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Semiconductor Industry: दुनिया में चिप उद्योग का विस्तार, भारत कहां खड़ा?
Semiconductor Industry Explained: दुनिया के तेजी से बढ़ते सेमीकंडक्टर उद्योग में अमेरिका, ताइवान, दक्षिण कोरिया और चीन की क्या भूमिका है?
Semiconductor Industry Explained
Semiconductor Industry Explained: सेमीकंडक्टर को आज की अर्थव्यवस्था का केवल एक इलेक्ट्रॉनिक पुर्जा समझना सही नहीं होगा। मोबाइल, कंप्यूटर, कार, बिजली नेटवर्क, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा सेंटर, उपग्रह, मिसाइल, रडार, दूरसंचार, चिकित्सा उपकरण, औद्योगिक मशीनें और रोबोट—लगभग पूरी आधुनिक तकनीकी व्यवस्था इसके बिना नहीं चल सकती। पिछली सदी में जिस तरह तेल औद्योगिक और सामरिक शक्ति का आधार था, उसी तरह इस सदी में चिप तकनीक आर्थिक और रणनीतिक शक्ति का एक प्रमुख आधार बन चुकी है।
WSTS के अंतिम आंकड़ों के अनुसार 2025 में दुनिया में सेमीकंडक्टर बिक्री 795.6 अरब डॉलर रही, जो एक वर्ष में 26.2 प्रतिशत बढ़ी। इस तेजी के पीछे कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा सेंटर, लॉजिक चिप और मेमोरी की मांग प्रमुख रही।
2026 की तस्वीर इससे भी बड़ी है। WSTS के नवीनतम पूर्वानुमान के अनुसार वैश्विक सेमीकंडक्टर बाजार 2026 में लगभग 1.51 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है और 2027 में लगभग 1.9 ट्रिलियन डॉलर तक जाने का अनुमान है। 2026 में अकेले मेमोरी क्षेत्र के 800 अरब डॉलर से अधिक होने का अनुमान है। यहां ध्यान रखना चाहिए कि 2025 का आंकड़ा वास्तविक बिक्री है, जबकि 2026 और 2027 के आंकड़े पूर्वानुमान हैं।
इस उद्योग की एक खास बात है—पूरी दुनिया का सेमीकंडक्टर उद्योग किसी एक देश के हाथ में नहीं है। इसकी शक्ति कई देशों में अलग-अलग हिस्सों में बंटी हुई है।
अमेरिका डिजाइन में, ताइवान निर्माण में, कोरिया मेमोरी में
अमेरिका की सबसे बड़ी शक्ति चिप डिजाइन, बौद्धिक संपदा और उच्चस्तरीय प्रोसेसर में है। Nvidia, AMD, Qualcomm, Broadcom जैसी कंपनियां दुनिया की महत्वपूर्ण चिप डिजाइन कंपनियों में हैं। Intel डिजाइन के साथ निर्माण में भी मौजूद है। AI की मौजूदा क्रांति ने अमेरिकी डिजाइन कंपनियों की रणनीतिक अहमियत और बढ़ा दी है।
इसके उलट ताइवान वास्तविक चिप निर्माण, खासकर फाउंड्री कारोबार का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र है। इसका सबसे बड़ा कारण TSMC है। 2026 की दूसरी तिमाही में दुनिया की शीर्ष दस फाउंड्री का संयुक्त राजस्व लगभग 53.49 अरब डॉलर था। इसमें अकेले TSMC की हिस्सेदारी करीब 72.5 प्रतिशत थी। Samsung Foundry लगभग 5.9 प्रतिशत और चीन की SMIC करीब 5.4 प्रतिशत पर थी। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अत्याधुनिक चिप निर्माण में ताइवान की स्थिति कितनी असाधारण है।
दक्षिण कोरिया की ताकत Samsung और SK Hynix जैसी कंपनियों के कारण विशेष रूप से मेमोरी में है। AI के प्रसार के साथ हाई-बैंडविड्थ मेमोरी का महत्व बहुत बढ़ चुका है। जापान की ताकत सेमीकंडक्टर सामग्री, विशेष उपकरणों और कुछ खास प्रकार के सेमीकंडक्टर में है। नीदरलैंड की ASML जैसी कंपनी अत्याधुनिक लिथोग्राफी मशीनों के कारण पूरी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के लिए महत्वपूर्ण है। चीन दूसरी ओर विशाल निवेश, बड़े घरेलू बाजार और SMIC जैसी कंपनियों के जरिए तेजी से अपनी क्षमता बढ़ा रहा है।
उत्पादन कितने कम देशों में केंद्रित है, इसका अंदाजा OECD के आंकड़े से लगाया जा सकता है। सितंबर 2025 में चीन, ताइवान, दक्षिण कोरिया, जापान और अमेरिका के पास मिलकर दुनिया की चालू वेफर निर्माण क्षमता का लगभग 87 प्रतिशत हिस्सा था। भारत अभी इस शीर्ष निर्माण समूह में शामिल नहीं है।
अब मूल सवाल—भारत वास्तव में कहां है?
यहीं भारत की स्थिति दिलचस्प हो जाती है। यदि सवाल हो कि क्या भारत अभी दुनिया की प्रमुख सेमीकंडक्टर निर्माण शक्ति है? तो उत्तर है—नहीं। लेकिन यदि पूछा जाए कि क्या भारत चिप डिजाइन की विश्व शक्ति है? तो तस्वीर बिल्कुल बदल जाती है।
भारत में दुनिया के करीब 20 प्रतिशत सेमीकंडक्टर चिप डिजाइन इंजीनियर काम करते हैं। भारत में सेमीकंडक्टर क्षेत्र के दुनिया के लगभग 7 प्रतिशत वैश्विक क्षमता केंद्र भी हैं। भारतीय इंजीनियर केवल पुरानी चिपों पर काम नहीं कर रहे। बल्कि 2 नैनोमीटर जैसे अत्याधुनिक नोड की चिपों के डिजाइन, सत्यापन और विकास में भी योगदान कर रहे हैं।
इसका सीधा अर्थ है कि भारत की समस्या प्रतिभा की कमी नहीं है। दशकों से भारत में बैठे इंजीनियर दुनिया की बड़ी सेमीकंडक्टर कंपनियों के लिए चिप डिजाइन करते रहे हैं। लेकिन उन डिजाइनों को सिलिकॉन पर बनाने का काम मुख्यतः ताइवान, दक्षिण कोरिया और दूसरे देशों में होता रहा है।
इसे बहुत सरल तरीके से कहें तो—भारत का दिमाग चिप उद्योग में पहले से मौजूद था, अब भारत उस दिमाग के साथ अपनी फैक्टरी भी जोड़ने की कोशिश कर रहा है।
भारत में अब वास्तव में चिप उद्योग में क्या बन चुका है?
यहां 2026 तक महत्वपूर्ण बदलाव आया है। भारत में अब मामला केवल घोषणाओं और प्रस्तावों तक सीमित नहीं है। जुलाई 2026 तक 12 सेमीकंडक्टर विनिर्माण परियोजनाएं स्वीकृत हो चुकी थीं और इनमें कुल प्रस्तावित निवेश 1.64 लाख करोड़ रुपये से अधिक है। इनमें एक सिलिकॉन फैब, एक सिलिकॉन कार्बाइड फैब, एक एकीकृत गैलियम नाइट्राइड माइक्रो-एलईडी डिस्प्ले फैब तथा नौ पैकेजिंग इकाइयां शामिल हैं। इनमें Micron, Kaynes और CG Semi ने वाणिज्यिक उत्पादन शुरू कर दिया है।
लेकिन यहां एक तकनीकी अंतर समझना बहुत जरूरी है। Micron का साणंद संयंत्र वह फैब नहीं है जहां सिलिकॉन वेफर पर मूल चिप बनाई जाती है। वहां Micron के वैश्विक विनिर्माण नेटवर्क से आने वाले DRAM और NAND वेफर की असेंबली और टेस्टिंग करके तैयार उत्पाद बनाए जाते हैं। साणंद इकाई 28 फरवरी, 2026 से परिचालन में है।
भारत के लिए वास्तविक ऐतिहासिक बदलाव गुजरात के धोलेरा में Tata Electronics की सेमीकंडक्टर फैब है। इस परियोजना में करीब 91,526 करोड़ रुपये का निवेश प्रस्तावित है। यह ताइवान की PSMC के तकनीकी सहयोग से स्थापित की जा रही है और इसकी प्रस्तावित क्षमता लगभग 50,000 वेफर स्टार्ट प्रति माह है। सरकार इसे भारत की पहली चिप फैब्रिकेशन फैक्टरी बताती है।
इसके साथ असम में Tata Electronics की करीब 27,120 करोड़ रुपये की पैकेजिंग इकाई, गुजरात में CG Power और Kaynes की परियोजनाएं तथा दूसरे राज्यों में अन्य इकाइयां सेमीकंडक्टर की पूरी श्रृंखला बनाने की दिशा में काम कर रही हैं।
लेकिन भारत और ताइवान के बीच असली अंतर यहीं दिखाई देता है
भारत की पहली बड़ी सिलिकॉन फैब का शुरुआती तकनीकी दायरा 28 से 110 नैनोमीटर है। सरकार ने Semicon 2.0 में भी कहा है कि यात्रा 28–110 nm नोड से शुरू हुई है और अगला लक्ष्य अधिक उन्नत नोड की दिशा में आगे बढ़ना है। पहली फैब को 2028 में चालू करने का लक्ष्य है।
इसका अर्थ यह नहीं कि 28 नैनोमीटर की चिप पुरानी होने के कारण बेकार है। यह एक आम गलतफहमी है। हर काम के लिए 2 या 3 नैनोमीटर चिप की जरूरत नहीं होती। कार, औद्योगिक उपकरण, बिजली प्रबंधन, दूरसंचार, घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा प्रणालियों और अनेक दूसरे क्षेत्रों में 28, 40, 65, 90 नैनोमीटर और उससे पुराने नोड की चिपों की भारी मांग बनी रहती है।
लेकिन जब बात सबसे उन्नत AI प्रोसेसर, GPU, अत्याधुनिक स्मार्टफोन प्रोसेसर और उच्च प्रदर्शन कंप्यूटिंग की आती है तो 2–5 नैनोमीटर श्रेणी महत्वपूर्ण हो जाती है। यहां भारत अभी निर्माता नहीं है।
इसलिए भारत में भारतीय इंजीनियर का 2 नैनोमीटर चिप डिजाइन करना और भारत की फैक्टरी में 2 नैनोमीटर चिप बनना एक बात नहीं है। पहली क्षमता भारत के पास है, दूसरी अभी विकसित नहीं हुई है।
भारत ने पैकेजिंग पर इतना जोर क्यों दिया है?
यह भारत की सेमीकंडक्टर रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत केवल बड़ी फैब स्थापित करने की प्रतीक्षा नहीं कर रहा। बल्कि ATMP/OSAT यानी चिप असेंबली, परीक्षण और पैकेजिंग में तेजी से क्षमता खड़ी कर रहा है। स्वीकृत 12 निर्माण परियोजनाओं में नौ पैकेजिंग से जुड़ी हैं।
पहले पैकेजिंग को चिप उद्योग का अपेक्षाकृत कम तकनीकी हिस्सा समझा जाता था। लेकिन AI और चिपलेट के दौर में उन्नत पैकेजिंग स्वयं बहुत महत्वपूर्ण तकनीक बन गई है। अलग-अलग प्रोसेसर, मेमोरी और चिपलेट को अत्यधिक गति से एक-दूसरे से जोड़ना अब प्रदर्शन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इसलिए भारत की वैश्विक सेमीकंडक्टर उद्योग में पहली बड़ी औद्योगिक पहचान संभवतः डिजाइन + असेंबली + परीक्षण + उन्नत पैकेजिंग के संयोजन से बनेगी और उसके बाद फैब्रिकेशन का हिस्सा मजबूत होगा।
भारत की चार बड़ी ताकतें
भारत की पहली और सबसे स्पष्ट ताकत मानव संसाधन है। यदि विश्व के लगभग पांचवें चिप डिजाइन इंजीनियर भारत में काम कर रहे हैं, तो भारत को तकनीकी प्रतिभा शून्य से विकसित नहीं करनी है। दूसरी ताकत विशाल घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार है। तीसरी ताकत मोबाइल फोन, वाहन, रक्षा, दूरसंचार, बिजली, डेटा सेंटर और औद्योगिक इलेक्ट्रॉनिक्स के विस्तार से लगातार बढ़ती चिप मांग है। चौथी ताकत अमेरिका, जापान, यूरोप, ताइवान और अन्य तकनीकी अर्थव्यवस्थाओं की कंपनियों के साथ भारत की मौजूदा औद्योगिक साझेदारियां हैं।
लेकिन दूसरी तरफ एक फैब केवल अरबों डॉलर की मशीनों से बनी इमारत नहीं होती। उसके आसपास अति-शुद्ध पानी, अत्यंत विश्वसनीय बिजली, विशेष गैसें, रसायन, सिलिकॉन वेफर, फोटोरेजिस्ट, निर्माण उपकरण, प्रशिक्षित तकनीशियन, अनुसंधान केंद्र और सैकड़ों विशेष आपूर्तिकर्ताओं का पूरा तंत्र चाहिए। ताइवान, दक्षिण कोरिया और जापान ने यह व्यवस्था कई दशकों में विकसित की है। भारत अब उस पारिस्थितिकी तंत्र को तेज गति से खड़ा करने की कोशिश कर रहा है।
Semicon 2.0 इसलिए महत्वपूर्ण है
पहले Semicon India Programme का परिव्यय ₹76,000 करोड़ था। 2026 में Semicon 2.0 के लिए ₹1,27,500 करोड़ स्वीकृत किए गए। इसके छह प्रमुख स्तंभ हैं—डिजाइन, मशीनें और सामग्री, नई फैब, ATMP/OSAT, अनुसंधान एवं विकास तथा प्रतिभा विकास।
यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि केवल विदेशी कंपनियों को भारत में फैक्टरी लगाने के लिए आर्थिक सहायता देना दीर्घकाल में पर्याप्त नहीं होगा। किसी देश को वास्तविक सेमीकंडक्टर शक्ति बनने के लिए अपनी चिप बौद्धिक संपदा, उत्पाद कंपनियां, निर्माण उपकरण, विशेष रसायन और सामग्री, पैकेजिंग तकनीक तथा अंततः उन्नत वेफर निर्माण प्रक्रिया भी विकसित करनी पड़ती है।भारत की अगली परीक्षा इसी मोर्चे पर होगी।
तो भारत को दुनिया में किस स्थान पर रखें?
सेमीकंडक्टर में भारत को एक संख्या देकर, जैसे पांचवें या दसवें स्थान पर बताना, सही तस्वीर नहीं देगा। डिजाइन और निर्माण में भारत की स्थिति इतनी अलग है कि क्षेत्रवार स्थिति देखना अधिक उपयोगी है।
क्षेत्र भारत की वर्तमान स्थिति
चिप डिजाइन प्रतिभा विश्व स्तर पर बहुत मजबूत, करीब 20% वैश्विक डिजाइन कार्यबल भारत में
वैश्विक कंपनियों के डिजाइन/R&D केंद्र मजबूत
भारतीय स्वामित्व वाली वैश्विक चिप उत्पाद कंपनियां अभी सीमित
सिलिकॉन वेफर फैब्रिकेशन अभी शुरुआती अवस्था
अत्याधुनिक 2–5 nm निर्माण वर्तमान में घरेलू व्यावसायिक क्षमता नहीं
28–110 nm निर्माण बड़ी क्षमता निर्माणाधीन
असेंबली, परीक्षण और पैकेजिंग तेजी से उभरता क्षेत्र
सेमीकंडक्टर मशीन निर्माण बहुत शुरुआती अवस्था
विशेष सामग्री/रसायन आपूर्ति श्रृंखला विकासशील
घरेलू मांग बहुत बड़ी और तेजी
भारत की स्थिति को एक वाक्य में समझना हो तो
भारत अभी सेमीकंडक्टर निर्माण महाशक्ति नहीं है,य। लेकिन वह दुनिया की प्रमुख सेमीकंडक्टर डिजाइन प्रतिभा वाला देश है और अब उसी डिजाइन क्षमता को घरेलू निर्माण, पैकेजिंग और तकनीकी स्वामित्व में बदलने की कोशिश कर रहा है।
2026 में भारत को ताइवान, दक्षिण कोरिया, चीन, जापान या अमेरिका जैसी स्थापित निर्माण शक्ति के बराबर रखना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। दुनिया की 87 प्रतिशत चालू वेफर क्षमता अभी पांच प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में केंद्रित है और भारत उनमें शामिल नहीं है। दूसरी तरफ भारत को केवल चिप आयात करने वाला देश कहना भी उतना ही अधूरा होगा, क्योंकि दुनिया की करीब पांचवीं सेमीकंडक्टर डिजाइन प्रतिभा भारत में काम करती है और भारतीय इंजीनियर अत्याधुनिक नोड तक के वैश्विक उत्पादों के विकास में शामिल हैं।
इसलिए भारत की मौजूदा स्थिति को सबसे ठीक ढंग से “डिजाइन शक्ति से सेमीकंडक्टर निर्माण शक्ति बनने का संक्रमण काल” कहा जा सकता है। भारत में पैकेजिंग और परीक्षण का वाणिज्यिक उत्पादन शुरू हो चुका है, 12 निर्माण परियोजनाएं स्वीकृत हैं, ₹1.64 लाख करोड़ से अधिक का निवेश जुड़ा है और पहली बड़ी सिलिकॉन फैब 2028 के लिए निर्धारित है।
अगले पांच से दस वर्ष इसीलिए निर्णायक होंगे। यदि भारत अपनी मौजूदा डिजाइन प्रतिभा को भारतीय बौद्धिक संपदा, स्वदेशी चिप उत्पाद कंपनियों, उन्नत पैकेजिंग, मशीन और सामग्री उद्योग तथा सफल वेफर फैब्रिकेशन से जोड़ पाता है, तो वैश्विक सेमीकंडक्टर मूल्य श्रृंखला में उसका स्थान बहुत मजबूत हो सकता है। यदि वह मुख्यतः विदेशी कंपनियों के डिजाइन केंद्र और कुछ आयातित तकनीक आधारित निर्माण इकाइयों तक सीमित रहता है, तो तकनीकी निर्भरता बनी रहेगी। भारत के पास इस दौड़ में उतरने के लिए सबसे कठिन संसाधनों में से एक—प्रतिभा—पहले से मौजूद है; अब असली चुनौती उस प्रतिभा को अपनी तकनीक, अपनी चिप और बड़े पैमाने के घरेलू निर्माण में बदलने की है।

