Gold Loan Interest Rate: गोल्ड लोन इतनी आसानी से क्यों मिल जाता है, बैंक लाखों रुपये क्यों देते हैं?

Gold Loan Interest Rate: गोल्ड लोन पर्सनल लोन के मुकाबले जल्दी क्यों मिलता है? जानिए बैंक सोने की शुद्धता, वजन, LTV और गिरवी संपत्ति के आधार पर लाखों रुपये का लोन कैसे देते हैं और इसमें ग्राहक के लिए क्या जोखिम हैं।

Yogesh Mishra
Published on: 28 Sept 2026 4:25 PM IST
Why Gold Loan Is Easy to Get Gold Loan Interest Rat Explained
X

 Why Gold Loan Is Easy to Get Gold Loan Interest Rat Explained

Gold Loan Interest Rate: आप बैंक से पांच लाख रुपये का पर्सनल लोन मांगें तो बैंक आपकी नौकरी, आमदनी, बैंक खाते, पुराने कर्ज, क्रेडिट स्कोर और हर महीने किस्त चुकाने की क्षमता तक जांच सकता है। कई बार कागजों और जांच की यह प्रक्रिया लंबी हो जाती है। लेकिन यही व्यक्ति पांच लाख रुपये का सोना लेकर गोल्ड लोन लेने पहुंचे तो काम काफी तेजी से हो सकता है। कई मामलों में कुछ ही समय में रकम खाते में आ जाती है।

सवाल है कि आखिर बैंक सोने पर इतना भरोसा क्यों करता है? क्या बैंक को ग्राहक की आमदनी या नौकरी की उतनी चिंता नहीं रहती?

असल कहानी कुछ अलग है। गोल्ड लोन में बैंक सिर्फ इस बात पर भरोसा नहीं कर रहा होता कि आप भविष्य में पैसा कमाकर कर्ज चुका देंगे। उसके पास उसी समय एक ऐसी संपत्ति गिरवी आ जाती है जिसकी कीमत बाजार में तय की जा सकती है और जरूरत पड़ने पर उसे बेचकर बकाया रकम की वसूली की जा सकती है।

यही वजह है कि गोल्ड लोन को सुरक्षित ऋण कहा जाता है। बैंक का जोखिम खत्म नहीं होता, लेकिन उसके पास जोखिम से बचने का एक ठोस सहारा मौजूद रहता है।

पर्सनल लोन में बैंक किस पर भरोसा करता है, गोल्ड लोन में क्या बदल जाता है?

मान लीजिए दो लोगों को पांच-पांच लाख रुपये चाहिए। पहले व्यक्ति के पास गिरवी रखने के लिए कोई संपत्ति नहीं है। बैंक को भरोसा करना होगा कि वह अगले कुछ वर्षों तक कमाता रहेगा और हर महीने किस्त चुकाता रहेगा। अगर उसकी आमदनी बंद हो गई और उसने भुगतान करना छोड़ दिया तो बैंक के पास तुरंत बेचकर पैसा निकालने वाली कोई गिरवी संपत्ति नहीं है।

दूसरा व्यक्ति पांच लाख रुपये के लिए पर्याप्त मूल्य का सोना गिरवी रख रहा है। अब बैंक की स्थिति बदल जाती है। ग्राहक समय पर पैसा लौटाता है तो बैंक को ब्याज मिलता है। अगर ग्राहक भुगतान नहीं करता तो तय नियम और प्रक्रिया के तहत बैंक के पास गिरवी रखे सोने से बकाया वसूलने का रास्ता रहता है।

यानी बिना जमानत वाले ऋण में बैंक का मुख्य भरोसा व्यक्ति की भविष्य की कमाई पर होता है। गोल्ड लोन में व्यक्ति के साथ एक ऐसी संपत्ति भी बैंक के पास होती है, जिसे जरूरत पड़ने पर वसूली के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। यही गोल्ड लोन का सबसे बड़ा रहस्य है।

लेकिन दस लाख के सोने पर दस लाख रुपये क्यों नहीं मिलते?

यहां गोल्ड लोन का असली गणित शुरू होता है। अगर आपके सोने का मूल्य दस लाख रुपये है तो बैंक आमतौर पर आपको पूरे दस लाख रुपये नहीं देगा। वह उसके मूल्य का केवल एक हिस्सा ऋण के रूप में देगा। इसे एलटीवी यानी Loan-to-Value Ratio कहा जाता है।

सीधी भाषा में समझें तो अगर दस लाख रुपये के मान्य सोने पर बैंक सात लाख रुपये देता है तो एलटीवी 70 प्रतिशत है। बाकी तीन लाख रुपये बैंक के लिए सुरक्षा का अंतर हैं।

क्यों? क्योंकि सोने की कीमत हमेशा एक जैसी नहीं रहती। बाजार भाव गिर सकता है। ग्राहक पर ब्याज जुड़ सकता है। नीलामी में सोना अनुमानित कीमत से कम में बिक सकता है और वसूली की प्रक्रिया में खर्च भी हो सकता है। अगर बैंक सोने की पूरी कीमत के बराबर ऋण दे दे तो कीमत में थोड़ी गिरावट आते ही बैंक की सुरक्षा कमजोर पड़ जाएगी। इसलिए बैंक सोने की कीमत से कम रकम देता है। यही अंतर गोल्ड लोन को बैंक के लिए सुरक्षित बनाता है।

भारत में अब गोल्ड लोन का एलटीवी सिर्फ 75 प्रतिशत नहीं है

गोल्ड लोन के बारे में लंबे समय से 75 प्रतिशत एलटीवी की बात आम है। लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक के नए नियमों के बाद तस्वीर बदल गई है।

1 अप्रैल 2026 से लागू नियमों के तहत उपभोग के लिए दिए जाने वाले गोल्ड और सिल्वर लोन में अधिकतम एलटीवी ऋण की राशि के हिसाब से अलग-अलग है। 2.5 लाख रुपये तक के ऋण में यह सीमा 85 प्रतिशत, 2.5 लाख से ज्यादा और 5 लाख रुपये तक के ऋण में 80 प्रतिशत और 5 लाख रुपये से अधिक के ऋण में 75 प्रतिशत है। इसका मतलब यह नहीं कि हर बैंक हर ग्राहक को अधिकतम सीमा तक ऋण देगा। ये नियामकीय अधिकतम सीमाएं हैं। बैंक अपनी जोखिम नीति, ग्राहक की स्थिति और अपने उत्पाद के हिसाब से इससे कम रकम भी दे सकता है।

मसलन, अगर पात्र सोने का मूल्य दो लाख रुपये है तो नियमों के हिसाब से 85 प्रतिशत तक, यानी 1.70 लाख रुपये तक का ऋण संभव हो सकता है। लेकिन बैंक चाहे तो इससे कम रकम मंजूर कर सकता है। इसलिए गोल्ड लोन की सुरक्षा केवल इस बात में नहीं है कि सोना बैंक के पास है। सुरक्षा इस बात में भी है कि सोने की कीमत और दिए गए ऋण के बीच एक अंतर रखा जाता है।

आपने हार दस लाख में खरीदा, बैंक उसे दस लाख का क्यों नहीं मानता?

गोल्ड लोन में यह सबसे ज्यादा गलत समझी जाने वाली बातों में से एक है। मान लीजिए आपने कोई हार दस लाख रुपये में खरीदा। इस कीमत में सिर्फ सोना शामिल नहीं होता। इसमें मेकिंग चार्ज, कर, डिजाइन, पत्थर और दूसरी सामग्री की कीमत भी हो सकती है। बैंक के लिए आपकी खरीद की पुरानी कीमत महत्वपूर्ण नहीं होती। वह यह देखता है कि गिरवी रखे आभूषण में वास्तव में कितना पात्र सोना है और उसकी शुद्धता कितनी है।

मान लीजिए हार का कुल वजन 100 ग्राम है, लेकिन उसमें पत्थर और दूसरी सामग्री लगी है। जांच के बाद पता चला कि पात्र सोने का वजन 85 ग्राम है। बैंक उसी 85 ग्राम सोने के मूल्य को आधार बनाएगा।

यानी दुकान की रसीद पर दस लाख रुपये लिखा होना और बैंक के मूल्यांकन में दस लाख रुपये का सोना होना दो अलग बातें हैं।

22 कैरेट सोने की कीमत 24 कैरेट जैसी क्यों नहीं होती?

24 कैरेट सोना लगभग शुद्ध सोने के सबसे करीब होता है। 22 कैरेट सोने में सोने की मात्रा करीब 91.67 प्रतिशत होती है। इसलिए 100 ग्राम 22 कैरेट आभूषण को 100 ग्राम शुद्ध सोना नहीं माना जा सकता।

मान लीजिए केवल उदाहरण के लिए 24 कैरेट सोने का मूल्य 12,000 रुपये प्रति ग्राम है। 22 कैरेट सोने का धातु मूल्य मोटे तौर पर 22/24 के अनुपात से करीब 11,000 रुपये प्रति ग्राम बैठेगा।

अब अगर आभूषण में पत्थर या दूसरी सामग्री भी लगी है तो उसका वजन भी अलग किया जाएगा। यही कारण है कि ग्राहक कह सकता है, ‘मेरा जेवर बाजार में दस लाख का है’, जबकि बैंक के मूल्यांकन में उसमें मौजूद पात्र सोने की कीमत आठ या नौ लाख रुपये निकल सकती है। दोनों के बीच अंतर का कारण मूल्यांकन का तरीका है।

बैंक को कैसे पता चलता है कि सोना असली है?

गोल्ड लोन की पूरी व्यवस्था में यह सबसे महत्वपूर्ण चरणों में से एक है। ऋणदाता सोने का वजन और शुद्धता जांचता है। इसके लिए अलग-अलग जांच पद्धतियां इस्तेमाल की जा सकती हैं, जिनमें आधुनिक मशीनों से की जाने वाली जांच भी शामिल है। बैंक के लिए यह जांच बेहद जरूरी है। अगर उसने नकली सोने या कम शुद्धता वाले सोने को ज्यादा मूल्य का मानकर ऋण दे दिया तो उसकी पूरी सुरक्षा व्यवस्था कमजोर पड़ जाएगी। इसीलिए गोल्ड लोन में मूल्यांकनकर्ता की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। ग्राहक की मौजूदगी में सोने का मूल्यांकन और उससे जुड़ी जानकारी दर्ज करने की व्यवस्था भी नियामकीय नियमों में रखी गई है। यानी गोल्ड लोन में बैंक का सबसे पहला सवाल कई बार यह नहीं होता कि ‘आप कितना कमाते हैं’, बल्कि यह होता है कि ‘आप जो सोना गिरवी रख रहे हैं, उसमें वास्तव में कितना सोना है?’

क्रेडिट स्कोर की भूमिका कम क्यों हो सकती है?

इसका कारण फिर वही है, गिरवी। व्यक्तिगत ऋण में अगर ग्राहक भुगतान करना बंद कर दे तो बैंक के पास कोई खास संपत्ति सुरक्षा नहीं होती। गोल्ड लोन में उसके पास सोना मौजूद है। इसलिए गिरवी संपत्ति बैंक के संभावित नुकसान को काफी हद तक कम कर सकती है। इसका मतलब यह नहीं कि गोल्ड लोन में ग्राहक की पहचान, भुगतान क्षमता या दूसरे ऋण संबंधी नियमों की जांच नहीं होती। ये प्रक्रियाएं बनी रहती हैं। लेकिन छोटे गोल्ड लोन में ऋण मूल्यांकन अपेक्षाकृत सरल हो सकता है। यही वजह है कि जिस व्यक्ति को बिना जमानत वाला ऋण मिलने में काफी जांच का सामना करना पड़े, उसे पर्याप्त सोना गिरवी रखने पर गोल्ड लोन अपेक्षाकृत जल्दी मिल सकता है।

बैंक के लिए गोल्ड लोन इतना आकर्षक कारोबार क्यों है?

बैंक या वित्तीय कंपनी का मूल कारोबार सोना जमा करना नहीं, ऋण देकर ब्याज कमाना है। मान लीजिए किसी ग्राहक को पांच लाख रुपये का ऋण दिया गया और ब्याज दर उदाहरण के लिए 10 प्रतिशत सालाना है। अगर पूरे साल पांच लाख रुपये बकाया रहते हैं तो मोटे तौर पर 50 हजार रुपये ब्याज बन सकता है। वास्तविक रकम भुगतान की व्यवस्था और बकाया मूलधन के अनुसार अलग होगी। ग्राहक समय पर भुगतान करता है तो बैंक को ब्याज मिलता है और मूलधन वापस आता है। अगर ग्राहक गंभीर रूप से भुगतान नहीं करता तो बैंक के पास गिरवी सोने से नियमों के अनुसार बकाया वसूलने का रास्ता रहता है। यानी बैंक के लिए सबसे अच्छा ग्राहक वह है जो समय पर पूरा ऋण चुका दे। सोना बैंक के लिए ग्राहक का आभूषण नहीं, सुरक्षा है।

क्या बैंक चाहता है कि ग्राहक कर्ज न चुकाए और उसका सोना मिल जाए?

बैंक का कारोबार सोना बेचकर मुनाफा कमाना नहीं है। वह चाहता है कि ग्राहक ऋण चुकाए और बैंक को ब्याज मिले। ग्राहक के भुगतान में चूक होने पर सोना वसूली की सुरक्षा बनता है। अगर नीलामी की स्थिति आती है तो उसके लिए भी नियम और प्रक्रिया होती है। ग्राहक को नोटिस देना, नीलामी की प्रक्रिया को पारदर्शी रखना और निर्धारित आरक्षित मूल्य जैसी व्यवस्थाएं लागू होती हैं। और सबसे महत्वपूर्ण बात, अगर नीलामी से ऋण और संबंधित बकाया चुकाने के बाद अतिरिक्त रकम बचती है तो वह बैंक की कमाई नहीं बन जाती। नियमों के अनुसार वह रकम ग्राहक को लौटाई जानी होती है। इसलिए बैंक का उद्देश्य ग्राहक का सोना हासिल करना नहीं, बल्कि ऋण की रकम और ब्याज वापस पाना है।

सोने की कीमत गिर जाए तो बैंक क्या करता है?

मान लीजिए दस लाख रुपये के पात्र सोने पर बैंक ने 7.5 लाख रुपये का ऋण दिया। अब सोने की कीमत गिरकर नौ लाख रुपये रह गई। पहले बैंक के पास दस लाख की संपत्ति के बदले 7.5 लाख रुपये का ऋण था। अब नौ लाख की संपत्ति के बदले 7.5 लाख रुपये का ऋण है। यानी सुरक्षा का अंतर काफी कम हो गया। अगर सोने की कीमत और गिरती है तो जोखिम और बढ़ सकता है। यही कारण है कि एलटीवी को केवल ऋण देते समय नहीं, ऋण की अवधि के दौरान भी निर्धारित सीमा के भीतर रखना महत्वपूर्ण है। बैंक के लिए सोने का बाजार भाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वही उसकी गिरवी सुरक्षा का मूल्य तय करता है।

गोल्ड लोन में क़िस्त के बजाय अंत में पूरी रकम क्यों हो सकती है?

हर गोल्ड लोन एक जैसा नहीं होता। कुछ ऋणों में ग्राहक हर महीने मूलधन और ब्याज की किस्त देता है, जबकि कुछ उत्पादों में अवधि के दौरान ब्याज चुकाया जाता है और मूलधन अंत में लौटाना होता है। इसे आम तौर पर बुलेट रीपेमेंट कहा जाता है। ऐसी व्यवस्था उन लोगों के लिए सुविधाजनक हो सकती है जिनकी आमदनी हर महीने एक जैसी नहीं होती। किसान, छोटे व्यापारी या मौसमी कारोबार करने वाले व्यक्ति के लिए कुछ समय तक केवल ब्याज देना आसान लग सकता है। लेकिन इसमें एक बड़ा खतरा भी है। शुरुआत में ऋण बहुत आसान लगता है, जबकि अवधि पूरी होने पर बड़ी रकम एक साथ चुकानी पड़ सकती है। इसीलिए ऐसे ऋण में पहले से यह तय होना चाहिए कि अंतिम भुगतान कहां से आएगा। अगर भुगतान का इंतजाम नहीं है तो वही सोना नीलामी तक पहुंच सकता है।

गोल्ड लोन की ब्याज दर कभी-कभी व्यक्तिगत ऋण से कम क्यों होती है?

ब्याज दर केवल पैसे की कीमत नहीं है, उसमें जोखिम की कीमत भी शामिल होती है। बिना जमानत वाले ऋण में बैंक के लिए नुकसान की संभावना ज्यादा हो सकती है। इसलिए बैंक उस जोखिम के लिए ज्यादा ब्याज ले सकता है।

गोल्ड लोन में बैंक के पास मूल्यवान और बाजार में आसानी से बिक सकने वाली संपत्ति होती है। इससे उसका संभावित नुकसान कम हो सकता है। इसलिए कुछ मामलों में गोल्ड लोन की ब्याज दर व्यक्तिगत ऋण से कम हो सकती है। लेकिन इसे कोई सार्वभौमिक नियम नहीं मानना चाहिए। ब्याज दर बैंक या अन्य वित्तीय कम्पनी ऋण की राशि, अवधि, एलटीवी, ग्राहक और भुगतान की व्यवस्था के अनुसार बदलती है। इसलिए केवल विज्ञापन में दिखाई गई ब्याज दर देखकर गोल्ड लोन नहीं लेना चाहिए। प्रसंस्करण शुल्क, मूल्यांकन शुल्क, देर से भुगतान का शुल्क, अन्य खर्च और नीलामी से जुड़ी शर्तों को भी समझना जरूरी है।

भारत में गोल्ड लोन का कारोबार इतना बड़ा क्यों है?

इसका एक बड़ा कारण भारतीय परिवारों के पास मौजूद सोने के आभूषण हैं। कई परिवारों के पास बड़ी मात्रा में सोना है, लेकिन वह घर में रखा रहता है और नियमित आमदनी पैदा नहीं करता। गोल्ड लोन उस संपत्ति को बेचे बिना कुछ समय के लिए नकदी में बदलने का रास्ता देता है।

मान लीजिए किसी परिवार को अचानक अस्पताल का खर्च देना है। किसी दुकानदार को कुछ महीनों के लिए कारोबार में पैसा लगाना है। किसी किसान को फसल आने से पहले पैसों की जरूरत है। ऐसी स्थिति में सोना बेचने के बजाय उसे गिरवी रखकर ऋण लिया जा सकता है। ऋण चुकाने के बाद आभूषण वापस मिल सकता है।

यही कारण है कि गोल्ड लोन केवल बड़े कारोबारियों या अमीर लोगों का साधन नहीं है। यह उन परिवारों के लिए भी ऋण का एक रास्ता है जिनकी आय को नियमित वेतन या दूसरे दस्तावेजों से साबित करना हमेशा आसान नहीं होता।

लेकिन ग्राहक के लिए सबसे बड़ा खतरा क्या है?

यहीं गोल्ड लोन की कहानी का दूसरा पहलू सामने आता है। बैंक के लिए 50 ग्राम सोना एक वित्तीय संपत्ति है। लेकिन परिवार के लिए वही सोना मां की चूड़ियां, शादी का हार या पीढ़ियों पुरानी निशानी हो सकता है। इसलिए भुगतान न कर पाने की कीमत केवल आर्थिक नहीं होती। परिवार ऐसी चीज खो सकता है जिसकी भावनात्मक कीमत बाजार में तय नहीं की जा सकती।गोल्ड लोन की आसान प्रक्रिया कभी-कभी लोगों को यह भ्रम भी दे सकती है कि पैसा आसानी से मिल रहा है, इसलिए ऋण भी आसानी से चुका दिया जाएगा। जबकि असली सवाल यह है कि ऋण लौटाने का पैसा आएगा कहां से।

एक उदाहरण से पूरा गणित समझिए

मान लीजिए आपके पास 100 ग्राम का आभूषण है। जांच में पता चला कि पत्थर और दूसरी सामग्री हटाने के बाद ऋण के लिए मान्य सोने का वजन 90 ग्राम है और वह 22 कैरेट का है।

सिर्फ उदाहरण के लिए मान लेते हैं कि मान्य 22 कैरेट सोने का मूल्य 11,000 रुपये प्रति ग्राम है।

तो पात्र सोने का मूल्य हुआ: 90 × 11,000 = 9,90,000 रुपये

अगर इस ऋण श्रेणी में अधिकतम एलटीवी 75 प्रतिशत लागू है तो सैद्धांतिक अधिकतम ऋण होगा: 9,90,000 × 75% = 7,42,500 रुपये

यानी ग्राहक को लग सकता है कि उसके पास 10 या 11 लाख रुपये का जेवर है, लेकिन बैंक पहले गैर-सोना सामग्री को अलग करेगा, फिर शुद्धता और मान्य सोने का मूल्य निकालेगा और उसके बाद उस मूल्य का केवल एक हिस्सा ऋण के रूप में देगा। यही गोल्ड लोन की सुरक्षा का मूल गणित है: सही वजन, सही शुद्धता, सही मूल्य और मूल्य से कम ऋण। और इसके बाद सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा है, गिरवी रखा सोना।

फिर बैंक कुछ ही मिनट में लाखों रुपये देने को तैयार क्यों हो जाता है?

बैंक आपके भविष्य की कमाई पर अकेले भरोसा नहीं कर रहा होता। उसके पास उसी समय ऐसी संपत्ति होती है जिसका वजन किया जा सकता है, जिसकी शुद्धता जांची जा सकती है, जिसका बाजार मूल्य निकाला जा सकता है और जरूरत पड़ने पर जिसे नियमों के अनुसार बेचकर बकाया रकम की वसूली की जा सकती है।

यानी पर्सनल लोन में बैंक का सवाल होता है, ‘क्या यह व्यक्ति आने वाले वर्षों में पैसा कमाकर ऋण चुका पाएगा?’

गोल्ड लोन में एक दूसरा सवाल जुड़ जाता है, ‘अगर यह व्यक्ति नहीं चुका पाया तो हमारे पास कितनी मूल्यवान गिरवी संपत्ति है?’ यही अंतर पूरी प्रक्रिया को बदल देता है। गोल्ड लोन की तेजी बैंक की उदारता नहीं, बल्कि उसके जोखिम का गणित है। बैंक सोने की पूरी कीमत का ऋण नहीं देता, गैर-सोना सामग्री का मूल्य नहीं जोड़ता, शुद्धता और वजन जांचता है, एलटीवी की सीमा रखता है और गिरवी संपत्ति अपने पास रखता है। इसलिए गोल्ड लोन को केवल ‘सोने के बदले आसानी से मिलने वाला पैसा’ समझना अधूरा है। असल में यह ऐसा ऋण है जिसमें बैंक आपकी आर्थिक साख के साथ आपके सोने को भी अपनी सुरक्षा बनाता है।

Yogesh Mishra
ABOUT THE AUTHOR

Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

Next Story