2,700 की दवा 27 हजार रुपये में! सुप्रीम कोर्ट ने कीमतों के अंतर पर केंद्र से पूछे सवाल

Medicine Price in India: सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं की PTR और MRP के बीच 10 गुना तक अंतर पर सवाल उठाया। 16% मार्जिन की व्यवस्था और बढ़ते दवा खर्च पर भी चर्चा हुई।

Newstrack Network
Published on: 1 Oct 2026 5:46 PM IST
Medicine PTR MRP
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Supreme Court Medicine Price 

Medicine Price in India: देश में दवाओं की आपूर्ति कीमत और मरीजों से वसूली जाने वाली अधिकतम कीमत के बीच भारी अंतर का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। कैंसर की एक दवा की खुदरा विक्रेता को आपूर्ति कीमत (PTR) करीब 2,700 रुपये और अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) 27,000 रुपये होने का उदाहरण सामने आने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कीमतों के बीच दस गुना तक के अंतर को ‘carnage’ यानी ‘नरसंहार’ जैसी स्थिति बताते हुए केंद्र सरकार से सवाल किया कि दवाओं में PTR और MRP के बीच अधिकतम 16 प्रतिशत मार्जिन की एक समान व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जा सकती।

अदालत की इस टिप्पणी के बीच देश के 322 जिलों में हुए एक उपभोक्ता सर्वे के आंकड़े भी सामने आए हैं। सर्वे में 71 प्रतिशत परिवारों ने बताया कि पिछले तीन वर्षों में उनका दवाओं पर खर्च बढ़ा है। ऐसे में एक ओर जहां सुप्रीम कोर्ट दवाओं की मूल्य व्यवस्था पर सवाल उठा रहा है, वहीं दूसरी ओर बड़ी संख्या में परिवार भी दवाओं के बढ़ते खर्च का दबाव महसूस करने की बात कह रहे हैं।

दवाओं की कीमतों में अंतर पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता

सुप्रीम कोर्ट दवाओं की कीमतों के नियमन, डॉक्टरों द्वारा जेनेरिक दवाएं लिखे जाने और औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश, 2013 के तहत दवाओं तथा चिकित्सा उपकरणों के मूल्य नियंत्रण से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रहा है। सुनवाई के दौरान कैंसर की एक ऐसी दवा का उदाहरण दिया गया, जिसकी PTR करीब 2,700 रुपये और MRP 27,000 रुपये थी।

इस पर पीठ ने सवाल उठाया कि दवा जिस कीमत पर अस्पताल या खुदरा विक्रेता तक पहुंचती है और मरीज से वसूली जा सकने वाली अधिकतम कीमत के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों होना चाहिए। अदालत ने कॉरपोरेट अस्पतालों में मरीजों को अस्पताल की अपनी या निर्धारित फार्मेसी से ही दवाएं खरीदने के लिए बाध्य किए जाने की व्यवस्था पर भी चिंता जताई।

हालांकि, किसी दवा की MRP 27,000 रुपये होने का यह मतलब नहीं है कि हर अस्पताल ने उसे इसी कीमत पर बेचा हो। लेकिन PTR और MRP के बीच दस गुना तक का अंतर रखने की गुंजाइश ने दवाओं की कीमत तय करने की व्यवस्था में पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं पर भी पड़ता है महंगी दवाओं का बोझ

अदालत ने दवाओं की ऊंची कीमतों के मुद्दे को केवल निजी मरीजों के खर्च तक सीमित नहीं माना। पीठ ने कहा कि सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के तहत इलाज होने पर महंगी दवाओं का भुगतान अंततः सरकारी धन से किया जाता है, जिसका बोझ करदाताओं तक पहुंचता है।

केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी माना कि इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। उन्होंने अधिकारियों से विचार-विमर्श के लिए समय मांगा। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि जब दवाओं की कीमत तय करने की व्यवस्था मौजूद है, तो आवश्यक और गैर-आवश्यक दवाओं के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों बना रहना चाहिए। साथ ही, सभी दवाओं में PTR से MRP तक पारदर्शी और सीमित मार्जिन की व्यवस्था की संभावना पर भी सवाल किया।

322 जिलों के सर्वे में 71% परिवारों ने बताया दवाओं का खर्च बढ़ा

लोकल सर्किल्स के उपभोक्ता सर्वे में दवाओं पर बढ़ते घरेलू खर्च की तस्वीर सामने आई है। सर्वे में देश के 322 जिलों के 70 हजार से अधिक घरेलू उपभोक्ताओं की प्रतिक्रियाएं शामिल होने की बात कही गई है। इसमें 71 प्रतिशत परिवारों ने बताया कि पिछले तीन वर्षों में उनके दवाओं के बिल में बढ़ोतरी हुई है। वहीं, केवल तीन प्रतिशत परिवारों ने खर्च घटने की बात कही।

इसके अलावा 13 प्रतिशत परिवारों ने दवाओं पर खर्च लगभग समान रहने की जानकारी दी, जबकि शेष उत्तरदाता इस बारे में स्पष्ट आकलन नहीं कर सके। यह सर्वे लोगों के अनुभव और उनके बताए गए खर्च पर आधारित है, न कि सरकारी मूल्य सूचकांक पर। इसलिए इसके आंकड़ों को आधिकारिक बाजार मूल्य वृद्धि के बराबर नहीं माना जा सकता। हालांकि, बड़ी संख्या में परिवारों द्वारा दवाओं पर खर्च बढ़ने की बात कहना घरेलू स्वास्थ्य खर्च के दबाव का संकेत जरूर है।

39% परिवारों ने दवाओं का बिल 20% तक बढ़ने की बात कही

सर्वे के मुताबिक, 39 प्रतिशत परिवारों ने दवाओं का बिल करीब 20 प्रतिशत तक बढ़ने की बात कही। वहीं, 16 प्रतिशत परिवारों ने लगभग 10 प्रतिशत तक वृद्धि बताई। आठ प्रतिशत परिवारों ने करीब 50 प्रतिशत तक और आठ प्रतिशत ने 50 प्रतिशत से भी अधिक बढ़ोतरी महसूस करने की बात कही।

सबसे अधिक दबाव उन परिवारों में दिखाई दिया, जहां लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों की दवाएं नियमित रूप से खरीदनी पड़ती हैं। करीब 70 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने मधुमेह, उच्च रक्तचाप, गठिया और कैंसर जैसी बीमारियों की विशेष दवाओं में 20 प्रतिशत से अधिक वृद्धि महसूस करने की बात कही।

वहीं, 52 प्रतिशत परिवारों ने बुखार, खांसी, सिरदर्द, आंखों की दवाओं और विटामिन जैसी सामान्य श्रेणी की दवाओं में भी 20 प्रतिशत से अधिक बढ़ोतरी बताई। आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक दवाओं में 19 प्रतिशत परिवारों ने ऐसी वृद्धि महसूस की। जबकि 15 प्रतिशत परिवारों का कहना था कि उनके यहां किसी भी श्रेणी की दवाओं में 20 प्रतिशत से ज्यादा वृद्धि नहीं हुई।

सभी दवाओं की कीमत एक ही तरीके से तय नहीं होती

दवाओं की कीमतों की मौजूदा व्यवस्था को समझना भी जरूरी है। सरकार सभी दवाओं की कीमत एक ही तरीके से निर्धारित नहीं करती। राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची में शामिल अनुसूचित दवाओं की अधिकतम कीमत राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) के नियंत्रण में होती है। वहीं, गैर-अनुसूचित दवाओं में कंपनियों को शुरुआती MRP तय करने की अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता होती है। हालांकि, इन दवाओं की कीमतों में सालाना वृद्धि को लेकर भी नियम लागू हैं।

दवाओं की कीमतों में PTR और MRP की भूमिका भी अलग-अलग होती है। PTR वह कीमत है, जिस पर दवा खुदरा विक्रेता तक पहुंचती है, जबकि MRP वह अधिकतम राशि है, जो उपभोक्ता से ली जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा चिंता मुख्य रूप से इसी बात को लेकर है कि इन दोनों कीमतों के बीच असाधारण अंतर की गुंजाइश क्यों बनी हुई है।

16% मार्जिन पर अभी अंतिम आदेश नहीं

सुप्रीम कोर्ट की 16 प्रतिशत मार्जिन वाली टिप्पणी को फिलहाल नया कानून या लागू मूल्य सीमा समझना सही नहीं होगा। अदालत ने सभी दवाओं पर 16 प्रतिशत मार्जिन लागू करने का अंतिम आदेश नहीं दिया है, बल्कि केंद्र सरकार से इस संभावना पर विचार करने और अपना पक्ष रखने को कहा है।

यदि भविष्य में ऐसी कोई समान सीमा तय होती है, तो उसका स्वरूप क्या होगा, किन दवाओं पर यह लागू होगी और निर्माता, वितरक, खुदरा विक्रेता तथा अस्पतालों के मार्जिन किस तरह निर्धारित किए जाएंगे, यह सरकार की नीति और आगे होने वाली न्यायिक सुनवाई से ही स्पष्ट होगा।

मरीजों और परिवारों पर बढ़ते खर्च का दबाव

दोनों घटनाक्रमों को साथ रखकर देखें तो मामला केवल कैंसर की एक दवा की 2,700 रुपये की आपूर्ति कीमत से 27,000 रुपये की MRP तक पहुंचने का नहीं है। मधुमेह और रक्तचाप जैसी बीमारियों में मरीजों को वर्षों तक दवाएं लेनी पड़ती हैं, जबकि कैंसर जैसी गंभीर बीमारी में महंगी दवाओं का खर्च कुछ ही महीनों में परिवार की आर्थिक स्थिति पर असर डाल सकता है।

एक ओर सर्वे में 71 प्रतिशत परिवार दवाओं पर खर्च बढ़ने की बात कह रहे हैं, तो दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट दवा की आपूर्ति कीमत और MRP के बीच दस गुना तक का अंतर देखकर सवाल उठा रहा है। अब केंद्र सरकार के सामने ऐसी मूल्य व्यवस्था बनाने की चुनौती है, जिसमें दवा उद्योग और आपूर्ति शृंखला की व्यावहारिक जरूरतें भी पूरी हों और बीमारी की मजबूरी में मरीजों से असामान्य कीमत वसूलने की गुंजाइश भी सीमित हो सके।

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