Share Market History: शेयर बाजार में ‘बुल’ और ‘बियर’ के प्रतीक क्यों अपनाए गए?

Share Market History: शेयर बाजार में तेजी के लिए बुल और गिरावट के लिए बियर शब्द क्यों इस्तेमाल होते हैं?

Yogesh Mishra
Published on: 25 Sept 2026 4:31 PM IST
Share Market History Bull Batting Explained in Hindi
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Share Market History Bull Batting Explained in Hindi

Share Market History: शेयर बाजार की दुनिया में दो जानवर लगभग पूरी बाजार की मनोदशा बता देते हैं, बुल यानी सांड और बियर यानी भालू। बाजार लगातार ऊपर जा रहा हो तो उसे ‘बुल मार्केट’ कहा जाता है और लंबे समय तक गिरावट का दौर हो तो ‘बियर मार्केट’। तेजी की उम्मीद रखने वाला निवेशक ‘बुलिश’ और गिरावट की आशंका रखने वाला ‘बियरिश’ कहलाता है। मुंबई में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के बाहर सांड़ की विशाल प्रतिमा हो या न्यूयॉर्क की मशहूर ‘चार्जिंग बुल’, दुनिया के वित्तीय केंद्रों में सांड़ बाजार की ताकत और तेजी का लोकप्रिय प्रतीक बन चुका है।

आमतौर पर इसकी एक आसान कहानी सुनाई जाती है। कहा जाता है कि सांड़ हमला करते समय अपने सींगों को नीचे से ऊपर की ओर उछालता है, इसलिए वह चढ़ते बाजार का प्रतीक है। भालू पंजा ऊपर से नीचे मारता है, इसलिए वह गिरते बाजार का प्रतीक बन गया। यह कहानी प्रतीकों को याद रखने के लिए बिल्कुल सही बैठती है, लेकिन इनके इतिहास की असली कहानी इससे कहीं पुरानी और ज्यादा दिलचस्प है। खास बात यह है कि वित्तीय दुनिया में ‘बियर’ शब्द ‘बुल’ से पहले आया था। और इसकी जड़ किसी शेयर बाजार के नियम में नहीं, बल्कि भालू की खाल से जुड़ी एक पुरानी अंग्रेजी कहावत में मिलती है।

कहानी पहले ‘बियर’ से शुरू होती है

ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार वित्तीय अर्थ में बियर (bear) शब्द के इस्तेमाल के प्रमाण बुल (bull) से पहले मिलते हैं। इसकी जड़ एक पुरानी अंग्रेजी कहावत में मानी जाती है: ‘sell the bear’s skin before one has caught the bear’, यानी भालू को पकड़े बिना ही उसकी खाल बेच देना। हिंदी में इसका मतलब लगभग यही होगा कि हाथ में चीज आने से पहले ही उसे बेचने का सौदा कर लेना।

सत्रहवीं और अठारहवीं सदी के दौरान यह कहावत ऐसे लोगों के लिए इस्तेमाल होने लगी जो ऐसी चीज बेचने का सौदा कर रहे थे जो उस समय उनके पास थी ही नहीं। भालू की खाल उस दौर में वास्तविक व्यापारिक वस्तु थी। इसलिए ‘bearskin’ या ‘bearskin jobber’ जैसे शब्द उन कारोबारियों और सट्टेबाजों के लिए इस्तेमाल होने लगे जो भविष्य में मिलने वाली वस्तु या प्रतिभूति को पहले बेचने जैसी गतिविधियों में शामिल थे। धीरे-धीरे ‘bearskin’ छोटा होकर सिर्फ ‘bear’ रह गया।

यहीं से शेयर बाजार की आधुनिक भाषा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा पैदा हुआ। उस समय ‘बियर’ का मतलब सीधे-सीधे यह नहीं था कि बाजार गिर रहा है। इसका संबंध पहले ऐसे व्यक्ति से था जो कीमत गिरने की उम्मीद में पहले बेचने की कोशिश कर रहा था।

यानी आज के ‘शॉर्ट सेलर’ जैसा विचार

इसे आज के उदाहरण से समझना आसान है। मान लीजिए किसी कंपनी का शेयर 1,000 रुपये पर कारोबार कर रहा है और आपको लगता है कि इसकी कीमत घटकर 800 रुपये हो जाएगी। शॉर्ट सेलिंग की व्यवस्था में आप शेयर उधार लेकर उसे 1,000 रुपये पर बेच सकते हैं और बाद में कीमत गिरने पर 800 रुपये में खरीदकर वह शेयर वापस कर सकते हैं। इस स्थिति में अंतर आपका संभावित लाभ हो सकता है। लेकिन अगर शेयर 1,200 रुपये का हो गया तो आपको नुकसान होगा। पुराने समय में बाजार की व्यवस्था आज जैसी नहीं थी, लेकिन विचार कुछ ऐसा ही था। व्यक्ति ऐसी चीज बेचने की स्थिति बना रहा था जो फिलहाल उसके पास नहीं थी, क्योंकि उसे उम्मीद थी कि बाद में वह चीज सस्ती मिल जाएगी। इसलिए ‘भालू पकड़ा भी नहीं और उसकी खाल बेच दी’ वाला मुहावरा ऐसे सट्टेबाज के लिए बहुत सटीक बैठता था। वेबस्टर डिक्शनरी भी वित्तीय अर्थ में बियर शब्द की उत्पत्ति को इसी पुराने ‘bearskin’ मुहावरे और सट्टेबाजी से जोड़ती है।

फिर ‘बुल’ कहां से आया?

जब गिरती कीमत पर दांव लगाने वाले के लिए ‘बियर’ शब्द प्रचलित हो गया तो उसके विपरीत सोच रखने वाले बाजार खिलाड़ी के लिए भी एक शब्द की जरूरत थी। अठारहवीं सदी के शुरुआती दौर तक बुल और बियर वित्तीय दुनिया में एक-दूसरे के विपरीत शब्दों के रूप में इस्तेमाल होने लगे थे। ‘बुल’ उस व्यक्ति के लिए कहा जाने लगा जिसे कीमत बढ़ने की उम्मीद थी और जो उसी उम्मीद के आधार पर बाजार में सौदा करता था। लेकिन ‘बियर’ की उत्पत्ति के मुकाबले ‘बुल’ शब्द की उत्पत्ति को लेकर कोई एक ऐसी कहानी नहीं है जिसे पूरी तरह प्रमाणित माना जा सके। एक लोकप्रिय व्याख्या यह है कि उस समय इंग्लैंड में ‘बुल बेटिंग’ (bull baiting) और बियर बेटिंग (bear-baiting) जैसे जानवरों के खेल लोगों के बीच परिचित थे। सांड़ और भालू पहले से ही एक-दूसरे के विरोधी जानवरों के रूप में कल्पना में मौजूद थे। ऐसे में बियर के विपरीत बाजार पक्ष के लिए बुल शब्द का इस्तेमाल स्वाभाविक हो सकता था।

आज शेयर बाजार समझाने के लिए सबसे लोकप्रिय दृश्य यही है कि सांड़ सींगों से नीचे से ऊपर की ओर हमला करता है और भालू पंजे से ऊपर से नीचे वार करता है। इसलिए सांड़ तेजी और भालू गिरावट का प्रतीक बन गया। सींग और पंजे वाली कहानी संभवतः बाद के दौर में इन दो प्रतीकों को समझाने का सुविधाजनक दृश्य रूपक बन गई।

अठारहवीं सदी में बाजार की भाषा आम हो गई

अठारहवीं सदी के शुरुआती वर्षों तक बुल और बियर लंदन के वित्तीय बाजार में इतने परिचित हो चुके थे कि साहित्य और व्यंग्य लेखन में भी इनका इस्तेमाल होने लगा था। उस समय ब्रिटेन में शेयर बाजार आज के इलेक्ट्रॉनिक बाजार जैसा नहीं था। लंदन के कॉफी हाउस और दूसरे व्यापारिक ठिकाने वित्तीय सौदों और सूचनाओं के बड़े केंद्र थे। शेयर, सरकारी ऋण और दूसरे व्यापारिक दावों के सौदों के साथ-साथ बाजार की अपनी भाषा भी इन्हीं जगहों पर विकसित हो रही थी। 1720 का ‘साउथ सी बबल’ इस कहानी में खास महत्व रखता है। उस समय साउथ सी कंपनी के शेयरों में जबरदस्त सट्टा हुआ। कीमतें तेजी से बढ़ीं और फिर भारी गिरावट आई। इस पूरे घटनाक्रम ने उस समय की वित्तीय भाषा और सट्टेबाजी से जुड़े शब्दों को और लोकप्रिय बनाया। यही वह दौर था जब बुल और बियर सिर्फ किसी जानवर के नाम नहीं रह गए थे। वे बाजार में अलग-अलग उम्मीद रखने वाले लोगों के लिए पहचाने जाने वाले शब्द बन चुके थे।

‘बुल’ और ‘बियर’ पहले व्यक्ति थे, फिर पूरा बाजार बन गए

शुरुआत में बुल और बियर का इस्तेमाल बाजार में शामिल व्यक्ति या उसकी स्थिति के लिए ज्यादा होता था। बुल वह था जो कीमत बढ़ने की उम्मीद कर रहा था और बियर वह जो गिरावट की उम्मीद में था। बाद में यही शब्द पूरे बाजार की दिशा बताने लगे। आज अगर कोई कहता है, ‘मैं इस कंपनी के शेयर पर बुलिश हूं’, तो उसका मतलब है कि उसे लगता है कि शेयर की कीमत आगे बढ़ सकती है। अगर कोई कहता है कि वह किसी शेयर पर बियरिश है, तो उसका मतलब है कि उसे गिरावट की आशंका है। यही भाषा शेयरों से आगे बढ़कर सोना, कच्चा तेल, मुद्रा, बॉन्ड, बिटकॉइन और दूसरी संपत्तियों के लिए भी इस्तेमाल होने लगी। यह सिर्फ बाजार की दिशा को लेकर व्यक्ति की सोच बताता है। बियर को गिरावट की आशंका इसलिए हो सकती है क्योंकि उसे लगता है कि किसी संपत्ति की कीमत बहुत ज्यादा बढ़ चुकी है। दूसरी तरफ बुल की तेजी की उम्मीद सही भी हो सकती है और गलत भी।

क्या 20 प्रतिशत गिरते ही बाजार ‘बियर मार्केट’ बन जाता है?

वित्तीय खबरों में अक्सर कहा जाता है कि किसी व्यापक बाजार सूचकांक का अपने हाल के सबसे ऊंचे स्तर से 20 प्रतिशत या ज्यादा गिरना ‘बियर मार्केट’ माना जाता है। इसी तरह 20 प्रतिशत या उससे ज्यादा की बढ़त को ‘बुल मार्केट’ कहने का चलन भी है। लेकिन यह कोई प्रकृति का नियम या पूरी दुनिया में लागू होने वाली कानूनी परिभाषा नहीं है। अलग-अलग संस्थाएं बाजार के चक्र की शुरुआत और अंत तय करने के लिए अलग तरीके अपना सकती हैं। इसलिए 19.9 प्रतिशत की गिरावट और 20 प्रतिशत की गिरावट के बीच कोई जादुई सीमा नहीं है। 20 प्रतिशत एक प्रचलित वित्तीय पैमाना है, जिसका इस्तेमाल बाजार की बड़ी गिरावट या तेजी को समझाने के लिए किया जाता है।

बुल और बियर बाजार के मनोविज्ञान के भी प्रतीक हैं

इन दोनों शब्दों की लोकप्रियता सिर्फ इसलिए नहीं है कि बाजार ऊपर या नीचे जाता है। वे निवेशकों की सामूहिक मनोदशा को भी व्यक्त करते हैं। लंबे समय तक बाजार बढ़ता रहे तो निवेशकों में भरोसा और उत्साह बढ़ सकता है। बढ़ती कीमतें नए लोगों को बाजार में ला सकती हैं। नए खरीदार मांग बढ़ाते हैं और इससे कीमतें और ऊपर जा सकती हैं। कुछ समय बाद किसी निवेशक को यह लगने लग सकता है कि उसने बाजार की चाल समझ ली है, जबकि उसके मुनाफे का एक हिस्सा सिर्फ तेजी के माहौल का परिणाम हो सकता है। गिरते बाजार में इसका उलटा दिखाई दे सकता है। लगातार गिरती कीमतें डर पैदा करती हैं। कुछ निवेशक नुकसान से बचने के लिए बेचते हैं। ज्यादा बिक्री से कीमतों पर और दबाव पड़ सकता है। नकारात्मक खबरें और बढ़ती चिंता इस माहौल को और मजबूत कर सकती हैं। यानी बाजार निवेशकों की भावनाओं को प्रभावित करता है और निवेशकों का व्यवहार बाजार को प्रभावित कर सकता है। बुल और बियर इसी दोतरफा रिश्ते के आसान प्रतीक बन गए हैं।

वॉल स्ट्रीट का ‘चार्जिंग बुल’ सदियों पुराना नहीं है

बुल की सबसे प्रसिद्ध आधुनिक तस्वीरों में न्यूयॉर्क का ‘चार्जिंग बुल’ शामिल है। लेकिन यह मूर्ति उस समय की नहीं है जब बुल शब्द वित्तीय भाषा में आया था। इतालवी-अमेरिकी कलाकार अर्तुरो डी मोडिका ने इसे 1987 के शेयर बाजार हादसे के बाद बनाया था। दिसंबर 1989 में उन्होंने इसे बिना आधिकारिक अनुमति न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज के सामने रख दिया। बाद में इसे हटाकर बोलिंग ग्रीन के पास स्थापित किया गया। आज यह न्यूयॉर्क के वित्तीय इलाके की सबसे पहचानने योग्य कलाकृतियों में शामिल है।

मुंबई में भी सांड़ बाजार का प्रतीक क्यों है?

भारत में भी ‘बुल’ शेयर बाजार की तेजी, शक्ति और निवेशकों के भरोसे का लोकप्रिय प्रतीक है। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के परिसर में मौजूद सांड़ की प्रतिमा इसी वैश्विक वित्तीय प्रतीकवाद का हिस्सा है। भारतीय शेयर बाजार की भाषा में भी ‘बुल’, ‘बियर’, ‘बुलिश’ और ‘बियरिश’ रोजमर्रा के शब्द बन चुके हैं। लेकिन इन शब्दों की जड़ भारत के आधुनिक शेयर बाजार में नहीं है। इनकी कहानी यूरोप के पुराने व्यापारिक और सट्टेबाजी वाले बाजारों तक जाती है।

बुल और बियर की कहानी इसलिए खास है क्योंकि यह बताती है कि वित्तीय भाषा कितनी धीरे और दिलचस्प तरीके से विकसित होती है। शुरुआत किसी आधुनिक शेयर बाजार के लोगो से नहीं हुई थी। पहले एक पुरानी कहावत थी, भालू को पकड़े बिना उसकी खाल बेच देना। फिर यह कहावत उन सट्टेबाजों से जुड़ी जो ऐसी चीज पहले बेचने की कोशिश करते थे जो उस समय उनके पास नहीं थी। बियरस्किन से बियर बना और यह शब्द गिरती कीमत की उम्मीद रखने वाले बाजार खिलाड़ी के लिए इस्तेमाल होने लगा। इसके विपरीत तेजी की उम्मीद रखने वाले खिलाड़ी के लिए बुल शब्द स्थापित हो गया। अठारहवीं सदी के वित्तीय बाजारों और सट्टेबाजी ने दोनों शब्दों को और लोकप्रिय बनाया। धीरे-धीरे किसी एक व्यक्ति की बाजार संबंधी सोच बताने वाले ये शब्द पूरे बाजार की दिशा बताने लगे। यानी शेयर बाजार की भाषा में जंगल का भालू और सांड़ बहुत बाद में आए, पहले आया था इंसान का लालच, उम्मीद और भविष्य की कीमत का अनुमान।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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