Black Friday Full Movie: अनुराग कश्यप की सबसे साहसी फिल्म कैसे बनी?

Black Friday Full Movie: अनुराग कश्यप की फिल्म Black Friday कैसे बनी? जानिए 1993 मुंबई बम धमाकों पर आधारित इस फिल्म की कहानी, डेढ़ साल की रिसर्च, कोर्ट की रोक, पायरेसी और 2007 में रिलीज होने का पूरा इतिहास।

Yogesh Mishra
Published on: 5 Nov 2026 3:31 PM IST
Black Friday Full Movie Watch | Bollywood Old Movie in Hindi | Newstrack Hindi News
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Black Friday Full Movie Watch | Bollywood Old Movie in Hindi | Newstrack Hindi News

Black Friday Full Movie Watch: 12 मार्च 1993 को मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम विस्फोटों ने पूरे देश को झकझोर दिया था। 257 लोगों की जान गई और सैकड़ों घायल हुए। लेकिन इस भयावह घटना के पीछे की साज़िश, अंडरवर्ल्ड का नेटवर्क और पुलिस की लंबी जांच आम लोगों के लिए धीरे-धीरे सामने आई। इसी जटिल कहानी को अनुराग कश्यप ने अपनी फ़िल्म ‘ब्लैक फ्राइडे’ में इस तरह पेश किया कि हिंदी सिनेमा में अपराध और आतंकवाद को दिखाने का नज़रिया ही बदल गया।

फ़िल्म 2004 में बनकर तैयार हो गई थी और उसी साल अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में दिखाई भी गई। लेकिन भारत में इसकी रिलीज़ पर अदालत ने रोक लगा दी। आख़िरकार 9 फ़रवरी 2007 को यह सिनेमाघरों तक पहुँची। इस बीच फ़िल्म की चर्चा, इसकी कानूनी लड़ाई और इसकी कथित पायरेटेड प्रतियों ने इसे एक अलग ही पहचान दे दी।

एक किताब, जिसने फ़िल्म की दिशा बदल दी

‘ब्लैक फ्राइडे’ की शुरुआत पत्रकार एस. हुसैन ज़ैदी की किताब Black Friday: The True Story of the Bombay Bomb Blasts से हुई। फ़िल्म के निर्माता अरिंदम मित्रा ने अनुराग कश्यप को यह किताब पढ़ने के लिए दी थी। शुरुआत में इस सामग्री पर एक टेलीविज़न सीरीज़ बनाने की योजना थी, लेकिन किताब पढ़ने के बाद अनुराग को लगा कि इसकी कहानी को फ़िल्म के रूप में कहना अधिक प्रभावशाली होगा। अनुराग के लिए किताब का सबसे बड़ा आकर्षण केवल बम विस्फोटों का विवरण नहीं था। उन्हें उसमें उन अनगिनत लोगों की कहानियाँ मिलीं, जिनकी ज़िंदगी एक ही दिन में बदल गई थी। किताब में पुलिस अधिकारी राकेश मारिया की जांच, अपराधियों के नेटवर्क और सरकारी एजेंसियों की कार्रवाई के साथ उन आम लोगों की त्रासदी भी थी जो अचानक हिंसा के शिकार बन गए थे।

अनुराग ने बाद में एक बातचीत में बताया था कि किताब का पहला अध्याय पढ़ते हुए उन्हें यह एहसास हुआ कि ऐसी घटना में ज़िंदगी और मौत के बीच का फ़ासला कितना अचानक और अप्रत्याशित हो सकता है। एक व्यक्ति रोज़मर्रा के काम से निकलता है, किसी विस्फोट वाली जगह से सुरक्षित गुजर जाता है, लेकिन कुछ ही देर बाद दूसरी जगह हुए धमाके में मारा जाता है। इसी असहज वास्तविकता ने उन्हें फ़िल्म बनाने के लिए प्रेरित किया।

डेढ़ साल का शोध और असली लोगों से बातचीत

अनुराग कश्यप जानते थे कि इतने संवेदनशील विषय पर केवल अख़बारों की रिपोर्ट और किताब के सहारे फ़िल्म बनाना पर्याप्त नहीं होगा। इसलिए उन्होंने अपनी टीम के साथ लगभग डेढ़ साल तक शोध किया। इस काम में अपर्णा चतुर्वेदी, डॉ. तुषार और देबाशीष मखीजा सहित कई लोगों ने सहयोग किया।

टीम ने पुराने अख़बारों, तस्वीरों, डॉक्यूमेंट्री फुटेज और सरकारी फ़िल्म डिवीज़न के अभिलेखों का अध्ययन किया। इसके अलावा बम विस्फोटों के पीड़ितों और उन जगहों पर काम करने वाले लोगों से भी बातचीत की गई, जहाँ धमाके हुए थे। अनुराग की दिलचस्पी केवल तबाह इमारतों को दिखाने में नहीं थी। वे यह समझना चाहते थे कि किसी विस्फोट के बाद उस जगह के लोगों की ज़िंदगी में क्या बदलता है।

फ़िल्म के लिए 1993 के मुंबई शहर को दोबारा रचना भी एक बड़ी चुनौती थी। उस समय मोबाइल फ़ोन और सैटेलाइट टेलीविज़न आम नहीं हुए थे। सड़कों पर चलने वाली गाड़ियाँ, दुकानों के बोर्ड, लोगों के कपड़े और शहर का पूरा दृश्य आज से अलग था। अनुराग को वास्तविक मुंबई में शूटिंग करते हुए इस बात का ध्यान रखना पड़ता था कि फ्रेम में आधुनिक दौर की कोई ऐसी चीज़ न आ जाए जो कहानी के समय से मेल न खाती हो।

कैमरे के सामने नहीं, किरदारों के भीतर उतरते कलाकार

फ़िल्म की कास्टिंग इसकी सबसे बड़ी खूबियों में से एक थी। अनुराग कश्यप ने बड़े सितारों के बजाय ऐसे कलाकारों को चुना जो अपने किरदारों में पूरी तरह घुल-मिल सकें। फ़िल्म में के. के. मेनन, पवन मल्होत्रा, आदित्य श्रीवास्तव, किशोर कदम, दिव्येंदु भट्टाचार्य, ज़ाकिर हुसैन और विजय मौर्य जैसे कलाकार दिखाई दिए।

के. के. मेनन ने जांच अधिकारी राकेश मारिया का किरदार निभाया। पवन मल्होत्रा ने टाइगर मेमन की भूमिका की, जबकि आदित्य श्रीवास्तव ने बादशाह ख़ान का किरदार निभाया, वह व्यक्ति जिसकी कहानी पुलिस जांच को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण बनती है।

दिलचस्प बात यह है कि बादशाह ख़ान का किरदार शुरू में आदित्य श्रीवास्तव के लिए तय नहीं था। अभिनेता ने बाद में बताया कि उनकी जगह इस भूमिका के लिए के. के. मेनन या नसीरुद्दीन शाह के बारे में विचार किया जा रहा था। अंततः यह भूमिका उन्हें मिली और उनके करियर की यादगार भूमिकाओं में शामिल हो गई।

अनुराग का मानना था कि कलाकारों को किरदारों को निभाने के बजाय उनके स्वभाव और व्यवहार को समझना चाहिए। उन्होंने कलाकारों को किताब पढ़ने और अपने किरदारों की मानसिकता को समझने का समय दिया। उनका उद्देश्य यह था कि पर्दे पर कोई भी व्यक्ति केवल कहानी की ज़रूरत के हिसाब से बना हुआ पात्र न लगे। फ़िल्म में एक और दिलचस्प नाम इम्तियाज़ अली का है। बाद में ‘जब वी मेट’ और ‘रॉकस्टार’ जैसी फ़िल्मों से निर्देशक के रूप में पहचान बनाने वाले इम्तियाज़ ने ‘ब्लैक फ्राइडे’ में याकूब मेमन का किरदार निभाया। उन्होंने बाद में मज़ाकिया अंदाज़ में बताया कि अनुराग ने उन्हें यह भूमिका करने के लिए भावनात्मक दबाव तक डाला था। इम्तियाज़ के मुताबिक, अनुराग ने उनसे कहा था कि जब वह उनके लिए कुछ भी कर सकते हैं, तो इम्तियाज़ उनके लिए एक भूमिका क्यों नहीं निभा सकते!

यह छोटी-सी कास्टिंग कहानी बताती है कि फ़िल्म के निर्माण में अनुराग के आसपास उस समय किस तरह के सहयोगी और मित्र मौजूद थे।

छिपे कैमरों से मुंबई की सड़कों पर शूटिंग

‘ब्लैक फ्राइडे’ की सबसे चर्चित निर्माण-कहानियों में से एक इसकी लोकेशन शूटिंग है। फ़िल्म को वास्तविक मुंबई के बीच शूट किया गया था। कई जगहों पर औपचारिक अनुमति मिलना मुश्किल था और कुछ इलाक़ों में कैमरा निकालते ही भीड़ जमा होने का ख़तरा था।

अभिनेता दिव्येंदु भट्टाचार्य ने बाद में बताया कि टीम ने कई जगहों पर बिना अनुमति या बहुत सीमित इंतज़ाम के साथ शूटिंग की। कुछ दृश्यों के लिए छिपे कैमरों और तेज़ी से काम करने वाली छोटी यूनिट का सहारा लिया गया। इसे गोरिल्ला फ़िल्ममेकिंग कहा जाता है—यानी ऐसी शूटिंग जिसमें बड़े उपकरणों और भारी-भरकम सेटअप के बजाय कम संसाधनों के साथ वास्तविक माहौल में दृश्य रिकॉर्ड किए जाते हैं।

अनुराग के सामने सबसे कठिन काम 1993 के मुंबई को कैमरे में कैद करना था। शहर की असली सड़कों पर शूटिंग करनी थी, लेकिन साथ ही आज के मुंबई को फ्रेम से हटाना भी था। आधुनिक गाड़ियाँ, मोबाइल फ़ोन और बदले हुए बाज़ार दृश्य में आ जाते तो फ़िल्म का समय-संदर्भ टूट जाता।

फ़िल्म की शूटिंग भारत के साथ संयुक्त अरब अमीरात में भी हुई। एक रिपोर्ट के अनुसार, पूरी फ़िल्म लगभग 68 दिनों में शूट की गई थी। सीमित समय और बजट के बावजूद अनुराग ने वास्तविक लोकेशनों को प्राथमिकता दी, क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि मुंबई किसी स्टूडियो में बनाया गया कृत्रिम शहर लगे।

कहानी कहने का अलग तरीका

‘ब्लैक फ्राइडे’ की संरचना भी उस दौर की हिंदी फ़िल्मों से अलग थी। अनुराग के सामने बहुत सारी घटनाएँ और पात्र थे। उनके पास विकल्प था कि वे कहानी को केवल बादशाह ख़ान के दृष्टिकोण से दिखाएँ, केवल पुलिस अधिकारी की नज़र से सुनाएँ या फिर एक अपेक्षाकृत वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण अपनाएँ।

आख़िरकार उन्होंने तीसरा रास्ता चुना। फ़िल्म विस्फोटों से शुरू होती है, फिर पुलिस जांच की प्रक्रिया में प्रवेश करती है और धीरे-धीरे उन लोगों की दुनिया तक पहुँचती है जो इस साज़िश में शामिल थे। इस संरचना के कारण दर्शक किसी एक पात्र के साथ नहीं बंधता, बल्कि पूरी घटना और उसके अलग-अलग पक्षों को देखता है।

अनुराग ने किताब की हर घटना को फ़िल्म में शामिल नहीं किया। उन्होंने कई प्रसंग हटाए और कहानी को उन घटनाओं तक सीमित रखा जो फ़िल्म की मुख्य संरचना के लिए ज़रूरी थीं। उन्होंने एक बातचीत में कहा था कि किताब में मौजूद बहुत-सी सामग्री फ़िल्म में नहीं रखी गई। यह चयन इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि वास्तविक घटनाओं पर आधारित फ़िल्म में हर जानकारी शामिल करना संभव नहीं होता; कहानी को स्पष्ट और प्रभावी बनाए रखने के लिए संपादन और चयन उतने ही ज़रूरी होते हैं जितना शोध।

कैमरा और ध्वनि से पैदा हुआ बेचैनी का माहौल

फ़िल्म के छायांकन की ज़िम्मेदारी नटराजन सुब्रमण्यम ने संभाली, जिन्हें नटराज के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने हैंडहेल्ड कैमरे, वास्तविक लोकेशन और अपेक्षाकृत प्राकृतिक रोशनी का इस्तेमाल करते हुए ऐसी दृश्य-भाषा तैयार की जो फ़िल्म को डॉक्यूमेंट्री के करीब ले जाती है।

कैमरा कई बार पात्रों के पीछे-पीछे चलता है। फ्रेम में अनावश्यक चमक या सजावट नहीं है। पूछताछ, पीछा करने और पुलिस कार्रवाई के दृश्य किसी पारंपरिक एक्शन फ़िल्म की तरह व्यवस्थित नहीं लगते। उनमें जल्दबाज़ी, भ्रम और तनाव का अनुभव होता है।

फ़िल्म की एडिटिंग आरती बजाज ने की। इसकी लंबाई और घटनाओं की जटिलता को देखते हुए संपादन बेहद महत्वपूर्ण था। फ़िल्म में कई पात्र और घटनाएँ हैं, लेकिन संपादन उन्हें एक बड़े घटनाक्रम में जोड़ता है। कहानी में आगे-पीछे जाने के बावजूद दर्शक जांच की दिशा और उसके परिणामों से जुड़ा रहता है।

ध्वनि और संगीत ने भी इस माहौल को गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अनुराग ने पारंपरिक बॉलीवुड संगीतकारों के बजाय इंडियन ओशन बैंड को चुना। बैंड ने फ़िल्म का संगीत और बैकग्राउंड स्कोर तैयार किया। यह उनका किसी फ़िल्म के लिए पहला बड़ा साउंडट्रैक प्रोजेक्ट था।

अनुराग को ऐसा संगीत चाहिए था जो मुंबई की बेचैनी, सामाजिक तनाव और कहानी के भीतर मौजूद गुस्से को व्यक्त कर सके। इंडियन ओशन की ध्वनि में लोक, रॉक और प्रयोगधर्मी संगीत का मेल था। इसने फ़िल्म को पारंपरिक हिंदी फ़िल्मों से अलग पहचान दी। एल्बम में शामिल ‘बंदेह’ विशेष रूप से चर्चित हुआ। यह गीत फ़िल्म के माहौल के साथ इस तरह जुड़ता है कि वह केवल मनोरंजन के लिए रखा गया गाना नहीं लगता, बल्कि कहानी की बेचैनी और उसके भावनात्मक तनाव को आगे बढ़ाता है।

रिलीज़ से ठीक पहले अदालत की रोक

‘ब्लैक फ्राइडे’ का सबसे नाटकीय अध्याय उसके निर्माण के बाद शुरू हुआ। फ़िल्म मई 2004 तक पूरी हो चुकी थी। उसी साल 13 अगस्त को इसका प्रीमियर लोकार्नो अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह में हुआ। वहाँ इसे प्रदर्शित किया गया और दूसरे फ़िल्म समारोहों में भी इसकी चर्चा होने लगी।

भारत में फ़िल्म की रिलीज़ जनवरी 2005 के लिए तय की गई थी। लेकिन रिलीज़ से ठीक एक दिन पहले, 27 जनवरी 2005 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने इसके प्रदर्शन पर रोक लगा दी। 1993 बम विस्फोट मामले के कुछ आरोपियों ने अदालत में याचिका दायर की थी कि फ़िल्म की रिलीज़ से मुकदमे पर असर पड़ सकता है और लोगों के मन में आरोपियों के प्रति पहले से धारणा बन सकती है। इससे पहले फ़िल्म के प्रचार में इस्तेमाल किए गए टैगलाइन के शब्द ‘True Story’ पर भी आपत्ति उठाई गई थी। निर्माताओं ने अदालत के सामने इसे हटाने पर सहमति दी थी। फ़िल्म की शुरुआत में एक डिस्क्लेमर देने की शर्त भी रखी गई थी, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि फ़िल्म एक पुस्तक पर आधारित है और उसमें दिखाए गए पात्रों के दोषी या निर्दोष होने का अंतिम निर्णय नहीं सुनाया जा रहा।

इसके बावजूद रिलीज़ पर रोक लग गई। मामला केवल फ़िल्म की सेंसर मंज़ूरी का नहीं था; अदालत के सामने यह सवाल था कि चल रहे मुकदमे के दौरान फ़िल्म दिखाने से न्यायिक प्रक्रिया या जनमत प्रभावित हो सकता है या नहीं।

सितंबर 2006 में 1993 बम विस्फोट मामले में विशेष टाडा अदालत के फैसले आने शुरू हुए। इसके बाद फ़िल्म के निर्माताओं ने सुप्रीम कोर्ट में रिलीज़ का रास्ता साफ़ करने के लिए गुहार लगाई। अंततः फ़िल्म को सिनेमाघरों में प्रदर्शित करने की अनुमति मिली और 9 फ़रवरी 2007 को यह भारत में रिलीज़ हुई।

इस तरह फ़िल्म के तैयार होने और भारतीय सिनेमाघरों तक पहुँचने के बीच लगभग तीन साल का अंतर आ गया। अभिनेता आदित्य श्रीवास्तव ने बाद में कहा कि इस देरी ने फ़िल्म के व्यावसायिक अवसरों को नुकसान पहुँचाया। उनके मुताबिक, यदि फ़िल्म समय पर रिलीज़ हो जाती तो उसे उस समय की चर्चा और उत्सुकता का अधिक लाभ मिल सकता था।

पायरेसी और रिलीज़ से पहले बनी अलग पहचान

रिलीज़ रुकने का एक अनपेक्षित परिणाम यह भी हुआ कि फ़िल्म की पायरेटेड प्रतियाँ फैलने लगीं। अनुराग कश्यप ने बाद की बातचीत में बताया कि फ़िल्म रिलीज़ नहीं हो पा रही थी, लेकिन उसकी प्रतियाँ लोगों तक पहुँच रही थीं। इस तरह कुछ दर्शकों ने उसे सिनेमाघरों में आने से पहले ही देख लिया था।

यह स्थिति किसी भी निर्माता के लिए आर्थिक और रचनात्मक, दोनों स्तरों पर नुकसानदेह थी। जिस फ़िल्म को बड़े पर्दे पर दिखाने के लिए बनाया गया था, वह आधिकारिक रिलीज़ से पहले ही अनधिकृत तरीकों से देखी जाने लगी। इसके बावजूद फ़िल्म की प्रतिष्ठा कम नहीं हुई। अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में उसकी उपस्थिति और आलोचकों की प्रतिक्रियाओं ने उसे पहले ही एक महत्वपूर्ण स्वतंत्र फ़िल्म के रूप में स्थापित कर दिया था।

आलोचकों की सराहना और भारतीय सिनेमा पर प्रभाव

जब ‘ब्लैक फ्राइडे’ भारतीय सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई तो इसे आलोचकों से व्यापक प्रशंसा मिली। दर्शकों के एक बड़े हिस्से के लिए यह आसान फ़िल्म नहीं थी। इसकी लंबाई लगभग 162 मिनट थी और इसमें पारंपरिक हिंदी सिनेमा वाले गीत, रोमांस या राहत देने वाले हास्य दृश्य नहीं थे। कहानी लगातार तनाव और बेचैनी के साथ आगे बढ़ती है।

व्यावसायिक स्तर पर यह कोई विशाल हिट नहीं बनी, लेकिन इसकी प्रतिष्ठा समय के साथ बढ़ती गई। इसे लॉस एंजिलिस के इंडियन फ़िल्म फ़ेस्टिवल में ग्रैंड ज्यूरी पुरस्कार मिला और लोकार्नो फ़िल्म समारोह में यह गोल्डन लेपर्ड पुरस्कार के लिए नामांकित भी हुई।

इस फ़िल्म का प्रभाव केवल इसके विषय तक सीमित नहीं था। इसने दिखाया कि वास्तविक घटनाओं पर आधारित हिंदी फ़िल्म में असली नामों, वास्तविक जगहों और जटिल राजनीतिक-सामाजिक संदर्भों का इस्तेमाल किया जा सकता है। अपराध को केवल एक खलनायक और उसे पकड़ने वाले नायक की कहानी बनाना ज़रूरी नहीं है। पुलिस की जांच, मुखबिरों की भूमिका, अपराधियों के आपसी संबंध, गवाहों की स्थिति और पीड़ितों का अनुभव, इन सभी को एक ही फ़िल्म में जगह दी जा सकती है।

बाद के वर्षों में भारतीय सिनेमा और वेब सीरीज़ में जिस तरह अपराध-जांच की कहानियों को अधिक यथार्थवादी और बहुस्तरीय ढंग से दिखाया जाने लगा, उसमें ‘ब्लैक फ्राइडे’ की विरासत को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

एक ऐसी फ़िल्म, जिसने अपने समय से टकराने का जोखिम उठाया

‘ब्लैक फ्राइडे’ को आज भी याद करने की वजह केवल यह नहीं है कि उसने 1993 के मुंबई बम विस्फोटों की कहानी कही। इसकी असली ताक़त यह है कि उसने उस घटना को किसी एक आसान निष्कर्ष में बंद नहीं किया। उसने अपराध, आतंक, पुलिस जांच, व्यक्तिगत टूटन और शहर के बदलते सामाजिक माहौल को एक साथ देखने की कोशिश की।

अनुराग कश्यप ने दर्शकों को यह सुविधा नहीं दी कि वे पूरी कहानी को केवल अच्छे और बुरे लोगों के बीच की लड़ाई मानकर देख लें। फ़िल्म उनसे घटनाओं को ध्यान से देखने, उनके पीछे की परिस्थितियों को समझने और हिंसा के वास्तविक परिणामों का सामना करने की अपेक्षा करती है।

इसकी रिलीज़ पर लगी रोक ने इसे इतिहास में एक अलग जगह दी, लेकिन इसकी अहमियत केवल विवाद से पैदा नहीं हुई। डेढ़ साल का शोध, असली लोगों से बातचीत, छिपे कैमरों से शूटिंग, कलाकारों का चयन और इंडियन ओशन का असामान्य संगीत - इन सबने मिलकर इसे एक ऐसी फ़िल्म बनाया जिसकी सिनेमाई भाषा अपने समय से आगे थी।

‘ब्लैक फ्राइडे’ ने साबित किया कि सिनेमा केवल मनोरंजन या किसी घटना का पुनर्निर्माण नहीं है। वह इतिहास के उन हिस्सों को भी सामने ला सकता है जिनसे समाज असहज होता है। शायद यही वजह है कि दो दशक से अधिक समय बाद भी यह फ़िल्म भारतीय अपराध सिनेमा की सबसे महत्वपूर्ण और साहसी कृतियों में गिनी जाती है।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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