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What is Demat Account: डिमैट अकाउंट क्या होता है, शेयर खरीदने के लिए कैसे खोलें और कितना जरूरी है?
What is Demat Account: डिमैट अकाउंट क्या होता है और शेयर खरीदने-बेचने के लिए यह क्यों जरूरी है?
What is Demat Account: डिमैट अकाउंट को बहुत आसान भाषा में समझें तो यह शेयरों का बैंक खाता है। जैसे बैंक खाते में आपके रुपये इलेक्ट्रॉनिक रूप में दर्ज रहते हैं, उसी तरह डिमैट अकाउंट में आपके शेयर, बॉन्ड, एक्सचेंज ट्रेडेड फंड यानी ईटीएफ और दूसरी प्रतिभूतियां इलेक्ट्रॉनिक रूप में रखी जाती हैं। डिमैट’ शब्द ‘Dematerialised Account’ से बना है। इसका मतलब है कागजी शेयर प्रमाणपत्रों को इलेक्ट्रॉनिक रूप में बदलकर रखना।
पहले जब लोग शेयर खरीदते थे तो उन्हें कागज के प्रमाणपत्र मिलते थे। उन्हें संभालकर रखना पड़ता था। शेयर बेचने या किसी दूसरे के नाम करने के लिए अलग-अलग कागजी प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती थी। प्रमाणपत्र खो गया तो परेशानी, चोरी हो गई तो परेशानी और हस्ताक्षर में थोड़ा भी फर्क हुआ तो भी परेशानी। डिमैट व्यवस्था ने इस पूरी प्रक्रिया को काफी आसान कर दिया है। अब शेयर कागज पर नहीं, इलेक्ट्रॉनिक रूप में आपके खाते में दर्ज होते हैं।
मान लीजिए आपने किसी कंपनी के 100 शेयर खरीदे। सौदा पूरा होने के बाद ये 100 शेयर आपके डिमैट अकाउंट में दिखाई देंगे। कुछ समय बाद आप इन्हें बेचते हैं तो ये शेयर आपके डिमैट खाते से निकलकर खरीदार के खाते में चले जाते हैं। पूरी प्रक्रिया इलेक्ट्रॉनिक तरीके से होती है। यानी शेयर बाजार में आपका निवेश अब किसी फाइल या कागज की अलमारी में नहीं, बल्कि डिजिटल रिकॉर्ड के रूप में रहता है।
डिमैट, ट्रेडिंग और बैंक अकाउंट में क्या फर्क है?
यह फर्क समझना बहुत जरूरी है, खासकर अगर आप पहली बार शेयर बाजार में निवेश करने जा रहे हैं। बैंक अकाउंट में आपका पैसा रहता है। ट्रेडिंग अकाउंट से आप शेयर खरीदने और बेचने का आदेश देते हैं। डिमैट अकाउंट में आपके खरीदे हुए शेयर रहते हैं। आज ज्यादातर शेयर ब्रोकर इन तीनों को एक ही ऐप या प्लेटफॉर्म से जोड़ देते हैं। इसलिए आपको लगता है कि सब कुछ एक ही खाता है। लेकिन असल में तीनों का काम अलग-अलग है।
मान लीजिए आपने ₹10,000 के शेयर खरीदने का फैसला किया। आपने अपने ट्रेडिंग ऐप से शेयर खरीदने का आदेश दिया। पैसा आपके बैंक खाते या उससे जुड़ी व्यवस्था से जाएगा। सौदा पूरा होने के बाद खरीदे गए शेयर आपके डिमैट अकाउंट में आ जाएंगे। जब आप कुछ महीने बाद उन शेयरों को बेचेंगे तो बिक्री का आदेश ट्रेडिंग अकाउंट से जाएगा। आपके डिमैट अकाउंट से शेयर निकलेंगे और बिक्री की रकम निपटान प्रक्रिया पूरी होने के बाद आपके जुड़े हुए बैंक या ट्रेडिंग खाते में आएगी। यानी पैसा बैंक में, खरीद-बिक्री का आदेश ट्रेडिंग अकाउंट से और शेयर डिमैट अकाउंट में।
डिमैट अकाउंट आखिर किसके पास होता है?
भारत में दो प्रमुख डिपॉजिटरी हैं, NSDL (National Securities Depository Limited) और CDSL (Central Depository Services (India) Limited)। इन्हें आप शेयरों की एक बड़ी डिजिटल तिजोरी की तरह समझ सकते हैं। लेकिन आम निवेशक सीधे NSDL या CDSL जाकर डिमैट अकाउंट नहीं खोलता। वह किसी Depository Participant यानी DP के जरिए डिमैट अकाउंट खोलता है। बैंक, शेयर ब्रोकर और कुछ वित्तीय संस्थाएं DP के रूप में काम कर सकती हैं। इसे बैंकिंग व्यवस्था से समझना आसान होगा। आपका बैंक खाता बैंक के पास होता है, लेकिन पूरी बैंकिंग व्यवस्था के पीछे देश की बड़ी वित्तीय प्रणाली काम करती है। उसी तरह डिमैट अकाउंट का रोजमर्रा का काम DP के जरिए होता है और प्रतिभूतियों का केंद्रीय रिकॉर्ड डिपॉजिटरी व्यवस्था में रहता है। आपके शेयरों का असली लाभकारी मालिक आप ही होते हैं। ब्रोकर केवल उस व्यवस्था का माध्यम है जिसके जरिए आप शेयर बाजार तक पहुंचते हैं।
यही वजह है कि अगर किसी दिन आपका ब्रोकर अपना कारोबार बंद कर दे तो इसका मतलब यह नहीं है कि आपके शेयर भी खत्म हो गए। अगर शेयर आपके डिमैट अकाउंट में सही तरीके से दर्ज हैं तो उनका रिकॉर्ड डिपॉजिटरी व्यवस्था में रहता है। इसलिए ब्रोकर और आपके शेयरों का मालिकाना हक एक ही चीज नहीं है।
शेयर खरीदने के लिए डिमैट अकाउंट जरूरी क्यों है?
आज भारत में सूचीबद्ध शेयरों की खरीद-बिक्री और उनका निपटान लगभग पूरी तरह इलेक्ट्रॉनिक तरीके से होता है। आप मोबाइल से शेयर खरीदने का आदेश देते हैं। एक्सचेंज पर सौदा होता है और सौदा पूरा होने के बाद शेयर आपके डिमैट अकाउंट में जमा हो जाते हैं। यही वजह है कि अगर आप शेयर बाजार में नियमित रूप से सूचीबद्ध शेयर खरीदना चाहते हैं तो डिमैट अकाउंट जरूरी होता है। इस व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा यह है कि कागजी प्रमाणपत्र संभालने की जरूरत नहीं रहती। शेयरों का हस्तांतरण तेजी से होता है और चोरी, नकली प्रमाणपत्र, कागज खो जाने या हस्ताक्षर न मिलने जैसी पुरानी परेशानियां काफी कम हो गई हैं। इसके अलावा बोनस शेयर, शेयर विभाजन और दूसरी कॉरपोरेट कार्रवाई होने पर भी संबंधित बदलाव इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड में किए जा सकते हैं।
मान लीजिए आपके पास किसी कंपनी के 50 शेयर हैं और कंपनी ने योग्य शेयरधारकों के लिए 1:1 बोनस घोषित किया। नियमों के मुताबिक आप बोनस के पात्र हैं तो अतिरिक्त शेयर आपके डिमैट खाते में जमा हो सकते हैं।
क्या डिमैट अकाउंट में सिर्फ शेयर रखे जाते हैं?
डिमैट अकाउंट सिर्फ शेयर रखने के लिए नहीं होता। इसमें कई तरह की प्रतिभूतियां रखी जा सकती हैं। इनमें बॉन्ड, डिबेंचर, ईटीएफ, सरकारी प्रतिभूतियां और दूसरी पात्र प्रतिभूतियां शामिल हो सकती हैं। लेकिन यहां एक बात समझना जरूरी है कि हर निवेश के लिए डिमैट अकाउंट जरूरी नहीं है। उदाहरण के लिए कई म्यूचुअल फंड योजनाएं आप बिना डिमैट अकाउंट के भी खरीद सकते हैं। लेकिन अगर आप शेयर बाजार में सूचीबद्ध शेयरों को खरीदना और बेचना चाहते हैं तो डिमैट और ट्रेडिंग की व्यवस्था चाहिए।
डिमैट अकाउंट कैसे खोला जाता है?
डिमैट अकाउंट खोलना पहले के मुकाबले काफी आसान है। ज्यादातर मामलों में आप इसे मोबाइल ऐप या वेबसाइट के जरिए ऑनलाइन खोल सकते हैं। सबसे पहले आपको किसी सेबी पंजीकृत शेयर ब्रोकर या डीपी को चुनना होता है। इसके बाद आपकी पहचान और बैंक खाते से जुड़ी जानकारी का सत्यापन किया जाता है। आम तौर पर पैन, पहचान और पते का प्रमाण, मोबाइल नंबर, ईमेल और बैंक खाते की जानकारी देनी होती है। कई मामलों में ई-केवाईसी की वजह से पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन ही पूरी हो जाती है।
आप सबसे पहले सेबी में पंजीकृत ब्रोकर या डीपी चुनते हैं। ब्रोकर चुनते समय केवल यह न देखें कि खाता मुफ्त में खुल रहा है या नहीं। उसकी फीस, ऐप की विश्वसनीयता, ग्राहक सेवा और सुरक्षा भी देखें। इसके बाद पैन और दूसरी जरूरी जानकारी देते हैं। पहचान और पते का सत्यापन होता है। कई मामलों में आधार आधारित ई-केवाईसी या दूसरे इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेजों से यह काम हो जाता है। फिर अपना बैंक अकाउंट जोड़ना होता है। इसी खाते से निवेश के लिए पैसा भेजा जाता है और शेयर बेचने के बाद मिलने वाली रकम वापस आती है। मोबाइल नंबर और ईमेल भी सत्यापित किए जाते हैं। इन्हीं पर आपके लेन-देन और सुरक्षा से जुड़े संदेश आ सकते हैं।
इसके बाद नामांकन यानी नॉमिनेशन की सुविधा भी पूरी करना अच्छा रहता है। इससे भविष्य में खाताधारक की मृत्यु होने की स्थिति में शेयरों को सही व्यक्ति तक पहुंचाने की प्रक्रिया आसान हो सकती है। अंत में जरूरी इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर और दूसरे सत्यापन पूरे होते हैं। प्रक्रिया पूरी होने के बाद आपका डिमैट अकाउंट और आम तौर पर उससे जुड़ा ट्रेडिंग अकाउंट सक्रिय हो जाता है। पूरी प्रक्रिया कितनी देर में पूरी होगी, यह आपके चुने हुए ब्रोकर या डीपी और सत्यापन प्रक्रिया पर निर्भर करता है।
डिमैट अकाउंट खोलने के लिए क्या-क्या चाहिए?
एक सामान्य निवासी भारतीय निवेशक को आम तौर पर पैन, पहचान और पते का प्रमाण, मोबाइल नंबर, ईमेल, बैंक खाते की जानकारी और केवाईसी से जुड़ी दूसरी जानकारी देनी होती है। आपसे जन्मतिथि, पेशा, बैंक विवरण और नामांकन जैसी जानकारी भी मांगी जा सकती है। आधार ई-केवाईसी के लिए सुविधाजनक हो सकता है, लेकिन कौन-से दस्तावेज चाहिए होंगे, यह आपके चुने हुए ब्रोकर या डीपी और लागू केवाईसी नियमों पर निर्भर करता है।
डिमैट अकाउंट नंबर क्या होता है?
डिमैट अकाउंट खुलने के बाद आपको एक खास पहचान संख्या मिलती है। सीडीएसएल में इसे आम तौर पर 16 अंकों के ‘BO ID’ के रूप में देखा जाता है। एनएसडीएल की व्यवस्था में आम तौर पर ‘DP ID’ और ‘Client ID’ मिलकर खाते की पहचान बनाते हैं। इसे आप अपने शेयरों के खाते का एक तरह का पहचान नंबर समझ सकते हैं। इस नंबर को जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल करना पड़ सकता है, लेकिन इसे बिना वजह सार्वजनिक रूप से साझा नहीं करना चाहिए। खास तौर पर इसे कभी भी ओटीपी, पिन, पासवर्ड या दूसरे सुरक्षा कोड के साथ साझा न करें।
ब्रोकर चुनते समय सबसे बड़ी गलती क्या होती है?
नए निवेशक अक्सर सिर्फ दो चीजें देखते हैं, खाता मुफ्त है या नहीं और ब्रोकरेज कितना है। असल बात ये है कि डिमैट और ट्रेडिंग अकाउंट में कई तरह के शुल्क हो सकते हैं। इनमें वार्षिक रखरखाव शुल्क, शेयर बेचते समय लगने वाले डिपॉजिटरी शुल्क, ब्रोकरेज, कॉल-एंड-ट्रेड शुल्क और दूसरी सेवाओं से जुड़े शुल्क शामिल हो सकते हैं। इसलिए अगर कोई ब्रोकर कहता है कि “खाता खोलना बिल्कुल मुफ्त है”, तो इसका मतलब यह जरूरी नहीं कि आगे भी आपका खाता पूरी तरह मुफ्त रहेगा। ब्रोकर चुनने से पहले उसकी पूरी शुल्क सूची देखना समझदारी है। सिर्फ कम शुल्क देखकर किसी अनजान ऐप पर खाता न खोलें। यह भी जांचें कि ब्रोकर सेबी और संबंधित एक्सचेंजों के साथ विधिवत पंजीकृत है। अगर कोई प्लेटफॉर्म बहुत ज्यादा मुनाफे का भरोसा दे रहा है या मुफ्त शेयर देकर आपको जल्दी खाता खोलने के लिए दबाव बना रहा है तो सावधान रहें।
आपके शेयर वास्तव में कहां दिखाई देते हैं?
आप अपने ब्रोकर के ऐप में शेयरों की होल्डिंग देख सकते हैं। लेकिन निवेशक के लिए समय-समय पर डिपॉजिटरी के रिकॉर्ड से भी अपनी होल्डिंग मिलाना अच्छा रहता है। सीडीएसएल के निवेशकों के लिए ‘Easi’ जैसी सुविधा उपलब्ध है, जिसके जरिए खाते में दर्ज होल्डिंग और लेन-देन देखे जा सकते हैं। इसका फायदा यह है कि आप केवल ब्रोकर के ऐप पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि डिपॉजिटरी के रिकॉर्ड में भी देख सकते हैं कि आपके नाम पर कौन-सी प्रतिभूतियां दर्ज हैं।
डिमैट अकाउंट और शेयर बाजार में निवेश एक ही चीज नहीं है
डिमैट अकाउंट सिर्फ आपके शेयर रखने की व्यवस्था है। यह आपको अच्छे शेयर चुनना नहीं सिखाता और न ही नुकसान से बचने की कोई गारंटी देता है।
इसे बैंक अकाउंट से समझिए - सिर्फ बैंक अकाउंट खोलने से आपका पैसा अपने आप नहीं बढ़ता। उसी तरह डिमैट अकाउंट खोलने से आपका निवेश अपने आप अच्छा नहीं हो जाता। आप किसी कमजोर कंपनी के शेयर भी डिमैट में रख सकते हैं और किसी मजबूत कंपनी के शेयर भी। जोखिम शेयर की कीमत, कंपनी के प्रदर्शन, बाजार की स्थिति और आपकी निवेश रणनीति से जुड़ा है। डिमैट अकाउंट खुद निवेश का जोखिम पैदा नहीं करता।
क्या एक व्यक्ति के एक से ज्यादा डिमैट अकाउंट हो सकते हैं?
सामान्य तौर पर एक व्यक्ति अलग-अलग डीपी के साथ एक से ज्यादा डिमैट अकाउंट रख सकता है। इसके लिए हर खाते में जरूरी केवाईसी और दूसरी औपचारिकताएं पूरी करनी होती हैं। कुछ निवेशक अलग-अलग उद्देश्यों के लिए एक से ज्यादा खाते रखते हैं। लेकिन अगर आप नए निवेशक हैं तो आम तौर पर इसकी कोई खास जरूरत नहीं होती। ज्यादा खाते होने का मतलब ज्यादा रिकॉर्ड और कई मामलों में ज्यादा शुल्क भी हो सकता है।
अगर ब्रोकर बंद हो जाए तो क्या आपके शेयर चले जाएंगे?
अगर आपके शेयर वास्तव में आपके डिमैट अकाउंट में दर्ज हैं तो सिर्फ ब्रोकर के बंद होने से उनका मालिकाना हक खत्म नहीं हो जाता। यही डिमैट व्यवस्था का एक बड़ा फायदा है। आपके शेयर आपकी प्रतिभूतियां हैं, ब्रोकर की संपत्ति नहीं। हालांकि निवेशक को अपने डिमैट स्टेटमेंट और लेन-देन की जानकारी समय-समय पर जांचते रहना चाहिए।यह भी ध्यान रखें कि डिमैट में रखे शेयर और ट्रेडिंग अकाउंट में पड़ा पैसा दो अलग चीजें हैं। इसलिए दोनों के रिकॉर्ड को अलग-अलग समझना जरूरी है।
एक छोटे उदाहरण से पूरी व्यवस्था समझिए
मान लीजिए आप पहली बार किसी सूचीबद्ध कंपनी के 10 शेयर खरीदना चाहते हैं। आपके पास तीन चीजें होंगी - बैंक अकाउंट में पैसा होगा। ट्रेडिंग अकाउंट से आप 10 शेयर खरीदने का आदेश देंगे। और सौदा पूरा होने के बाद वे 10 शेयर आपके डिमैट अकाउंट में आ जाएंगे।
मान लीजिए आपने 500 रुपये प्रति शेयर के हिसाब से 10 शेयर खरीदे। कुल कीमत 5,000 रुपये हुई। आपने ट्रेडिंग ऐप से खरीद का आदेश दिया। सौदा पूरा हुआ और निपटान की प्रक्रिया के बाद 10 शेयर आपके डिमैट अकाउंट में दिखाई देने लगे। छह महीने बाद उस शेयर की कीमत 650 रुपये हो गई और आपने उसे बेचने का फैसला किया। आपने ट्रेडिंग अकाउंट से बिक्री का आदेश दिया। सौदा पूरा होने पर आपके डिमैट अकाउंट से 10 शेयर निकल गए और निपटान प्रक्रिया पूरी होने के बाद बिक्री की रकम आपके जुड़े खाते में आ गई। बस, शेयर बाजार की इस पूरी व्यवस्था का मूल ढांचा इतना ही है।
सबसे आसान तरीके से याद रखें
बैंक अकाउंट = आपका पैसा। ट्रेडिंग अकाउंट = शेयर खरीदने-बेचने का रास्ता। डिमैट अकाउंट = आपके शेयरों की डिजिटल तिजोरी।
अगर आप भारत में सूचीबद्ध शेयर खरीदना और बेचना चाहते हैं तो डिमैट और ट्रेडिंग अकाउंट इस पूरी व्यवस्था के जरूरी हिस्से हैं। आज डिमैट अकाउंट खोलना काफी आसान है। लेकिन खाता खोलने से ज्यादा जरूरी है सही ब्रोकर चुनना। केवल टखाता मुफ्तट या टकम ब्रोकरेजट देखकर फैसला न करें। ब्रोकर का सेबी पंजीकरण, शुल्क, सुरक्षा, ग्राहक सेवा और आपकी जरूरत के हिसाब से मिलने वाली सुविधाएं जरूर देखें। और सबसे जरूरी बात, डिमैट अकाउंट सिर्फ शेयर रखने की जगह है, पैसा कमाने की मशीन नहीं। असली फर्क इस बात से पड़ता है कि आप कौन-से शेयर खरीदते हैं, कितने समय के लिए निवेश करते हैं और जोखिम को कितना समझते हैं।


