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Life Insurance Nominee: बीमा में नॉमिनी और कानूनी वारिस अलग क्यों होते हैं? पैसा आखिर किसे मिलता है?
Life Insurance Nominee Rules in India: बीमा में नॉमिनी और कानूनी वारिस में क्या अंतर है? जानिए Life Insurance में पैसा किसे मिलता है, 2015 के कानून में क्या बदला और पत्नी, बच्चों व माता-पिता के अधिकार क्या हैं।
Life Insurance Nominee Rules in India
Life Insurance Nominee Rules in India: जीवन बीमा लेते समय लगभग हर व्यक्ति से पूछा जाता है कि उसकी मृत्यु होने पर बीमा की रकम किस व्यक्ति को दी जाए। आम बोलचाल में इसी व्यक्ति को ‘नॉमिनी’ कहा जाता है।लेकिन हिंदी में इसे नामित व्यक्ति या नामांकित व्यक्ति कहना अधिक उचित है। दूसरी ओर किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति पर जिस व्यक्ति का अधिकार उत्तराधिकार कानून के अनुसार बनता है, उसे कानूनी वारिस कहा जाता है। सामान्य लोगों में सबसे बड़ी उलझन यहीं पैदा होती है, क्योंकि वे मान लेते हैं कि बीमा में जिस व्यक्ति का नाम दर्ज है, वही उस पूरी रकम का अंतिम मालिक है। जबकि कानून की वास्तविक व्यवस्था इससे अधिक जटिल है। कई परिस्थितियों में नामित व्यक्ति और कानूनी वारिस एक ही हो सकते हैं। लेकिन कई बार दोनों अलग-अलग भी होते हैं। इतना ही नहीं, वर्ष 2015 के बाद जीवन बीमा कानून में महत्वपूर्ण बदलाव हुआ, जिसके कारण पति या पत्नी, माता-पिता और बच्चों जैसे कुछ नामित व्यक्तियों को पहले की तुलना में अधिक मजबूत अधिकार मिले। इसलिए आज यह कहना भी पूरी तरह सही नहीं है कि “नामित व्यक्ति केवल पैसा लेने वाला माध्यम है, असली मालिक हमेशा कानूनी वारिस ही होता है।”
कैसे मिलता है अधिकार?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि नामित व्यक्ति और कानूनी वारिस का अधिकार पैदा कहाँ से होता है। नामित व्यक्ति का अधिकार बीमा पॉलिसी में पॉलिसीधारक द्वारा किए गए नामांकन से पैदा होता है, जबकि कानूनी वारिस का अधिकार उत्तराधिकार कानून से पैदा होता है। मान लीजिए किसी व्यक्ति ने बीमा पॉलिसी में अपनी पत्नी का नाम दर्ज किया है। पत्नी उस पॉलिसी की नामित व्यक्ति है। लेकिन यदि उस व्यक्ति के पीछे पत्नी, बच्चे और माता जीवित हैं, तो उसके कानूनी वारिस कौन होंगे और किसका कितना हिस्सा होगा, यह उसके धर्म, लागू उत्तराधिकार कानून, वसीयत और पारिवारिक परिस्थितियों से तय होगा। इसलिए केवल बीमा पॉलिसी में नाम लिखा होना और मृत व्यक्ति की पूरी संपत्ति का कानूनी वारिस होना एक ही बात नहीं है।
नामित व्यक्ति की व्यवस्था बनाने का मूल उद्देश्य बहुत व्यावहारिक था। मान लीजिए किसी व्यक्ति की मृत्यु हो गई और उसके जीवन बीमा की राशि एक करोड़ रुपये है। यदि बीमा कंपनी को हर बार पहले यह तय करना पड़े कि मृत व्यक्ति के कितने कानूनी वारिस हैं, उसकी पत्नी कौन है, कितने बच्चे हैं, माता-पिता जीवित हैं या नहीं, कोई वसीयत है या नहीं, किसी रिश्तेदार ने दावा किया है या नहीं और परिवार में उत्तराधिकार विवाद तो नहीं चल रहा, तो बीमा की रकम वर्षों तक अटक सकती है। इस समस्या से बचने के लिए कानून ने पॉलिसीधारक को अधिकार दिया कि वह पहले से किसी व्यक्ति या व्यक्तियों का नाम दर्ज कर दे, ताकि उसकी मृत्यु के बाद बीमा कंपनी को यह पता रहे कि रकम किसके हाथ में दी जानी है। इसलिए नामांकन का पहला उद्देश्य भुगतान की प्रक्रिया सरल करना है।
समय के साथ बदला बीमा कानून
लेकिन जीवन बीमा में भारत का कानून समय के साथ बदला है। लंबे समय तक न्यायालयों की सामान्य व्याख्या यह थी कि केवल नामांकन कर देने से उत्तराधिकार कानून समाप्त नहीं हो जाता। सर्वोच्च न्यायालय के प्रसिद्ध सरबती देवी बनाम उषा देवी मामले में यह सिद्धांत सामने आया कि नामित व्यक्ति बीमा कंपनी से रकम प्राप्त कर सकता है। लेकिन केवल नामांकन के आधार पर वह आवश्यक रूप से उस धन का अंतिम मालिक नहीं बन जाता। अंतिम अधिकार उत्तराधिकार कानून के अनुसार तय हो सकता है। इसी कारण वर्षों तक यह सामान्य सलाह दी जाती रही कि “नामित व्यक्ति केवल रकम प्राप्त करने वाला व्यक्ति है, असली अधिकार कानूनी वारिसों का है।”
लेकिन वर्ष 2015 में बीमा कानून में बड़ा संशोधन हुआ। बीमा अधिनियम, 1938 की धारा 39 में बदलाव करके पति या पत्नी, माता-पिता और बच्चों जैसे निकट पारिवारिक सदस्यों के लिए विशेष व्यवस्था बनाई गई। यदि कोई व्यक्ति अपनी जीवन बीमा पॉलिसी में अपने माता-पिता, पति या पत्नी, बच्चों अथवा इनमें से एक से अधिक व्यक्तियों को नामित करता है, तो ऐसे व्यक्ति सामान्य परिस्थितियों में बीमा की रकम के लाभकारी हकदार माने जा सकते हैं। इसका अर्थ यह है कि इन निकट पारिवारिक सदस्यों को केवल बीमा कंपनी से रकम लेने वाला माध्यम मानना अब हर स्थिति में सही नहीं है। कानून ने उन्हें वास्तविक लाभ पाने वाले व्यक्ति के रूप में विशेष दर्जा दिया है।
यही आज के कानून का सबसे महत्वपूर्ण अंतर है। मान लीजिए किसी व्यक्ति ने अपनी एक करोड़ रुपये की जीवन बीमा पॉलिसी में अपनी पत्नी को अकेली नामित व्यक्ति बनाया है। उसकी मृत्यु के समय पत्नी, दो बच्चे और उसकी माता जीवित हैं। पुराने सामान्य सिद्धांत के अनुसार यह कहा जा सकता था कि पत्नी बीमा कंपनी से रकम लेगी। लेकिन बाद में वह धन उत्तराधिकार कानून के अनुसार बाँटा जाएगा। लेकिन 2015 के बाद की व्यवस्था में पत्नी, यदि धारा 39 के अंतर्गत लाभकारी नामित व्यक्ति की श्रेणी में आती है, तो उसका अधिकार अधिक मजबूत हो सकता है और उसे केवल दूसरे वारिसों के लिए रकम संभालने वाली व्यक्ति मानना सही नहीं होगा।
इसके विपरीत यदि उसी व्यक्ति ने अपनी जीवन बीमा पॉलिसी में अपने किसी मित्र, भाई, भतीजे, कारोबारी साथी या किसी अन्य व्यक्ति को नामित किया है, तो मामला अलग हो सकता है। ऐसे व्यक्ति को निकट पारिवारिक लाभकारी नामित व्यक्ति वाली विशेष कानूनी सुरक्षा अपने-आप नहीं मिलती। तब मृत व्यक्ति के कानूनी वारिसों का दावा अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है और उत्तराधिकार कानून का प्रश्न सामने आएगा। इसलिए किसी भी जीवन बीमा विवाद में केवल इतना पूछना पर्याप्त नहीं है कि ‘नामित व्यक्ति कौन है?’ यह भी देखना पड़ता है कि नामित व्यक्ति का मृतक से रिश्ता क्या था और कानून की कौन-सी धारा उस पर लागू होती है।
अब एक उदाहरण से इसे और सरल समझें। मान लीजिए रमेश के पास 50 लाख रुपये की जीवन बीमा पॉलिसी है। उसने अपनी पत्नी सुनीता को नामित किया है। रमेश की मृत्यु के बाद बीमा कंपनी को उसका मृत्यु प्रमाणपत्र, पॉलिसी से जुड़ी जानकारी और अन्य आवश्यक कागजात मिलते हैं। सामान्य परिस्थितियों में कंपनी सुनीता को रकम दे सकती है। यदि सुनीता कानून में निर्धारित निकट संबंधी लाभकारी नामित व्यक्ति की श्रेणी में आती है, तो उसका अधिकार केवल रकम प्राप्त करने तक सीमित नहीं रह सकता। लेकिन यदि रमेश ने अपने मित्र मोहन को नामित किया होता, जबकि उसकी पत्नी और बच्चे जीवित होते, तो मोहन को रकम मिलने के बाद भी कानूनी वारिसों का उत्तराधिकार दावा उत्पन्न हो सकता था।
अंतिम निर्णय तो अदालत के हाथ में
यहाँ एक और महत्वपूर्ण बात समझनी चाहिए कि बीमा कंपनी किसी परिवार का अंतिम उत्तराधिकार न्यायालय नहीं है। बीमा कंपनी का काम अपनी पॉलिसी, बीमा कानून और उसके रिकॉर्ड के अनुसार उचित व्यक्ति को भुगतान करना है। यदि दो या अधिक लोग आपस में दावा कर रहे हों, नामांकन विवादित हो, किसी ने वसीयत दिखाई हो, पॉलिसी किसी बैंक के पक्ष में गिरवी या हस्तांतरित हो या अदालत में उत्तराधिकार का मामला चल रहा हो, तो बीमा कंपनी स्वयं अंतिम पारिवारिक फैसला नहीं करती। ऐसे मामलों में अदालत का निर्णय आवश्यक हो सकता है।
किसे बना सकते हैं नॉमिनी?
नामित व्यक्ति किसे बनाया जाए, यह सामान्यतः पॉलिसीधारक तय करता है। जीवन बीमा खरीदते समय वह एक या एक से अधिक लोगों का नाम दर्ज कर सकता है। बाद में यदि उसकी परिस्थितियाँ बदल जाएँ तो वह नामांकन बदल भी सकता है। उदाहरण के लिए विवाह से पहले किसी व्यक्ति ने अपनी माता को नामित किया था। लेकिन विवाह और बच्चों के बाद वह पत्नी और बच्चों को नामित करना चाहता है तो बीमा कंपनी के रिकॉर्ड में परिवर्तन कराया जा सकता है। यही कारण है कि नामांकन को एक बार की औपचारिकता समझना उचित नहीं है।
जीवन में बड़े बदलाव आने पर नामांकन की समीक्षा जरूरी है। विवाह, तलाक, दूसरी शादी, बच्चे का जन्म, किसी नामित व्यक्ति की मृत्यु या परिवार में बड़े आर्थिक बदलाव के बाद बीमा पॉलिसी का नामांकन देख लेना चाहिए। कई बार लोग बीस वर्ष पुरानी पॉलिसी में वही नाम रहने देते हैं जो उन्होंने अविवाहित रहते हुए लिखा था। बाद में मृत्यु होने पर पत्नी, बच्चे, माता-पिता और पुराने नामित व्यक्ति के बीच विवाद खड़ा हो जाता है।
यदि नामित व्यक्ति पॉलिसीधारक से पहले ही मर जाए तो उसका नाम अपने-आप किसी दूसरे व्यक्ति में नहीं बदल जाता। पॉलिसीधारक को नया नामांकन करना चाहिए। यदि उसने ऐसा नहीं किया और उसकी मृत्यु हो गई, तो बीमा कंपनी को कानूनी वारिसों, विधिक प्रतिनिधियों या उत्तराधिकार प्रमाणपत्र के आधार पर भुगतान करना पड़ सकता है। इसलिए नामित व्यक्ति की मृत्यु के बाद पॉलिसी में संशोधन कराना अत्यंत आवश्यक है।
एक से अधिक नामित व्यक्ति भी बनाए जा सकते हैं। पति अपनी पत्नी और दोनों बच्चों को नामित कर सकता है। बीमा कंपनी की प्रक्रिया के अनुसार हिस्से भी निर्धारित किए जा सकते हैं। इससे मृत्यु के बाद यह भ्रम कम हो सकता है कि पूरी रकम केवल एक व्यक्ति को मिले या सभी में बाँटी जाए। बड़े बीमा कवर वाले परिवारों में यह व्यवस्था अधिक स्पष्टता ला सकती है।
यदि नामित व्यक्ति नाबालिग बच्चा है तो स्थिति थोड़ी अलग होती है। बच्चा स्वयं बड़ी बीमा राशि संभाल नहीं सकता। इसलिए पॉलिसीधारक एक ऐसे वयस्क व्यक्ति का नाम भी दर्ज कर सकता है जो बच्चे की ओर से रकम प्राप्त करे। इस व्यक्ति का काम नाबालिग की ओर से धन प्राप्त करना होता है।केवल इस कारण वह रकम का मालिक नहीं बन जाता। छोटे बच्चों वाले परिवारों में यह व्यवस्था विशेष महत्व रखती है।
नॉमिनेशन और पॉलिसी ट्रान्सफर
अब यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि यदि पॉलिसीधारक पर कर्ज है तो क्या केवल पत्नी या बच्चे को नामित कर देने से कर्जदाता का अधिकार समाप्त हो जाएगा? उत्तर है , नहीं। यदि किसी बैंक, वित्तीय संस्था या अन्य व्यक्ति का बीमा पॉलिसी पर वैध कानूनी अधिकार है, तो नामांकन अपने-आप उस अधिकार को समाप्त नहीं करता। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति ने ऋण लेते समय अपनी बीमा पॉलिसी बैंक के पक्ष में हस्तांतरित कर रखी है। उसकी मृत्यु होने पर पहले बैंक का वैध बकाया पूरा किया जा सकता है और उसके बाद शेष रकम नामित व्यक्ति या अन्य हकदार को मिल सकती है।
इसी कारण नामांकन और पॉलिसी का हस्तांतरण अलग बातें हैं। नामांकन यह बताता है कि मृत्यु पर रकम किसे दी जाए, जबकि हस्तांतरण में पॉलिसी से जुड़ा अधिकार किसी दूसरे व्यक्ति या संस्था को सौंपा जा सकता है। बैंक कई बार बड़े ऋण के बदले जीवन बीमा पॉलिसी पर ऐसा अधिकार ले सकते हैं। इसलिए केवल पॉलिसी में पत्नी का नाम होने से यह आवश्यक नहीं कि किसी वैध बैंक दावे की अनदेखी करके पूरी रकम पत्नी को ही दे दी जाए।
विवाहित व्यक्तियों के लिए एक और विशेष कानून है—विवाहित महिला संपत्ति अधिनियम, 1874। इसके अंतर्गत कुछ परिस्थितियों में पति अपनी पत्नी और बच्चों के लाभ के लिए जीवन बीमा पॉलिसी को विशेष संरचना में रख सकता है। ऐसी पॉलिसी सामान्य नामांकन वाली पॉलिसी जैसी नहीं होती। इसका उद्देश्य परिवार के लिए धन को अलग और सुरक्षित रखना होता है। व्यापार करने वाले या बड़े ऋण जोखिम वाले लोग कभी-कभी इस व्यवस्था का उपयोग करते हैं। ऐसी पॉलिसी पर सामान्य नामांकन नियम सीधे उसी तरह लागू नहीं होते।
नॉमिनी और वसीयत अलग अलग होने पर क्या होगा?
अब सबसे विवादास्पद सवाल, यदि पॉलिसी में पत्नी नामित है।लेकिन वसीयत में लिखा है कि बीमा की रकम बच्चों को मिले, तो किसकी बात मानी जाएगी? इसका उत्तर एक पंक्ति में नहीं दिया जा सकता। यदि जीवन बीमा में पत्नी 2015 के बाद की व्यवस्था के तहत लाभकारी नामित व्यक्ति है, तो उसका कानूनी दर्जा मजबूत हो सकता है। दूसरी ओर यदि नामित व्यक्ति कोई ऐसा रिश्तेदार है जिसे विशेष लाभकारी दर्जा नहीं मिला, तो वसीयत और उत्तराधिकार कानून अधिक महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इसी कारण यह कहना कि “वसीयत हमेशा नामांकन से ऊपर होती है” या “नामांकन हमेशा वसीयत से ऊपर होता है”—दोनों अधूरे कथन हैं।
यह भी समझना चाहिए कि बैंक खाते, सावधि जमा, शेयर, म्यूचुअल फंड और जीवन बीमा में नामांकन का कानूनी प्रभाव हमेशा एक जैसा नहीं होता। सामान्य बोलचाल में लोग सभी जगह ‘नॉमिनी’ शब्द देखते हैं और मान लेते हैं कि कानून भी समान होगा। लेकिन ऐसा नहीं है। अलग-अलग वित्तीय संपत्तियों पर अलग कानून लागू हो सकते हैं। जीवन बीमा में 2015 के बाद निकट पारिवारिक नामित व्यक्तियों को जो विशेष लाभकारी अधिकार मिला, वह हर बैंक खाते या हर निवेश पर अपने-आप लागू नहीं हो जाता।
कानूनी वारिस कौन होगा?
कानूनी वारिस कौन होगा, यह भी परिवार की सामाजिक धारणा से नहीं बल्कि कानून से तय होता है। उदाहरण के लिए हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत पत्नी, पुत्र, पुत्री और माता सहित कई निकट संबंधी प्रथम श्रेणी के वारिस हो सकते हैं। विवाहित बेटी का अधिकार केवल विवाह हो जाने से समाप्त नहीं हो जाता। इसी तरह केवल सबसे बड़े बेटे को सारी संपत्ति मिल जाए, यह आधुनिक भारतीय उत्तराधिकार कानून का सामान्य सिद्धांत नहीं है। अलग धर्मों और व्यक्तिगत कानूनों में उत्तराधिकार की व्यवस्था अलग हो सकती है।
यदि कोई वैध वसीयत नहीं है तो व्यक्ति की संपत्ति उसके लागू उत्तराधिकार कानून के अनुसार बाँटी जाती है। यदि वसीयत मौजूद है तो संपत्ति का वितरण उसके अनुसार हो सकता है।लेकिन कुछ विशेष प्रकार की बीमा पॉलिसियों, लाभकारी नामांकन, हस्तांतरण या दूसरे वैधानिक अधिकारों के कारण अलग कानूनी प्रश्न पैदा हो सकते हैं। इसलिए बड़ी बीमा राशि वाले व्यक्ति के लिए केवल नामांकन कर देना पर्याप्त संपत्ति नियोजन नहीं माना जाना चाहिए।
कई परिवारों में यह गलतफहमी भी होती है कि बीमा कंपनी जिसके खाते में पैसा डाल देगी, वही व्यक्ति हमेशा अंतिम मालिक बन जाएगा। ऐसा जरूरी नहीं है। बीमा कंपनी द्वारा भुगतान और रकम पर अंतिम कानूनी स्वामित्व दो अलग चरण हो सकते हैं। जिस मामले में नामित व्यक्ति केवल रकम प्राप्त करने वाला है, वहाँ भुगतान के बाद भी दूसरे कानूनी वारिस दावा कर सकते हैं। जहाँ लाभकारी नामित व्यक्ति की व्यवस्था लागू होती है, वहाँ स्थिति अलग हो सकती है।
यदि नामांकन ही न किया गया हो तो क्या बीमा का पैसा खत्म हो जाता है? बिल्कुल नहीं। पॉलिसी की देय रकम बीमा कंपनी की संपत्ति नहीं बन जाती। लेकिन परिवार को अधिक दस्तावेज प्रस्तुत करने पड़ सकते हैं। बीमा कंपनी कानूनी वारिस प्रमाणपत्र, उत्तराधिकार प्रमाणपत्र, वसीयत से संबंधित न्यायालयी प्रमाण या अन्य कागजात माँग सकती है। इससे भुगतान में देरी हो सकती है। नामांकन का सबसे बड़ा व्यावहारिक लाभ यही है कि वह मृत्यु-दावे की प्रक्रिया को सरल करता है।
नामित व्यक्ति और कानूनी वारिस के बीच अंतर जीवन बीमा में इसलिए बनाया गया क्योंकि दोनों व्यवस्थाओं का उद्देश्य अलग है। नामांकन का उद्देश्य भुगतान को सरल और तेज बनाना है, जबकि उत्तराधिकार कानून का उद्देश्य किसी मृत व्यक्ति की पूरी संपत्ति का न्यायसंगत और कानूनी वितरण तय करना है। व्यक्ति का घर, जमीन, बैंक जमा, गहने, निवेश और दूसरी संपत्तियाँ उत्तराधिकार कानून के अनुसार अलग-अलग प्रश्न पैदा कर सकती हैं। केवल बीमा पॉलिसी में किसी का नाम दर्ज कर देने से वह व्यक्ति मृतक की पूरी संपत्ति का मालिक नहीं बन जाता।
नामांकन के पीछे परिवार की तत्काल आर्थिक सुरक्षा का विचार भी है। यदि कमाने वाले व्यक्ति की अचानक मृत्यु हो जाए तो उसके परिवार को घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई, ऋण की किस्त और दैनिक आवश्यकताओं के लिए तत्काल धन चाहिए होता है। यदि बीमा कंपनी पहले लंबा उत्तराधिकार मुकदमा समाप्त होने की प्रतीक्षा करे तो बीमा का मूल उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाएगा। इसलिए कानून नामांकन के माध्यम से तुरंत भुगतान का रास्ता देता है।
लेकिन इसी सुविधा का दुरुपयोग या गलतफहमी न हो, इसलिए कानून दूसरे अधिकारों को भी समाप्त नहीं करता। बैंक का वैध दावा, किसी पॉलिसी का हस्तांतरण, विशेष पारिवारिक सुरक्षा कानून, अदालत का आदेश और कुछ परिस्थितियों में उत्तराधिकार कानून—ये सब नामांकन के साथ-साथ काम कर सकते हैं। इसलिए बीमा पॉलिसी में नाम दर्ज होना शक्तिशाली अधिकार है।लेकिन हर परिस्थिति में बाकी सभी कानूनों को खत्म कर देने वाला अधिकार नहीं।
तलक के बाद क्या होगा?
तलाक के बाद नामांकन विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। मान लीजिए पति ने विवाह के समय पत्नी को नामित किया, बाद में दोनों का तलाक हो गया लेकिन उसने पॉलिसी में नाम नहीं बदला। उसके बाद उसने दूसरी शादी कर ली और नए परिवार के बच्चे भी हो गए। यदि उसकी मृत्यु हो जाए तो पुराना नामांकन बड़ा विवाद पैदा कर सकता है। इसलिए तलाक या दूसरी शादी के बाद बीमा, बैंक खाते, भविष्य निधि, निवेश और वसीयत—सभी में नामांकन और उत्तराधिकार व्यवस्था फिर से देखनी चाहिए।
माता-पिटा की मृत्यु की स्थिति में
इसी तरह माता-पिता की मृत्यु के बाद नामांकन बदलना जरूरी हो सकता है। कोई व्यक्ति अविवाहित अवस्था में अपनी माता को नामित करता है। लेकिन बाद में विवाह और बच्चे होने के बाद भी वही नाम चलने देता है। यदि माता उससे पहले मर जाएँ और उसने नया नामांकन न किया हो तो दावा प्रक्रिया जटिल हो सकती है। इसलिए पॉलिसी खरीदना एक बार का निर्णय है। लेकिन नामांकन जीवन की परिस्थितियों के साथ बदलने वाला विषय है।
बीमा में पति और पत्नी दोनों के अधिकार समान सिद्धांत पर चलते हैं। यदि पत्नी अपने जीवन की बीमा पॉलिसी में पति, माता-पिता या बच्चों को नामित करती है तो वही कानूनी व्यवस्था लागू होगी जो किसी पुरुष पॉलिसीधारक पर होती है। आधुनिक बीमा कानून में यह सिद्धांत केवल पति द्वारा पत्नी को सुरक्षा देने तक सीमित नहीं है।
स्वास्थ्य बीमा और जीवन बीमा
अब सामान्य स्वास्थ्य बीमा को जीवन बीमा से अलग समझना जरूरी है। यदि किसी व्यक्ति के पास दस लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा है तो उसकी मृत्यु होने पर नामित व्यक्ति को सीधे दस लाख रुपये नहीं मिल जाते। स्वास्थ्य बीमा का मुख्य उद्देश्य अस्पताल और इलाज के स्वीकार्य खर्च का भुगतान करना है। यदि मृत्यु से पहले अस्पताल का कोई दावा लंबित है तो नामित व्यक्ति या कानूनी प्रतिनिधि उस दावे की प्रक्रिया पूरी कर सकता है। लेकिन सामान्य स्वास्थ्य बीमा की पूरी सीमा मृत्यु लाभ नहीं होती। इसके विपरीत जीवन बीमा में मृत्यु होने पर पूर्वनिर्धारित बीमा राशि देय हो सकती है।
मोटर बीमा का सिद्धांत
मोटर बीमा में भी यही सिद्धांत है। कार की बीमा राशि वाहन को हुए नुकसान या तीसरे पक्ष की जिम्मेदारी से जुड़ी होती है। वाहन मालिक की मृत्यु होते ही बीमित मूल्य नामित व्यक्ति को नकद नहीं मिल जाता। यदि पॉलिसी के साथ व्यक्तिगत दुर्घटना सुरक्षा जुड़ी है और उसमें मृत्यु लाभ है, तो उस हिस्से पर नामांकन का प्रश्न अलग से उठ सकता है। इसलिए ‘बीमा में नामित व्यक्ति’ शब्द का अर्थ हर तरह के बीमा में समान नहीं है।
जीवन बीमा में नामित व्यक्ति की पहचान गोपनीय औपचारिकता नहीं। बल्कि करोड़ों रुपये के वित्तीय अधिकार से जुड़ी हो सकती है। इसलिए बीमा खरीदते समय यह सोचकर कोई नाम नहीं लिखना चाहिए कि बाद में देखेंगे। यदि परिवार में पत्नी, बच्चे और बुजुर्ग माता-पिता सभी आर्थिक रूप से निर्भर हैं तो नामांकन भी उसी वास्तविकता के अनुसार सोचना चाहिए।
यहाँ एक और स्थिति महत्वपूर्ण है। यदि नामित व्यक्ति स्वयं पॉलिसीधारक की हत्या का दोषी हो तो केवल नामांकन के आधार पर उसे लाभ मिल जाए, ऐसा कानून का उद्देश्य नहीं है। भारतीय विधि का सामान्य सिद्धांत है कि कोई व्यक्ति अपने ही अपराध से लाभ नहीं उठा सकता। ऐसी परिस्थिति में बीमा कंपनी दावा रोक सकती है और अदालत तथा आपराधिक मामले के परिणाम के आधार पर आगे निर्णय लिया जा सकता है।
2015 का महत्वपूर्ण संशोधन
इस पूरे विषय में वर्ष 2015 का संशोधन इसलिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि उसने पुरानी कानूनी धारणा को आंशिक रूप से बदल दिया। पहले यह कहना अपेक्षाकृत सुरक्षित था कि नामित व्यक्ति केवल भुगतान प्राप्त करने वाला है और अंतिम स्वामित्व उत्तराधिकार कानून से तय होगा। लेकिन अब माता-पिता, पति या पत्नी और बच्चों जैसे निकट संबंधियों को जीवन बीमा में विशेष लाभकारी अधिकार मिल सकता है। इसलिए पुरानी किताबों, पुराने न्यायालयी निर्णयों या इंटरनेट पर चल रहे पुराने लेखों को वर्तमान कानून मान लेना ठीक नहीं है।
फिर भी 2015 का बदलाव यह नहीं कहता कि नामांकन ही सब कुछ है। कर्जदाता के अधिकार, पॉलिसी का हस्तांतरण, विशेष पारिवारिक सुरक्षा वाली पॉलिसी, विवादित वसीयत, नामित व्यक्ति की मृत्यु और दूसरे उत्तराधिकार प्रश्न अभी भी महत्वपूर्ण हैं। इसलिए बीमा की रकम का अंतिम अधिकार कभी-कभी सीधे स्पष्ट होता है और कभी अदालत की व्याख्या की जरूरत पड़ सकती है।
क्या करना चाहिए?
सामान्य परिवार के लिए सबसे सुरक्षित तरीका यह है कि बीमा पॉलिसी का नामांकन और वसीयत एक-दूसरे के विरोध में न छोड़े जाएँ। यदि व्यक्ति चाहता है कि पत्नी को आधी और दोनों बच्चों को चौथाई-चौथाई रकम मिले तो उसकी बीमा व्यवस्था और संपत्ति नियोजन में वही इच्छा साफ दिखाई देनी चाहिए। केवल एक दस्तावेज में एक बात और दूसरे में दूसरी बात लिख देना भविष्य में विवाद पैदा कर सकता है।
बड़ी बीमा पॉलिसी को केवल आर्थिक निवेश नहीं बल्कि परिवार की मृत्यु-पश्चात वित्तीय योजना समझना चाहिए। व्यक्ति जीवित रहते हुए यह तय कर सकता है कि उसकी मृत्यु के बाद परिवार का घर कैसे चलेगा, कौन ऋण चुकाएगा, बच्चों की शिक्षा कैसे होगी और बुजुर्ग माता-पिता का खर्च कहाँ से आएगा। नामांकन इसी योजना का पहला और सबसे सरल कानूनी साधन है।
इसलिए इस प्रश्न का सबसे सटीक उत्तर यह है कि नामित व्यक्ति और कानूनी वारिस दो अलग कानूनी भूमिकाएँ हैं। नामित व्यक्ति को पॉलिसीधारक चुनता है, जबकि कानूनी वारिस को उत्तराधिकार कानून तय करता है। जीवन बीमा में 2015 के बाद माता-पिता, पति या पत्नी और बच्चों जैसे कुछ निकट पारिवारिक नामित व्यक्तियों को विशेष लाभकारी अधिकार मिला है, इसलिए उन्हें हर मामले में केवल रकम पहुँचाने वाला व्यक्ति कहना गलत है। दूसरी ओर हर नामित व्यक्ति अंतिम मालिक भी नहीं होता।
बीमा कंपनी यह तय करती है कि पॉलिसी और अपने अभिलेख के अनुसार रकम किसे भुगतान की जाए। लेकिन परिवार का अंतिम उत्तराधिकार कानून संसद और न्यायालय तय करते हैं। पॉलिसीधारक नामांकन और वसीयत के माध्यम से अपनी इच्छा दर्ज कर सकता है। बैंक या दूसरे कर्जदाता का वैध अधिकार हो तो वह भी प्रभाव डाल सकता है। और जब इन अधिकारों में टकराव हो जाए तो अंतिम फैसला अदालत कर सकती है।
अंततः बीमा पॉलिसी में नामित व्यक्ति का नाम लिखना साधारण कागजी औपचारिकता नहीं है। यह कई बार परिवार की सबसे बड़ी आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा होता है। इसलिए नामांकन करते समय यह समझना चाहिए कि व्यक्ति किसे केवल बीमा कंपनी से पैसा लेने के लिए नामित कर रहा है और किसे वास्तव में उस धन का लाभ देना चाहता है। बीमा में सही नामांकन केवल दावा जल्दी दिलाने का उपाय नहीं।बल्कि मृत्यु के बाद परिवार में विवाद रोकने की महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था भी है।


