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Cyber Fraud: गोल्डन ऑवर में ये 5 कदम उठाकर बचाई जा सकती है ठगी की रकम
Cyber Fraud : रिपोर्ट, ट्रेस, फ्रीज, प्रिजर्व और इन्वेस्टिगेट का फॉर्मूला, कुछ घंटों की देरी से बढ़ सकती है ठगी की रकम गंवाने की आशंका
Cyber Fraud: डिजिटल तकनीक के तेजी से विस्तार के साथ साइबर अपराध भी लगातार बढ़ रहा है। साइबर ठग नए-नए तरीकों से लोगों का भरोसा जीतकर उनके बैंक खातों से रकम उड़ा रहे हैं। कभी ओटीपी साझा करने की गलती भारी पड़ती है तो कभी शेयर बाजार में निवेश पर मोटा मुनाफा दिलाने के नाम पर लोग खुद ही ठगों को अपनी बैंकिंग और निजी जानकारी उपलब्ध करा देते हैं। यही वजह है कि साइबर फ्रॉड के मामलों में सतर्कता के साथ-साथ घटना के तुरंत बाद की गई कार्रवाई भी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ डॉ. रक्षित टंडन के मुताबिक, साइबर ठगी के बाद शुरुआती समय यानी ‘गोल्डन ऑवर’ में उठाए गए कुछ महत्वपूर्ण कदम पीड़ित की रकम को बचाने में निर्णायक साबित हो सकते हैं। उन्होंने साइबर अपराध की शिकायत मिलते ही ‘रिपोर्ट, ट्रेस, फ्रीज, प्रिजर्व और इन्वेस्टिगेट’ यानी पांच चरणों पर एक साथ तेजी से काम करने का फॉर्मूला बताया है।
दरअसल, हाल ही में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर स्थित नेताजी सुभाष चंद्र बोस राज्य पुलिस अकादमी में साइबर अपराध और वित्तीय धोखाधड़ी को लेकर विशेष कार्यशाला आयोजित की गई। ‘नवीन युग के वित्तीय अपराध एवं त्वरित प्रतिक्रिया की तैयारी’ विषय पर आयोजित इस सेमिनार में प्रदेशभर के करीब 300 पुलिस अधिकारियों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम में देश के जाने-माने साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ डॉ. रक्षित टंडन ने पुलिस अधिकारियों को साइबर अपराध की जांच और त्वरित कार्रवाई के आधुनिक तरीकों की जानकारी दी।
पांच कदमों से समझें साइबर फ्रॉड के बाद क्या करें
1. रिपोर्ट करें: ठगी का पता चलते ही बिना समय गंवाए साइबर अपराध की शिकायत दर्ज कराना जरूरी है। शुरुआती सूचना जितनी जल्दी पुलिस और संबंधित वित्तीय संस्थानों तक पहुंचेगी, रकम को रोकने की संभावना उतनी ही बढ़ेगी।
2. ट्रेस करें: पैसा किस बैंक खाते, यूपीआई आईडी या डिजिटल माध्यम में गया, इसकी तत्काल पड़ताल शुरू होनी चाहिए। शुरुआती घंटों में ट्रांजेक्शन की कड़ी पकड़ना जांच के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है।
3. फ्रीज करें: संदिग्ध बैंक खातों और संबंधित लेनदेन को तत्काल ब्लॉक या फ्रीज कराने की कोशिश की जानी चाहिए। इससे ठगी की रकम को दूसरे खातों या अन्य राज्यों में ट्रांसफर होने से रोका जा सकता है।
4. डिजिटल सबूत सुरक्षित रखें: पीड़ित के मोबाइल फोन, चैट, कॉल हिस्ट्री, बैंक ट्रांजेक्शन, यूपीआई डिटेल और अन्य डिजिटल फुटप्रिंट जांच के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इसलिए इन्हें सुरक्षित रखना जरूरी है।
5. जांच को मास्टरमाइंड तक ले जाएं: जांच सिर्फ इस बात तक सीमित नहीं होनी चाहिए कि पैसा कहां गया। पुलिस को डिजिटल फुटप्रिंट और फर्जी खातों की मदद से पूरे नेटवर्क और उसके पीछे मौजूद मास्टरमाइंड तक पहुंचने का प्रयास करना चाहिए।
कुछ घंटों की देरी पड़ सकती है भारी
कार्यशाला में विशेषज्ञों ने बताया कि साइबर ठगी की सूचना मिलने के बाद शुरुआती कुछ घंटे बेहद अहम होते हैं। यदि तत्काल कार्रवाई कर बैंकिंग लेनदेन को रोकने का प्रयास किया जाए तो ठगी की रकम को आगे ट्रांसफर होने से बचाने की संभावना बढ़ सकती है। वहीं, देरी होने पर ठग रकम को कई फर्जी बैंक खातों, यूपीआई-क्यूआर कोड, क्रिप्टोकरेंसी, शेयर बाजार से जुड़े माध्यमों और अन्य डिजिटल चैनलों के जरिए तेजी से इधर-उधर कर सकते हैं।
ऐसे मामलों में रकम की मूल ट्रांजेक्शन श्रृंखला को पकड़ना और उसे वापस हासिल करना जांच एजेंसियों के लिए अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इसलिए साइबर फ्रॉड की शिकायत पर पुलिस, बैंक, फिनटेक कंपनियों और टेलीकॉम कंपनियों के बीच तत्काल समन्वय स्थापित करना जरूरी है।
कार्यक्रम में मौजूद वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने भी साइबर अपराध के मामलों में त्वरित प्रतिक्रिया पर जोर दिया। डीजी जेपी सिंह ने कहा कि साइबर अपराधी हजारों किलोमीटर दूर बैठकर कुछ ही मिनटों में करोड़ों रुपये की ठगी को अंजाम दे रहे हैं। ऐसे में पुलिस की प्रतिक्रिया भी उतनी ही तेज और तकनीक आधारित होनी चाहिए।
कार्यशाला में डीजीपी अरुणदेव गौतम, डीजी जेपी सिंह, एडीजी दीपमांशु काबरा, अमित कुमार, डॉ. आनंद छाबड़ा और आईजी प्रशांत अग्रवाल समेत कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। विशेषज्ञों का जोर इस बात पर रहा कि साइबर अपराध से निपटने में समय ही सबसे महत्वपूर्ण हथियार है। इसलिए ठगी का शिकार होने पर घबराने या इंतजार करने के बजाय तुरंत शिकायत दर्ज कराना और बैंकिंग लेनदेन को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाना चाहिए।


