सुरक्षित कार्ड को उन लोगों के लिए उपयोगी बताता है जिनका क्रेडिट इतिहास नहीं है या कमजोर है। इसलिए नए व्यक्ति के लिए यह क्रेडिट इतिहास बनाने का रास्ता हो सकता है।

एक उदाहरण से पूरी प्रक्रिया समझिए:

मान लीजिए अनुराग की मासिक आय 1.50 लाख रुपये है। उसकी उम्र 35 वर्ष है। पिछले आठ साल का क्रेडिट इतिहास है। सिबिल स्कोर 810 है। 25,000 रुपये की गृह ऋण किश्त चल रही है। पुराने कार्ड की लिमिट 2 लाख है लेकिन सामान्य बकाया 30 हजार रहता है और हर महीने पूरा भुगतान होता है। पिछले वर्ष उसने कोई नया ऋण आवेदन नहीं किया।

बैंक के मॉडल में संकेत होंगे - स्थिर आय। कम ऋण भार। लंबा अच्छा भुगतान इतिहास। कम कार्ड उपयोग। कम नई ऋण पूछताछ। ऐसे व्यक्ति को बैंक अपेक्षाकृत उदार सीमा दे सकता है।

अब दूसरे व्यक्ति विक्रम की आय भी 1.50 लाख रुपये है। स्कोर 690। गृह ऋण 45 हजार, वाहन ऋण 20 हजार, व्यक्तिगत ऋण 25 हजार। दो कार्ड लगभग पूरी सीमा तक इस्तेमाल हो रहे हैं। पिछले छह महीने में चार नए ऋण आवेदन किए और एक भुगतान 30 दिन देर से गया।

आय समान है। लेकिन जोखिम पूरी तरह अलग। इसलिए बैंक की दृष्टि में क्रेडिट सीमा का सवाल है कि वास्तव में आप कितना कमाते हैं? नहीं बल्कि आप कितना कमाते हैं, उसमें से कितना पहले ही बँधा है, अब तक कर्ज कैसे संभाला है और अगले कर्ज के बाद आपकी स्थिति कैसी होगी?

बैंक की सबसे बड़ी कोशिश है, भविष्य को अतीत से पढ़ना और क्रेडिट व्यवस्था का पूरा विज्ञान इसी पर खड़ा है, बैंक भविष्य नहीं देख सकता। वह यह नहीं जान सकता कि अगले महीने आपकी नौकरी जाएगी या आपको बड़ी पदोन्नति मिलेगी। इसलिए वह उपलब्ध संकेतों से संभावना बनाता है, पुराना भुगतान, आय, कर्ज, खाता व्यवहार, रोजगार, क्रेडिट उपयोग और समान ग्राहकों का ऐतिहासिक अनुभव। इस अर्थ में क्रेडिट कार्ड की लिमिट आपके पैसे की नहीं, बैंक के आपके ऊपर भरोसे की संख्यात्मक सीमा है। और यही कारण है कि यह सीमा बदलती रहती है।

आपका वेतन बढ़ा, कर्ज घटा, वर्षों तक समय पर भुगतान हुआ, भरोसा बढ़ सकता है और सीमा भी। लगातार देरी, अधिक कर्ज, ऊँचा उपयोग और आर्थिक दबाव दिखाई दिया, भरोसा घट सकता है और सीमा भी।इस पूरी व्यवस्था को एक सूत्र में समझें तो बैंक लगभग चार प्रश्न पूछता है, क्या आपके पास चुकाने के लिए पर्याप्त आय है? क्या पहले से बहुत कर्ज है? आपने पुराने कर्ज कैसे चुकाए? और हमारे सांख्यिकीय मॉडल के अनुसार आपके भविष्य में चूकने की संभावना कितनी है? इन चारों उत्तरों का संयुक्त परिणाम आपके कार्ड पर लिखी वह छोटी-सी संख्या बनता है - क्रेडिट लिमिट।

और शायद इसे समझने की सबसे जरूरी बात यही है: 5 लाख की क्रेडिट लिमिट बैंक का यह कथन नहीं है कि आपके पास 5 लाख हैं। यह केवल बैंक का यह अनुमान है कि वह आपको एक समय में अधिकतम कितना पैसा उधार देकर जोखिम उठा सकता है।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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