China Yuan: रुपया कमजोर, लेकिन चीन का युआन चमका; जानिए क्यों बढ़ रही इसकी ताकत

China Yuan vs Dollar 2026: रुपये पर दबाव बढ़ा, लेकिन चीन का युआन हुआ मजबूत, जानिए डॉलर और ग्लोबल बाजार पर क्या पड़ेगा असर

Jyotsana Singh
Published on: 22 May 2026 3:35 PM IST (Updated on: 23 May 2026 1:41 AM IST)
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China Yuan vs Dollar 2026

China Yuan vs Dollar 2026: एक ओर जहां लगातार यह खबरें सामने आ रही हैं कि भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर पड़ता जा रहा है, वहीं दूसरी ओर चीन की करेंसी ‘युआन’ तेजी से मजबूती हासिल कर वैश्विक बाजार में डॉलर को चुनौती देती नजर आ रही है। यह केवल एक मुद्रा की मजबूती की कहानी नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक आर्थिक समीकरणों का संकेत भी है। दुनिया के बाजारों में पहले से ही चीन का दबदबा कायम था और अब युआन को मिल रही नई ताकत ने उसकी आर्थिक स्थिति को और मजबूत कर दिया है। बढ़ते निर्यात, निवेशकों के भरोसे और वैश्विक व्यापार में बढ़ती हिस्सेदारी के दम पर चीन अब पहले से ज्यादा मुनाफे और प्रभाव की राह पर आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है।चीन का युआन अब फरवरी 2023 के बाद अपने सबसे मजबूत स्तर पर पहुंच गया है। इससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि वैश्विक बाजार में चीन की आर्थिक पकड़ फिर मजबूत हो रही है और निवेशकों का भरोसा धीरे-धीरे डॉलर से हटकर युआन की ओर बढ़ रहा है।

चीन के केंद्रीय बैंक ‘पीपल्स बैंक ऑफ चाइना’ के ताजा आंकड़ों के अनुसार, युआन का दैनिक रेफरेंस रेट 6.8349 प्रति डॉलर तय किया गया है। यह बीते करीब तीन वर्षों का सबसे मजबूत स्तर माना जा रहा है। ऑफशोर मार्केट में भी युआन करीब 6.803 प्रति डॉलर के स्तर पर कारोबार करता दिखाई दिया। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही रफ्तार बनी रही तो आने वाले महीनों में युआन और मजबूत हो सकता है।

आखिर क्यों मजबूत हो रहा है युआन?

चीन की करेंसी में आई इस मजबूती के पीछे कई बड़े कारण माने जा रहे हैं। सबसे बड़ा कारण चीन का बढ़ता निर्यात है। पिछले एक साल में चीन ने इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, सोलर उपकरण और टेक्नोलॉजी उत्पादों के निर्यात में तेजी दिखाई है। इससे चीन के विदेशी मुद्रा भंडार में मजबूती आई और युआन को सपोर्ट मिला।

इसके अलावा चीन की सरकार लगातार अपनी अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने के लिए बड़े कदम उठा रही है। रियल एस्टेट सेक्टर में संकट के बावजूद चीन ने बैंकिंग सिस्टम को नियंत्रित रखा और बाजार में नकदी बनाए रखी। इसका असर निवेशकों के भरोसे पर भी पड़ा। विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि अमेरिका और चीन के रिश्तों में पहले के मुकाबले थोड़ी स्थिरता आने की उम्मीद ने भी युआन को मजबूती दी है। पिछले कुछ महीनों में दोनों देशों के बीच व्यापार और तकनीकी मुद्दों पर बातचीत बढ़ी है, जिससे बाजार में सकारात्मक माहौल बना।

डॉलर पर क्यों बढ़ रहा दबाव?

दूसरी तरफ अमेरिकी डॉलर कई मोर्चों पर दबाव में दिखाई दे रहा है। अमेरिका में ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने महंगाई नियंत्रित करने के लिए लंबे समय तक ऊंची ब्याज दरें बनाए रखीं, लेकिन अब आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ने की आशंका जताई जा रही है। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव ने भी डॉलर पर असर डाला है। आमतौर पर संकट के समय डॉलर को सुरक्षित निवेश माना जाता है, लेकिन इस बार कई निवेशक वैकल्पिक मुद्राओं और गोल्ड की ओर भी रुख कर रहे हैं। चीन की मुद्रा को इस बदलाव का फायदा मिल रहा है।

क्या डॉलर की बादशाहत को चुनौती दे रहा है चीन?

वैश्विक स्तर पर चीन लंबे समय से डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती देने की कोशिश कर रहा है। चीन कई देशों के साथ स्थानीय मुद्रा में व्यापार बढ़ा रहा है। रूस, ब्राजील, सऊदी अरब और कुछ एशियाई देशों के साथ चीन ने युआन आधारित ट्रेड को बढ़ावा दिया है।

ब्रिक्स देशों के बीच भी डॉलर पर निर्भरता कम करने को लेकर लगातार चर्चा हो रही है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में युआन की स्वीकार्यता धीरे-धीरे बढ़ रही है। हालांकि अभी भी अमेरिकी डॉलर दुनिया की सबसे बड़ी रिजर्व करेंसी है, लेकिन युआन की बढ़ती ताकत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

भारतीय रुपये पर क्या असर?

जहां युआन मजबूत हो रहा है, वहीं भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले दबाव में बना हुआ है। कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और विदेशी निवेशकों की बिकवाली रुपये पर असर डाल रही है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय तनाव का सीधा असर रुपये पर पड़ता है।

अगर डॉलर मजबूत रहता है और तेल महंगा बना रहता है, तो भारतीय मुद्रा पर दबाव आगे भी जारी रह सकता है। हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक समय-समय पर बाजार में हस्तक्षेप कर रुपये को संभालने की कोशिश करता है।


बैंक ऑफ अमेरिका ने क्या अनुमान जताया?


बैंक ऑफ अमेरिका की एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2026 के अंत तक युआन 6.70 प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंच सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि मिडिल ईस्ट में तनाव ज्यादा नहीं बढ़ता और चीन अपनी मुद्रा स्थिरता की नीति जारी रखता है, तो युआन में और तेजी देखने को मिल सकती है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि चीन की निर्यात क्षमता और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की मजबूती आने वाले समय में युआन को अतिरिक्त समर्थन दे सकती है।

युआन की मजबूती इस बात का संकेत है कि वैश्विक निवेशक अब केवल डॉलर पर निर्भर नहीं रहना चाहते। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के नाते चीन लगातार अपने वित्तीय प्रभाव को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

हालांकि आर्थिक विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि डॉलर की जगह पूरी तरह किसी दूसरी मुद्रा का लेना अभी आसान नहीं है। अमेरिका की वित्तीय व्यवस्था, बॉन्ड मार्केट और वैश्विक व्यापार में डॉलर की हिस्सेदारी अब भी सबसे ज्यादा है। लेकिन युआन की मौजूदा तेजी यह जरूर दिखा रही है कि आने वाले वर्षों में वैश्विक करेंसी बाजार में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

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Jyotsana Singh

Content Writer

बहुमुखी प्रतिभा, विभिन्न विषयों पर लिखने का पत्रकारिता का लम्बा अनुभव

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