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सुकमा में दिव्यांग बच्चों को मिल रही नई उड़ान, 'आकार' में 120 बच्चों को विशेष प्रशिक्षण
छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित सुकमा जिले में ‘आकार’ संस्था 120 दिव्यांग बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से अनुकूलित प्रशिक्षण के साथ विशेष थैरेपी देने का काम कर रही है।
सुकमा स्थित 'आकार' स्कूल की तस्वीर social media image
Sukma Divyang Children: छत्तीसगढ़ का नक्सल प्रभावित आकांक्षी जिला सुकमा में समावेशी शिक्षा और सशक्तीकरण की एक बेहद सराहनीय पहल सामने आई है। जिले में संचालित विशेष ‘आकार’ नामक संस्था 120 दिव्यांग बच्चों को अनुकूलित प्रशिक्षण के साथ विशेष थैरेपी प्रदान कर रही है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य दिव्यांग बच्चों के स्कूल छोड़ने (ड्रॉपआउट) की दर को कम करना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है।
‘आकार’ में बच्चों को वाक् चिकित्सा, फिजियोथेरेपी, ऑक्यूपेशनल थेरेपी, व्यवहार प्रबंधन और विशेष शिक्षा जैसी सुविधाएं दी जा रही हैं। इसके अलावा सांकेतिक भाषा, ब्रेल, कंप्यूटर, कला, शिल्प, संगीत और खेल का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। कई बच्चे नियमित स्कूलों में पढ़ाई करने के साथ आकार के कार्यक्रमों से भी जुड़े हैं।
अक्षमता नहीं, क्षमता पर ध्यान
केंद्र में आने वाले बच्चों की चुनौतियां अलग-अलग हैं। कुछ बच्चों को सुनने और बोलने में परेशानी है, जबकि कुछ को पढ़ने-लिखने में कठिनाई होती है। ऐसे बच्चों की जरूरत के अनुसार विशेष प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई है। दृष्टिबाधित विद्यार्थियों को ब्रेल के माध्यम से शिक्षा दी जाती है, वहीं श्रवण बाधित बच्चों को सांकेतिक भाषा सिखाई जाती है।
आकार के कई बच्चे संगीत और अन्य रचनात्मक गतिविधियों में अपनी प्रतिभा दिखा रहे हैं। वहीं कंप्यूटर प्रशिक्षण के जरिए बच्चों की डिजिटल और शैक्षणिक क्षमताओं को भी विकसित किया जा रहा है। बच्चे हिंदी और अंग्रेजी में टाइपिंग, फाइल सेव करने और पढ़ने-लिखने में मदद करने वाले एप्लिकेशन का इस्तेमाल करना सीख रहे हैं।
उच्च शिक्षा और सरकारी नौकरी तक पहुंचे बच्चे
आकार में प्रशिक्षण लेने वाले कई बच्चे आगे की पढ़ाई के लिए रायपुर, भिलाई, दुर्ग और पुणे जैसे शहरों तक पहुंचे हैं। कुछ विद्यार्थी डीएड और बीएड जैसे पाठ्यक्रमों में भी पढ़ाई कर रहे हैं। वहीं कुछ बच्चों को सरकारी नौकरी भी मिली है। दो विद्यार्थी इंदिरा गांधी संगीत विश्वविद्यालय में डिप्लोमा की पढ़ाई कर रहे हैं।
‘आकार’ पहल का उद्देश्य दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले दिव्यांग बच्चों को शिक्षा, चिकित्सा, प्रशिक्षण और तकनीक से जोड़ना है। जिला प्रशासन के माध्यम से संचालित इस पहल में जिला खनिज फाउंडेशन (DMF) जैसे संसाधनों का भी उपयोग किया जा रहा है।
यह पहल दिव्यांग बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने की दिशा में प्रयास के तौर पर सामने आई है। इसका फोकस बच्चों की सीमाओं के बजाय उनकी क्षमताओं को पहचानकर उन्हें आगे बढ़ने के अवसर देने पर है।


