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Share Bazar में लाखों करोड़ रुपये डूबते हैं तो पैसा जाता कहां है? समझिए पूरा गणित
Stock Market Money Lost: शेयर बाजार गिरने पर लाखों करोड़ रुपये की संपत्ति कैसे कम हो जाती है?
Stock Market Money Lost Where Does Stock Market Money Go
Stock Market Money Lost: शेयर बाजार में किसी दिन बड़ी गिरावट आती है और अगले ही दिन खबर आती है कि निवेशकों के लाखों करोड़ रुपये डूब गए। टीवी स्क्रीन पर लाल निशान दिखाई देते हैं, सेंसेक्स और निफ्टी नीचे चले जाते हैं और बाजार से जुड़ी खबरों में बताया जाता है कि एक ही दिन में निवेशकों की इतनी बड़ी संपत्ति खत्म हो गई।
लेकिन यहां एक बहुत सीधा और दिलचस्प सवाल पैदा होता है। अगर लाखों करोड़ रुपये डूब गए, तो वह पैसा गया कहां? क्या वह पैसा किसी दूसरे निवेशक के खाते में चला गया? क्या शेयर बाजार, शेयर बेचने वाले लोगों से पैसा लेकर कहीं जमा कर देता है? क्या विदेशी निवेशक वह पैसा अपने देश ले जाते हैं? या फिर बैंकिंग व्यवस्था में कहीं से इतने हजारों करोड़ रुपये गायब हो जाते हैं?
असलियत थोड़ी अलग है और शेयर बाजार को समझने के लिए यही सबसे जरूरी बात है। जब बाजार गिरने पर कहा जाता है कि “इतने लाख करोड़ रुपये डूब गए”, तो इसका मतलब आमतौर पर यह नहीं होता कि उतनी रकम वास्तव में किसी के हाथ से निकलकर किसी दूसरे के हाथ में चली गई। ज्यादातर मामलों में यह बाजार में शेयरों की कीमत घटने से उनकी कुल बाजार कीमत में आई कमी होती है। यानी यहां पैसा गायब होने से ज्यादा महत्वपूर्ण है, संपत्ति की कीमत का बदल जाना।
किसी कंपनी की कीमत तय कैसे होती है?
मान लीजिए किसी कंपनी के 10 लाख शेयर बाजार में हैं और एक शेयर की कीमत 100 रुपये है। कंपनी का बाजार मूल्य हुआ 10 लाख × 100 यानी 10 करोड़ रुपये।
अब किसी वजह से उस कंपनी के शेयर खरीदने वाले लोग कम हो जाते हैं और बाजार में शेयर की कीमत गिरकर 80 रुपये हो जाती है। अब वही 10 लाख शेयर 80 रुपये के हिसाब से 8 करोड़ रुपये के माने जाएंगे।
कंपनी के पास से 2 करोड़ रुपये निकलकर कहीं नहीं गए। कंपनी के बैंक खाते में पहले जितने पैसे थे, वे जरूरी नहीं कि कम हुए हों। कंपनी की फैक्ट्री, जमीन, मशीनें या कर्मचारियों की संख्या भी एक दिन में 20 प्रतिशत कम नहीं हुई।
बस बाजार में उस कंपनी के शेयर की कीमत 100 रुपये से घटकर 80 रुपये हो गई। इसलिए उसके बाजार मूल्य में 2 करोड़ रुपये की कमी दिखाई देने लगी।
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड यानी सेबी भी बाजार पूंजीकरण को कंपनी के मौजूदा शेयर मूल्य और बाजार में मौजूद शेयरों की संख्या के आधार पर बताता है।
एक आसान उदाहरण से समझिए
मान लीजिए आपके पास किसी कंपनी के 1,000 शेयर हैं और आपने उन्हें 500 रुपये प्रति शेयर के भाव पर खरीदा था। आपकी कुल खरीद कीमत 5 लाख रुपये हुई।
कुछ समय बाद बाजार में उस शेयर की कीमत बढ़कर 700 रुपये हो गई। अब आपके 1,000 शेयरों की बाजार कीमत 7 लाख रुपये दिखाई दे रही है।
क्या आपके खाते में 2 लाख रुपये नकद आ गए? नहीं।बल्कि आपकी संपत्ति की बाजार कीमत 5 लाख से बढ़कर 7 लाख रुपये हो गई। अगर आपने शेयर बेच दिए होते, तब बिक्री के बाद मिलने वाली रकम आपके खाते में आती।
अब उल्टा सोचिए। शेयर की कीमत 700 से गिरकर 500 रुपये हो गई। आपकी संपत्ति की बाजार कीमत फिर 5 लाख रुपये हो गई। और अगर शेयर 300 रुपये पर आ गया तो उसकी बाजार कीमत 3 लाख रुपये रह जाएगी।
इस स्थिति में यह कहना कि आपके 2 लाख रुपये किसी दूसरे के पास चले गए सही नहीं होगा। अगर आपने शेयर बेचा ही नहीं है तो वह नुकसान अभी कागज पर दिखाई देने वाला बाजार मूल्य का नुकसान है। हालांकि यह वास्तविक आर्थिक नुकसान बन सकता है, अगर बाद में आप उस कम कीमत पर शेयर बेचते हैं। इसे ही आम भाषा में कागजी नुकसान कहा जाता है।
लेकिन शेयर की कीमत गिरती ही क्यों है?
अब अगला सवाल आता है कि आखिर बाजार में किसी कंपनी के शेयर का भाव ऊपर-नीचे कौन करता है?इसका सीधा जवाब है, खरीदार और विक्रेता।
किसी शेयर को खरीदने वाले ज्यादा लोग और बेचने वाले कम लोग हों तो खरीदार ज्यादा कीमत देने को तैयार हो सकते हैं। दूसरी तरफ अगर बड़ी संख्या में लोग शेयर बेचने लगें और खरीदने वाले उस कीमत पर खरीदने के लिए तैयार न हों तो भाव नीचे आने लगता है।
इसमें कंपनी के मुनाफे, भविष्य की कमाई, ब्याज दरें, अर्थव्यवस्था, कच्चे माल की कीमत, सरकार की नीतियां, युद्ध, अंतरराष्ट्रीय घटनाएं, विदेशी निवेश, बाजार की उम्मीदें और बहुत सी दूसरी चीजें भूमिका निभा सकती हैं।
इसलिए शेयर बाजार भविष्य को लेकर लोगों की उम्मीदों का भी आईना होता है। कई बार कंपनी ने अभी कोई बड़ा नुकसान किया भी नहीं होता, लेकिन निवेशकों को लगता है कि आने वाले महीनों में कंपनी का कारोबार कमजोर हो सकता है। वे शेयर बेचने लगते हैं और कीमत गिर जाती है।
अगर कीमत घट गई तो 'लाखों करोड़' कैसे?
यहां बाजार पूंजीकरण की गणित काम करती है।
मान लीजिए किसी शेयर के 100 करोड़ शेयर बाजार में हैं और एक शेयर 1,000 रुपये का है। कंपनी का बाजार मूल्य हुआ 1 लाख करोड़ रुपये। अब शेयर की कीमत 900 रुपये हो गई। वही 100 करोड़ शेयर अब 90,000 करोड़ रुपये के बाजार मूल्य के माने जाएंगे।
यानी बाजार मूल्य में 10,000 करोड़ रुपये की कमी दिखाई देगी। लेकिन ध्यान रखिए, 10,000 करोड़ रुपये के शेयरों को किसी ने 900 रुपये पर बेचकर 10,000 करोड़ रुपये नकद नहीं कमाए हैं। बाजार मूल्य की गणना उस समय उपलब्ध शेयर कीमत के आधार पर होती है।
यही कारण है कि शेयर बाजार में कुल बाजार पूंजीकरण में बहुत बड़ी गिरावट दिखाई दे सकती है, जबकि उतनी ही रकम के बराबर नकदी किसी दूसरे व्यक्ति के खाते में जमा नहीं हुई होती।
फिर शेयर बेचने वाले को पैसा मिलता कहां से है?
अगर आपने किसी कंपनी के 100 शेयर 500 रुपये में खरीदे और बाद में उन्हें 600 रुपये में बेच दिया, तो आपको 60,000 रुपये मिलेंगे। वह रकम किसी दूसरे खरीदार की तरफ से आती है। खरीदार ने शेयर खरीदने के लिए पैसा दिया और आपको बिक्री की रकम मिली।
लेकिन पूरी कंपनी के सारे शेयरों की बाजार कीमत बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि हर शेयरधारक को उतनी ही रकम नकद मिल गई।
इसी तरह जब बाजार गिरता है, तो जिन लोगों ने शेयर बेच दिए और कम कीमत स्वीकार कर ली, उनके पास बिक्री के बदले नकदी आ जाती है। लेकिन जिन लोगों ने शेयर अभी नहीं बेचे, उनकी संपत्ति का बाजार मूल्य घट जाता है। इसलिए शेयर बाजार में मूल्य में बदलाव और पैसे के वास्तविक लेन-देन को अलग-अलग समझना बहुत जरूरी है।
क्या बाजार में पैसा बनता भी ऐसे ही है?
मान लीजिए आपने 10,000 रुपये के शेयर खरीदे। कुछ साल बाद उनकी बाजार कीमत 20,000 रुपये हो गई। क्या सिस्टम ने आपके खाते में अचानक 10,000 रुपये छापकर डाल दिए? ऐसा नहीं। बल्कि आपके पास मौजूद शेयरों की बाजार कीमत बढ़ गई है। अगर आप उन्हें बेचते हैं तो उस समय के खरीदार से पैसा लेकर आपकी संपत्ति का एक हिस्सा नकदी में बदल जाता है।इसलिए बाजार में दिखाई देने वाली कुल संपत्ति का बड़ा हिस्सा बाजार कीमतों से मापा जाता है, न कि बैंक खातों में रखी नकदी से।
फिर बाजार गिरने पर हर किसी का नुकसान बराबर क्यों नहीं होता?
क्योंकि हर निवेशक के पास अलग-अलग शेयर होते हैं और अलग-अलग कीमत पर खरीदे होते हैं।
मान लीजिए एक कंपनी का शेयर 1,000 रुपये से गिरकर 800 रुपये हो गया। जिसने 1,000 रुपये पर खरीदा था, उसके लिए गिरावट बड़ी है। लेकिन जिसने वही शेयर 500 रुपये पर खरीदा था, उसके लिए बाजार भाव अभी भी खरीद कीमत से ऊपर है।
यानी बाजार में “इतने करोड़ रुपये डूब गए” जैसी खबर पूरे बाजार की तस्वीर बताती है। इसका मतलब यह नहीं कि हर निवेशक की संपत्ति उसी अनुपात में कम हुई है।
किसी निवेशक के पोर्टफोलियो में कुछ शेयर गिर सकते हैं, कुछ बढ़ सकते हैं और कुछ पर कोई खास असर नहीं पड़ सकता।
क्या हर गिरावट सिर्फ कागजी नुकसान होती है?
यह कहना भी गलत होगा कि बाजार गिरने पर असली नुकसान नहीं होता। अगर आपने कोई शेयर 1,000 रुपये में खरीदा और वह 500 रुपये पर आ गया, तो आपकी हिस्सेदारी की बाजार कीमत आधी हो गई। आपने अभी तक शेयर नहीं बेचा है तो नुकसान कागज पर है, लेकिन आपकी संपत्ति की वास्तविक बाजार कीमत कम हो चुकी है। अगर आपने मजबूरी में उसे 500 रुपये में बेच दिया तो नुकसान वास्तविक बिक्री में बदल गया।
यही वजह है कि निवेश की दुनिया में अवास्तविक नुकसान और वास्तविक नुकसान की बात की जाती है। शेयर बाजार में कीमत गिरने से संपत्ति का बाजार मूल्य कम होना एक बात है और उस कीमत पर शेयर बेच देना दूसरी बात।
क्या कोई बाजार गिरने से पैसा कमाता भी है?
कुछ परिस्थितियों में हां, लेकिन इसे समझने के लिए सामान्य शेयर खरीदने और बेचने से अलग तरह के कारोबार को देखना पड़ता है।
उदाहरण के लिए कुछ बाजार भागीदार ऐसे साधनों में कारोबार करते हैं जिनमें कीमत गिरने पर लाभ की संभावना होती है। वायदा और विकल्प जैसे डेरिवेटिव में कीमत की दिशा के आधार पर अलग-अलग तरह की स्थिति बनाई जा सकती है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि बाजार में जितने करोड़ रुपये का बाजार मूल्य घटा, उतने करोड़ रुपये किसी दूसरे निवेशक ने कमा लिए। बाजार मूल्य में गिरावट और किसी खास ट्रेड से हुए लाभ को एक ही चीज मानना गलत होगा।
विदेशी निवेशक पैसा लेकर भाग जाते हैं, यह बात कितनी सही है?
जब विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बेचते हैं तो उन्हें बिक्री के बदले रकम मिलती है और उस रकम का एक हिस्सा भारत से बाहर भी जा सकता है। लेकिन बाजार में कुल बाजार पूंजीकरण में गिरावट को केवल विदेशी निवेशकों के पैसे बाहर जाने के बराबर मानना सही नहीं है।
कई बार बाजार की कीमतें इसलिए गिरती हैं क्योंकि निवेशक भविष्य को लेकर कम कीमत पर शेयर खरीदना चाहते हैं। कीमत नीचे आने से पूरी बाजार पूंजीकरण राशि कम हो जाती है, भले ही उस पूरी कमी के बराबर नकदी का देश से बाहर जाना न हुआ हो। यही वह जगह है जहां बाजार से इतने लाख करोड़ रुपये निकल गए और इतने लाख करोड़ रुपये की बाजार संपत्ति कम हो गई के बीच बड़ा फर्क है।
शेयर बाजार को एक मकान की तरह समझिए
इस पूरे मामले को समझने का एक बहुत आसान उदाहरण मकान का है। मान लीजिए आपके पास एक मकान है जिसकी बाजार कीमत 1 करोड़ रुपये है। अगले साल आपके इलाके में जमीन की कीमत बढ़ती है और उसी तरह के मकानों की कीमत 1.5 करोड़ रुपये हो जाती है।
क्या आपके बैंक खाते में 50 लाख रुपये आ गए? नहीं।बल्कि आपकी संपत्ति की बाजार कीमत बढ़ गई। अब मान लीजिए इलाके में मांग घट गई और उसी मकान की कीमत 80 लाख रुपये रह गई। क्या आपके घर से 70 लाख रुपये किसी ने निकाल लिए?
मकान वही है, लेकिन उसकी बाजार कीमत बदल गई। शेयर बाजार में भी काफी हद तक यही होता है। फर्क सिर्फ इतना है कि शेयरों की कीमत हर कारोबारी दिन लगातार बदलती रहती है और इसलिए उनकी बाजार कीमत में बदलाव भी बहुत तेजी से दिखाई देता है।
लेकिन शेयर बाजार में एक और बड़ा फर्क है
मकान की कीमत शायद दिन में हजार बार नहीं बदलेगी, लेकिन शेयर की कीमत कुछ सेकंड में बदल सकती है। लाखों निवेशक और संस्थागत निवेशक अलग-अलग कीमतों पर खरीदने और बेचने के आदेश देते हैं।
इसी वजह से बाजार पूंजीकरण बहुत तेजी से ऊपर-नीचे हो सकता है। NSE के मौजूदा बाजार आंकड़ों में भी बाजार पूंजीकरण और रोज के कारोबार का अलग-अलग हिसाब दिया जाता है। यानी बाजार में जितने मूल्य के शेयर मौजूद हैं और किसी दिन जितने शेयरों में वास्तव में कारोबार हुआ, दोनों अलग-अलग चीजें हैं।
तो क्या शेयर बाजार में पैसा सिर्फ एक जेब से दूसरी जेब में जाता है?
शेयर बाजार में जब वास्तविक खरीद-बिक्री होती है तो खरीदार और विक्रेता के बीच रकम और शेयरों का लेन-देन होता है। लेकिन शेयरों की कुल बाजार कीमत में बदलाव उससे बहुत बड़ा आंकड़ा हो सकता है।
एक दिन में बाजार में जितने शेयर वास्तव में खरीदे-बेचे गए, उनका कुल कारोबार और पूरे बाजार की बाजार पूंजीकरण में हुई कमी एक ही चीज नहीं है।
इसीलिए अगर खबर आती है कि “आज बाजार में 6 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति साफ हो गई”, तो इसका मतलब यह नहीं कि 6 लाख करोड़ रुपये के बराबर शेयर उसी दिन बेच दिए गए।
सबसे बड़ा भ्रम यहीं खत्म होता है
शेयर बाजार में लाखों करोड़ रुपये डूबे तो वह पैसा कहां गया? जवाब है, अक्सर वह पैसा किसी एक जगह गया ही नहीं। शेयरों की कीमतें नीचे आईं, इसलिए उन शेयरों की बाजार कीमत कम हो गई। जिन निवेशकों ने शेयर अपने पास रखे हुए हैं, उनकी संपत्ति की बाजार कीमत घट गई। जिन लोगों ने कम कीमत पर बेच दिया, उनके लिए नुकसान बिक्री में बदल गया। दूसरी तरफ जिन लोगों ने कम कीमत पर शेयर खरीदे, उन्हें भविष्य में कीमत बढ़ने पर लाभ मिल सकता है। इसलिए बाजार में “दौलत का खत्म होना” और “नकदी का गायब होना” दो अलग बातें हैं।
फिर बाजार में इतनी बड़ी गिरावट का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ बिल्कुल यह नहीं है कि गिरावट महत्वहीन है। बाजार मूल्य में भारी कमी निवेशकों की संपत्ति को प्रभावित करती है। कंपनियों के लिए शेयर का भाव पूंजी जुटाने, निवेशकों की धारणा और कई बार प्रबंधन के फैसलों के लिए भी महत्वपूर्ण होता है। शेयर बाजार की गिरावट लोगों के खर्च, निवेश और कारोबारी भरोसे पर भी असर डाल सकती है।
लेकिन खबरों में जब हम सुनते हैं कि “निवेशकों के इतने लाख करोड़ रुपये डूब गए”, तो इसे सही अर्थ में समझने के लिए एक शब्द याद रखना चाहिए, बाजार मूल्य।
क्योंकि शेयर बाजार में हर दिन सिर्फ शेयरों की खरीद-बिक्री नहीं होती। हर खरीद-बिक्री के साथ बाजार किसी कीमत पर यह भी तय करता है कि उस समय किसी कंपनी में एक हिस्सेदारी की कीमत कितनी मानी जाएगी।
और जब यह कीमत लाखों शेयरों पर लागू होती है, तो कुछ प्रतिशत की गिरावट भी हजारों करोड़ रुपये की बाजार संपत्ति को एक झटके में कम दिखा सकती है।
इसलिए शेयर बाजार में लाखों करोड़ रुपये “गायब” नहीं होते। बहुत बार वे सिर्फ उस कीमत में नहीं रहते, जिस कीमत पर बाजार ने उन्हें एक दिन पहले आंका था।


