कौन-कौन है 'दिमागी नक्सल'? चिदंबरम के बयान पर रिजिजू ने दी सफाई, PM के भाषण पर सियासी बवाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘दिमागी नक्सल’ वाले बयान पर सियासी विवाद के बीच केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने सफाई दी है कि पीएम ने विपक्षी नेताओं को ऐसा नहीं कहा था।

Sachin Singh
Published on: 16 Aug 2026 3:46 PM IST
कौन-कौन है दिमागी नक्सल?  चिदंबरम के बयान पर रिजिजू ने दी सफाई, PM के भाषण पर सियासी बवाल
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Dimagi Naxal: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस के भाषण में 'दिमागी नक्सल' शब्द के इस्तेमाल को लेकर सियासी बहस छिड़ गई है। कांग्रेस नेताओं ने इसे लेकर कई सवाल खड़े किए हैं. चिदंबरम ने कहा कि मुझे दिमागी नक्सल होने पर गर्व है.

वहीं इसे लेकर केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि पीएम मोदी ने विपक्ष के लिए इस शब्द का इस्तेमाल नहीं किया है. लेकिन उन्होंने ये बताया है कि किस तरह के लोग 'दिमागी नक्सल' के केटेगरी में आते हैं.

किरेन रिजिजू ने बताया- कौन है ‘दिमागी नक्सल’?

रिजिजू ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर बताया कि प्रधानमंत्री के बयान में ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल किन लोगों के लिए किया गया था।

  1. . जो माओवादियों का समर्थन करते हैं और भारतीय संविधान को अस्वीकार करते हैं।
  2. जो अलगाववादियों के साथ खड़े हैं और अनुच्छेद 370 का समर्थन करते हैं।
  3. जो उत्तर-पूर्व को भारत से अलग करने के लिए चिकन नेक को काटना चाहते हैं।

चिदंबरम ने कहा- ‘मुझे दिमागी नक्सल होने पर गर्व’

पीएम मोदी के बयान पर कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने प्रधानमंत्री की टिप्पणी को अपने ऊपर लेते हुए सोशल मीडिया पर कहा था कि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ होने पर गर्व है। चिदंबरम की इस प्रतिक्रिया के बाद यह मुद्दा और ज्यादा राजनीतिक बहस का विषय बन गया। कांग्रेस के कुछ अन्य नेताओं ने भी पीएम मोदी के बयान पर सवाल उठाए।

पीएम मोदी ने भाषण में क्या कहा था?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले से देश को संबोधित करते हुए माओवादी हिंसा का मुद्दा उठाया था। उन्होंने कहा था कि लंबे समय तक देश के कई हिस्से नक्सली हिंसा से प्रभावित रहे और इस दौरान बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मियों ने अपनी जान गंवाई।

इसी दौरान उन्होंने 'दिमागी नक्सल' का भी जिक्र किया। पीएम मोदी के मुताबिक, लंबे समय तक माओवादी सोच रखने वाले लोग सार्वजनिक जीवन और सरकारी समितियों तक में मौजूद रहे और इस सोच का असर संस्थानों और नीतियों पर भी पड़ा।

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