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FCRA History: इंदिरा गांधी के दौर में बना था FCRA, 50 साल में कैसे बदला कानून?
FCRA History: शुरुआत 1976 में इंदिरा गांधी सरकार के दौर में हुई थी। जानें 50 साल में FCRA कानून में क्या-क्या बदलाव हुए और FCRA Amendment Bill 2026 में क्या प्रस्तावित है।
FCRA History: How India’s Foreign Funding Law Changed in 50 Years
FCRA History:राजनीति के गलियारे में विदेशी चंदा हमेशा ही चर्चा का केंद्र रहा है। एक बार फिर विदेशी चंदे और उस पर सरकारी निगरानी को लेकर देश में बहस तेज हो गई है। भारत-इटली संबंधों के सलाहकार और वरिष्ठ विश्लेषक कार्लो लोंबार्डी ने भी इसी संदर्भ में कहा है कि भारत में विदेशी फंडिंग पर नियंत्रण कोई नई व्यवस्था नहीं है। उन्होंने याद दिलाया कि विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम यानी FCRA की शुरुआत 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में हुई थी। उस समय देश आपातकाल के दौर से गुजर रहा था। लोंबार्डी के मुताबिक, गैर-सरकारी संगठन यानी NGO मानवीय और सामाजिक कामों में अहम भूमिका निभाते हैं। वहीं विदेशी फंडिंग कभी-कभी विदेश नीति और प्रभाव बढ़ाने का माध्यम भी बन सकती है। इसलिए उनका मानना है कि संप्रभु सरकारों के लिए यह जानना जरूरी है कि विदेश से पैसा कौन दे रहा है, किसे दे रहा है और किस उद्देश्य से दे रहा है।
यही वजह है कि आज FCRA फिर चर्चा में है। साथ ही इस दिशा में एक अपडेट यह भी सामने आई है कि, FCRA Amendment Bill, 2026 को 12 अगस्त को लोकसभा ने संयुक्त संसदीय समिति यानी JPC के पास भेज दिया है। यानी प्रस्तावित बदलाव पर अभी कानून नहीं बना है। बल्कि उन पर संसदीय जांच आगे जारी रहेगी।
FCRA की शुरुआत आपातकाल के दौर में क्यों हुई?
भारत में विदेशी चंदे को नियंत्रित करने की पहली व्यापक कानूनी व्यवस्था फॉरेन कंट्रीब्यूशन (Regulation) Act, 1976 के रूप में आई। इसका उद्देश्य विदेशी योगदान और विदेशी आतिथ्य को नियंत्रित करना था। ताकि देश की राजनीतिक और संवैधानिक संस्थाओं पर बाहरी प्रभाव न पड़े।
1976 के कानून में कई ऐसे लोगों और संस्थाओं को विदेशी योगदान लेने से प्रतिबंधित किया गया था। जिनकी भूमिका सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण थी। इनमें चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार, संसद और विधानसभाओं के सदस्य, राजनीतिक दल और उनके पदाधिकारी, सरकारी कर्मचारी तथा अखबारों से जुड़े कुछ लोग शामिल थे। पत्रकारिता से जुड़े कई पदों को भी कानून के दायरे में रखा गया था।
इस व्यवस्था के पीछे मूल सोच यही थी कि विदेशी धन का इस्तेमाल भारत की राजनीतिक व्यवस्था, चुनाव, प्रशासन या लोकतांत्रिक संस्थाओं को प्रभावित करने के लिए नहीं होना चाहिए। यानी FCRA केवल NGO के लिए निर्मित कानून तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी शुरुआत ही व्यापक राष्ट्रीय हित और विदेशी प्रभाव को नियंत्रित करने की सोच के साथ हुई थी।
FCRA को लेकर 1984-85 में और सख्त हुआ कानून
FCRA में अगला बड़ा बदलाव 1984 के संशोधन से आया। जिसे 1984 के अध्यादेश के बाद 1985 में संशोधन कानून के रूप में लागू किया गया। इस बदलाव का मकसद पुराने कानून में सामने आई व्यावहारिक कमियों को दूर करना और विदेशी फंड के प्रवाह पर निगरानी बढ़ाना था।
इस संशोधन से विदेशी योगदान की परिभाषा को व्यापक किया गया। खास बात यह थी कि किसी विदेशी योगदान को प्राप्त करने वाले संगठन से आगे किसी दूसरे संगठन को दिया गया पैसा भी निगरानी के दायरे में आए। यानी केवल पहला लेन-देन देखना पर्याप्त नहीं था, बल्कि फंड आगे कहां जा रहा है। इसे भी ट्रैक करने की व्यवस्था मजबूत हुई। इसी दौर में राजनीतिक दल की परिभाषा भी विस्तृत की गई और उच्च न्यायपालिका के सदस्यों को भी कानून के दायरे में लाया गया। इसके अलावा विदेशी योगदान लेने वाले सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक और धार्मिक कार्यक्रमों से जुड़े संगठनों के लिए पंजीकरण की व्यवस्था महत्वपूर्ण रूप से सामने आई।
2010 में पुराना FCRA खत्म कर आया नया कानून
समय के साथ भारत में NGO की संख्या तेजी से बढ़ी। विदेशी फंडिंग का आकार बढ़ा और सूचना तकनीक के विस्तार ने विदेश से आने वाले पैसे के रास्तों को भी बदल दिया। इसी पृष्ठभूमि में 1976 के कानून को बदलने की जरूरत महसूस हुई। नतीजा रहा फॉरेन कंट्रीब्यूशन (Regulation) Act, 2010। इस कानून ने 1976 के FCRA को रिप्लेस किया और 1 मई 2011 से लागू हुआ। India Code के अनुसार 2010 का कानून विदेशी योगदान या विदेशी आतिथ्य की स्वीकार्यता और उसके इस्तेमाल को नियंत्रित करता है तथा राष्ट्रीय हित के प्रतिकूल गतिविधियों में इसके इस्तेमाल पर रोक लगाता है। 2010 के कानून में एक बड़ा बदलाव FCRA रजिस्ट्रेशन को लेकर हुआ। पहले की व्यवस्था के मुकाबले अब FCRA सर्टिफिकेट को स्थायी व्यवस्था के बजाय पांच साल की अवधि से जोड़ा गया। इसके बाद संगठन को अपना रजिस्ट्रेशन रिन्यू कराना पड़ता है। इससे सरकार को समय-समय पर यह जांचने का अवसर मिला कि संगठन कानून के मुताबिक काम कर रहा है या नहीं।
2016 और 2018 में विदेशी फंडिंग और स्रोत को लेकर हुए बदलाव
FCRA का इतिहास केवल NGO और सामाजिक संगठनों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध भारतीय राजनीति में विदेशी कॉरपोरेट फंडिंग की बहस से भी रहा है।
इसी कड़ी में FCRA का अगला महत्वपूर्ण राजनीतिक और कानूनी विवाद विदेशी स्रोत की परिभाषा को लेकर सामने आया। 2016 में फाइनेंस एक्ट के जरिए FCRA में बदलाव किया गया। इसका संबंध भारतीय कंपनियों में विदेशी हिस्सेदारी और उन्हें विदेशी स्रोत मानने के नियमों से था।
बाद में 2018 में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया गया। 2016 में किए गए बदलाव को 1976 से प्रभावी यानी रेट्रोस्पेक्टिव माना गया। इसका असर राजनीतिक दलों को मिले कुछ विदेशी कॉरपोरेट चंदों की वैधता से जुड़े मामलों पर भी पड़ा।
2020 में सबसे बड़ा सख्ती वाला बदलाव
FCRA में हाल के वर्षों का सबसे महत्वपूर्ण बदलाव 2020 का संशोधन रहा। इस संशोधन ने विदेशी चंदा प्राप्त करने वाले संगठनों के लिए कई नियम कड़े कर दिए। सबसे चर्चित बदलाव प्रशासनिक खर्च को लेकर था। पहले संगठन विदेशी योगदान का अधिकतम 50 प्रतिशत प्रशासनिक खर्चों पर इस्तेमाल कर सकते थे। 2020 में यह सीमा घटाकर 20 प्रतिशत कर दी गई। इसका मतलब था कि विदेशी फंड का बड़ा हिस्सा संगठन के घोषित सामाजिक या अन्य स्वीकृत उद्देश्यों पर खर्च करना होगा, जबकि वेतन, कार्यालय, प्रबंधन और दूसरे प्रशासनिक खर्चों पर खर्च की गुंजाइश सीमित हो गई।
दूसरा बड़ा बदलाव विदेशी चंदे के ट्रांसफर से जुड़ा था। 2020 से पहले कुछ परिस्थितियों में FCRA के तहत पात्र दूसरे व्यक्ति या संगठन को विदेशी योगदान ट्रांसफर किया जा सकता था। संशोधन ने इस व्यवस्था को खत्म कर दिया। अब एक FCRA प्राप्तकर्ता संगठन अपने विदेशी योगदान को किसी दूसरे व्यक्ति या संगठन को ट्रांसफर नहीं कर सकता।
SBI के दिल्ली खाते से क्यों जुड़ा विदेशी चंदा?
2020 में विदेशी फंड की निगरानी के लिए बैंकिंग व्यवस्था भी बदली गई। संगठनों के लिए विदेशी योगदान प्राप्त करने के लिए SBI की नई दिल्ली स्थित मुख्य शाखा में FCRA अकाउंट की व्यवस्था की गई।
इसका उद्देश्य विदेशी पैसे की एंट्री को एक निर्धारित बैंकिंग चैनल से जोड़ना था, ताकि सरकार के लिए आने वाले विदेशी फंड की निगरानी और ट्रैकिंग आसान हो। संगठन बाद में नियमों के तहत दूसरे बैंक खातों का इस्तेमाल रकम के उपयोग के लिए कर सकते थे, लेकिन विदेशी योगदान की प्राप्ति के लिए निर्धारित FCRA खाते की व्यवस्था जरूरी की गई। 2020 के संशोधन में पहचान संबंधी नियम भी कड़े हुए। FCRA रजिस्ट्रेशन, रिन्यूअल या पूर्व अनुमति के लिए संगठन के पदाधिकारियों, निदेशकों और प्रमुख पदाधिकारियों की पहचान संबंधी जानकारी मांगी गई। भारतीय नागरिकों के लिए आधार और विदेशी नागरिकों के लिए पासपोर्ट या OCI जैसे दस्तावेजों की व्यवस्था की गई।
इसी संशोधन के बाद सार्वजनिक सेवकों को भी विदेशी योगदान लेने से प्रतिबंधित श्रेणी में स्पष्ट रूप से शामिल किया गया।
अब FCRA 2026 के बिल में क्या बदलाव प्रस्तावित हैं?
एक बार फिर फॉरेन कंट्रीब्यूशन (Regulation) Amendment Bill, 2026 को 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश हुआ। 12 अगस्त को इसे संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दिया गया। इसलिए इसके प्रावधान अभी प्रस्तावित हैं, लागू कानून नहीं किए गए। इस बिल का सबसे अहम प्रस्ताव FCRA रजिस्ट्रेशन खत्म होने की स्थिति में विदेशी फंड से बने या खरीदे गए परिसंपत्तियों को संभालने के लिए डेजिग्नेटिड अथॉरिटी बनाने से जुड़ा है। यदि किसी संगठन का FCRA सर्टिफिकेट रद्द होता है, संगठन खुद इसे सरेंडर करता है या उसका रिन्यूअल नहीं होता, तो ऐसी स्थिति में विदेशी योगदान और उससे बनी परिसंपत्तियों की निगरानी, प्रबंधन और निपटान के लिए एक निर्धारित व्यवस्था बनाई जाएगी। बिल में अस्थायी और स्थायी वेस्टिंग का ढांचा प्रस्तावित है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक सरकार के अनुसार, यदि संगठन निर्धारित अवधि में अपना FCRA स्टेटस बहाल करा लेता है तो परिसंपत्तियां और अप्रयुक्त राशि वापस की जा सकती हैं। अगर स्थिति बहाल नहीं होती तो प्रस्तावित व्यवस्था के तहत परिसंपत्तियों के स्थायी वेस्टिंग का प्रावधान लागू हो सकता है। धार्मिक स्थल होने की स्थिति में उसके धार्मिक चरित्र को बनाए रखने की बात भी बिल में कही गई है। इस बार बिल में ‘key functionary’ की जिम्मेदारी को भी स्पष्ट करने का प्रस्ताव है। इसमें कंपनी के निदेशक, फर्म के पार्टनर, ट्रस्ट के ट्रस्टी, सोसाइटी या संगठन के पदाधिकारी और प्रबंधन में जिम्मेदारी निभाने वाले अन्य लोग शामिल हो सकते हैं। साथ ही कुछ मामलों में संगठन के अपराध के लिए प्रमुख पदाधिकारी की जवाबदेही तय करने का प्रस्ताव है। इसमें सबसे खास बात यह है कि 2026 का प्रस्ताव हर मामले में सजा बढ़ाने की दिशा में नहीं है। बिल FCRA उल्लंघन के लिए अधिकतम जेल की सजा को पांच साल से घटाकर एक साल करने का प्रस्ताव रखा गया है। साथ ही किसी अपराध की जांच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की मंजूरी की व्यवस्था प्रस्तावित है।
FCRA को लेकर मूल मुद्दा आज भी वही है जो पांच दशक पहले था यानी विदेशी धन का इस्तेमाल भारत में किस उद्देश्य के लिए हो रहा है और उस पैसे का अंतिम प्रभाव क्या है?
सरकार का तर्क है कि विदेशी योगदान में पारदर्शिता और राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर, NGO और नागरिक समाज से जुड़े कई समूहों की चिंता है कि अत्यधिक सरकारी नियंत्रण से वैध सामाजिक, मानवीय, धार्मिक और शोध गतिविधियों पर असर पड़ सकता है। 2026 के बिल को लेकर भी यही बहस तेज हुई है। इसीलिए कार्लो लोंबार्डी का यह कहना कि विदेशी फंडिंग पर निगरानी कोई नई बात नहीं है, FCRA के करीब 50 साल के इतिहास के संदर्भ में इस मुद्दे को देखा जाना चाहिए।


