Unicorn क्या होता है, 1 अरब डॉलर की कंपनी को घोड़े के सींग वाले जीव का नाम क्यों दिया गया?

What Is Unicorn Company: यूनिकॉर्न कंपनी क्या होती है और इसे घोड़े के सींग वाले काल्पनिक जीव का नाम क्यों दिया गया?

Yogesh Mishra
Published on: 30 Sept 2026 5:13 PM IST
What Is Unicorn Company Explained in Hindi
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What Is Unicorn Company Explained in Hindi 

What Is Unicorn Company: स्टार्टअप की दुनिया में कुछ शब्द इतने लोकप्रिय हो चुके हैं कि वे सामान्य बातचीत का हिस्सा बन गए हैं। यूनिकॉर्न (Unicorn) भी ऐसा ही एक शब्द है। सुनने में लगता है जैसे कंपनी ने कोई बहुत बड़ी रकम कमा ली हो, या कोई ख़ास तरह की कंपनी है। लेकिन असल में यूनिकॉर्न बनने का संबंध उस कंपनी की हैसियत या अनुमानित कीमत से होता है।

सीधे सीधे कहें तो जब किसी निजी नई कंपनी की कीमत एक अरब डॉलर या उससे ज्यादा आंकी जाती है, तो उसे ‘यूनिकॉर्न’ कहा जाता है। यहां निजी कंपनी का मतलब ऐसी कंपनी से है जो अभी शेयर बाजार में लिस्टेड नहीं हुई है। सबसे जरूरी बात यह है कि एक अरब डॉलर की कीमत का मतलब यह नहीं है कि कंपनी के बैंक खाते में एक अरब डॉलर पड़े हैं। इसका यह मतलब भी नहीं है कि कंपनी हर साल एक अरब डॉलर कमाती है या उसे एक अरब डॉलर का मुनाफा होता है।

कंपनी को यूनिकॉर्न क्यों कहा गया?

दरअसल, यूनिकॉर्न एक काल्पनिक जीव है, जिसे आम तौर पर घोड़े जैसा जिसके माथे पर एक सींग होता है। कारोबार की दुनिया में इस नाम का इस्तेमाल इसलिए शुरू हुआ क्योंकि एक अरब डॉलर से ज्यादा कीमत वाली निजी नई कंपनियां कभी बहुत दुर्लभ हुआ करती थीं। 2013 में अमेरिकी निवेशक ऐलीन ली ने एक अरब डॉलर से ज्यादा कीमत वाली निजी तकनीकी कंपनियों पर एक चर्चित लेख लिखा। उन्होंने ऐसी कंपनियों के लिए यूनिकॉर्न शब्द का इस्तेमाल किया। उस समय इतनी बड़ी कीमत वाली निजी कंपनियां बहुत कम थीं, इसलिए उनकी तुलना इस दुर्लभ काल्पनिक जीव से की गई। बाद में नई कंपनियों में निवेश तेजी से बढ़ा और अरबों डॉलर की कीमत वाली निजी कंपनियों की संख्या भी बढ़ती गई। यूनिकॉर्न शब्द पूरी दुनिया में कारोबार की आम भाषा बन गया।

एक अरब डॉलर की कीमत का मतलब क्या है?

मान लीजिए किसी नई कंपनी में एक निवेशक 100 करोड़ रुपये लगाता है और बदले में कंपनी का 10 प्रतिशत हिस्सा लेता है। साधारण हिसाब से देखें तो 10 प्रतिशत हिस्से की कीमत 100 करोड़ रुपये हुई। इसी आधार पर पूरी कंपनी की कीमत करीब 1,000 करोड़ रुपये मानी जा सकती है। यानी निवेशक ने कंपनी की पूरी कीमत सीधे 1,000 करोड़ रुपये देकर नहीं खरीदी। उसने कंपनी का छोटा हिस्सा खरीदा और उस सौदे से पूरी कंपनी की अनुमानित कीमत का अंदाजा लगाया गया। असल सौदों में हिसाब इससे ज्यादा जटिल हो सकता है, क्योंकि अलग-अलग निवेशकों को अलग अधिकार और अलग तरह के शेयर मिल सकते हैं। लेकिन सामान्य बात यही है कि जिस कीमत पर निवेशक कंपनी का हिस्सा खरीदते हैं, उससे पूरी कंपनी की कीमत का अनुमान लगाया जाता है।

कंपनी की कीमत और कमाई अलग चीजें हैं

यूनिकॉर्न को समझने के लिए तीन चीजों में फर्क समझना जरूरी है: कंपनी की कीमत, उसकी कमाई और उसका मुनाफा। कमाई यानी वह पैसा है जो कंपनी अपने कारोबार से हासिल करती है। मुनाफा यानी वह रकम है जो सारे खर्च निकालने के बाद बचती है। और कंपनी की कीमत याने वह अनुमान जिस पर निवेशक उस पूरी कंपनी को मूल्य दे रहे होते हैं। इसलिए कोई कंपनी हजारों करोड़ रुपये की हो सकती है, लेकिन उसकी सालाना कमाई उससे काफी कम हो। यहां तक कि वह कंपनी घाटे में भी चल रही हो सकती है।

मान लीजिए किसी नई कंपनी की कीमत 10,000 करोड़ रुपये आंकी गई है। उसकी सालाना कमाई 1,000 करोड़ रुपये है और अभी उसे मुनाफा नहीं हो रहा। इसके बावजूद वह बड़ी कीमत वाली कंपनी हो सकती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि निवेशक केवल आज की कमाई नहीं देखते। वे यह भी देखते हैं कि कंपनी आने वाले वर्षों में कितनी बड़ी हो सकती है।

निवेशक कंपनी की कीमत तय करते समय क्या देखते हैं?

जब कोई निवेशक किसी नई कंपनी में पैसा लगाता है तो वह कई सवालों पर ध्यान देता है। कंपनी कितने लोगों तक पहुंच रही है? उसके ग्राहक कितनी तेजी से बढ़ रहे हैं? जिस बाजार में वह काम कर रही है, वह कितना बड़ा है? उसके पास कोई खास तकनीक है या नहीं? उसके मुकाबले दूसरी कंपनियां कितनी मजबूत हैं? आने वाले वर्षों में उसकी कमाई कितनी बढ़ सकती है? इन सभी बातों को देखकर निवेशक कंपनी के भविष्य की संभावनाओं का अनुमान लगाते हैं। यही वजह है कि किसी नई कंपनी की आज की कमाई कम होने के बावजूद उसकी कीमत बहुत ज्यादा हो सकती है। निवेशक असल में उसके भविष्य की संभावित कमाई और विकास को भी कीमत में शामिल कर रहे होते हैं।

यूनिकॉर्न बनने के लिए कंपनी को कितना पैसा चाहिए?

यूनिकॉर्न बनने के लिए कंपनी को 1 अरब डॉलर जुटाना जरूरी नहीं है। मान लीजिए किसी कंपनी की कीमत 10,000 करोड़ रुपये आंकी गई और उसने इस दौरान सिर्फ 500 करोड़ रुपये का नया निवेश हासिल किया। कंपनी को हाथ में 500 करोड़ रुपये मिले, जबकि 10,000 करोड़ रुपये उसकी अनुमानित कुल कीमत है। इसलिए अगर खबर में लिखा है कि कोई कंपनी 1 अरब डॉलर की हो गई, तो इसका मतलब यह नहीं कि कंपनी ने 1 अरब डॉलर जमा कर लिए हैं। ऐसा इसलिए कि निवेश में आया पैसा और कंपनी की कुल कीमत दो अलग-अलग चीजें हैं।

क्या यूनिकॉर्न बनने के बाद कंपनी की कीमत हमेशा बढ़ती है?

कंपनी की कीमत ऊपर भी जा सकती है और नीचे भी। मान लीजिए किसी नई कंपनी की कीमत एक साल पहले 1 अरब डॉलर आंकी गई थी। बाद में कंपनी की कमाई उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ी या कारोबार में मुश्किलें आईं। अगली बार जब निवेशक कंपनी में पैसा लगाएं, तो वे उसकी कीमत कम भी आंक सकते हैं। ऐसे में कंपनी की कीमत 1 अरब डॉलर से नीचे जा सकती है। इसलिए यूनिकॉर्न कोई ऐसा स्थायी तमगा नहीं है जो एक बार मिलने के बाद हमेशा बना रहे। यह एक खास समय पर कंपनी की निजी बाजार में मानी गई कीमत को बताता है।

शेयर बाजार में पहुंचने के बाद क्या होता है?

यूनिकॉर्न शब्द मुख्य रूप से निजी कंपनियों के लिए इस्तेमाल होता है। जब कोई कंपनी शेयर बाजार में सूचीबद्ध हो जाती है, तो आम लोग भी उसके शेयर खरीद और बेच सकते हैं। इसके बाद कंपनी की बाजार कीमत शेयर के मौजूदा भाव के आधार पर लगातार बदलती रहती है। इसलिए शेयर बाजार में सूचीबद्ध किसी कंपनी की कीमत 1 अरब डॉलर से ज्यादा होने पर आम तौर पर उसे यूनिकॉर्न नहीं कहा जाता। यूनिकॉर्न शब्द खास तौर पर उन निजी नई कंपनियों के लिए लोकप्रिय हुआ है जिनकी कीमत निवेश के दौरान तय होती है।

घाटे में चल रही कंपनी अरबों डॉलर की कैसे हो सकती है?

पहली नजर में यह विरोधाभास लगता है। सामान्य दुकान या कारखाने में हम उसकी बिक्री और लाभ देखकर कीमत समझते हैं। लेकिन तेजी से बढ़ने वाले स्टार्टअप में निवेशक भविष्य खरीद रहे होते हैं। कोई कंपनी आज 500 करोड़ रुपये का घाटा उठा सकती है क्योंकि वह नए शहरों में जा रही है, ग्राहकों को जोड़ने पर भारी खर्च कर रही है, तकनीक विकसित कर रही है या बाजार में अपनी जगह बनाने के लिए कीमतें कम रख रही है। यदि निवेशकों को विश्वास है कि पर्याप्त विस्तार के बाद कंपनी लाभदायक हो जाएगी तो वे आज भी उसे बहुत ऊंचा मूल्यांकन दे सकते हैं। यही मॉडल जोखिमपूर्ण भी है। यदि भविष्य का अनुमान गलत निकला, ग्राहक वृद्धि रुक गई, प्रतिस्पर्धी बेहतर निकला या कंपनी कभी लाभ कमाने की स्थिति में नहीं पहुंची तो मूल्यांकन तेजी से गिर सकता है। इसलिए एक अरब डॉलर का मूल्यांकन सफलता का महत्वपूर्ण संकेत है, लेकिन भविष्य की सफलता की गारंटी नहीं।

यूनिकॉर्न से आगे भी हैं नाम

अगर किसी निजी कंपनी की कीमत 1 अरब डॉलर से ज्यादा है तो उसे यूनिकॉर्न कहा जाता है। अगर यही कीमत 10 अरब डॉलर से ऊपर पहुंच जाए तो उसे ‘डेकाकॉर्न’ कहा जाता है। 100 अरब डॉलर से ज्यादा कीमत वाली निजी कंपनी के लिए ‘हेक्टोकॉर्न’ जैसे शब्द भी इस्तेमाल किए जाते हैं। ये कोई सरकारी या कानूनी श्रेणियां नहीं हैं। ये कारोबार की दुनिया में इस्तेमाल होने वाले नाम हैं।

भारत में यूनिकॉर्न की चर्चा क्यों बढ़ी?

भारत में पिछले वर्षों में नई कंपनियों का कारोबार तेजी से फैला है। सस्ते और आसानी से उपलब्ध इंटरनेट, स्मार्टफोन, डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन खरीदारी ने कंपनियों के लिए बहुत बड़ा बाजार तैयार किया। इसके साथ ही वित्तीय सेवाओं, शिक्षा, ऑनलाइन खरीदारी, सॉफ्टवेयर और दूसरी डिजिटल सेवाओं से जुड़ी कई नई कंपनियों में निवेश आया। जैसे-जैसे निवेश बढ़ा, कई कंपनियों की कीमत भी तेजी से बढ़ी और यूनिकॉर्न शब्द भारतीय कारोबार की खबरों में आम हो गया। लेकिन किसी देश में कितनी यूनिकॉर्न कंपनियां हैं, इससे अकेले उसकी अर्थव्यवस्था या कारोबार की पूरी तस्वीर नहीं समझी जा सकती। यह भी देखना जरूरी है कि इन कंपनियों की वास्तविक कमाई कितनी है, कितने लोगों को रोजगार मिला है, उनका कारोबार लंबे समय तक चल सकता है या नहीं और वे मुनाफा कमा पा रही हैं या नहीं।

आसान भाषा में समझिए यूनिकॉर्न

मान लीजिए एक नई कंपनी कुछ साल पहले सिर्फ 10 करोड़ रुपये की कीमत की थी। कारोबार बढ़ा तो उसकी कीमत 200 करोड़ रुपये हो गई। कुछ और निवेश आया और एक समय उसकी कीमत 9,500 करोड़ रुपये तक पहुंच गई।

अब अगर अगले निवेश के समय कंपनी की कीमत डॉलर में 1 अरब डॉलर या उससे ज्यादा आंकी जाती है, तो वह यूनिकॉर्न बन जाएगी। इस पूरे सफर में कंपनी को 1 अरब डॉलर नकद मिलना जरूरी नहीं है। उसका कारोबार 1 अरब डॉलर का होना भी जरूरी नहीं है। जरूरी यह है कि किसी निवेश के समय निवेशकों के हिसाब से उस निजी कंपनी की कुल कीमत 1 अरब डॉलर या उससे ज्यादा हो गई हो।

यही यूनिकॉर्न की असली कहानी है। यह कंपनी के पास पड़े पैसे का नहीं, बल्कि किसी खास समय पर निवेशकों की नजर में उसकी कुल कीमत का आंकड़ा है। और इसलिए यूनिकॉर्न बनना किसी नई कंपनी के सफर का एक बड़ा पड़ाव जरूर है, लेकिन यह अपने आप में मुनाफे या लंबे समय तक सफल रहने की गारंटी नहीं है।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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