नोट पर छपा ये नंबर आखिर किस काम आता है? Coins पर क्यों नहीं होता Serial Number?

Indian Currency Serial Number: करेंसी नोट पर छपा Serial Number क्या बताता है? जानिए RBI इसे कैसे तय करता है, Prefix, Inset Letter और Star Series क्या हैं, नकली नोट पकड़ने में नंबर कैसे मदद करता है और सिक्कों पर Serial Number क्यों नहीं होता।

Yogesh Mishra
Published on: 9 Aug 2026 8:02 PM IST
Indian currency serial number
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Indian currency serial number

Indian Currency Serial Number Explained: हम रोज़ नोटों का उपयोग करते हैं। लेकिन बहुत कम लोग उस नंबर को ध्यान से देखते हैं, जो हर भारतीय बैंकनोट के सामने दो स्थानों पर छपा होता है। 10, 20, 50, 100, 200 या 500 रुपये का कोई नोट उठाइए, उस पर अक्षरों और अंकों का एक ऐसा ग्रुप दिखाई देगा जो दूसरे अधिकांश नोटों से अलग होगा। यही उसका नंबर पैनल या प्रचलित भाषा में सीरियल नंबर है। आम आदमी अक्सर इसे नोट का ‘आधार नंबर’ मान लेता है। यह सोचता है कि पूरी दुनिया में उस नंबर वाला केवल एक ही नोट हो सकता है। वास्तविक व्यवस्था इससे थोड़ी अधिक जटिल है। भारतीय रिज़र्व बैंक खुद स्पष्ट करता है कि दो या ज्यादा बैंकनोटों पर एक जैसा सीरियल नंबर होना संभव है। बशर्ते उनका इनसेट लेटर, छपाई का वर्ष या RBI गवर्नर का हस्ताक्षर अलग हो। इसलिए केवल छह या कुछ अंकों की संख्या ही नोट की पूर्ण विशिष्ट पहचान नहीं बनाती। उसके साथ प्रीफिक्स, इनसेट अक्षर, श्रृंखला, छपाई वर्ष और जारी करने वाले गवर्नर जैसे संकेत मिलकर उसे व्यापक पहचान देते हैं।

करेंसी की छपाई एक अत्यंत बड़े औद्योगिक और सुरक्षा तंत्र का हिस्सा है। RBI को यह जानना होता है कि किस मूल्यवर्ग के कितने नोट छापे गए। किस प्रेस ने कितनी खेप तैयार की। कौन-सी श्रृंखला जारी की गई। किन पैकेटों में कौन-से नंबर गए और किसी छपाई दोष के कारण नोट हटाने पड़े तो उनकी जगह कौन-से नोट लगाए गए। नम्बरिंग उत्पादन नियंत्रण, गुणवत्ता प्रबंधन, सुरक्षा और लेखांकन, चारों कामों में सहायक होती है। भारतीय रिजर्व बैंक के पास भारत में बैंकनोट जारी करने का एकाधिकार है जबकि नोट चार प्रेसों में छपते हैं - नासिक और देवास की प्रेसें भारत सरकार की Security Printing and Minting Corporation of India के अधीन हैं और मैसूरु तथा सालबोनी की प्रेसें RBI की पूर्ण स्वामित्व वाली Bharatiya Reserve Bank Note Mudran Private Ltd. के अंतर्गत आती हैं। RBI हर वर्ष अर्थव्यवस्था में नकदी की अपेक्षित मांग, पुराने और खराब नोटों को बदलने की जरूरत और बैंकों से मिली जानकारी के आधार पर अलग-अलग मूल्यवर्ग में कितने नोट छापने हैं, इसका अनुमान लगाता है और प्रेसों को मांग भेजता है।

गिनती कौन तय करता है?

बैंकनोट जारी करने और उनकी संख्या, मात्रा तथा श्रृंखला प्रबंधन की केंद्रीय जिम्मेदारी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की है। लेकिन बैंकनोट का डिजाइन, रूप और सामग्री रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया अकेले मनमाने ढंग से तय नहीं करता। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया एक्ट की धारा 25 के अनुसार बैंकनोट का डिजाइन, रूप और सामग्री केंद्र सरकार द्वारा रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के केंद्रीय बोर्ड की सिफारिशों पर विचार करने के बाद अनुमोदित की जाती है। दूसरी ओर कितने नोट छापे जाएँ, यह रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया सरकार और प्रिंटिंग प्रेसों के साथ परामर्श करके तय करता है। नंबरों का वास्तविक उत्पादन और उनका छपाई क्रम निर्धारित सुरक्षा प्रक्रियाओं के भीतर प्रेसों में लागू होता है। इसकी संपूर्ण अंदरूनी संख्या-आवंटन तकनीक सार्वजनिक रूप से उजागर नहीं की जाती। इसका कारण स्पष्ट है, मुद्रा सुरक्षा प्रणाली का हर संचालन विवरण सार्वजनिक कर देना नकली नोट बनाने वालों के लिए उपयोगी हो सकता है। फिर भी सार्वजनिक जानकारी से इतना स्पष्ट है कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया श्रृंखला, प्रीफिक्स और नंबरिंग प्रणाली का नियामकीय ढाँचा नियंत्रित करता है। नोट-प्रेस उसी के अनुसार उत्पादन करती हैं।

सीरियल नम्बर का भी होता है पैटर्न

भारतीय बैंकनोट का सीरियल नंबर केवल अंकों की सीधी लड़ी नहीं है। उसके पहले कुछ अक्षर या अंक मिलकर एक ‘प्रीफिक्स’ बनाते हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की तकनीकी सूचनाओं में इसे पहले तीन अल्फा-न्यूमेरिक कैरेक्टर कहा गया है। नए नंबरिंग पैटर्न में यही शुरुआती प्रीफिक्स समान आकार में छपता है, जबकि उसके बाद के अंक बाएँ से दाएँ क्रमशः बड़े होते जाते हैं। 2015 के बाद रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने अनेक मूल्यवर्गों में यह बढ़ते आकार वाले अंकों की विशेषता लागू की। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने इसे स्वयं एक विजिबल सुरक्षा विशेषता कहा। ताकि आम जनता नकली नोट और असली नोट के बीच अंतर आसानी से पहचान सके। इसीलिए आज नए भारतीय नोटों में नंबर पैनल के अंक बाएँ से दाएँ बड़े होते दिखाई देते हैं। जबकि शुरुआती प्रीफिक्स का आकार समान रहता है।

यहाँ ‘सीरियल नंबर की भाषा’ का प्रश्न भी रोचक है। नोट पर राशि कई भारतीय भाषाओं में लिखी होती है और महात्मा गांधी नई श्रृंखला में देवनागरी अंक में भी मूल्य दिखाया जाता है। लेकिन नंबर पैनल में प्रयुक्त क्रमांक अंतरराष्ट्रीय रूप से प्रचलित 0 से 9 वाले अंक और रोमन अक्षरों पर आधारित अल्फा-न्यूमेरिक प्रणाली में होता है। इसका कारण प्रशासनिक और मशीन-पठनीय सुविधा है। बैंकनोट छपाई, मशीन-सॉर्टिंग, नकली नोट की रिपोर्टिंग, बैंक रिकॉर्ड, मुद्रा चेस्ट और सुरक्षा एजेंसियों के बीच नंबर का एक समान प्रारूप होना आवश्यक है। नोट का भाषा पैनल भारत की भाषाई विविधता दिखाता है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के अनुसार भारतीय बैंकनोटों पर हिंदी और अंग्रेज़ी के अतिरिक्त 15 भाषाएँ भाषा पैनल में होती हैं। लेकिन सीरियल नंबर संचार की भाषा नहीं बल्कि पहचान और उत्पादन नियंत्रण का कोड है।

क्या होता है इनसेट लेटर?

सीरियल नंबर के साथ ‘इनसेट लेटर’ नाम की एक और चीज होती है, जिसने लंबे समय से आम लोगों को भ्रमित किया है। नंबर पैनल में कभी किसी अक्षर को अलग स्थिति में देखा जा सकता है। कभी कोई इनसेट अक्षर नहीं होता। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के अनुसार इनसेट लेटर नंबर पैनल में छपा एक वर्ण होता है। कुछ नोट बिना किसी इनसेट लेटर के भी जारी होते हैं। इसीलिए यदि दो नोटों पर समान मुख्य संख्या दिखाई दे तो भी वे जरूरी नहीं कि एक-दूसरे की नकली प्रतियाँ हों। उनमें अलग इनसेट अक्षर, अलग छपाई वर्ष या अलग गवर्नर हस्ताक्षर हो सकते हैं। यह तथ्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि सोशल मीडिया पर कभी-कभी दो नोटों की फोटो दिखाकर दावा किया जाता है कि ‘दोनों का नंबर एक है, इसलिए एक नकली है।’ रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की आधिकारिक व्यवस्था के अनुसार ऐसा निष्कर्ष केवल नंबर देखकर नहीं निकाला जा सकता।

स्टार सीरीज क्या है?

भारतीय बैंकनोट नंबरिंग प्रणाली में ‘स्टार सीरीज़’ भी एक अत्यंत दिलचस्प व्यवस्था है। वर्ष 2006 से पहले यदि 100 नोटों के क्रमबद्ध पैकेट में किसी नोट की छपाई खराब निकलती थी, तो प्रेस को उस दोषपूर्ण नोट को हटाकर उसी नंबर का नया सही नोट छापना पड़ता था। ताकि पैकेट की क्रम संख्या बनी रहे। यह समय, लागत और अतिरिक्त मैनुअल हस्तक्षेप बढ़ाता था। इसके समाधान के लिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने 2006 में स्टार सीरिज़ प्रणाली अपनाई। यदि किसी पैकेट में कोई खराब छपा नोट हटाया जाता है तो उसकी जगह ऐसा वैध नोट लगाया जा सकता है, जिसके नंबर पैनल में प्रीफिक्स और क्रमांक के बीच “*” यानी स्टार दिखाई देता है। RBI ने साफ कहा है कि स्टार वाला नोट पूरी तरह वैध मुद्रा है। उसे सामान्य नोट की तरह स्वीकार किया जाना चाहिए। स्टार किसी नकली नोट का संकेत नहीं। बल्कि यह बताता है कि वह नोट दोषपूर्ण छपाई वाले नोट के स्थान पर प्रतिस्थापन नोट के रूप में जारी हुआ था।

इसके बाद 2011 में RBI ने एक और महत्वपूर्ण बदलाव किया, ‘नॉन-सीक्वेंशियल नंबरिंग’। पहले नया नोट पैकेट सामान्यतः क्रमवार संख्या में होता था। जैसे एक नोट के बाद अगला नंबर, फिर अगला। लेकिन रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने परिचालन दक्षता और लागत कम करने के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रथाओं के अनुरूप ऐसे पैकेट भी जारी करने शुरू किए जिनमें 100 नोट तो होते हैं। लेकिन उनके क्रमांक लगातार क्रम में होना आवश्यक नहीं है। इसका अर्थ यह है कि आज बैंक से मिलने वाले नए सौ नोटों की गड्डी में यदि नंबर क्रम से नहीं चलते तो उसे नकली या संदिग्ध नहीं माना जाना चाहिए। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया स्वयं इसे अपनी आधिकारिक नंबरिंग प्रणाली का हिस्सा बताता है।

सीरियल नंबर और नकली नोट की पहचान

अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न आता है कि सीरियल नंबर नकली नोट पकड़ने में कैसे मदद करता है? इसकी पहली भूमिका रिकॉर्ड और जांच में है। जब किसी बैंक, ट्रेजरी या अन्य अधिकृत संस्था को कोई संदिग्ध या नकली नोट मिलता है और वह नोट नकली घोषित किया जाता है, तो उसका सीरियल नंबर दर्ज किया जाता है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया द्वारा निर्धारित counterfeit-note reporting format में बैंक को नकली माने गए नोट का सीरियल नंबर, मूल्यवर्ग और उन विशेषताओं का विवरण दर्ज करना होता है, जिनके आधार पर उसे नकली माना गया। इससे जांच एजेंसियाँ यह देख सकती हैं कि क्या एक ही नंबर या नंबर-श्रृंखला वाले नकली नोट अलग-अलग स्थानों पर मिल रहे हैं। यदि एक गिरोह किसी असली नोट का नंबर स्कैन करके हजारों नकली नोटों पर वही नंबर छाप रहा हो, तो कई स्थानों से एक ही क्रमांक की रिपोर्ट मिलना जांच के लिए महत्वपूर्ण संकेत बन सकता है।

लेकिन यहाँ सबसे बड़ी गलतफहमी दूर करना जरूरी है, सीरियल नंबर अकेले नोट को असली सिद्ध नहीं करता। नकली नोट पहचानने के लिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने कई सुरक्षा विशेषताएँ बनाई हैं—वॉटरमार्क, सुरक्षा धागा, सूक्ष्म अक्षर, आर-पार मिलने वाला रजिस्टर, उभरी अथवा विशिष्ट छपाई, रंग बदलने वाली स्याही, मूल्यवर्ग के विशेष चिह्न और नंबर पैनल जैसी अनेक विशेषताओं का सम्मिलित परीक्षण किया जाता है। इसी कारण रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया जनता और नकद संभालने वाले बैंक कर्मचारियों को कई सुरक्षा संकेत एक साथ देखने की सलाह देता है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया नियमित प्रशिक्षण भी आयोजित करता है। अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर अलग-अलग मूल्यवर्ग के सुरक्षा संकेत प्रकाशित करता है।

फोरेंसिक जाँच में उपयोगी

सीरियल नंबर फिर भी फोरेंसिक जांच में अत्यंत उपयोगी हो सकता है। मान लीजिए दिल्ली, लखनऊ, मुंबई और जयपुर के बैंकों में एक सप्ताह के भीतर ₹500 के कई नकली नोट पकड़े जाते हैं। उनमें समान प्रीफिक्स तथा बहुत करीब क्रमांक पाए जाते हैं। इससे संभावना बनती है कि वे एक ही नकली छपाई स्रोत से आए हों। जांचकर्ता इनके वितरण मार्ग, जब्ती स्थल, बैंक शाखा और आरोपियों के संपर्क जोड़ सकते हैं। इसी तरह किसी बड़ी नकद चोरी या फिरौती के मामले में यदि नोटों के नंबर पहले से दर्ज हों तो बाद में मिलने वाले नोटों को घटना से जोड़ने में सहायता हो सकती है। वास्तविक जीवन में हर सामान्य नोट का नंबर केंद्रीय रूप से प्रत्येक नागरिक से जोड़कर ट्रैक नहीं किया जाता। लेकिन विशेष आपराधिक जांच में दर्ज क्रमांक एक सुराग बन सकता है। यही कारण है कि सीरियल नंबर को मुद्रा की ‘ट्रेसिंग क्षमता’ का सीमित लेकिन उपयोगी उपकरण माना जा सकता है।

नोट पर दो नंबर पैनल क्यों होते हैं?

यह सुरक्षा और व्यावहारिकता दोनों से जुड़ा है। यदि नोट का कोई हिस्सा फट जाए, मुड़ जाए या एक कोना खराब हो जाए तो दूसरे पैनल से नंबर पहचाना जा सकता है। दोनों नंबर पैनलों का मेल भी साधारण सत्यापन में सहायक है। यदि किसी नकली या जोड़े गए नोट में दोनों तरफ नंबर अलग हों, तो वह तत्काल संदिग्ध हो सकता है। आधुनिक भारतीय बैंकनोटों में ऊपर बाईं और नीचे दाईं दिशा में नंबर पैनल रखा गया है और नए 500 सहित महात्मा गांधी नई श्रृंखला के नोटों में अंकों का आकार क्रमशः बढ़ता है।

नोट की छपाई में नंबर अंतिम चरणों में शामिल होने वाली अत्यंत नियंत्रित प्रक्रिया है। बैंकनोट बनाने में पहले विशेष सौ प्रतिशत कपास आधारित मुद्रा कागज, वॉटरमार्क, सुरक्षा धागे और अन्य संरचनात्मक विशेषताओं के साथ सामग्री तैयार होती है। फिर अलग-अलग रंगों और सुरक्षा मुद्रण तकनीकों के माध्यम से डिजाइन छपता है। इसके बाद नंबरिंग और गुणवत्ता जाँच होती है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के अनुसार वर्तमान भारतीय बैंकनोट कागज सौ प्रतिशत कपास से बनाया जाता है। नोट का हर पन्ना सामान्य कार्यालय प्रिंटर से छपे कागज जैसा नहीं होता। नंबरिंग मशीन और निरीक्षण प्रणाली इस बात का ध्यान रखती है कि नंबर स्पष्ट, सही और निर्धारित स्थान पर हों। छपाई दोष मिलने पर नोट को हटाया जा सकता है।आवश्यकता के अनुसार स्टार सीरीज़ प्रतिस्थापन प्रणाली इस्तेमाल की जा सकती है।

सिक्कों पर नंबर क्यों नहीं होते?

सिक्कों पर व्यक्तिगत सीरियल नंबर न होने का पहला कारण उनका निर्माण तरीका है। नोट सपाट कागजी वस्तु है, जिस पर तेज गति वाली मशीन से अलग-अलग क्रमांक छापना अपेक्षाकृत आसान है। सिक्का धातु का टुकड़ा है। जिसे भारी दबाव वाले डाई के बीच प्रहार करके बनाया जाता है। लाखों-करोड़ों सिक्कों पर हर सिक्के के लिए अलग-अलग अंक बदलना तकनीकी रूप से संभव तो है। लेकिन सामान्य परिसंचरण मुद्रा के लिए अत्यंत महँगा, धीमा और अनावश्यक होगा। आधुनिक टकसाल का उद्देश्य एक ही डाई से लाखों समान सिक्के बहुत तेज गति से बनाना है। प्रत्येक सिक्के को अलग क्रमांक देने का अर्थ होगा या तो हर प्रहार पर बदलने वाला अतिरिक्त नंबरिंग तंत्र लगाना या बाद में लेज़र अथवा दूसरी प्रक्रिया से अलग पहचान उकेरना। इसके बदले मिलने वाला लाभ बहुत कम है, क्योंकि छोटे मूल्य के सिक्के को व्यक्तिगत रूप से ट्रैक करने की आर्थिक आवश्यकता ही नहीं होती।

दूसरा कारण सिक्के का मूल्य और उसका जीवनकाल है। नोट का अंकित मूल्य उसके निर्माण पदार्थ से बहुत अधिक हो सकता है। नकली नोट बड़े पैमाने पर छापना अपराधियों के लिए आकर्षक हो सकता है। सिक्कों का भी नकलीकरण संभव है। लेकिन सामान्य 1, 2 या 5 सिक्के पर व्यक्तिगत सीरियल नंबर लगाने की लागत और प्रशासनिक भार उसकी उपयोगिता से कहीं अधिक होगा। सिक्के वर्षों और कभी-कभी दशकों तक प्रचलन में रह सकते हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने 10 के अलग-अलग डिजाइन एक साथ प्रचलन में होने का उल्लेख करते हुए स्वयं कहा है कि सिक्कों की उम्र लंबी होने के कारण कई डिजाइनों के सिक्के एक साथ बाजार में रहते हैं।

तीसरा कारण यह है कि सिक्कों की पहचान व्यक्तिगत नहीं बल्कि बैच और डिजाइन स्तर पर होती है। सिक्के पर मूल्य, वर्ष, राष्ट्रीय प्रतीक, डिजाइन और कई मामलों में टकसाल की पहचान से जुड़ा चिन्ह होता है। इससे मुद्रा विशेषज्ञ और टकसाल यह पहचान सकते हैं कि सिक्का किस प्रकार की ढलाई से संबंधित है। हर सिक्के को एक व्यक्तिगत ‘पासपोर्ट नंबर’ देने की आवश्यकता नहीं पड़ती। भारत में सिक्कों की डिजाइन और ढलाई की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की है। जबकि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया का कार्य उन्हें परिसंचरण में वितरित करना है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की अद्यतन जानकारी के अनुसार देश में मुंबई, हैदराबाद, कोलकाता और नोएडा की चार सरकारी टकसालें सिक्के बनाती हैं। केंद्र सरकार RBI से वार्षिक मांग मिलने के आधार पर कितने सिक्के बनाने हैं यह तय करती है।

सिक्का और नोट आर्थिक रूप से दो अलग दर्शन पर काम करते हैं। बैंकनोट एक ‘क्रमांकित वादा’ जैसा है, उस पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया गवर्नर का वचन होता है कि धारक को उस अंकित राशि का भुगतान किया जाएगा। सिक्का स्वयं राज्य द्वारा जारी धातु मुद्रा है। यही कारण है कि नोट पर गवर्नर का हस्ताक्षर, वादा, नंबर और अनेक स्तर की सुरक्षा दिखाई देती है, जबकि सिक्के पर सरकार का प्रतीक, मूल्य, वर्ष और डिजाइन पर्याप्त होते हैं। RBI FAQ के अनुसार बैंकनोट पर “I promise to pay the bearer…” वाक्य रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की धारक के प्रति देयता दर्शाता है, जबकि सिक्के सीधे भारत सरकार की देनदारी है।

नकली सिक्का कैसे पकड़ा जाता है?

सिक्के की असलियत उसकी धातु संरचना, वजन, आकार, व्यास, किनारे, ध्वनि, चुंबकीय गुण, डिजाइन और टकसाली गुणवत्ता जैसे गुणों से जाँची जा सकती है। आधुनिक सिक्का-सॉर्टिंग मशीनें सिक्के का आकार और विद्युत-चुंबकीय विशेषताएँ जाँच सकती हैं। इसी कारण वेंडिंग मशीन और बैंक कॉइन-सॉर्टर बिना सीरियल नंबर के भी सिक्के पहचान लेते हैं। सिक्के की पूरी पहचान उसके भौतिक ‘फिंगरप्रिंट’ में निहित है। जबकि बैंकनोट में भौतिक सुरक्षा विशेषताओं के ऊपर एक क्रमांकित पहचान भी जोड़ी जाती है।

सिक्कों पर व्यक्तिगत नंबर न होने की एक और व्यावहारिक वजह उनका घिसना है। धातु के सिक्के जेब, दुकानों, मशीनों और बैंकों में वर्षों तक टकराते रहते हैं। अगर उन पर छोटा व्यक्तिगत सीरियल नंबर उकेरा जाए तो लंबे उपयोग में उसका पढ़ना कठिन हो सकता है। नोट अपेक्षाकृत जल्दी खराब होकर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की clean note policy के तहत परिसंचरण से निकाल दिया जाता है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया सर्कुलेशन से लौटे नोटों की जांच करता है, अच्छे नोट दोबारा जारी करता है और खराब या फटे नोट नष्ट करता है। सिक्कों की उम्र बहुत लंबी होती है। इसलिए व्यक्तिगत संख्या आधारित प्रशासनिक मॉडल उनके लिए अनुपयोगी हो जाता है।

सिक्का बनाने का अलग सिस्टम

सिक्का बनाने की जिम्मेदारी भी नोट से अलग है। भारत सरकार Coinage Act, 2011 के तहत सिक्कों का डिजाइन और निर्माण करती है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया केवल सरकार द्वारा भेजे गए सिक्कों को परिसंचरण में डालता और बैंकिंग नेटवर्क के माध्यम से वितरित करता है। भारत की चार सरकारी टकसालें - मुंबई, कोलकाता, हैदराबाद और नोएडा - देश के चलन वाले सिक्के बनाती हैं।

इस पूरी व्यवस्था से यह भी समझ में आता है कि नोट और सिक्के पर पहचान की जरूरत अलग क्यों है। 500 का नोट हल्का, उच्च मूल्य वाला और छपाई से अपेक्षाकृत आसानी से नकली बनाया जा सकने वाला माध्यम है। इसलिए उस पर कई स्तर की सुरक्षा चाहिए। ₹5 का सिक्का कम मूल्य का, धातु आधारित और विशेष प्रेस तथा धातु संरचना से बना उत्पाद है। उसे जालसाजी से बचाने के तरीके अलग हैं। यदि हर ₹1 सिक्के पर अनूठा नंबर डालना शुरू कर दिया जाए तो देश में हर वर्ष करोड़ों सिक्के बनाने की लागत और गति दोनों प्रभावित होंगी। जबकि उसके नकलीकरण से मिलने वाला अपराधी लाभ बहुत कम है। इसलिए अर्थशास्त्र भी सुरक्षा डिजाइन तय करता है—हर मुद्रा इकाई पर सुरक्षा उतनी ही जटिल रखी जाती है जितनी उसके जोखिम और मूल्य के हिसाब से आवश्यक है।

एक अदृश्य प्रशासनिक भाषा

अंततः बैंकनोट पर छपी छोटी-सी संख्या मुद्रा व्यवस्था की एक अदृश्य प्रशासनिक भाषा है। वह हमें बताती है कि नकदी केवल रंगीन कागज नहीं है; उसके पीछे मुद्रण प्रेस, RBI, केंद्र सरकार, मुद्रा चेस्ट, बैंक, सुरक्षा एजेंसियाँ और गुणवत्ता नियंत्रण की एक विशाल शृंखला काम करती है। नंबर की शुरुआत में प्रीफिक्स, बीच में कभी इनसेट अक्षर, कुछ नोटों पर स्टार और बाद में बढ़ते आकार में अंक—इनमें से हर चीज का अपना कारण है। स्टार दोषपूर्ण छपाई वाले नोट की जगह आए प्रतिस्थापन नोट की पहचान है, बढ़ता अंक एक दृश्य सुरक्षा विशेषता है, इनसेट और वर्ष समान नंबरों को अलग श्रृंखलाओं में अलग पहचान देते हैं और सीरियल नंबर नकली नोट की जांच में फोरेंसिक सुराग बन सकता है।

और शायद इस विषय का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है कि नोट की असलियत उसकी संख्या में नहीं, उसकी पूरी सुरक्षा संरचना में होती है। नकली नोट बनाने वाला नंबर कॉपी कर सकता है, लेकिन RBI की चुनौती उसके लिए यह है कि वह कागज, सुरक्षा धागा, वॉटरमार्क, सूक्ष्म मुद्रण, रंग, दोनों तरफ के डिज़ाइन और नंबर पैनल—सबको एक साथ हूबहू दोहराए। वहीं सिक्के पर नंबर की जरूरत नहीं क्योंकि उसकी पहचान उसके धातु, वजन, आकार और टकसाली संरचना में ही निहित है। इसलिए नोट पर सीरियल नंबर और सिक्के पर उसका अभाव कोई संयोग नहीं, बल्कि दो अलग प्रकार की मुद्रा के लिए दो अलग सुरक्षा और उत्पादन दर्शन का परिणाम है।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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