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अगर इलाज पॉलिसी रिन्यूअल से पहले शुरू हो और रिन्यूअल के बाद खत्म हो जाए, तो क्या होगा?
Health Insurance Claim: हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी रिन्यू होने से पहले इलाज शुरू हुआ और बाद में भी जारी रहा तो क्लेम कैसे मिलेगा? जानिए कवरेज, सम इंश्योर्ड, कैशलेस अप्रूवल और क्लेम सेटलमेंट के जरूरी नियम।
Health Insurance Claim after renewal | Newstrack Hindi News
Health Insurance Claim: कभी-कभी मरीज को हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी रिन्यू होने से पहले हॉस्पिटल में भर्ती होना पड़ता है और इलाज नई पॉलिसी शुरू होने के बाद भी चलता रहता है। ऐसी स्थिति में रिन्यूअल की तारीख आते ही क्लेम अपने आप बंद नहीं होता।
इंश्योरेंस कंपनी यह चेक करती है कि इलाज कब शुरू हुआ, पॉलिसी समय पर रिन्यू हुई या नहीं और कितना कवरेज उपलब्ध है। क्लेम का भुगतान कैसे होगा, यह पॉलिसी की शर्तों पर निर्भर करता है।
1. हॉस्पिटल में भर्ती होते समय पॉलिसी एक्टिव होनी चाहिए
सबसे पहले इंश्योरेंस कंपनी यह चेक करती है कि मरीज के हॉस्पिटल में एडमिट होने की तारीख पर पॉलिसी एक्टिव थी या नहीं।
अगर मरीज को वैलिड कवरेज के दौरान भर्ती किया गया था, तो क्लेम पर पॉलिसी की शर्तों के अनुसार विचार किया जा सकता है।
आपकी मेडिकल इंश्योरेंस पॉलिसी (medical insurance policy) में यह भी बताया जा सकता है कि रिन्यूअल की तारीख के बाद भी चल रहे इलाज का खर्च कैसे कवर होगा।
इसलिए पॉलिसी के नियम ध्यान से पढ़ें, क्योंकि अलग-अलग इंश्योरेंस पॉलिसी में क्लेम सेटलमेंट की शर्तें अलग हो सकती हैं।
2. पॉलिसी समय पर रिन्यू कराना जरूरी है
अगर मरीज पहले से हॉस्पिटल में भर्ती है, तब भी पॉलिसी रिन्यू कराने में देरी न करें।
रिन्यूअल प्रीमियम तय समय पर भरना जरूरी है, ताकि पॉलिसी बिना किसी ब्रेक के जारी रहे।
अगर पुरानी पॉलिसी खत्म हो जाती है और नई पॉलिसी समय पर शुरू नहीं होती, तो बीच के समय में हुए इलाज के खर्च को लेकर परेशानी हो सकती है।
समय पर रिन्यूअल कराने से पॉलिसी की कंटिन्यूटी बनी रहती है और लागू शर्तों के अनुसार कवरेज जारी रह सकता है।
3. एक ही हॉस्पिटल स्टे को हमेशा दो अलग क्लेम नहीं माना जाता
अगर मरीज का इलाज पॉलिसी रिन्यूअल से पहले शुरू हुआ और बाद में भी जारी रहा, तो इसका मतलब यह नहीं कि दो अलग-अलग क्लेम बनेंगे।
इंश्योरेंस कंपनी पूरे हॉस्पिटल स्टे को एक लगातार चलने वाले इलाज के रूप में देख सकती है।
हालांकि, क्लेम का सेटलमेंट पॉलिसी की शर्तों के अनुसार किया जाएगा।
इसके लिए कंपनी एडमिशन की तारीख, रिन्यूअल की तारीख, इलाज की अवधि और डिस्चार्ज की तारीख चेक करती है।
4. दोनों पॉलिसी पीरियड की सम इंश्योर्ड चेक की जा सकती है
रिन्यूअल के बाद नया पॉलिसी पीरियड शुरू होता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि एक ही इलाज के लिए दोनों साल की पूरी सम इंश्योर्ड अपने आप इस्तेमाल की जा सकती है।
इंश्योरेंस कंपनी कुछ जरूरी बातें चेक कर सकती है:
• मरीज के एडमिट होने पर कितना कवरेज उपलब्ध था?
• रिन्यूअल से पहले कितनी रकम इस्तेमाल हो चुकी थी?
• रिन्यूअल के बाद कितना कवरेज उपलब्ध है।
• कोई डिडक्टिबल या को-पेमेंट लागू है या नहीं?
• रिस्टोरेशन या रिचार्ज बेनिफिट की क्या शर्तें हैं।
• इलाज पर कोई खास लिमिट लागू है या नहीं?
इन जानकारियों के आधार पर तय किया जाता है कि क्लेम में कितनी राशि कवर की जा सकती है।
5. रिन्यूअल से पहले और बाद के खर्च की अलग जांच हो सकती है
कभी-कभी हॉस्पिटल का फाइनल बिल दो पॉलिसी पीरियड के खर्चों को मिलाकर बनाया जाता है।
ऐसी स्थिति में इंश्योरेंस कंपनी चेक कर सकती है कि कौन-सा इलाज या मेडिकल प्रोसीजर किस तारीख को हुआ था।
रिन्यूअल से पहले हुए खर्च पुराने पॉलिसी पीरियड की शर्तों के अनुसार देखे जा सकते हैं।
वहीं, रिन्यूअल के बाद हुए खर्च पर नई पॉलिसी की लागू शर्तों के अनुसार विचार किया जा सकता है। हालांकि, हर पॉलिसी में खर्च का बंटवारा इसी तरह हो, यह जरूरी नहीं है।
6. रिन्यूअल पर बढ़ाई गई सम इंश्योर्ड पूरे इलाज पर लागू होना जरूरी नहीं है
अगर आपने पॉलिसी रिन्यू कराते समय सम इंश्योर्ड बढ़ाई है, तो जरूरी नहीं कि अतिरिक्त कवरेज पहले से चल रहे इलाज पर भी लागू हो।
बढ़ाई गई रकम पर अलग शर्तें या वेटिंग पीरियड लागू हो सकते हैं।
यह बात उन परिवारों के लिए खासतौर पर जरूरी है, जो अपने माता-पिता के लिए बेस्ट हेल्थ इंश्योरेंस फॉर पेरेंट्स (best health insurance for parents) चुन रहे हैं।
कई बार लंबे इलाज के दौरान पॉलिसी रिन्यूअल की तारीख आ जाती है। इसलिए कवरेज बढ़ाने से पहले यह समझें कि नई सम इंश्योर्ड कब और किन स्थितियों में इस्तेमाल की जा सकती है।
7. कैशलेस अप्रूवल को भी अपडेट करना पड़ सकता है
अगर मरीज का इलाज कैशलेस सुविधा के तहत चल रहा है, तो रिन्यूअल के बाद हॉस्पिटल के इंश्योरेंस डेस्क को नई पॉलिसी की जानकारी देनी पड़ सकती है।
इंश्योरेंस कंपनी या थर्ड-पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर (टीपीए) कुछ डॉक्यूमेंट्स मांग सकते हैं:
• रिन्यू की गई पॉलिसी की डिटेल्स।
• प्रीमियम पेमेंट का कन्फर्मेशन।
• इलाज से जुड़ी अपडेटेड जानकारी।
• हॉस्पिटल के खर्च का नया अनुमान।
• डिस्चार्ज के समय फाइनल बिल।
अगर इलाज का खर्च पहले दिए गए एस्टिमेट से बढ़ जाता है, तो हॉस्पिटल को अतिरिक्त कैशलेस अप्रूवल लेना पड़ सकता है।
8. फाइनल क्लेम का फैसला डिस्चार्ज के बाद होता है
कैशलेस इलाज में शुरुआती अप्रूवल मिलने का मतलब यह नहीं है कि पूरा हॉस्पिटल बिल कवर हो जाएगा।
फाइनल क्लेम सेटलमेंट के समय इंश्योरेंस कंपनी इलाज का रिकॉर्ड, हॉस्पिटल बिल, पॉलिसी स्टेटस और उपलब्ध कवरेज चेक करती है।
इसके बाद पॉलिसी की शर्तों के अनुसार क्लेम की मंजूर रकम तय की जाती है।
इसलिए इलाज के दौरान पॉलिसी रिन्यू होने पर क्लेम की रकम अपने आप बढ़ती या घटती नहीं है। इसका फैसला संबंधित पॉलिसी के नियमों के आधार पर होता है।
निष्कर्ष
अगर मरीज का इलाज पॉलिसी रिन्यूअल से पहले शुरू होता है और उसके बाद भी चलता रहता है, तो सबसे जरूरी है कि हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी समय पर रिन्यू कराई जाए।
इंश्योरेंस कंपनी एडमिशन की तारीख, इलाज का खर्च, उपलब्ध सम इंश्योर्ड और पॉलिसी की शर्तें चेक करके क्लेम का फैसला करती है।
ध्यान रखें कि नया पॉलिसी पीरियड शुरू होने से उसी इलाज के लिए अतिरिक्त कवरेज अपने आप नहीं मिलता। इसलिए रिन्यूअल से पहले पॉलिसी की शर्तें समझें और जरूरत पड़ने पर इंश्योरेंस कंपनी से क्लेम सेटलमेंट के नियम पूछें।


