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Highway Construction Quality: हावड़ा ब्रिज 80 साल बाद भी मजबूत, नए हाईवे महीनों में क्यों टूट रहे? जानें असली वजह
Highway Construction Quality: Highway Construction Quality पर सवाल क्यों उठ रहे हैं? जानें नए हाईवे में गड्ढों और धंसाव की वजह, ड्रेनेज, मिट्टी, डिजाइन और रखरखाव की अहम भूमिका।
Highway Construction Quality: Why Do New Highways Fail So Quickly?
Highway Construction Quality: हावड़ा ब्रिज जैसे करीब एक सदी पुराने ऐतिहासिक पुल आज भी देश की पहचान और इंजीनियरिंग की मिसाल बने हुए हैं। दूसरी ओर, करोड़ों-अरबों रुपये की लागत से तैयार किए गए कुछ नए हाईवे और एक्सप्रेसवे उद्घाटन के कुछ ही समय बाद गड्ढों, दरारों और धंसाव की वजह से सवालों के घेरे में आ जाते हैं। आखिर ऐसा क्यों है कि अंग्रेजों के दौर में बने हावड़ा ब्रिज, कोलकाता का विद्यासागर सेतु और मुंबई का बांद्रा-वर्ली सी लिंक जैसी बड़ी संरचनाएं दशकों तक टिकने के लिए जानी जाती हैं, जबकि आज की अत्याधुनिक तकनीक से बनी कुछ सड़कें शुरुआती बारिश में ही जवाब देने लगती हैं? क्या फर्क सिर्फ निर्माण सामग्री और तकनीक का है या इसके पीछे डिजाइन, नींव, मिट्टी, जलनिकासी, गुणवत्ता नियंत्रण और नियमित रखरखाव की पूरी व्यवस्था काम करती है? यही सवाल आज देश में तेजी से बन रहे हाईवे और एक्सप्रेसवे की गुणवत्ता को लेकर सबसे अहम बन गया है।
विशेषज्ञों और सरकारी तकनीकी दस्तावेजों के अनुसार इसका जवाब सिर्फ निर्माण सामग्री में नहीं, बल्कि डिजाइन, मिट्टी, पानी, लोड, निरीक्षण और रखरखाव की पूरी व्यवस्था में छिपा है। भारत में सड़क और एक्सप्रेसवे निर्माण की रफ्तार पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़ी है। नए कॉरिडोर शहरों को जोड़ रहे हैं और सफर का समय घटा रहे हैं। लेकिन किसी हाईवे का उद्घाटन हो जाना उसकी मजबूती की अंतिम परीक्षा नहीं है। असली परीक्षा बारिश, भारी ट्रैफिक, जलनिकासी और समय के साथ होती है। यही वजह है कि नई सड़क में अगर शुरुआती महीनों में ही धंसाव या गड्ढे दिखें तो यह सिर्फ ऊपर की डामर परत का मामला नहीं माना जा सकता।
पंखों से सड़क सुखाने का वीडियो क्यों हुआ वायरल?
लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे की मरम्मत के दौरान कई बड़े इलेक्ट्रिक पंखे लगाए जाने का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ। लगातार बारिश के कारण क्षतिग्रस्त हिस्से में नमी थी और मरम्मत से पहले प्रभावित लेयर को सुखाने की कोशिश की जा रही थी। रिपोर्टों के मुताबिक करीब 300 मीटर के हिस्से में सब-बेस और दूसरी सामग्री का काम किया जा रहा था। इस तस्वीर ने उस बुनियादी सवाल को जरूर सामने ला दिया कि नई सड़क की संरचना में पानी इतनी जल्दी अंदर कैसे पहुंच गया? शुरुआती जांच में कमजोर और ज्यादा प्लास्टिक वाली मिट्टी तथा सड़क के नीचे फंसे पानी को संभावित कारण बताया गया है।
दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे भी सवालों के घेरे में
ऐसा नहीं है कि सवाल केवल लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे को लेकर उठे हैं। करीब 12 हजार करोड़ रुपये से अधिक की लागत से तैयार दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे का उद्घाटन 14 अप्रैल 2026 को हुआ था। इसके कुछ महीनों के भीतर अलग-अलग हिस्सों में सड़क की सतह में गड्ढे, धंसाव और दरारों की शिकायतें सामने आईं। जुलाई में सामने आई ग्राउंड रिपोर्टों में कई जगह सड़क की स्थिति को लेकर सवाल उठाए गए। केंद्र सरकार ने संसद में बताया कि एक्सप्रेसवे पर दो गड्ढे मिले थे, जिन्हें ठेकेदार ने अपनी लागत पर ठीक किया। परियोजना पर 10 साल की डिफेक्ट लायबिलिटी अवधि भी लागू है। विशेषज्ञों के अनुसार जब नई सड़क पर शुरुआती महीनों में बार-बार मरम्मत की जरूरत पड़े तो गुणवत्ता नियंत्रण और निर्माण प्रक्रिया की जांच होना जरूरी है।
दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे पर सड़क धंसने की वजह क्या थी?
दिल्ली-देहरादून इकोनॉमिक कॉरिडोर के उद्घाटन के 2 महीने बाद ही 1 जुलाई 2026 को इसके एक हिस्से में सड़क की सतह धंसने की घटना सामने आई थी। इसके बाद भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण यानी NHAI ने आधिकारिक तौर पर इसकी वजह बताई। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की ओर से 2 जुलाई को जारी बयान में NHAI ने कहा कि, 'किलोमीटर 55+480 पर सड़क की सतह धंसने की घटना पिछली रात हुई भारी बारिश के बाद स्थानीय जलभराव और स्थायी क्रॉस-ड्रेनेज सिस्टम को चालू करने में आ रही बाधाओं के कारण हुई। NHAI के मुताबिक प्रभावित हिस्से की पहचान नियमित पेट्रोलिंग के दौरान हुई और तुरंत मरम्मत शुरू कर दी गई।' इस आधिकारिक बयान से एक महत्वपूर्ण बात सामने आई कि, सड़क की मजबूती के लिए पानी की निकासी उतनी ही जरूरी है जितनी सड़क की ऊपरी परत। NHAI ने यह भी बताया कि वहां बनाया गया बैलेंसिंग कल्वर्ट बारिश के पानी को सड़क से दूर ले जाने के लिए डिजाइन किया गया था, लेकिन स्थानीय स्तर पर इसे स्थायी ड्रेनेज सिस्टम से जोड़ने में बाधाएं आईं। इसके अलावा भूमि विवाद के कारण कुछ स्थायी ढलान सुरक्षा और ड्रेनेज का काम भी लंबित था।
सिर्फ डामर की ऊपरी परत नहीं है हाईवे टूटने की असली वजह
सड़क को देखकर अक्सर लगता है कि उसकी मजबूती सिर्फ ऊपर बिछी काली डामर की परत से तय होती है। विशेषज्ञों के अनुसार सड़क एक पूरी संरचना होती है। इसके नीचे मिट्टी की सतह, सबग्रेड, सब-बेस और बेस जैसी कई परतें होती हैं। इन सभी को डिजाइन के मुताबिक तैयार करना और पर्याप्त रूप से व्यवस्थित करना जरूरी होता है। अगर नीचे की मिट्टी कमजोर है या उसे पर्याप्त रूप से दबाया नहीं गया है तो बारिश का पानी उसमें जाकर उसकी मजबूती कम कर सकता है। इसके बाद जब भारी वाहन लगातार गुजरते हैं तो सड़क के नीचे की परत बैठने लगती है। ऊपर की डामर की सतह में दरारें और गड्ढे दिखाई देने लगते हैं। इसलिए सड़क की खराबी ऊपर दिखाई जरूर देती है, लेकिन उसकी शुरुआत कई बार नीचे से होती है।
बारिश और ड्रेनेज क्यों बन जाते हैं सड़क के सबसे बड़े दुश्मन?
भारत में मानसून हाईवे निर्माण की सबसे बड़ी प्राकृतिक चुनौतियों में से एक है। अगर बारिश का पानी सड़क से तेजी से बाहर नहीं निकले तो वह सड़क के किनारों, मिट्टी और नीचे की परतों को प्रभावित कर सकता है। इसी कारण NHAI ने जून 2026 में राष्ट्रीय राजमार्गों पर ड्रेनेज की मैकेनाइज्ड क्लीनिंग और प्रिवेंटिव मेंटेनेंस (mechanized cleaning और preventive maintenance) को मजबूत करने के लिए नई व्यवस्था की घोषणा की। मंत्रालय के मुताबिक ऑटोमेटेड पॉटहोल रिपेयर, मैकेनाइज्ड ड्रेन क्लीनिंग (automated pothole repair, mechanized drain cleaning) और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा ताकि सड़क की नियमित देखभाल बेहतर हो सके। सरकार खुद भी मानती है कि सड़क की लंबी उम्र के लिए सिर्फ निर्माण पर्याप्त नहीं है। निर्माण के बाद लगातार निगरानी और रखरखाव भी जरूरी है।
पहाड़ी हाईवे में समस्या और भी जटिल होती है
हर सड़क की समस्या एक जैसी नहीं होती। दिल्ली-देहरादून कॉरिडोर का गणेशपुर-देहरादून हिस्सा पहाड़ी क्षेत्र से गुजरता है। यहां सड़क निर्माण के लिए पहाड़ों की कटिंग की गई है। ऐसे इलाके में सड़क के साथ ढलान, चट्टान, बारिश और मलबे का जोखिम भी जुड़ जाता है। NHAI ने मई 2026 में इस हिस्से में स्लोप स्टेबिलाइजेशन (slope stabilization) के लिए विशेष काम की घोषणा की थी। मंत्रालय ने बताया था कि पहाड़ी ढलानों की स्केलिंग (scaling) और अतिरिक्त मलबे को हटाने का काम किया जाना है। संवेदनशील स्थानों पर पत्थरों के गिरने के खतरे को देखते हुए स्टोन कैचर्स (stone catchers) भी लगाए गए हैं। यानी नई सड़क बनाना केवल डामर बिछाने का काम नहीं है। जिस जमीन और भौगोलिक स्थिति से सड़क गुजर रही है, उसके हिसाब से पूरा डिजाइन बदलना पड़ता है।
पुराने पुल आज भी इतने मजबूत कैसे हैं?
देश में कई रेलवे और सड़क पुल ऐसे हैं जो कई दशक पुराने हैं। भारतीय रेलवे के आधिकारिक तकनीकी दस्तावेजों में लगभग 100 साल पुरानेमेसनरी आर्च ब्रिजेज (masonry arch bridges) का भी उल्लेख मिलता है। रेलवे के RDSO के दस्तावेज के मुताबिक भारतीय रेलवे के नेटवर्क में करीब 21,000 मेसनरी आर्च ब्रिजेज और कलवर्ट्स हैं। जिनमें से अधिकांश 100 साल से ज्यादा पुराने बताए गए हैं। इन पुलों की क्षमता का आकलन लोड टेस्ट (load tests) और तकनीकी जांच के जरिए किया गया है। इसका मतलब यह नहीं है कि हर पुराना पुल आज भी पूरी तरह सुरक्षित है। भारतीय रेलवे के ब्रिज मैनुअल (Bridge Manual) में साफ कहा गया है कि जिन पुलों में फिजिकल डिस्ट्रेस (physical distress) यानी भौतिक क्षति या दूसरी गंभीर समस्या दिखाई देती है, उन्हें विस्तृत निरीक्षण के बाद पुनर्स्थापना, मजबूतीकरण या पुनर्निर्माण (rehabilitation, strengthening या rebuilding) की जरूरत हो सकती है। जरूरत पड़ने पर पुल पर वाहनों की गति पर रोक या यातायात पर रोक (speed restriction या traffic suspension) भी लगाया जा सकता है। यानी पुराने पुलों की मजबूती का एक बड़ा कारण यह भी है कि उन्हें लगातार निरीक्षण, परीक्षण और जरूरत के मुताबिक मजबूत किया जाता रहा है।
पुराने पुलों की लंबी उम्र का राज क्या है?
भारतीय रेलवे के RDSO के एक तकनीकी दस्तावेज में बताया गया है कि अच्छी तरह तैयार और सही तरीके से लगाए गए लोहे की सरिया से मजबूत की गई कंक्रीट संरचनाएं ( reinforced concrete structures) सामान्य परिस्थितियों में लंबे समय तक टिक सकती हैं। दस्तावेज यह भी बताता है कि संरचना की दीर्घकालिक मजबूती केवल निर्माण सामग्री की गुणवत्ता पर निर्भर नहीं करती। बल्कि विस्तृत संरचनात्मक डिजाइन (detailing, construction) और आसपास का वातावरण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक पुराने पुल केवल इसलिए मजबूत नहीं हैं क्योंकि वे पुराने जमाने में बनाए गए थे। उनकी मजबूती में मजबूत डिजाइन, भारी संरचना, सही फाउंडेशन, निर्माण की तकनीक और दशकों तक किया गया निरीक्षण व रखरखाव शामिल है। साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि पुराने पुलों पर आज का ट्रैफिक और लोड वही नहीं है जिसके लिए वे मूल रूप से बनाए गए थे। इसलिए रेलवे समय-समय पर उनकी क्षमता का परीक्षण करता है। RDSO के दस्तावेजों में पुराने पुलों पर लोड टेस्टिंग और ढांचे की मजबूती और स्थिति का आकलन के अनगिनत उदाहरण मौजूद हैं।
क्या है आज की तकनीक में खामियां?
आज सड़क निर्माण में बेहतर मशीनें, नई सामग्री, आधुनिक डिजाइन सॉफ्टवेयर, ड्रोन, लेजर सर्वे और सेंसर आधारित निगरानी जैसी तकनीक उपलब्ध हैं। सड़क परिवहन मंत्रालय ने जून 2026 में Network Survey Vehicles के इस्तेमाल की जानकारी दी है। इन वाहनों में 3D laser-based systems, GPS और imaging technology का इस्तेमाल कर सड़क की सतह पर cracks, potholes और unevenness जैसी समस्याओं का पता लगाया जा सकता है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक समस्या केवल तकनीक की कमी नहीं है। बल्कि उपलब्ध तकनीक और मानकों का इस्तेमाल जमीन पर कितनी सख्ती से किया जा रहा है, यहां पर है।
क्या हर गलती ठेकेदार की होती है?
सड़क निर्माण में ठेकेदार की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन पूरी जिम्मेदारी केवल उसी पर डाल देना पर्याप्त नहीं है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक किसी परियोजना की शुरुआत डिजाइन और DPR से होती है। फिर मिट्टी की जांच, सामग्री की गुणवत्ता, निर्माण की अलग-अलग परतों की मोटाई, compaction, drainage, साइट निरीक्षण और अंत में काम की मंजूरी जैसे कई चरण आते हैं। इनमें से किसी एक स्तर पर गंभीर चूक हो तो उसका असर पूरी सड़क की उम्र पर पड़ सकता है। इसीलिए यह देखना जरूरी है कि जिस काम को इंजीनियरों और गुणवत्ता नियंत्रण एजेंसियों ने पास किया, उसमें बाद में इतनी जल्दी खराबी क्यों आई। CAG की विभिन्न ऑडिट रिपोर्टों में भी सड़क परियोजनाओं में DPR, कॉन्ट्रैक्ट मैनेजमेंट, भुगतान और निगरानी से जुड़ी अनियमितताओं पर सवाल उठाए गए हैं। एक ऑडिट में NHAI की परियोजनाओं में ठेकेदार को अनुचित लाभ दिए जाने जैसी आपत्तियां भी दर्ज हुई हैं।
भ्रष्टाचार का सवाल, लेकिन सबूत के साथ
हाईवे परियोजनाओं पर चर्चा करते समय भ्रष्टाचार का मुद्दा भी सामने आता है। 2020 में SaveLIFE Foundation की एक स्टडी में ट्रक ड्राइवरों और फ्लीट ऑपरेटरों से जुड़े सड़क परिवहन तंत्र में रिश्वतखोरी का बड़ा आर्थिक अनुमान सामने आया था। रिपोर्ट के मुताबिक ड्राइवर और फ्लीट मालिक अलग-अलग विभागों को मिलाकर सालाना करीब 48 हजार करोड़ रुपये तक रिश्वत देते थे।लखनऊ-कानपुर परियोजना को लेकर कंपनी और राजनीतिक संबंधों पर भी सवाल उठे हैं। पीएनसी इंफ्राटेक के CMD प्रदीप कुमार जैन और भाजपा के राज्यसभा सांसद नवीन जैन के पारिवारिक संबंध सार्वजनिक चर्चा में रहे हैं।
सड़क निर्माण की स्वतंत्र जांच जरूरी
एक्सपर्ट्स के मुताबिक नई सड़क के टूटने की हर घटना को कमीशन का खेल या घटिया सामग्री का नतीजा कहना उचित नहीं है। कई बार भारी बारिश, जलभराव, कमजोर प्राकृतिक मिट्टी, पहाड़ी ढलान, भूमिगत संरचना या अप्रत्याशित भूगर्भीय परिस्थितियां भी सड़क को नुकसान पहुंचा सकती हैं। लेकिन दूसरी तरफ हर समस्या को मौसम के खाते में डाल देना भी सही नहीं है। अगर किसी सड़क में बार-बार शुरुआती खराबियां आती हैं तो डिजाइन,मिट्टी की जांच, मिट्टी की उचित दबाई/कसावट, जल निकासी की व्यवस्था, निर्माण सामग्री की गुणवत्ता, निर्माण कार्य की निगरानी (soil testing, compaction, drainage, material quality और construction supervision) की स्वतंत्र जांच जरूरी है। पुराने पुलों की कामयाबी भी यही बताती है कि मजबूत निर्माण के साथ नियमित निरीक्षण और समय पर रखरखाव बेहद महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। आज भारत जिस तेजी से एक्सप्रेसवे बना रहा है, उसके लिए सिर्फ सड़क की लंबाई बढ़ाना नहीं, बल्कि उसकी उम्र और गुणवत्ता सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती बन चुका है।


