Share Market Analysis: शेयर बाजार में 'लॉट साइज़' और 'सर्किट लिमिट' कौन तय करता है?

Share Market Analysis: शेयर बाजार में लॉट साइज़ और सर्किट लिमिट कैसे तय होती है? जानिए SEBI, NSE और BSE की भूमिका, F&O लॉट साइज़, प्राइस बैंड और Market-Wide Circuit Breaker का पूरा गणित।

Yogesh Mishra
Published on: 14 Aug 2026 6:47 PM IST
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Share Market Analysis in Hindi: शेयर बाजार में अक्सर सुनने को मिलता है - 'इस शेयर में 5 प्रतिशत का सर्किट लग गया,' 'निफ्टी का लॉट साइज़ बदल गया,' या 'आज मार्केट में सर्किट ब्रेकर लग सकता है।' आम निवेशक के लिए ये सब एक ही नियामक व्यवस्था का हिस्सा लगते हैं, पर असल में इनके पीछे अलग-अलग नियम काम करते हैं। सेबी (SEBI) व्यापक नियामक ढाँचा और जोखिम-सुरक्षा के नियम तय करता है, जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) जैसे एक्सचेंज उन्हीं नियमों के भीतर वास्तविक अनुबंध, लॉट साइज़, प्राइस बैंड और दैनिक संचालन लागू करते हैं। इसलिए यह कहना कि 'हर शेयर का लॉट साइज़ SEBI तय करता है' अधूरा है, और यह कहना कि 'NSE अपनी इच्छा से जो चाहे लॉट बना देता है' गलत है। असली व्यवस्था दोनों के बीच बँटी हुई है।

लॉट साइज़ असल में क्या है

सामान्य नकद बाजार में शेयर खरीदने के लिए प्रायः लॉट साइज़ की बाध्यता नहीं होती। आप एक शेयर भी खरीद सकते हैं। जिस 'लॉट साइज़' की चर्चा सबसे अधिक होती है, वह मुख्यतः वायदा और विकल्प (Futures & Options) अनुबंधों में है। यदि किसी सूचकांक का लॉट 50 है, तो उसका एक विकल्प अनुबंध (F&O) 50 इकाइयों का प्रतिनिधित्व करेगा। यह व्यवस्था इसलिए बनाई जाती है कि डेरिवेटिव अनुबंधों का आर्थिक आकार अत्यधिक छोटा या बड़ा न हो और बाजार का जोखिम नियंत्रित रहे।

SEBI का गणित: सूचकांक अनुबंध

अक्टूबर 2024 में SEBI ने सूचकांक डेरिवेटिव बाजार में छोटे निवेशकों के अत्यधिक सट्टे को देखते हुए अनुबंध का न्यूनतम मूल्य बढ़ाया। नए ढाँचे के अनुसार सूचकांक डेरिवेटिव अनुबंध का मूल्य कम-से-कम ₹15 लाख होना चाहिए, और लॉट साइज़ इस तरह तय होता है कि अनुबंध मूल्य सामान्यतः ₹15–20 लाख के बीच रहे। लॉट की इकाइयाँ 5 के गुणक में और सामान्यतः 10 से कम नहीं रखी जातीं। यह व्यवस्था 20 नवंबर, 2024 के बाद के नए सूचकांक अनुबंधों पर लागू हुई।

इसे सरल गणित से समझें। यदि निफ्टी 25,000 पर है और अनुबंध मूल्य ₹15–20 लाख के दायरे में रखना है, तो 25,000 × 60 = ₹15 लाख और 25,000 × 75 = ₹18.75 लाख होगा। इसलिए 60 या 75 जैसी लॉट संख्या इस दायरे में आ सकती है। पर इसका मतलब यह नहीं कि SEBI रोज निफ्टी देखकर नया लॉट तय करता है। वह नियामकीय दायरा देता है, और एक्सचेंज निर्धारित समीक्षा प्रक्रिया से वास्तविक लॉट तय करता है।

यही वजह है कि निफ्टी, बैंक निफ्टी जैसे सूचकांकों का लॉट समय-समय पर बदलता है। अक्टूबर 2024 में NSE ने नए ढाँचे के अनुसार Nifty 50 का लॉट 25 से बढ़ाकर 75, Bank Nifty का 15 से 30, FinNifty का 25 से 65 और Midcap Nifty का 50 से 120 किया था। इसलिए किसी पुराने वीडियो में अलग संख्या मिले तो जरूरी नहीं वह गलत हो। लॉट समय के साथ संशोधित होता रहता है।

SEBI के नियम के अनुसार एक्सचेंज हर छह महीने में लॉट साइज़ की समीक्षा करते हैं, जिसके लिए पिछले एक महीने के औसत बंद स्तर का उपयोग होता है। मूल्य बढ़ने पर लॉट घट सकता है, गिरने पर बढ़ सकता है। संशोधन की सूचना कम-से-कम दो सप्ताह पहले देनी होती है।

लॉट साइज़ असल में जोखिम नियंत्रण का औजार है। यदि अनुबंध का मूल्य बहुत छोटा हो, तो छोटे निवेशक भी अत्यधिक leverage लेकर बड़ी संख्या में अनुबंध ले सकते हैं, जिससे मामूली पूँजी पर बड़ा जोखिम बनता है। यदि अनुबंध बहुत बड़ा हो जाए तो सामान्य भागीदारी मुश्किल हो जाती है।

व्यक्तिगत शेयरों का F&O लॉट

व्यक्तिगत शेयरों में गणित थोड़ा अलग है। SEBI के नियमों के अनुसार स्टॉक डेरिवेटिव अनुबंध शुरू होते समय कम-से-कम ₹5 लाख का होना चाहिए, और समीक्षा में लॉट ऐसा रखा जाता है कि अनुबंध मूल्य सामान्यतः ₹5–10 लाख के बीच रहे। सामान्यतः लॉट 25 के गुणक में और कम-से-कम 50 इकाइयों का होता है, पर बहुत महँगे शेयरों में छोटे गुणक और 5 इकाइयों तक का लॉट भी संभव है।

उदाहरण: किसी शेयर की कीमत ₹1,000 है और लॉट 500 शेयर है, तो अनुबंध मूल्य ₹5 लाख होगा। कीमत ₹2,000 हो जाए तो वही 500 शेयर ₹10 लाख के हो जाएँगे, और आगे बढ़ने पर अगली समीक्षा में लॉट घटाया जा सकता है। कीमत गिरे तो लॉट बढ़ाया जा सकता है। यानी लॉट साइज़ कंपनी की 'प्रतिष्ठा' नहीं, अनुबंध मूल्य का गणित तय करता है।

सर्किट लिमिट: तीन अलग व्यवस्थाएँ

सर्किट को समझने के लिए तीन अलग चीज़ें अलग करनी जरूरी हैं। किसी एक शेयर का दैनिक प्राइस बैंड, F&O वाले शेयरों का गतिशील परिचालन दायरा, और पूरे बाजार का Market-Wide Circuit Breaker। मीडिया में अक्सर तीनों को 'सर्किट' कह दिया जाता है, जिससे भ्रम पैदा होता है।

साधारण शेयर में यदि पिछला बंद भाव ₹100 है और 10 प्रतिशत का प्राइस बैंड है, तो उस दिन शेयर ₹90 से नीचे या ₹110 से ऊपर व्यापार नहीं कर सकता। ₹110 पर खरीदार हों पर बेचने वाला न हो तो कहा जाता है शेयर 'ऊपरी सर्किट पर लॉक' हुआ। NSE के अनुसार नकद बाजार में विभिन्न प्रतिभूतियों पर 2, 5, 10 और सामान्य श्रेणी में 20 प्रतिशत तक के दैनिक प्राइस बैंड लागू हो सकते हैं।

ध्यान दें, अपर सर्किट का मतलब खरीद-बिक्री पूरी तरह बंद होना नहीं। इसका मतलब है कि उस दिन की तय सीमा से ऊपर नया सौदा नहीं हो सकता; उस सीमा पर सौदे होते रह सकते हैं। प्राइस बैंड का उद्देश्य है कि अफवाह, हेरफेर या घबराहट से किसी कम तरल शेयर का भाव कुछ मिनटों में बहुत ज्यादा न बदल जाए।

बैंड का प्रतिशत एक्सचेंज की निगरानी व्यवस्था के पूर्वनिर्धारित मानदंडों और SEBI के ढाँचे में तय होता है। नीचे की ओर समीक्षा दैनिक आधार पर हो सकती है, जबकि ऊपर की ओर संशोधन तय प्रक्रिया से होता है। यदि किसी शेयर में असामान्य तेजी या संदिग्ध कारोबार दिखे तो निगरानी व्यवस्था उसका बैंड 20 से घटाकर 10, 5 या 2 प्रतिशत तक सख्त कर सकती है। उद्देश्य कंपनी को सजा देना नहीं, बल्कि अस्थिरता और संभावित हेरफेर रोकना है।

जिन शेयरों पर F&O उपलब्ध है, उन पर सामान्य स्थिर बैंड लागू नहीं होता। इनके लिए 10 प्रतिशत का गतिशील परिचालन दायरा होता है, जिसे तय परिस्थितियों में बढ़ाया जा सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि F&O वाले शेयर आमतौर पर अधिक तरल होते हैं, और नकद व डेरिवेटिव बाजार के भाव में तालमेल बनाए रखना जरूरी है।

पूरे बाजार का सर्किट ब्रेकर

सबसे बड़ा स्तर है पूरे भारतीय बाजार का Market-Wide Circuit Breaker, जो SEBI ने 2001 से लागू किया। इसमें Nifty 50 या Sensex में से जो पहले 10, 15 या 20 प्रतिशत की सीमा पार करे, उसके आधार पर पूरे इक्विटी और डेरिवेटिव बाजार में विराम लग सकता है।

10 प्रतिशत की चाल दोपहर 1 बजे से पहले आए तो बाजार 45 मिनट रुकता है, फिर 15 मिनट का पूर्व-खुला सत्र होता है। 1 से 2:30 बजे के बीच आए तो 15 मिनट का विराम होता है। 2:30 बजे के बाद अलग से रोकना जरूरी नहीं। 15 प्रतिशत की चाल 1 बजे से पहले आए तो बाजार 1 घंटा 45 मिनट बंद रहता है; 1 से 2 बजे के बीच 45 मिनट का विराम; 2 बजे के बाद पूरे दिन का कारोबार बंद हो जाता है। 20 प्रतिशत की चाल किसी भी समय आए तो उस दिन बाजार पूरी तरह बंद हो जाता है। यह व्यवस्था ऊपर और नीचे दोनों दिशाओं में समान लागू होती है। सर्किट सिर्फ गिरावट नहीं, अत्यधिक तेजी भी रोकता है।

सर्किट ब्रेकर रुकने का मकसद यह है कि किसी अप्रत्याशित घटना पर एल्गोरिदमिक कारोबार, मार्जिन कॉल और घबराई बिकवाली एक-दूसरे को बढ़ाती न रहें।बाजार को कुछ समय मिलता है ताकि सूचना समझी जाए। पर सर्किट शेयर का वास्तविक मूल्य तय नहीं करता; अगर किसी कंपनी की खबर वाकई बहुत बुरी है तो एक दिन का लोअर सर्किट उसे बचा नहीं सकता, अगले दिन फिर सर्किट लग सकता है। यानी सर्किट गिरावट रोकता नहीं, उसकी गति नियंत्रित करता है।

SEBI और एक्सचेंज की भूमिका

SEBI निवेशकों की सुरक्षा और बाजार के नियमन के लिए बना नियामक है, पर वह हर सौदे में सीधे शामिल नहीं होता। एक्सचेंज स्वयं भी प्रथम स्तर के नियामक की भूमिका निभाते हैं, हालाँकि वे SEBI की निगरानी में रहते हैं। SEBI कहता है कि सूचकांक अनुबंध ₹15–20 लाख के दायरे में रहे; NSE उस सूत्र से वास्तविक लॉट निकालता है। SEBI कहता है कि पूरे बाजार में 10/15/20 प्रतिशत का सर्किट होगा; NSE-BSE रोज इसके वास्तविक ट्रिगर पॉइंट निकालते हैं। यानी SEBI नियम बनाता है, एक्सचेंज उसे मशीन में बदलता है।

SEBI का काम किसी शेयर का 'सही भाव' तय करना नहीं है बल्कि बाजार कीमत तय करता है, SEBI और एक्सचेंज यह सुनिश्चित करते हैं कि कीमत तय होने की प्रक्रिया निष्पक्ष और जोखिम-नियंत्रित हो।

अलग संदर्भों में 'लॉट साइज़'

IPO में 'लॉट साइज़' एक अलग अवधारणा है। न्यूनतम bid lot कंपनी और merchant bankers तय करते हैं और offer document में घोषित होता है। यह F&O के market lot से अलग है। SME शेयरों में भी ट्रेडिंग लॉट अलग हो सकता है। इसी तरह सर्किट भी संदर्भ के अनुसार बदलता है। IPO लिस्टिंग के दिन अलग व्यवस्था, सामान्य शेयरों पर स्थिर प्राइस बैंड, F&O शेयरों पर गतिशील बैंड, और पूरे बाजार का अलग सर्किट ब्रेकर।

इसे सड़क व्यवस्था की तरह देखें। SEBI परिवहन मंत्रालय जैसा सर्वोच्च नियामक है, जबकि NSE-BSE नियंत्रित एक्सप्रेसवे संचालक। SEBI कहता है कि वाहनों के बीच इतनी दूरी हो, अत्यधिक गति पर आपातकालीन ब्रेक लगे, भारी वाहन की सुरक्षा क्षमता इतनी हो। एक्सचेंज रोज वास्तविक लेन, गति संकेत और ट्रैफिक नियंत्रण लागू करते हैं। लॉट साइज़ तय करता है 'वाहन' कितना बड़ा होगा, प्राइस बैंड तय करता है शेयर एक दिन में कितना जा सकता है, मार्केट-वाइड सर्किट ब्रेकर तय करता है पूरा राजमार्ग कब रुकेगा, मार्जिन तय करता है सुरक्षा जमा कितनी हो, और position limit तय करती है एक व्यक्ति कितने वाहन उतार सकता है।

SEBI का पूरा 'गणित' यही है - बाजार को गिरने या चढ़ने से रोकना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना कि वह इतनी तेजी और इतने लीवरेज से न दौड़े कि खुद बाजार की व्यवस्था ही टूट जाए। कीमत बाजार तय करता है; गति, जोखिम और खेल के नियम नियामक तय करता है।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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