Amitabh Bachchan Black Film: अमिताभ बच्चन और रानी मुखर्जी की ‘ब्लैक’ सिर्फ फिल्म नहीं,

Amitabh Bachchan Black Film: संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘ब्लैक’ में रानी मुखर्जी और अमिताभ बच्चन ने शिक्षा, विकलांगता, स्मृति और मानवीय रिश्तों की गहरी कहानी पेश की।

Yogesh Mishra
Published on: 29 Oct 2026 3:33 PM IST (Updated on: 29 Oct 2026 3:49 PM IST)
Bollywood Black Film Review Story | Sanjay Leela Bhansali Best Movie. Black Film | Newstrack Hindi
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Bollywood Black Film Review Story | Sanjay Leela Bhansali Best Movie. Black Film | Newstrack Hindi 

Bollywood Black Film: 2005 में संजय लीला भंसाली की फ़िल्म ‘ब्लैक’ आई। उसने हिंदी सिनेमा के सामने एक ऐसा अनुभव रखा, जिसमें कहानी कहने के लिए संवादों से अधिक दृश्य, ध्वनि से अधिक मौन और पारंपरिक भावुकता से अधिक आंतरिक बेचैनी पर भरोसा किया गया।

‘ब्लैक’ केवल एक दृष्टिहीन और श्रवणबाधित लड़की की कहानी नहीं है। यह भाषा, चेतना, शिक्षा, स्मृति और मानवीय संबंधों की कहानी है। यह पूछती है कि जब किसी मनुष्य के लिए दुनिया की सामान्य संवेदी राहें बंद हों, तो वह अपने आसपास के संसार तक कैसे पहुँचेगा? शिक्षा का अर्थ क्या केवल ज्ञान देना है, या किसी व्यक्ति को अपनी चेतना और पहचान तक पहुँचने का रास्ता देना भी है? और जब स्मृतियाँ मिटने लगें, तब क्या प्रेम किसी रिश्ते को जीवित रख सकता है?

इन प्रश्नों ने ‘ब्लैक’ को एक प्रेरणादायक कथा से आगे बढ़ाकर गहरे मानवीय अनुभव में बदल दिया।

संजय लीला भंसाली के सिनेमा में भावनाओं की तीव्रता हमेशा महत्वपूर्ण रही है। लेकिन ‘ब्लैक’ में उन्होंने बाहरी भव्यता के बजाय मनुष्य के भीतर मौजूद अंधकार, अकेलेपन और संघर्ष को केंद्र में रखा। फ़िल्म का वातावरण ठंडा, रहस्यमय और कई बार स्वप्न जैसा लगता है। यहाँ अंधेरा केवल प्रकाश का अभाव नहीं, बल्कि उस दुनिया का रूपक है जहाँ अर्थ, भाषा और पहचान तक पहुँचना एक कठिन संघर्ष है। फ़िल्म की प्रेरणा हेलेन केलर और उनकी शिक्षिका ऐन सुलिवन की जीवन-कथा से जुड़ी थी, लेकिन भंसाली ने इसे सीधे जीवनीपरक पुनर्कथन के रूप में प्रस्तुत नहीं किया। उन्होंने इस प्रेरणा को भारतीय भावनात्मक और सिनेमाई संदर्भ में ढालते हुए चेतना के विकास और दो मनुष्यों के बीच बनते असाधारण संबंध की कहानी रची।

ब्लैक फिल्म कब रिलीज हुई थी?

संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘ब्लैक’ वर्ष 2005 में रिलीज हुई थी।

ब्लैक फिल्म में मुख्य भूमिकाएं किसने निभाई थीं?

फिल्म में अमिताभ बच्चन ने देबराज सहाय और रानी मुखर्जी ने मिशेल मैकनैली की भूमिका निभाई थी।

ब्लैक फिल्म किस विषय पर आधारित है?

यह फिल्म एक दृष्टिहीन और श्रवणबाधित लड़की की शिक्षा, आत्मनिर्भरता और पहचान की यात्रा के साथ उसके शिक्षक से विकसित होने वाले संबंध को दिखाती है।

ब्लैक फिल्म का मुख्य संदेश क्या है?

फिल्म का मुख्य विचार है कि शिक्षा केवल जानकारी देने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि व्यक्ति को संवाद, स्वतंत्रता और अपनी पहचान विकसित करने के अवसर देने का माध्यम भी है।

Q5. ब्लैक फिल्म में देबराज सहाय को कौन-सी बीमारी होती है?

कहानी के बाद के हिस्से में देबराज सहाय अल्जाइमर से जूझते दिखाई देते हैं। इससे फिल्म स्मृति, पहचान और रिश्तों के महत्व पर सवाल उठाती है।

रानी मुखर्जी: अभिनय, जो शब्दों के बिना बोलता है

रानी मुखर्जी का मिशेल मैकनैली का किरदार हिंदी सिनेमा की सबसे चुनौतीपूर्ण अभिनय भूमिकाओं में गिना जाना चाहिए। इस भूमिका में उन्हें केवल दृष्टिहीनता और श्रवणबाधा से जुड़े शारीरिक व्यवहार को प्रस्तुत नहीं करना था, बल्कि एक ऐसी लड़की की आंतरिक दुनिया को भी अभिव्यक्त करना था, जिसके पास अपनी इच्छाएँ, भय और भावनाएँ व्यक्त करने के सामान्य साधन नहीं हैं।

फ़िल्म के शुरुआती हिस्सों में मिशेल का व्यवहार उग्र, अस्थिर और कई बार हिंसक दिखाई देता है। वह अपने आसपास की दुनिया को समझ नहीं पाती। उसकी बेचैनी केवल स्वभाव की समस्या नहीं, बल्कि संवाद और अर्थ तक पहुँच न पाने से पैदा हुई निराशा का परिणाम है।

रानी मुखर्जी ने इस भूमिका में चेहरे, हाथों, शरीर की गति और प्रतिक्रियाओं के जरिए भावनाओं की एक विस्तृत दुनिया रची। उनके अभिनय में क्रोध, भय, जिज्ञासा, असहायता और सीखने की इच्छा एक साथ दिखाई देती हैं। जब मिशेल पहली बार किसी शब्द और उसके अर्थ के बीच संबंध को समझने लगती है, तब वह केवल एक लड़की के सीखने का क्षण नहीं रहता। वह उस पूरी चेतना के खुलने का दृश्य बन जाता है, जो अब तक अपने आसपास की दुनिया से जुड़ने का रास्ता तलाश रही थी।

इस दृश्य की शक्ति इसलिए भी असाधारण है कि फ़िल्म इसे केवल संवादों के सहारे नहीं समझाती। अभिनय, ध्वनि, स्पर्श और प्रतिक्रिया मिलकर दर्शक को उस अनुभव के करीब ले जाते हैं।

रानी मुखर्जी मिशेल को दया की पात्र नहीं बनातीं। वह जिद्दी है, गुस्सा करती है, असफल होती है और फिर कोशिश करती है। उसमें इच्छाशक्ति है और अपनी स्वतंत्र पहचान पाने की आकांक्षा भी। फ़िल्म की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक यही है कि वह मिशेल को उसकी विकलांगता तक सीमित नहीं करती। वह उसे एक संपूर्ण मनुष्य की तरह प्रस्तुत करती है, कमियों, संघर्षों, इच्छाओं और संभावनाओं के साथ।

अमिताभ बच्चन: एक शिक्षक, जो स्वयं भी टूटा हुआ है

अमिताभ बच्चन का देबराज सहाय हिंदी सिनेमा के उनके सबसे जटिल और यादगार किरदारों में से एक है। वह पारंपरिक अर्थों में आदर्श शिक्षक नहीं है। उसके भीतर कठोरता है, अकेलापन है और अपने अतीत से जुड़ी टूटन भी। वह शराब की समस्या से जूझता है, लेकिन उसके भीतर यह विश्वास बचा हुआ है कि मिशेल को दुनिया तक पहुँचने का रास्ता सिखाया जा सकता है। देबराज मिशेल को केवल अनुशासन नहीं सिखाते। वे उसके भीतर भाषा और अर्थ के बीच संबंध स्थापित करने की कोशिश करते हैं। वे उसे यह समझने में मदद करते हैं कि दुनिया की चीजों के नाम हैं, अनुभवों को अर्थ दिया जा सकता है और मनुष्य अपने आसपास के संसार से संवाद स्थापित कर सकता है। इस प्रक्रिया में देबराज का तरीका कठोर है। वह कई बार मिशेल को उसकी सीमाओं से आगे धकेलता है। फ़िल्म उनके संबंध को आसान या आदर्शवादी बनाकर प्रस्तुत नहीं करती; उसमें संघर्ष है, असहमति है और असफलता भी। लेकिन इसी कठिन प्रक्रिया के भीतर विश्वास का निर्माण होता है।

अमिताभ बच्चन के अभिनय की विशेषता यह है कि वे देबराज की कठोरता के पीछे छिपी करुणा को धीरे-धीरे सामने लाते हैं। उनका चरित्र मिशेल को रास्ता दिखाता है, लेकिन इस यात्रा में स्वयं भी बदलता है। शिक्षक और छात्रा का संबंध एकतरफा नहीं रहता। दोनों एक-दूसरे के जीवन में अर्थ पैदा करने लगते हैं। यहीं से ‘ब्लैक’ की कहानी एक गहरी भावनात्मक दिशा ग्रहण करती है, जो अंततः स्मृति और पहचान के संकट तक पहुँचती है।

विकलांगता नहीं, चेतना और स्वतंत्रता की कहानी

‘ब्लैक’ की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक उसका विकलांगता को देखने का दृष्टिकोण है। फ़िल्म मिशेल को केवल उसकी शारीरिक सीमाओं के आधार पर परिभाषित नहीं करती। वह यह दिखाती है कि किसी व्यक्ति की संभावनाएँ केवल इस बात से तय नहीं होतीं कि वह दुनिया को किस तरह देखता या सुनता है।

मिशेल के लिए शिक्षा का अर्थ दूसरों की तरह बन जाना नहीं है। उसका अर्थ है अपने अनुभवों को समझने, अपनी इच्छाओं को व्यक्त करने और अपनी स्वतंत्र पहचान स्थापित करने की क्षमता हासिल करना।

इस दृष्टि से देबराज का काम केवल उसे पढ़ाना नहीं, बल्कि उसके लिए संवाद और आत्मनिर्भरता के रास्ते खोलना है। मिशेल की प्रगति का महत्व इसलिए नहीं है कि वह समाज द्वारा निर्धारित किसी आदर्श के करीब पहुँचती है, बल्कि इसलिए है कि वह अपने जीवन और अनुभवों को स्वयं अर्थ देने लगती है।

फ़िल्म यहाँ एक व्यापक सामाजिक प्रश्न भी उठाती है। क्या समाज किसी व्यक्ति की क्षमताओं को समझने के बजाय उसकी सीमाओं के आधार पर उसका मूल्यांकन करता है? क्या हम उन लोगों को कमतर मान लेते हैं, जिनका दुनिया से जुड़ने का तरीका हमसे अलग है?

मिशेल की कहानी इन धारणाओं को चुनौती देती है। वह बताती है कि मनुष्य की गरिमा उसकी शारीरिक तथाकथित सामान्यता में नहीं, बल्कि उसकी चेतना, इच्छाशक्ति और अपने जीवन को अर्थ देने की क्षमता में निहित है।

हालाँकि फ़िल्म की अत्यधिक नाटकीय शैली और मिशेल की यात्रा को प्रेरणादायक कथा के रूप में प्रस्तुत करने के तरीके पर अलग-अलग दृष्टिकोण हो सकते हैं, लेकिन उसके केंद्र में मौजूद सवाल आज भी महत्वपूर्ण है कि क्या हम किसी व्यक्ति को उसकी कठिनाइयों से आगे जाकर देखने के लिए तैयार हैं?

प्रकाश, छाया और अंधकार का सिनेमाई संसार

‘ब्लैक’ की दृश्यात्मक शैली उसकी कहानी का अभिन्न हिस्सा है। फ़िल्म में अंधकार केवल कथानक की आवश्यकता नहीं, बल्कि भावनाओं को व्यक्त करने का माध्यम बन जाता है। प्रकाश और छाया के बीच का तनाव पात्रों के अकेलेपन, असुरक्षा और आंतरिक संघर्ष को लगातार सामने लाता है।

संजय लीला भंसाली ने फ़िल्म के दृश्य संसार को अत्यंत नियंत्रित रखा। गहरे रंग, ठंडा वातावरण, भारी वास्तुशिल्पीय संरचनाएँ और सीमित प्रकाश फ़िल्म को लगभग गोथिक स्वर देते हैं। घर, स्कूल और अन्य आंतरिक स्थान केवल घटनाओं की पृष्ठभूमि नहीं बनते; वे मिशेल और देबराज की मानसिक अवस्थाओं के विस्तार की तरह महसूस होते हैं। कई दृश्यों में पात्रों के चेहरे आंशिक प्रकाश में दिखाई देते हैं। इससे उनके भाव पूरी तरह स्पष्ट होने के बजाय धीरे-धीरे खुलते हैं। दर्शक को हर भावना सीधे नहीं बताई जाती; उसे पात्रों की प्रतिक्रियाओं और दृश्यात्मक संकेतों के जरिए उसे समझना पड़ता है। यह शैली कहानी को अधिक आंतरिक बनाती है। फ़िल्म दर्शक को केवल यह नहीं बताती कि पात्र क्या महसूस कर रहे हैं, बल्कि उसे उस अनुभव के करीब ले जाने की कोशिश करती है।

रवि के. चंद्रन की सिनेमैटोग्राफी इस दृश्यात्मक दृष्टि को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कैमरा कभी पात्रों के बेहद करीब जाकर उनके चेहरे और शारीरिक प्रतिक्रियाओं को पकड़ता है, तो कभी उन्हें विशाल और अंधेरे स्थानों में अकेला छोड़ देता है। इन दोनों प्रकार के दृश्यों के बीच का अंतर पात्रों की भावनात्मक स्थिति को और तीव्र बनाता है।

कॉस्ट्यूम और सेट डिज़ाइन भी फ़िल्म के वातावरण को मजबूत करते हैं। गहरे रंगों और भारी कपड़ों का प्रयोग पात्रों की दुनिया में मौजूद गंभीरता और ठंडेपन को उभारता है। दृश्यात्मक संयम के कारण फ़िल्म का संसार सामान्य यथार्थ से थोड़ा अलग, स्मृति और अनुभूति से निर्मित जगह जैसा लगता है।

ध्वनि और मौन: जब अनुभव शब्दों से आगे निकल जाता है

‘ब्लैक’ की तकनीकी उपलब्धियों में ध्वनि का प्रयोग विशेष रूप से उल्लेखनीय है। चूँकि कहानी का केंद्र ही दृष्टि, श्रवण और संवाद की सीमाएँ हैं, इसलिए ध्वनि फ़िल्म में केवल वातावरण बनाने का साधन नहीं रहती। वह दर्शक को पात्रों के अनुभव के करीब ले जाने का माध्यम बन जाती है।

फ़िल्म कई जगह सामान्य संवादों और पारंपरिक व्याख्या पर निर्भर रहने के बजाय ध्वनियों, मौन और शारीरिक प्रतिक्रियाओं के सहारे दृश्य रचती है। इससे दर्शक को लगातार यह महसूस होता है कि दुनिया का अनुभव हर व्यक्ति के लिए एक जैसा नहीं होता।

मिशेल के लिए स्पर्श और शारीरिक संकेत जिस तरह अर्थ पैदा करते हैं, वह दर्शक को भाषा की व्यापक परिभाषा पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है। भाषा केवल बोले गए शब्दों का संग्रह नहीं है। वह दूसरे व्यक्ति तक पहुँचने, अनुभव साझा करने और अपने आसपास की दुनिया को समझने का माध्यम भी है।

फ़िल्म का संगीत भी इसी वातावरण का हिस्सा है। मोंटी शर्मा की संगीत-रचना भावनाओं को किसी लोकप्रिय गीत की तरह व्यक्त करने के बजाय दृश्य के भीतर एक वातावरण तैयार करती है। धीमी धुनें और ऑर्केस्ट्रल स्वर अकेलेपन, बेचैनी और आशा के बीच बदलती भावनात्मक स्थितियों को उभारते हैं।

स्मृति का अंधकार: जब शिक्षक स्वयं रास्ता भूलने लगता है

‘ब्लैक’ का सबसे गहरा भावनात्मक मोड़ तब आता है, जब देबराज अल्ज़ाइमर से जूझने लगते हैं। अब तक कहानी का केंद्र मिशेल का सीखना और अपनी दुनिया तक पहुँचने का रास्ता खोजना था। लेकिन देबराज की स्मृति टूटने लगती है, तो कहानी की दिशा बदल जाती है।

जिस शिक्षक ने मिशेल को भाषा, पहचान और दुनिया से जुड़ने का रास्ता दिया, वही धीरे-धीरे अपनी यादों और पहचान से दूर होने लगता है। जो व्यक्ति कभी उसके लिए दुनिया का अर्थ खोलता था, अब स्वयं उस दुनिया को पहचानने में असमर्थ होने लगता है। यही भावनात्मक उलटाव फ़िल्म को साधारण प्रेरणादायक कहानी से कहीं आगे ले जाता है।

देबराज की बीमारी के साथ कहानी एक कठिन प्रश्न के सामने खड़ी होती है - यदि स्मृति ही हमारी पहचान का बड़ा हिस्सा है, तो स्मृतियाँ मिटने पर मनुष्य के भीतर क्या बचता है? क्या व्यक्ति केवल अपनी यादों, भाषा और परिचित चेहरों का नाम है? या उसका अस्तित्व उन रिश्तों में भी जीवित रहता है, जिन्हें उसने दूसरों के जीवन में बनाया है? अमिताभ बच्चन इस हिस्से में अपने अभिनय की असाधारण संवेदनशीलता दिखाते हैं। देबराज का धीरे-धीरे भूलना केवल बीमारी के लक्षणों का चित्रण नहीं है। वह उस व्यक्ति की दुनिया का बिखरना है, जिसने जीवन का बड़ा हिस्सा किसी दूसरे मनुष्य की दुनिया बनाने में लगाया था। यहाँ फ़िल्म की भावनात्मक शक्ति उसके नाटकीय विस्तार से अधिक उसके मूल विचार में निहित है। देबराज अब पहले की तरह मिशेल का मार्गदर्शन नहीं कर सकते। भूमिकाएँ बदलने लगती हैं और मिशेल उस व्यक्ति के लिए सहारा बनने की कोशिश करती है, जिसने कभी उसे सहारा दिया था।

जब शिष्या अपने शिक्षक की दुनिया बचाने लगती है

देबराज की स्मृति क्षीण होने के साथ मिशेल की यात्रा का अर्थ भी बदल जाता है। वह केवल सीखने वाली छात्रा नहीं रहती; अब वह अपने शिक्षक की बची हुई दुनिया से जुड़ने और उसे संभालने की कोशिश करती है। यहीं गुरु और शिष्या का संबंध अपनी पारंपरिक सीमाओं से आगे निकल जाता है। शुरुआत में देबराज मिशेल को दुनिया की भाषा सिखाते हैं। अंततः मिशेल उस व्यक्ति के साथ खड़ी होती है, जिसकी अपनी भाषा और स्मृति धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही है। यह बदलाव फ़िल्म की सबसे मार्मिक उपलब्धियों में से एक है। मिशेल जिस करुणा और धैर्य की सहायता से आगे बढ़ी थी, अब वही गुण देबराज के प्रति उसके व्यवहार में दिखाई देते हैं। संबंध एकतरफा नहीं रह जाता। दोनों एक-दूसरे के जीवन में अर्थ पैदा करते हैं, भले ही उनकी भूमिकाएँ बदल चुकी हों।

फ़िल्म इस रिश्ते को किसी आसान समाधान तक नहीं पहुँचाती। देबराज की बीमारी का कोई चमत्कारी अंत नहीं होता और न ही जीवन पहले जैसा हो जाता है। इसके बजाय कहानी यह स्वीकार करती है कि कुछ क्षतियाँ ऐसी होती हैं, जिन्हें पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता। लेकिन इसके बावजूद मानवीय संबंध अपना महत्व नहीं खोते। जब स्मृति कमजोर पड़ती है, तब किसी दूसरे का धैर्य सहारा बन सकता है। जब शब्दों का अर्थ धुँधला होने लगता है, तब किसी परिचित स्पर्श या उपस्थिति में अपनापन बचा रह सकता है।

आलोचनात्मक सराहना और सांस्कृतिक विरासत

रिलीज़ के बाद ‘ब्लैक’ को उसके निर्देशन, दृश्यात्मक शैली और अभिनय के लिए व्यापक आलोचनात्मक प्रशंसा मिली। अमिताभ बच्चन और रानी मुखर्जी के प्रदर्शन विशेष रूप से सराहे गए। फ़िल्म ने यह दिखाया कि मुख्यधारा हिंदी सिनेमा में भी ऐसी कहानियाँ कही जा सकती हैं, जिनमें पारंपरिक मनोरंजन के बजाय अनुभव की जटिलता और भावनात्मक चुनौती को प्राथमिकता दी जाए। इसकी सफलता का महत्व केवल व्यावसायिक प्रदर्शन से नहीं आँका जा सकता। ‘ब्लैक’ ने हिंदी सिनेमा की कलात्मक संभावनाओं को विस्तार दिया। उसने दर्शकों को एक ऐसी फ़िल्म का अनुभव कराया, जिसमें दृश्य, ध्वनि, मौन और अभिनय कहानी कहने के बराबर महत्वपूर्ण थे।

फ़िल्म की अंतरराष्ट्रीय सराहना का एक कारण भी यही था कि उसके केंद्रीय विषय सांस्कृतिक सीमाओं से परे जाते हैं। शिक्षा, स्वतंत्रता, स्मृति, बीमारी और मानवीय संबंध किसी एक समाज तक सीमित अनुभव नहीं हैं।

समय के साथ ‘ब्लैक’ की प्रतिष्ठा एक ऐसी फ़िल्म के रूप में मजबूत हुई, जो केवल प्रेरणा देने के लिए नहीं, बल्कि दर्शक को असुविधाजनक सवालों के सामने खड़ा करने के लिए भी याद की जाती है। वह हमें विकलांगता और निर्भरता को देखने के अपने तरीकों पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है। साथ ही वह यह भी दिखाती है कि किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन में धैर्यपूर्वक उपस्थित रहना कितना कठिन और कितना महत्वपूर्ण हो सकता है।

अंधकार के भीतर बची हुई रोशनी

‘ब्लैक’ की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वह अंधकार को केवल निराशा का प्रतीक बनाकर नहीं छोड़ती। फ़िल्म में अंधकार के भीतर संघर्ष है, लेकिन उसी के भीतर अर्थ खोजने की संभावना भी मौजूद है। मौन में असहायता है, लेकिन संवाद का एक दूसरा रास्ता भी है। स्मृति में पहचान है, लेकिन स्मृति टूटने के बाद भी रिश्तों की भूमिका समाप्त नहीं हो जाती।

मिशेल की यात्रा हमें बताती है कि शिक्षा किसी व्यक्ति को समाज के बनाए साँचे में ढालने का नाम नहीं, बल्कि उसे अपनी क्षमताओं और इच्छाओं के साथ जीने का रास्ता देने की प्रक्रिया है। देबराज की यात्रा हमें याद दिलाती है कि ज्ञान देने वाला व्यक्ति भी कमजोर हो सकता है, उसे भी सहारे की जरूरत पड़ सकती है और उसके भीतर भी ऐसी टूटन पैदा हो सकती है, जिसे इच्छाशक्ति अकेले नहीं रोक सकती।

इन दोनों यात्राओं का मिलन ही फ़िल्म को गहरी मानवीय त्रासदी और आशा की कहानी बनाता है।

अंततः ‘ब्लैक’ किसी चमत्कार की कहानी नहीं है। यह उन सीमाओं के भीतर संबंधों की शक्ति तलाशती है, जिन्हें जीवन हमेशा हमारे सामने रखता है। यह नहीं कहती कि प्रेम बीमारी मिटा देगा, स्मृति लौटा देगा या हर कठिनाई को दूर कर देगा। वह इससे अधिक सच्ची बात कहती है कि किसी की कठिनाई को पूरी तरह दूर न कर पाने के बावजूद हम उसके साथ रह सकते हैं। और शायद यही इस फ़िल्म का सबसे स्थायी संदेश है। मनुष्य की पहचान केवल उन बातों से नहीं बनती, जिन्हें वह याद रखता है, बोलता है या देख पाता है। वह उन रिश्तों से भी बनती है, जिनमें उसे समझा गया, स्वीकार किया गया और अकेला नहीं छोड़ा गया। इसीलिए इतने वर्षों बाद भी ‘ब्लैक’ केवल एक पुरस्कार-विजेता फ़िल्म की तरह याद नहीं आती। वह एक ऐसे मानवीय अनुभव की तरह लौटती है, जहाँ अंधकार के भीतर भी स्पर्श, भाषा, स्मृति और प्रेम अपना अर्थ तलाशते रहते हैं।

क्योंकि कभी-कभी किसी दूसरे मनुष्य के लिए रोशनी बनने का अर्थ उसके अंधकार को मिटा देना नहीं, बल्कि उस अंधकार में उसका हाथ थामे रहना होता है।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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